0202 – Shanti Swaroop Mishra


 

Gazal:

हूँ कमज़ोर मगर, उनके ग़म उठा सकता हूँ !

उनके अश्कों पे, हज़ार पहरे बिठा सकता हूँ !

मुझपेदौलतनहींयेभीसचहैदोस्तोमगर,

उनके लिए मैं, दिल की दौलत लुटा सकता हूँ !

बदलगएहैंवोनजानेक्योंऔरकैसेमगर,

मेरा तो दिल वही है, मैं कसम उठा सकता हूँ !

मालूम है कि डरता है दिल ज़माने से मगर,

उनकी तो हर राह के, मैं कांटे हटा सकता हूँ !

अब उनका सुकून ही तो मेरा सुकून है “मिश्र”,

सारे दर्द उनके, अपने सीने में बिठा सकता हूँ !


Gazal:

जो समझा कोई, वो ज़ज्बात हूँ मैं

सुबह की चाह में गुज़री, वो रात हूँ मैं

निभाने से डरते हैं क्यों लोग रिश्ते,

बिखरे कोई रिश्ता, वो हालात हूँ मैं

हर सवाल का जवाब होता है मगर,

जो लाज़वाब हो बस, वो सवालात हूँ मैं

भागते हैं लोग क्यों छोड़ कर ज़िंदगी,

जो कर सके कोई, वो करामात हूँ मैं

सुनता है कोई किसी की बातमिश्र“,

मगर जो है सुनाने के लिए, वो बात हूँ मैं


Gazal:

अच्छा हुआ कि ख़त्म हुई, अपनी कहानी प्यार की !

हम छोड़ आये उनके लिए, सारी रवानी बहार की !

उठाओ फूल कब्र से, गर सूखें तो सूख जाने दो,

अब यही बची है मुझ पे बस, इक निशानी प्यार की !

सोचा था कि बिकती नहीं, उल्फत कहीं बाजार में,

पर दोस्तों ये सच नहीं, कभी सुनना जुबानी यार की !

कागज़ के चंद टुकड़ों से, बदल जाते हैं कैसे दिल,

कभी कर मेरे मज़ार पे, सुनना कहानी प्यार की !

यारो होते नहीं पूरे कभी भी, ज़िन्दगी के स्वप्न सारे,

बस मेरी तरह मायूस दिल, लिखता कहानी हार की !


Gazal :

देखा हाल गुल का, तो बदहवास हो गया !

काँटों का दख़ल देखा, मन उदास हो गया !

यूं तो आम था उस राह से गुज़रना अपना,

मगर आज का गुज़रना, तो ख़ास हो गया !

देखा तितलियों को उलझते हुए काँटों से,

अब दुष्टता का हर तरफ ही, वास हो गया !

बुलाया था फूल ने देकर दोस्ती का वास्ता,

मगर फूल भी दुष्ट काँटों का, ख़ास हो गया !

आता कोई अब किसी की मदद करने ,

दुनिया भी बहरी हो गयी, अहसास हो गया !

रही अब शराफ़त बेच डाला ईमान भी,

शर्म जो बाक़ी थी, उसका भी ह्रास हो गया !


Gazal:

मिलना तो चाहे दिल मगर, इन दूरियों का क्या करें !
हैं ज़िगर में पैबस्त जो, उन मज़बूरियों का क्या करें !

मैं तोड़ डालूं ये बेड़ियाँ ये चाहत है मेरे कदमों की,
पर बेरूख़ी से भरी उनकी, तिजोरियों का क्या करें !

मेरा दर्दे दिल न समझे कोई तो शिकवा नहीं मगर,
बदनाम हम जिनसे हुए, उन मश्हूरियों का क्या करें !

इन फासलों को ले कर कभी होते नहीं रिश्ते फ़ना
पर बनतीं पास रह कर भी, उन दूरियों का क्या करें !

न बदली हैं न बदलेंगी हवाएं इस जमाने की “मिश्र”,
जब फैली है दुर्गन्ध इतनी, तो कस्तूरियों का क्या करें !


Gazal:

मंदिर में भजन गाने से क्या मिलेगा,
झूठी भक्ती दिखाने से क्या मिलेगा !

अंदर भरा है मैल नफ़रत का इतना,
कि रोज़ गंगा नहाने से क्या मिलेगा !

निहारता है सब कुछ वो ऊपर बैठ कर,
उससे सच को छिपाने से क्या मिलेगा !

भुलाया खुशियों में बेकार समझ कर उसे,
अब दुखों में याद आने से क्या मिलेगा !

भेज था हमें तो पैग़ामे मोहब्बत दे कर,
उसकी मर्जी भूल जाने से क्या मिलेगा !

जो हर जगह मौजूद है हर पल हर घड़ी,
उसके लाखों घर बनाने से क्या मिलेगा !

