0201- Ved Pal Singh

कविता:

मेरा मन………………………………
फटकने नहीं देते हम किसी को पास अपने मन के,
कोई फ़क़ीर ज़हीन आलिम हो या हो दहशतगर्द कंजर।
लगने नही दी है हवा अभी तक हमने मन को अपने,
पास आकर देख लेना ना नमी मिलेगी ना खुश्क मंजर।
छूने की बात न करो मन को हमारे हवाओं की तरह,
कभी खूशबूए चमन देता नहीं है इलाक़ाए ज़मीने बंजर।
इज़ाज़त भी नहीं देते हम कि टटोले कोई मन हमारा,
क्योंकि छिपा के रखे हैं वहाँ हमने हजारों जख्मे खंजर।
अरसे से सह सहकर जख्म अब वो बेज़ार हो गया है,
वो खुद बुत बन गया और पत्थर हो गया उसका पंजर।
ना चाह रखता कोई ना कुछ दे सकता है किसी को,
बे हरकत बे काम रहता है जैसे कोई बे आब का झंझर।


कविता :

आया सावन का महीना ……………….
आया सावन का महीना मन झूम झूम के जाये,
फूटें नई कोपल सी बदन थिरक थिरक के जाये।
फूल से खिलें जिगर में और इंद्र धनुष सा छाये,
दिल में चटकी कली सी शरीर में हिलौर जगाये।
चलती भीगी सी पुरवाई मेरी देह अकड़ सी जाये,
धरती के ऊपर अम्बर में बादल की चादर छाये।
निर्मल जल की बूँदें धरती पर मंद मंद बरसाये,
चमक चमक के बिजली तड़तड़ का शोर मचाये।
जब ढंडी लगती फुहारे आँख मिचीँ होठ मुस्काये,
हर अंग अंग मटकता और जोड़ जोड़ खुल जाये।
सपनों के आँगन खुशियों का झूला सजता जाये,
मेरा बैठ उसमे मन मयूर ऊँची ऊँची पींग बढ़ाये।
है राह आँगन सब गीला रपटने को जी ललचाये,
पग सीधे ना पड़ते चलना ठुमक ठुमक के भाये।
गिरता झरने का पानी मधुर जल संगीत सुनाये,
बहता नदिया का नीर कलकल गीत गाता जाये।
सावन है शिव का महीना हर मंदिर सजता जाये,
बम बम भोले के शोर में शिव गंगाजल से नहाये।


कविता :

में जिंदगी हार गया ………
दौड़ता रहा जिंदगी भर बे सबब,
हर रोज़ मुझे चढ़ता खुमार गया।
आखिर नशा टूटा तो होश आया,
कि मैं मुफ्त में जिंदगी हार गया।
समझता रहा जिसे अपना साया,
वक्त पे तोड़ सारा सरोकार गया।
सोचा था कि एक हमसफ़र मिले,
जो मिला वो जीते जी मार गया।
असल में तो कुछ मिला ही नही,
जिंदगी से जो मिला बेकार गया।
मैं बाबत क्या कहूँ अब रिश्तों की,
हर रिश्ता कर जीना दुश्वार गया।
उससे रिश्ता था वो भी अपना था,
जिसका खंजर दिल के पार गया।
बैठा हूँ जिंदगी का सुकून गवां के,
जीने का मकसद गया सार गया।


कविता :

दहशतगर्दों की रूहें ……………
काबिले बददुआ हैं वे सभी जमींदोज़ रूहें,
जिन्होंने जीते जी गलत काम किया था।
कबीलों की आड़ में बने रहे मज़हब वाले,
और दहशत को ही बस अंजाम दिया था।

खुद तो चले गए कब्र में आराम फरमाने,
छोड़ गए जिन्हे दहशत के लिए ही पाला।
काफी मुश्किलों से बना था जहां गुलिस्ता,
इन नाफ़रमानों ने इसे दोजख बना डाला।

मज़हब के नाम पर सियासत करने वाले,
बन्दों के बीच अजब दीवार खड़ी कर गए।
ऐसी खींच गए सरहद मजहब के नाम पर,
ना मिट रही दिलों से जो वो खुदी भर गए।

