फिल्म समीक्षा: पार्च्ड : बेहतरीन, असरदार

निर्माता : अजय देवगन   निर्देशिका: लीना यादव

कलाकार: राधिका आप्टे, सुरवीन चावला, तनिष्ठा चटर्जी और आदिल हुसैन

हिन्दी फिल्मों का दौर बदलाव से गुजर रहा है। लेखक निर्देशक वो कहानियां ला रहे हैं जिसको फिल्म के रूप में पहले देखा ही नहीं जा सकता था। निर्माता भी अब दिल खोलकर ऐसी फिल्मों पर पैसा लगा रहे हैं। इस सप्ताह प्रदर्शित हुई आधा दर्जन से ज्यादा फिल्मों में एकमात्र पार्च्डऐसी फिल्म है, जिसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। लेकिन अफसोस इस फिल्म को बेहद सीमित सिनेमा घर और शो मिले हैं। वितरकों को इस फिल्म की सफलता पर संशय है शायद इसलिए।

पिछले सप्ताह दमदार पिंक देखने के बाद इस सप्ताह पार्च्ड देखकर दिल खुश हो गया। शहरी संस्कृति से इतर गांव की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म वहां ले जाती है जहां अब फिल्मों ने जाना बन्द कर दिया है। आधुनिकता की बयार वहां भी बह रही है लेकिन औरतों के लिए कुछ नहीं बदला है। वही समाज है, वही पुरुषवादी नजरिया है। तारीफ करेंगे निर्देशिका लीना यादव की जो हमें पार्च्डके जरिए उसी दुनिया में लेकर जाती है जहां औरतें अपने ढंग से प्रतिकार करती हैं, मस्ती करती हैं और उनमें अपने ढंग से जीवन जीने की हसरत कूट-कूटकर भरी हुई है। लीना यादव इससे पहले शब्द’ (संजय दत्त, ऐश्वर्या राय) और तीन पत्ती’ (अमिताभ बच्चन, श्रद्धा कपूर) जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुकी हैं।

यह कहानी गांव की चार महिलाओं की, जिनके जरिए फिल्मकार ने घरेलू हिंसा, बाल विवाह, अकेलापन, कामकाजी महिलाओं पर नकेल, महिला शिक्षा की खिलाफत और सदियों से चली आ रही समाज की रूढि़वादी सोच को फिल्म में उजागर किया है। इन चारों महिलाओं के किरदार में हैं तनिष्ठा चटर्जी, राधिका आप्टे, सुरवीन चावला और लहर खान… फिल्म में इनके साथ हैं आदिल हुसैन और सुमीत व्यास। कहानी में हर वह पहलू है जो एक अच्छे सिनेमा में होना चाहिए। खास यह कि चारों औरतें परिस्थितियों की शिकार हैं लेकिन जब चारों साथ होती हैं तो वह मस्ती का कोई पल हाथ से गुजरने नहीं देतीं

कथा-पटकथा, संवाद और लेखन के स्तर पर यह फिल्म खरी उतरी है। दर्शक कहीं भी बोरियत महसूस नहीं करता है। यह लेखक निर्देशक की खूबी है। पटकथा दर्शकों को अपने साथ आगे लेकर चलती है। दृश्यों का फिल्मांकन प्रभावी है, उस पर सोने पे सुहागा किरदारों के जज्बात हैं । देखने में तो यह आम कहानी लगती है लेकिन अपने प्रस्तुतीकरण के कारण यह दर्शकों को झकझोरती है। सिनेमैटोग्राफर ने राजस्थान की रेत को खूबसूरती से फिल्माया है। रेत पर उभरती लकीरों के जरिए उन्होंने भावनाओं और जज्बातों को जिस अंदाज में उकेरा है वह काबिल-ए-तारीफ है।

लीना यादव का निर्देशन दमदार है। गीत-संगीत और पार्श्व संगीत फिल्म के अनुरूप है। बस के ऊपर फिल्माया गया गीत प्रभाव छोडता है। पिछले सप्ताह पिंकको सफल बनाने वाले दर्शकों के लिए पार्च्डएक और बेहतरीन वीकएंड का मौका है, चूकना नहीं चाहिए। इस तरह की फिल्मों की सफलता मिलनी चाहिए।

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