ज़रा झांक कर देखो अपना गिरेवाँ “मिश्र”,
कमियाँ औरों की बताने से क्या मिलेगा !


Gazal:

दिल में घुसते हैं लोग कैसे, अब समझ आया !
मुखौटे बदलते हैं लोग कैसे, अब समझ आया !

मूरख है ये दिल कि समझता है खुदा सबको,
अपने उगलते हैं ज़हर कैसे, अब समझ आया !

कमाल है कि दुनिया भी ठगती है बड़े अदब से,
पचता है माल गैरों का कैसे, अब समझ आया !

न आता है समझ कुछ भी कोरी बातों से यारो,
लोग घुमा देते हैं दिमाग कैसे, अब समझ आया !

इन झूठी आशा दिलासाओं में न फंसिए “मिश्र”,
ये दुनिया सताती है हमें कैसे, अब समझ आया !


Gazal:

दिल खुश नहीं, तो ज़माना बुरा लगता है !
किसी का भी हमें, घर आना बुरा लगता है ! ,

छा जाती है एक अजीब सी धुंध दिल पे,
मधुर संगीत का, हर तराना बुरा लगता है !

जब दिल होता है किन्हीं ख़यालों में ग़ुम,
तो ज़िंदगी का, हर अफ़साना बुरा लगता है !

हार जीत तो बस एक सोच भर है “मिश्र”,
पर किसी हारे हुए को, हराना बुरा लगता है !


Gazal:

क्यों फिर रहे हो यूं ही, ये पुराने ज़ख़म लिए हुए!
जलते रहोगे कब तक, अपनों की शरम लिए हुए !

अब न रहा दुनिया में कोई साफ़ दिल मेहरवान,
कब तक जियोगे यक़ीन में, झूठी कसम लिए हुए!

क्यों क़ैद हो तुम उन ज़फाओं की यादों में दोस्त,
कैसे रहोगे दुनिया में, उल्फ़त का धरम लिए हुए!

वो वक़्त अब गुज़र गया जिसे ढूंढते हो दर ब दर,
जी सकोगे कैसे अब, अपना ईमानो करम लिए हुए !

निकाल फैंको ग़ुबार सारे जो सजा रखे हैं सालो से,
वरना न चल सकोगे “मिश्र”, इतना वहम लिए हुए !


GAzal:

अपने जज़्बात किसी को, हम बताएं कैसे !
अपने दिल की ये धड़कनें, हम सुनाएँ कैसे !

अंदर छुपा रखा है हमने प्यार का समंदर,
चीर कर अपने दिल को, हम दिखाएँ कैसे !

कोई तो बताये हमको क्या खता है हमारी,
अपनी वफ़ाओं का मातम, हम मनाएं कैसे !

अच्छा सिला दिया है मोहब्बत का हमको,
इन झूठी तोहमतों से दामन, हम बचाएं कैसे !

अब झूठ ही बिकता है इधर धड़ल्ले से “मिश्र”,
अब तो सच के साथ जीवन, हम बिताएं कैसे !


Gazal:

 

जीते रहे हैं ज़िन्दगी, किसी का उधार समझ कर !
निभाते रहे हम रिश्ता, किसी को प्यार समझ कर !

देते रहे सबूत हम अपनी बेगुनाही का हर समय,
पर भुला दिया उसने, हमें गुज़री बहार समझ कर !

बदल गया है सब कुछ ये तो किस्मत की चाल थी,
मगर नज़रें घुमा लीं उसने, हमें बदकार समझ कर !

न पढ़ सके हम उसके चेहरे की इबारत को दोस्तो,
हमने तो दे दिया था दिल, अपना ऐतबार समझ कर !

अब तो ये मोहब्बत भी एक बिकाऊ चीज़ है “मिश्र”,
लोग कर देते हैं माल वापस, उसे बेकार समझ कर !


Gazal:

आता है बुरा वक़्त, तो उजाले भी डराने लगते हैं !
यारो चूहे भी शेर को, अपना दम दिखाने लगते हैं !

अब कहाँ हैं वो लोग जो होते थे शरीक हर ग़म में,
अब तो दिल ही दिल, लोग खुशियां मनाने लगते हैं !

गर लेनी हो सलाह तो कही जाने की ज़रुरत क्या है,
इधर तो मुफ्त में लोग, अपनी अक्ल लगाने लगते हैं !

भुगतना है खुद को ही तो किसी को तंग क्या करिये,
लोग तो ज़रा सी बात का भी, बतंगड़ बनाने लगते हैं !

आता है अगर पतझड़ भी तो बहारें भी आती हैं “मिश्र”,
मगर बेसब्र इतने हैं लोग, कि कोहराम मचाने लगते हैं !