आमीन रटते रटते जिनके गले सूखते थे,
ये उन्ही बन्दों पे जुल्म तारी करते रहे थे।
अपने हम वतनों को खुद्दारी पढ़ा पढ़ा कर,
पराये वतन से अपनी झोली भरते रहे थे।


कविता :

इंसान अजीब है ………………….
हर किसी के अंदर एक इंसान है एक भगवान है,
हर किसी के भीतर एक कातिल है एक हैवान है।
बहुत अजीब बनाया है यह इंसान बनाने वाले ने,
मगर इसको बनाकर शायद वो भी खुद हैरान है।

कभी खुदा की माला फेर रहा इंसान भूखा रहकर,
कभी सारी इबादत छोड़ रोज़ी-रोटी में हलकान है।
कहीं बंधुआ हो मुफ्त में अपना पसीना बहा रहा,
कहीं खुद के नौकर को सताना समझता शान है।

कहीं सैनिक बनके करता हिफाजत पूरे वतन की,
कहीं उसका वतन उसकी ही गद्दारी से परेशान है।
इंसान ही धर्माधीश बनके पाठ पढ़ाता इबादत का,
कहीं बनकर लुटेरा फिरता देखो लूटता सामान है।

मुफलिसी में सज़दे करता रहता उसी के नाम के,
पैसा आये तो सोचे कि वही गीता वही कुरान है।
खूब जानता वो कब्र में होगा या वो जल जाएगा,
फिर भी रहने के लिए बनाता ऊंचे-ऊंचे मकान है।


कविता :

हम बहुत करते हैं जब करते हैं ………

हम वो नही करते हैं जो सब करते हैं,
मगर सब कहते हैं कि गजब करते हैं।
भले गुज़ार दें वक्त खाली कितना भी,
मगर हम बहुत करते हैं जब करते हैं।

ज़िंदगी ने हमें सताया भी है कई बार,
मगर फिर भी उससे हम कब डरते हैं।
हम चलने वाले हैं उसूलों की राहों पर,
खुदा में यकीन बड़ों का अदब करते हैं।

रौशन होगा नाम एक दिन हमारा भी,
जमाने को भाये हम वो सब करते हैं।
हम करते हैं काम सिर्फ औरों के लिए,
अपने लिए तो हम जब तब करते हैं।

हम कोई छल ना धोखेबाजी करते हैं,
ना कोई बेईमानी नही नकब करते हैं।
रिश्तों में हमारा हिसाब सारा साफ़ है,
जिसका जो बनता है वो सब करते हैं।


कविता :

सुबह होने को है ……..
ये रात चुप चुप सी है तारे हैं मदहोश,
चाँद की खबर नही कायनात खामोश।
फलक है मुँह खोल रहा मुस्कुराने को,
बस सुबह होने को है अँधेरा चुराने को।

अँधेरी रात आखिरी सांस ले रही है,
जैसे सैलाब में टूटी कश्ती खे रही है।
बस थोड़ी देर बाकी है सुबह होने में,
अंधियारे को धरती से जुदा होने में।

पौ फटेगी और एक शोला निकलेगा,
आफ़ताब बनकर एक गोला उभरेगा।
तब नींद से जगेगा सोया हुआ सवेरा,
कायनात में होगा उजाले का बसेरा।

चप्पा चप्पा रौशनी में नहाया होगा,
रंगों ने सारे जहां को सजाया होगा।
रंगबिरंगी चिड़ियों की बोली सुरीली,
शबनम से होगी फ़िज़ा गीली गीली।

हवाओं में खुशबू होगी ताज़गी होगी,
हर ज़र्रे में एक नई सी जिंदगी होगी।
फूलों के आँगन में कलियाँ चटकेंगीं,
भँवरों का नाच होगा शाखें मटकेंगीं।


कविता :

पनिहारी ……..
पनिहारी
भर गागर पानी
धर शीश शिखर
सुकुमारी
पग रख हौले
सम्भल सम्भल
लाचारी
पथरीली राह
ढलवाँ बार बार
बेचारी
सम्भाले कभी गगरी
ख़ुद को तो
कभी सारी
चली  जाये ढलकते
गगरिया छलकते
नहीं हारी
अबला, पर है सबल
नारी
जननी, महतारी।


कविता :

हमारे अपने ……………….
हमने भी लगाईं थी भीड़ अपने आसपास अपनों की,
सोचा था हमने कि हमें उनसे बड़ी हिफाजत मिलेगी।
तोड़ दिए सारे भ्रम हमारे उन्होंने अपना चक्र चलाके,
हमने कहाँ सोचा था कि अपनों से ही आफत मिलेगी।
हमने रिश्ते को मान रिश्ता अपनों से राज कह दिया,
उनकी जरूरत हुई तो हमने कल को आज कह दिया।
थक कर हमने राह चलते जब एक सवाल कर दिया,
तो आँख फेर कर सबने नफरत का बवाल कर दिया।

कर लेते हम भी अगर दुनियादारी की बातों पे अमल,
तो दिया होता इस दुनिया ने हमें भी इक चैन का पल।
रह गए हम तो उलझे हुए सही-गलत के ही चक्कर में,
गलती रही यही के उठा लिया हिसाब हमने दर-असल।

अपने करते गए सितम और हम सहते गए चुपचाप,
सिर्फ खामोशी पकड़ कर बचते रहे हम हर जवाल से।
अब कैसा शिकवा या शिकायत उम्र के इस पड़ाव पर,
सुकून है कि जिंदगी पूरी हो गयी बस ठीक अमाल से।


कविता :

जिंदगी ………………..
हम दूर तलक ढोते रहे अपनी ये जिंदगी,
हर मोड़ पर लुभाती रही जहां की गंदगी।
कोई आसरा नही भाया सरे राह हमें कहीं,
सारा नपा आसमान सारी नप गयी जमीं।
समझ सके न हकीकत उसकी खुदाई की,
सताती रही फ़िक्र हमें बस जग हँसाई की।
देखा नज़र उठाकर तब पसीना छूट गया,
खुदा की दी अक्ल मेरी जमाना लूट गया।
थक गया अब सांस छूटी चलना है दुश्वार,
अब जाके मैं पा सका नापायेदार का  पार।
मगर क्या खाक समझा चाल जमाने की,
जब कब्र खुद चुकी है मुझको दफनाने की


कविता :

मेरा गुनाह ……………………….
इक गुनाह मैं बार बार करता हूँ, के कातिल को अपने घर लाता हूँ।
क्योंकि सिर्फ खुदा से डरता हूँ, बाकी किसी से खौफ नहीं खाता हूँ।।

जानता हूँ इस जमाने को मैं खूब, रोज़ ये मुझको पागल कहता है।
मुझको मेरे ही कायदों से हटाने की, ये हर वक्त जुगत में रहता है।।
मैं अपने कायदों से फिसलता नहीं, बल्कि और चिपकता जाता हूँ।
क्योंकि सिर्फ खुदा से डरता हूँ, बाकी किसी से खौफ नहीं खाता हूँ।।

सब लोग उसी के तो बन्दे हैं, कोई कातिल है या कोई पगला है।
मर्जी जब भी हुई है खुदा की, तो फिर इनका भी दिल बदला है।।
मैं खुदा की इबादत करता हूँ, और नफरत को गले नहीं लगाता हूँ।
क्योंकि सिर्फ खुदा से डरता हूँ, बाकी किसी से खौफ नहीं खाता हूँ।।

वैसे इस बन्दे का भी क्या, कभी कातिल है तो कभी खुदा भी है।
कभी दौड़े राहे बदमगजी पर, और कभी होता उस से जुदा भी है।।
हर बन्दे से मोहब्बत करता हूँ, और कातिल में भी दया जगाता हूँ।
क्योंकि सिर्फ खुदा से डरता हूँ, बाकी किसी से खौफ नहीं खाता हूँ।।


कविता :

कौन है जो…………..
कौन है जो गरीबों की चाहतों के सपने सवाँरे,
अमीरों को जगाये परमार्थ की राह पर उतारे ,
अपराध को समाप्त करे व्यवस्था को सुधारे,
जहाँ को आपाधापी और बदमगजी से उबारे।
कौन है जो आदमीयत को सबका धर्म बनादे,
बदज़ुबानी के आलम में ज़रा तहज़ीब सिखादे,
मज़हब की दीवार को सारी दुनिया से मिटादे,
आस्था जगा दे आदमी को आदमी से मिलादे।
कौन है जो ज़माने में मोहब्बत के नगमें सुनाये,
बदमिज़ाज़ों व बदकारों के भी दिल जीत लाये,
बदअमनी के दौरान में भाई-चारे की रीत लाये,
खुदावंद हो जिसे बेसहारा बन्दों की प्रीत भाये।
कौन है जो आसमाँ से इक सितारा तोड़ लाये,
हताशाओं की जमीं पे बिखरे सपने जोड़ लाये,
बहके क़दमों को फिर सही राहों पर मोड़ लाये,
फलक के चाँद से जो रोशन टुकड़ा फोड़ लाये l