Gazal:

मेरी तो ज़िन्दगी का, बस इतना फ़साना है !
राहों में कांटे हैं मगर, कुछ दूर और जाना है !

कैसे हैं लोग कैसी है इस दुनिया की रिवाज़ें,
ज़ख़्मी है नशेमन, मुझे फिर भी मुस्कराना है !

महफ़िल में रंग जमाना अब मुश्किल है यारो,
क्योंकि मेरे गीत अधूरे, और संगीत पुराना है !

उम्मीद नहीं कि मिल भी पायेगी मंज़िल मुझे,
रहबर भी न कोई, न आगे का कुछ ठिकाना है !

खुदाया कुछ मोहलत और दे दे ज़िन्दगी को,
अभी तो ज़माने को, कुछ और सितम ढाना है !


Gazal:

अब तो ज़िन्दगी भी, उचाट हो चली है !
उम्र भी तो यारो, कुछ खास हो चली है !

उदास बागवां की तरह बैठा हूँ किनारे,
गुलशन में भी, एक अजीब खलबली है !

खार ही खार दिखते हैं हर तरफ यारो,
न कोई फूल दिखता है, न कोई कली है !

धीरे धीरे घिसट रही है ज़िंदगी “मिश्र”,
और आगे और आगे, बस अँधेरी गली है !


Gazal:

जूनून ए मोहब्बत, बरक़रार है आज भी !
इस दिल को उनका, इंतज़ार है आज भी !

बहुत देखे हैं हमने हारे हुए दिल वाले भी
मगर अपना तो दिल, बेक़रार है आज भी !

मुश्किलों का क्या आती ही है ज़िन्दगी में,
इन हादसों से अपना तो, क़रार है आज भी !

नफरतों का क्या कोई भी कर ले किसी से,
पर मोहब्बत की सज़ा, वज़नदार है आज भी !

न करो अफसोस दुनिया में आने का “मिश्र”,
इंसानियत की दुनिया, तलबगार है आज भी !


Gazal:

रह के भी साथ उनके, न समझ पाए हम !
दिल की कालिखों को, न परख पाए हम !

भला क्या करें हम उस से गिला शिकवा,
जिसको दिल से अपना, न समझ पाए हम !

बड़ा गरूर था हमें अपनी परख पर यारो,
पर उसके दिल की इबारत, न पढ़ पाए हम !

कहने को तो दुनिया बड़ी हसीन है दोस्तो,
मगर जीने का करिश्मा, न समझ पाए हम !

ज़िन्दगी फंसी है फरेबों में इस क़दर कि,
कोई निकलने का रस्ता, न समझ पाए हम !


Gazal:

कैसे कटेगी ज़िन्दगी, यूं उजड़ा चमन लिए हुए,
चेहरे से उड़ती हवाइयां, दिल में रुदन लिए हुए !

ज़रा ठंडा करो इन नफरतों के शोलों को दोस्तो,
वरना न जी सकेगा शहर, इतनी तपन लिए हुए !

अय तितलियों मत जाइये गुलशन में आजकल,
अब उधर तो सिर्फ कांटे हैं, अपनापन लिए हुए !

मैं तो घुसा था इस शहर में खुशियों की तलाश में,
मगर बैठे हैं इधर भी लोग, दिल में टशन लिए हुए !

लगा दी ज़िन्दगी हमने जिसकी ज़िन्दगी के वास्ते,
अब लगा कर घात बैठा है, मेरा कफ़न लिए हुए !

किस किस को सुनाओगे दिल के अफ़साने “मिश्र”,
यूं कैसे जियोगे तुम इधर, ये मैला सा मन लिए हुए !!!


Gazal:

आज आँखों में आंसू, फिर छाये हुए हैं !
फिर से बेचैनियों के लमहें, आये हुए हैं !

गड़े मुर्दों ने फिर से ली है करवट यारो,
जिन्हें दफना कर हम तो, भुलाये हुए हैं !

खड़ा हूँ बीच रस्ते में हैरान सा हो कर,
कि ये यादों के तूफ़ान, क्यों आये हुए हैं !

घिर आये हैं बादल ग़मों के हर तरफ से,
दिल भी है बेबस, पाँव लड़खड़ाए हुए हैं !

फेंक देता है इंसान फालतू सामान यूं ही ,
कैसे फेंकें उनको, जो दिल को भाये हुए हैं !

शांती स्वरूप मिश्र


Gazal:

आये थे ऐसे कि, दिल में समा कर चले गए !
सो रहे थे चैन से, कि वो जगा कर चले गए !

न ठहरे वो इक पल भी मेरे गरीबखाने पर,
दिखा के बस झलक, जी दुखा कर चले गए !

न आया समझ कि ये हक़ीक़त है या सपना,
वो तो अजीब सी, हलचल मचा कर चले गए !