कविता :

मेरा वजूद ……………..
माना के रेत का ढ़ेर सा हूँ, पर हवा से उड़ता नहीं हूँ मैं।
कितना भी ग़म मुझे तोड़ दे, पर कभी झुकता नहीं हूँ मैं।।

मुझको तो ये यक़ीन है, जो सबका है वही मेरा भी खुदा।
मैं चल रहा इस राह पर, अब ये राह कभी ना होगी जुदा।।
कोई आज़मा के देख ले, चलपड़ा तो रुकता नहीं हूँ मैं।
कितना भी ग़म मुझे तोड़ दे, पर कभी झुकता नहीं हूँ मैं।।

मुझे वजूद का क्यूँ फ़िक्र हो, मेरी रूह जब मजबूत है।
लड़खडड़ाया मैं कभी नहीं, मेरी ताक़त का ये सबूत है।।
नश्तर खाने की आदत है, नश्तर से चिहुँकता नहीं हूँ मैं।
कितना भी ग़म मुझे तोड़ दे, पर कभी झुकता नहीं हूँ मैं।।

कह दो इस ज़माने से, मुझे बदलने की कौशिस ना करे।
तन कर खड़ा हुआ हूँ, मुझे कुचलने की कौशिस ना करे।।
सूरज सा गरम भले ना सही, बादल में छुपता नहीं हूँ मैं।
कितना भी ग़म मुझे तोड़ दे, पर कभी झुकता नहीं हूँ मैं।।


कविता :

जमीं-ओ-ज़माना ………….
आसमां होगा जमीं पर समंदर रहेंगे,
मौत के बाद हम जमीं के अंदर रहेंगे।
रखो ज़मीं पर पैर न तो उड़ना पड़ेगा,
आखिर में जमीं पर ही उतरना पड़ेगा।
ज़माने में जीना है तो बदलना पड़ेगा,
बेवफ़ा लोगों से बच निकलना पड़ेगा।
अपनों के ही नश्तरों को झेलना होगा,
तुमको अपने ही दिल से खेलना होगा।
अपने दिल को समंदर बनाना सीख लो,
अश्क पीकर उसमें ही बहाना सीख लो।
अश्क़ पीने में आँखें मुक्तसर तो होंगी,
अश्क़ पीकर ये आँखें पत्थर भी होंगी।
आँखें दिले समंदर की सहारा होती है,
और आँखें ही उसका किनारा होती हैं।
किनारा पत्थर नहीं होंगा तो ढह जाएगा,
आँसू पीकर बनाया समंदर बह जाएगा।

कविता :

नेह का बंधन………………..

नेह का बंधन है तभी तो अंतर्द्वंद है,

यूँ पीर से तर धीर से तर हर छंद है ।

 

हृदय की कल्पित आस छोड़ो,

कल्पित धरती आकाश छोड़ो,

मन यूँ ही क्यूँ अधीर होता है,

नयनों से तर क्यूँ पीर होता है,

क्यूँ देखोगी मुझे किसी के संग,

तुम्हीं बसी हो मेरे भी हर अंग,

 

न छोड़ूँगा तुम्हें फिर क्यूँ सौगंध है,

नेह का बंधन है तभी तो अंतर्द्वंद है ।

 

तुझे क्यूँ होश नहीं हवास नहीं है,

क्यूँ ये विवेक तुम्हारे पास नहीं है,

समझदारी भी तो क्या रास नहीं है,

मुझपर क्यूँ तुम्हें विश्वास नहीं है,

पढ़ाई की सीख क्यूँ छोड़ रही हो,

जूठे डर के पीछे क्यूँ दौड़ रही हो,

 

हमारा मिलन ही जीवन की सुगंध है,

नेह का बंधन है तभी तो अंतर्द्वंद है ।

 

तेरी ही मुस्कान


कविता :

मन की चटकन…………………..
द्वार खुला है…… अंदर आ जाओ……..
सीधा अंदर कैसे आऊँ
शर्मो हया का खुला द्वार देख
ठिठके हैं क़दम।

ड्योढी पर पड़े पायदान पर अपना अहं झाड़ आना……..
कैसे झाड़ूँ अहं अपना
पायदान के संकीर्ण विस्तार में
ना समा पाएगा अहम्।

मुंडेर से लिपटी मधुमालती पर नाराज़गी उड़ेल आना ……..
मुँडेर से लिपटी
मधुमालती के मुरझाए फूल
नाराज़गी कैसे उँड़ेली जाए।

तुलसी के क्यारे में मन की चटकन चढ़ा आना………
पाप लगे जो तुलसी पर
या उसके क्यारे में
मन की चटकन चढ़ाए।

अपनी व्यस्ततायें बाहर खूंटी पर ही टांग आना……….
दुर्बल खूँटी ना सह सके भार
टाँग दूँ उस पर यदि
व्यस्ततायें अपनी बहुत भारी।

जूतों संग हर नकारात्मकता उतार आना……..
नकारतमकता मन में है
पैरों में नहीं होती
जूतों संग न जाये उतारी।

किलोलते बच्चों से थोड़ी शरारत माँग लाना……….
कैसे ले लूँ
किलोलते बच्चों की शरारत
मिलती सिर्फ़ बचपन में है।

गुलाब के गमले में लगी मुस्कान तोड़ कर पहन आना…..
पहनूँ कैसे तोड़कर
गुलाब की मुस्कान में काँटे भी
चुभन नही अच्छी मिलन में।

लाओ अपनी उलझने मुझे थमा दो………
उलझने तो हमारी
सुलझ चुकीं कभी की
अब उत्साह है थकान नही है।

तुम्हारी थकान पर मनुहारों का पँखा झल दूँ………
होती यदि थकान तो
थाम लेता साँसों को
मनुहार समाधान नही है।

देखो शाम बिछाई है मैंने
सूरज क्षितिज पर बाँधा है लाली छिड़की है नभ पर……..
अपने चारों ओर
तुमने जो शाम बिछाई है
सूरज क्षितिज पर बांधा है
भर अंजलि सिंदूर सी
लाली नभ पर छिड़की है
मनभावन समा बांधा है।

प्रेम और विश्वास से चाय चढ़ाई है घूँट घूँट पीना……..
इस नज़ारे में ही है
छाया नशा सा
चाय की ज़रूरत नहीं है।

सुनो इतना मुश्किल भी नहीं है जीना….
आसान ना हो जीना
मुश्किल भी हो यदि
मरना हमारी फ़ितरत नहीं है।


कविता :

चाँद और जुगनू………….
उधार के उजाले से चमकते
चाँद की आँखों में
अपना उजाला लिए घूमता जुगनू
क्यूँ चुभेगा भला ?
चाँद का उजाला
उधार का है मगर
चोरी का नहीं
और सूरज से लिया है
जुगनू से नही
और अंधेरे में राह
ख़ुद को छोड़
दूसरों को दिखाता है
सुकून देता है हर मौसम
तन्हाई की रात हो या मिलन की
जुगनू के ख़ुद के उजाले के
वजूद का क्या करें
जो किसी और के लिए
है ही नहीं और ज़रा सी
सर्द हवाओं का मौसम
क्या आया
कि चला जाता है
कहीं छिप जाता है
गरम मौसम के इंतज़ार में
बेचारा…………मौसमी……. ।।


कविता :

सफ़र ………………….