आये थे कुछ कहने मगर न कह सके शायद,
बस दिल की बातें, दिल में छुपा कर चले गए !

वैसे भी क्या कमी थी हमें रुसबाइयों की “मिश्र”,
जो यूंही ढेर सारी, मायूसियां बढ़ा कर चले गए !


Gazal:

जो सच है, उसे तुम छुपाते क्यों हो !
अगर झूठ है, तो इधर आते क्यों हो !

दिल से पूँछ कर जवाब देना दोस्त,
कि प्यार है तो, उसको छुपाते क्यों हो !

कहते हो कि मैं अकेला हूँ दुनिया में,
फिर रूठे हुओं को, यूं मनाते क्यों हो !

आंसुओं से पूंछो कि क्यों बेचैन हैं वो,
अपने दिल को, इतना सताते क्यों हो !

क्यों सजा रखा है इतना दर्द दिल में,
हर किसी को, बेवफा बताते क्यों हो !

दुनिया के मसले तो चलते रहेंगे “मिश्र”,
उलझ कर उनमें, जां फंसाते क्यों हो !


Gazal :

ज़रा सी है ये ज़िन्दगी, तक़रार क्या करना !
जब रहना है साथ साथ, तो रार क्या करना !

दुखित है वैसे भी मन, तमाशे देख दुनिया के,
फिर भरे बाज़ार में, तमाशा यार क्या करना !

काट लो खुशियों से, बची है जो ज़िंदगी यारो,
इसके लिए भी यूँही, नख़रे हज़ार क्या करना !

झेली हैं हमने मुश्किलें, वह अपना करम था ,
अपने लिए किसी और को, लाचार क्या करना !

कोई न जीत पाया “मिश्र”, नफरतों के खेल में,
ज़िंदगी के सफर में, किसी पे वार क्या करना !


Gazal:

बहुत वक़्त लगता है, किसी का यकीन पाने में !
मगर लगता नहीं एक लम्हा भी, उसे गॅवाने में !

जुबाँ की हरकतें न जाने क्या क्या कराती हैं,
उम्र गुज़र जाती है, आग लगाने और बुझाने में !

अब तो गिरगिट भी कुछ नहीं आदमी के आगे,
जाने कितने रंग भरता है, अपना रंग जमाने में !

अपनी करतूत पे बस डालते रहते हैं लोग पर्दे,
मज़ा आता है उनको तो, बस और को सताने में !

अब यही दस्तूर है “मिश्र” कि अपने लिए जियो,
वर्ना तो क्या रखा है इधर, औरों से जी लगाने में !


Gazal:

राख हूँ मैं बेशक मगर, फ़ितरत अभी बाक़ी है!
दिखा सकता हूँ जलवे, हिम्मत अभी बाक़ी है!

न समझो कि मैं डर गया दुनिया के अंधेरों से,
यारो चराग़ों के बुझने में, वक़्त अभी बाक़ी है!

न करना किसी से ज़िक्र मेरे बिगड़े हालात का,
दुनिया की नज़र में मेरी, इज़्ज़त अभी बाक़ी है !

न बदली है न बदलूंगा मैं अपनी फ़ितरत यारो,
मेरे दिल के हर कोने में, मोहब्बत अभी बाक़ी है !

सिरफिरा हूँ “मिश्र” कि ढूढ़ता हूँ पत्थरों में जान,
उन्हें भी दोस्त बनाने की, हसरत अभी बाक़ी है !


Gazal:

आदमी से क्या क्या, न करा देता है ख़ुदा !
इंसान को खुला बाज़ार, बना देता है ख़ुदा !

उसे सब कुछ ही बटोरने की चाहत दे कर,
बेचारे इंसान को हैवान, बना देता है ख़ुदा !

कोई तो ओढ़ता है बिछाता है दौलत को,
तो किसी को भिखारी, बना देता है ख़ुदा !

ईमान ओ धरम तो ले लिए वापस उसने,
अब लम्पटों को नायक, बना देता है ख़ुदा !

सिक्के का एक ही पहलू न देखिये “मिश्र”
कभी कभी बिगड़ी बात, बना देता है ख़ुदा !!


Gazal :

ख़ुशी न दे सको,तो रुलाओ मत यारो !
गुनाहों को अपने, छुपाओ मत यारो !

ये जो दुनिया है सब जानती है दोस्त,
उसे झूठी कहानी, सुनाओ मत यारो !

देख लो झाँक कर अपना गिरेवां भी,
मुजरिम औरों को, बनाओ मत यारो !

गुनाहों की सजा तो मिल कर रहेगी,
इसे कोई साजिश, बताओ मत यारो !

न देखा चल के कभी सीधी डगर पर,
फिर राहों को दोषी, बताओ मत यारो !

ये दौलत का नशा मुबारक़ हो “मिश्र”,
पर गरीबों पे रुतबा,जमाओ मत यारो !