***

ये अंतहीन सफ़र सभी का होता है

कोई हौसला और धैर्य लेकर
दीये की रोशनी में
दुर्गम पगडंडी से गुज़रे
या फिर
आँख बंद कर
बहकर सिद्धान्तहीन जीवन
की सुकून भरी मौज़ों की
इठलाती धारा में

ख़्वाबों का धागा
होता है दोनों के ही
हाथ में
हमसफ़र खींचते रहते
हैं पैर दोनों के
फिर भी पहुँचते हैं
दोनों
शमशान तक
और शुरू करते है
सफ़र इस जीवन
के बाद का
नवनिर्माण के लिए।l


कविता :

सबके दिलों के अंदर यहाँ…………

कोई नहीं किसी का ना तेरा ना कुछ मेरा,
सबके दिलों के अंदर यहाँ छाया है अँधेरा।

फलसफा ना कोई नही किस्सा कोई नया,
सरेराह धर्म रोता और सिसक रही है दया,
गहरा रही है रात और दिखता नहीं सवेरा,
सबके दिलों के अंदर यहाँ छाया है अँधेरा।

मर्यादा तो जैसे जमीन के नीचे हुई दफ़न,
चोरी होकर बिक रहे हैं मुर्दों के भी कफ़न।
सगा भाई ना भाई रहा क्या लगेगा चचेरा,
सबके दिलों के अंदर यहाँ छाया है अँधेरा।

प्रजातंत्र का नारा लेकिन ना कोई आज़ाद,
प्रजा पिंजरे में फँसी और नेता बने सैयाद।
पार्टी-फंड के खातों में काले धन का बसेरा,
सबके दिलों के अंदर यहाँ छाया है अँधेरा।

नोट-बंदी ना कर सकी काले धन पर चोट,
गरीब लाइन में खड़ा नेता बदल गए नोट।
बैंकों ने भी चाँदी काटी कर घपला बहुतेरा,
सबके दिलों के अंदर यहाँ छाया है अँधेरा।


कविता :

कौन है……………………

कौन है जो आसमाँ से इक सितारा तोड़ लाये,
हताशाओं की जमीं पे बिखरे सपने जोड़ लाये,
बहके क़दमों को फिर सही राहों पर मोड़ लाये,
फलक के चाँद से इक रोशन टुकड़ा फोड़ लाये।

कौन है जो ज़माने में मोहब्बत के गीत गाये,
बदमिज़ाज़ों व बदकारों के भी दिल जीत लाये,
बदअमनी के दौरान में भाईचारे की रीत लाये,
खुदावंद हो जिसे बेसहारा बन्दों की प्रीत भाये।

कौन है जो आदमीयत को सबका धर्म बनादे,
बदज़ुबानी के आलम में ज़रा तहज़ीब सिखादे,
मज़हब की दीवार को सारी दुनिया से मिटादे,
आस्था जगादे आदमी को आदमी से मिलादे।

कौन है जो गरीबों की चाहतों के सपने सवाँरे,
अमीरों को जगाये परमार्थ की राह पर उतारे,
अपराध को समाप्त करे व्यवस्था को सुधारे,
जहाँ को आपाधापी और बदमगजी से उबारे।


कविता :

दर्द बहुत हैं मंज़र के……………………..

दर्द बहुत हैं मंज़र के किसको जा कर मैं सुनाऊँ?

चारों तरफ़ दर्द देने वाले कहाँ जा कर छुप जाऊँ?

पुलिस पोष रही अपराधी को नेता बदमाशों को,

स्वर्णकार भी चाँदी काट रहे खा तोले माशों को,

डॉक्टर अंग चोरी करता कहाँ मैं रपट लिखाऊँ?

चारों तरफ़ दर्द देने वाले कहाँ जाकर छुप जाऊँ?

सरकारी दफ़्तर में रिश्वत कोर्ट में हो जाती लूट,

बलात्कार करके भी ज़ुल्मी जेल से हैं जाते छूट,

भक्षक बने रक्षक को मैं यह सब कैसे समझाऊँ?

चारों तरफ़ दर्द देने वाले कहाँ जाकर छुप जाऊँ?

बैंक जाये कोई पैसे लेने कैश ख़त्म हो जाता है,

बिन पैसे ग्रामीण जन बिन सब्ज़ी रोटी खाता है,

गाँव की चाची-ताई को कैसे पेटीएम समझाऊँ?

चारों तरफ़ दर्द देने वाले कहाँ जाकर छुप जाऊँ?

नोटबंदी के जयकारे क्यूँ काले धनी भी बोल रहे,

बच्चे की शादी में कैसे अकूत ख़ज़ाना खोल रहे,

इन्हें सबक़ सिखाने किसे कहाँ से ढूँढ के लाऊँ?

चारों तरफ़ दर्द देने वाले कहाँ जाकर छुप जाऊँ?

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