Gazal :

माथे की सलवटों से, ग़मों को हटाना सीखो !
खुश रहो खुद भी व, औरों को हँसाना सीखो !

न आएगा कोई तुम्हारे ग़मों में होने शरीक़,
उलझनों को अपनी, खुद ही सुलझाना सीखो !

होगा क्या हासिल तुम्हें तन्हाइयों में बैठ कर,
यारा दुनिया की मुश्किलों से, टकराना सीखो !

ये जो दिल है उस पे न चलता बस किसी का,
इससे पहले कि बहक जाए, उसे मनाना सीखो !

ये अजीब दुनिया बदलती है रंग हज़ारों “मिश्र”,
प्यारे अपनी ज़िन्दगी के रंग, खुद सजाना सीखो !


Gazal :

उनको तो हमारे, अहसानो वफ़ा याद नहीं !
हम मुज़रिम हैं उनके, मगर दफ़ा याद नहीं !

मोहब्बत के नाम पर मिला सिर्फ धोखा हमें,
दोस्ती की किताब का, कोई सफ़ा याद नहीं !

यूं ही ज़िल्लतों में काटी है ये उम्र हमने सारी,
थे कितनों से खुश, कितनों से ख़फा याद नहीं !

“मिश्र” दब गए उनके कसूर दौलत के ढेर में,
हमें कितना हुआ, नुकसान ओ नफ़ा याद नहीं !


Gazal :

हम तो क़तरों से खुश हैं, समंदर ले के क्या करेंगे,
जब भटकना है नसीब में, तो ठाँव ले के क्या करेंगे !

जरा सी हवा से बिखर जाती है ज़िंदगी तिनकों में,
फिर तू ही बता दोस्त, कि तूफ़ान ले के क्या करेंगे !

अजीबोगरीब चाहतों ने मिटा दिया इस आदमी को,
हमें चाहिए जब चार रोटी, अधिक ले के क्या करेंगे !

जो लूटते हैं दुनिया को न जाने किस किस तरह से,
भला ऐसे महान पुरुषों से, हम हुनर ले के क्या करेंगे !

जब चाहिए थी ज़रा सी महक तब न मिल सकी “मिश्र”,
जब आखिरी दिन आ गए, तब चमन ले के क्या करेंगे !


Gazal :

जब सुबह सवेरे माँ जागी, तो आफत आई !
अब मेरे सर से उठ जायेगी, ये गरम रजाई !

फोड़ रहा तू अपनी किस्मत यूं सो कर,
उठ जा बेटा कर ले तू, मेहनत से ज़रा पढ़ाई !

मैं बोला माँ क्यों नींद उड़ा दी इतनी प्यारी,
फिर क्या था यारो, माँ ने अपनी छड़ी उठाई !

अब तक मैंने तेरी हर गलती को माफ़ किया,
जल्दी से उठ जा वरना, तेरी होगी मार पिटाई !

आती है मुझको याद आज भी वो अमृत घुट्टी,
मार मार कर पढ़ने की, जो माँ ने मुझे पिलाई !

वो ज्ञानवान थी उन्हें शिक्षा का महत्व पता था,
उनके सबक से हम बच्चों ने, पूरी करी पढ़ाई !

माँ सबक सिखा कर चली गईं इस दुनिया से पर,
जीवित है हर बात कभी, जो उसने हमें सिखाई !


Gazal :

कह नहीं पाता बच्चा फिरभी, माता सब कुछ लेती जान !
क्या है ज़रूरत बच्चे की, ये सब उसको हो जाता ज्ञान !

उसको भूख तभी लगती, जब बच्चे की भूख मिटा देती !
उसको नींद तभी आती, जब पहले बच्चे को सुला देती !

वो बच्चा जब यौवन पाता, ये सब कुछ कैसे जाता भूल !
मात पिता की हर शिक्षा, उसको क्यों लगती है प्रतिकूल !

उसकी हर इच्छा को पूर्ण किया, बिना किये कोई भी भूल !
मात पिता की लघु इच्छा भी, क्यों लगती है उसको सूल !

बीवी से ज्यादा इस दुनिया में, उसे प्यारा कोई और नहीं !
समझो उसके जीवन में, अब माता के लिये कोई ठौर नहीं !

बच्चों के लिये वो लाख लुटाये, मां के लिये वो कंगला है !
माता को कोई जगह नहीं, भले ही अपना गाड़ी बंगला है !

बीवी को कोई दुख ना पहुंचे, पर मां के दुख की खबर नहीं !
कुत्तों को खाना मिले समय पै, मां के पेट की खबर नहीं !

ये तो कुदरत का ही चक्र है यारो, अब इसमें कोई फेर नहीं !
अब ऐसी ही हालत होगी उसकी, अब इसमें ज्यादा देर नहीं !

जिन बच्चों पै उसने जान लुटाई, अब अपना धर्म निभाएंगे !
जैसे कर्ज़ उतारा अपनी माँ का, बैसे बच्चे भी फ़र्ज़ निभाएंगे !


Gazal :

मेरे दिल से उनकी याद, संभाली नहीं जाती !
करते हैं प्यार वो, ये खामख़याली नहीं जाती !

करते हैं हर वक़्त सिर्फ उनकी ही बातें हम,
कोई सुबह ओ शाम, यारो खाली नहीं जाती !

जब से सुना है दिल ने उनके आने के वावत,
उसके अंदर की ख़ुशी, अब संभाली नहीं जाती !

मालूम हमें है उनके मासूम से दिल की खोट,
पर अपनों की इज़्ज़त, कभी उछाली नहीं जाती !

कभी हारा था दिल उन्होंने भी हमारे वजूद पर,
ग़लतफ़हमी अपने दिल से, निकाली नहीं जाती !

होश में आओ कि मोहब्बत खिलौना नहीं “मिश्र”,
बन जाए अगर बात, तो फिर बिगाड़ी नहीं जाती !


Gazal :

मैं तो जमीं तो जमीं, आसमाँ छोड़ आया,
जाने कितने दिलों की, दास्तां छोड़ आया !

मैं यादों के झरोखों से देखता हूँ अब भी,
कि बदन साथ था, पर आत्मा छोड़ आया !

किस से कहूँ मैं अपना दर्दे दिल आखिर,
मैं तो मोहब्बत का, वो नगमा छोड़ आया !

अज़ब से रंग देखे थे अपनों के परायों के,
मैं तो सारा का सारा, वो समां छोड़ आया !

मैंने भी गाये थे वो तराने उल्फत के दोस्त,
जाने जीने की वो सरगम, कहाँ छोड़ आया !


Gazal :

बिठा दें चाहे लाख पहरे, ये जमाने वाले !
मगर घुस ही जाते हैं, दिल जलाने वाले !

कर सकते हैं राख उनको भी ये शोले,
भला कहाँ सोचते हैं ये, घर जलाने वाले !

अब तो मदद करना भी गुनाह है दोस्तो,
नहीं हैं कम इधर, इलज़ाम लगाने वाले !

बड़ा बेरहम है आज का ये जमाना दोस्त,
लापता हो जाएंगे, तुझपे जाँ लुटाने वाले !

कहाँ फंस गए ठगों की नगरी में “मिश्र”,
न मिलेंगे ढूंढें से अब, दोस्ती निभाने वाले !


Gazal :

न करता कोई याद, तो ख़ुद ही याद कर लो !
टूटे हुए रिश्तों को, फिर से आबाद कर लो !

सर झुकाना है अपनों के लिए तो शर्म कैसी,
दिल को गुबारों से, ज़रा सा आज़ाद कर लो !

हर दफ़ा ख़ामोशियों से काम होता नहीं दोस्त,
बात कर के क्यों न, ख़ात्मा ए फसाद कर लो !

रूठों को मनाने में दिखता है बड़ा अपनापन,
वक़्त मिल जाए तो, इसे भी अहसास कर लो !

इस ज़रा सी ज़िन्दगी का क्या भरोसा है “मिश्र”,
चाहे तो इसे आबाद कर लो, या बर्बाद कर लो !


Gazal :

किसी को अपनों की, बदहालियां नज़र नहीं आतीं !
खुद के भी बदवक़्त की, कहानियां नज़र नहीं आतीं !

सब को औरों में हज़ार कमियां तो दिखती हैं दोस्तो,
मगर ख़ुद में किसी को, मदमाशियां नज़र नहीं आतीं !

करते हैं दिखावा प्यार का जो दिल में खोट रख कर,
कभी उनके चेहरे पर, वो रमानियाँ नज़र नहीं आतीं !

अरे अब तो ईमान की बातें लिखना छोड़ दो “मिश्र”,
अब कहीं भी ईमान की, निशानियां नज़र नहीं आतीं !


Gazal :

यहाँ कोंन है अपना कोंन पराया, वक़्त मिला तो देखेंगे,
किसने दिल से दिल को मिलाया, वक़्त मिला तो देखेंगे !

कितनों ने वफ़ा से साथ निभाया, वक़्त मिला तो देखेंगे,
यहां कितनों से हमने धोखा पाया, वक़्त मिला तो देखेंगे !

जीवन के पथ पर चलते चलते हम हार गए हम टूट गए,
किस रस्ते ने हमको खूब सताया, वक़्त मिला तो देखेंगे !

सहते सहते अपनों की घातें दिल अपना हलकान हुआ,
कब कोंन सा किसने तीर चलाया, वक़्त मिला तो देखेंगे !

करता सब के मन की रहा कितना ही भले नुक्सान हुआ,
इस जीवन में किसने ज़हर मिलाया, वक़्त मिला तो देखेंगे !

अपनों से मिल कर खुश होना अपने नसीब में नहीं “मिश्र”
पर गैरों ने कितना प्यार लुटाया, वक़्त मिला तो देखेंगे !


Gazal :

खुश है ज़िंदगी से जो, उसे आबाद रहने दो !
दिल की धड़कनें यूं ही, बे आवाज़ रहने दो !

न उखाड़ो गढ़े मुर्दों को यूं ही बेसबब यारो,
यूं गुज़रे हुए लम्हों को, मत आज़ाद रहने दो !

नहीं है फरिश्ता कोई इस जमाने में अब तो,
संभालो खुद को ही, औरों की बात रहने दो !

न सिखाइये अपनी सरगम किसी को “मिश्र”,
जो खुश है जिस अंदाज़ में, वो अंदाज़ रहने दो !


Gazal :

सब कुछ लुटा कर, कुछ मिला तो क्या मिला,
अरे इज़्ज़त गवां कर, कुछ मिला तो क्या मिला !

सारी ज़िन्दगी तो गुज़ार दी बेचारगी में हमने,
अपनी मौत पा कर, कुछ मिला तो क्या मिला !

शराफत की ज़िन्दगी न जीने दी किसी ने भी,
यारो आँखें दिखा कर, कुछ मिला तो क्या मिला !

देखा है बड़े गौर से ईमान ओ करम अपनों का,
गैरों से रिश्ते जोड़ कर, कुछ मिला तो क्या मिला !


Gazal :

कभी न कभी तो, ये वक़्त भी आना ही था !
जो आया था उसे तो, एक दिन जाना ही था !

क्यों लगा बैठे थे तुम एक मुसाफिर से दिल,
उसे तो अपनी, मंज़िल की ओर जाना ही था !

होती नहीं ये दूरियां राहों की असीम यारो,
कभी न कभी तो छोर, उनका आना ही था !

कुछ भी न साथ लेकर गया वो जाने वाला,
उसे सब कुछ तो इधर, छोड़ जाना ही था !

बूढ़े दरख़्तों से आँधियों की भला क्या यारी,
कभी न कभी तो जड़ से, उखड जाना ही था !

क्यों ग़मज़दा हो देख अपने गुलशन को “मिश्र”,
कभी न कभी तो पतझड़, इसमें आना ही था !


Gazal :

गिर के फिर संभलने का, मज़ा ही कुछ और है !
अपने पैरों से चलने का, मज़ा ही कुछ और है !

प्यार में चोट खाने का अफसोस न करो दोस्त,
मोहब्बत में बिछड़ने का, मज़ा ही कुछ और है !

ज़िन्दगी जीने के लिए कोई तिकड़म न लगाइये,
सिर्फ अपनी तरह जीने का, मज़ा ही कुछ और है !

अपने अमोल रिश्तों को दौलत से न तौलिये कभी,
अपनों के आगे झुकने का, मज़ा ही कुछ और है !

भरी पड़ी है ये दुनिया अनेकों लम्पटों से “मिश्र”,
उनसे ईमान बचा रखने का, मज़ा ही कुछ और है !


Gazal :

कभी क़ातिल रिहा, कभी मासूम लटक जाता है !
फरेबों के सहरा में, बेचारा सच भटक जाता है !

शराफ़त की औकात कुछ भी नहीं जमाने में,
बदमाशियों के आगे, सब कुछ अटक जाता है !

अजीब सा आलम है इस बेसब्र शहर का यारो,
यहां ज़रा सा मसला भी, दिलों में खटक जाता है !

लोग बिछाते हैं जाल कुछ इस कदर फरेबों का,
कि ज़िन्दगी का सफ़र, अधर में अटक जाता है !

ये दुनिया वो दुनिया नहीं जिसकी तलाश है “मिश्र”,
इसमें घुसते ही प्राणी का, साहस ठिठक जाता है !


Gazal :

गर चाहिए मोहब्बत, तो काबिल बनिए !
तपती धूप नहीं, खुशनुमा बादल बनिए !

बन के बारूद क्या मिलेगा तुम्हें दोस्त,
बन सको तो, आँखों का काजल बनिए !

न मुस्कराओ किसी को डूबता देख कर,
गर बन सको तो, उसका साहिल बनिए !

ज़िन्दगी में ज़रा संभल कर चलो “मिश्र”,
न ज्यादा सुर्ख़रू, न ज्यादा जाहिल बनिए !


Gazal :

घर बैठे कभी फूल, मुस्कराने नहीं आते,
बिन ख़ुशी, मोहब्बत के तराने नहीं आते !

नफ़रत को उजड़ा हुआ आशियाँ समझो,
जहां पंछी भी कभी, सर छुपाने नहीं आते !

खुश्क आँखें भी कर देती हैं वयां हाले दिल,
उनको भी दिल के राज़, छिपाने नहीं आते !

क्यों छोड़ा था सफ़र में यूं अकेला उनको,
यारा लौट कर कभी, यार पुराने नहीं आते !

शहर की फ़िज़ाओं से बच कर रहिये दोस्त,
आग लगाने आते हैं लोग, बुझाने नहीं आते !

बेहतर, भूल जाओ गुज़रे लम्हों को “मिश्र”,
क्योंकि लौट कर फिर, वो जमाने नहीं आते !


Gazal :

ग़मों का आलम, बदलते भी देर नहीं लगती,
खुशियों के रंग, बिगड़ते भी देर नहीं लगती !

भुला दिया जिसको कभी बेकार समझ कर,
उसका मुकद्दर, बदलते भी देर नहीं लगती !

जो खाते हैं कसम वफ़ाओं की अच्छे दिनों में,
वक़्त-ए-ग़र्दिश में, बदलते भी देर नहीं लगती !

मौसम का क्या भरोसा कब बदल दे मिज़ाज,
चाल इन हवाओं की, बदलते देर नहीं लगती !

न बहको “मिश्र” इतना मंज़िल को करीब देख,
अंजाम-ए-सफर को, बदलते भी देर नहीं लगती !


Gazal :

कोई हम अकेले नहीं, परेशान और भी हैं !
अभी तो देखा है क्या, मुकाम और भी हैं !

न समझो कि गुज़र गए फरेबों के दिन,
अभी तो ज़िंदगी में, कोहराम और भी हैं !

वो वादे वो इरादे सब झूठ हैं मेरे दोस्त,
अभी ठगने के लिए, इंतज़ाम और भी हैं !

कैसे छूट पाएंगे हम इस जिद्दो ज़हद से,
अभी हमारे सर पर, इल्ज़ाम और भी हैं !

न सोचो कि बात बस इतनी सी है “मिश्र”,
अभी इस नसीब के, इम्तिहान और भी हैं !


Gazal :

आज तो दिल में, यादों का चमन सजा बैठा है !
अतीत का हर लम्हा, काबिले याद बना बैठा है !

वक़्त था कि रोज़ मिलते थे अपने यारों से हम,
अब तो कोई कहीं, तो कोई कहीं जमा बैठा है !

आये थे इस शहर में जोशो जवानी लेकर हम,
मगर अब कोई नाना, तो कोई दादा बना बैठा है !

आये थे आशाओं से भरा निश्छल दिल लेकर,
अब कोई अहम्, तो कोई वहम का मारा बैठा है !

हमने भी देखे थे कभी नज़ारे खुली आँखों से,
अब तो उन पर, ये बुढापे का चश्मा चढ़ा बैठा है !

क्या इसी को कहते हैं ज़िंदगी जीना दोस्त कि,
जो था सहारा औरों का, अब लाचार बना बैठा है !

न पहिचान पाओगे “मिश्र” अपनों को भी अब,
अब हर कोई, अपने चेहरे पर मुखौटा लगा बैठा है !


Gazal :

तूने खुशुबुओं का रिश्ता, बर्बाद कर दिया !
इक हरे भरे से चमन को, उजाड़ कर दिया !

तेरी हर ख़ुशी में लटके थे जो हार बन कर,
मुस्कराते उन फूलों को, तूने कबाड़ कर दिया !

जो खुश थे तेरी बुलंदियों को देख कर दोस्त,
ख़ुदारा उन्हीं के दिल पर, तूने वार कर दिया !

जिसका सहारा लेकर पहुंचा तू इतना ऊंचा,
उसी को धक्का मार कर, तूने बेराह कर दिया !

ये कैसा दस्तूर ओ ज़मीर है तेरा अय “मिश्र”,
कि खून के रिश्तों को, तूने लाचार कर दिया !


Gazal :

ये रात गुज़र जाए तो चले जाइएगा,
न रहे कोई अरमां तो चले जाइएगा !

बहुत बेचैन रहता है ये नादान दिल,
मैं समझा बुझा लूँ तो चले जाइएगा !

न जाने कितनी यादें बसी हैं दिल में,
उनको मैं भूल जाऊं तो चले जाइएगा !

मुद्दत के बाद तो आये हो तुम दोस्त,
ज़रा गुफ़्तगू कर लूँ तो चले जाइएगा !

ये कैसी है तड़प कैसी है हलचल “मिश्र”,
ये तूफ़ान गुज़र जाए तो चले जाइएगा !


Gazal :

कैसे हैं ये मौसम, जो सताने चले आते हैं !
फिर से याद उनकी, दिलाने चले आते हैं !

कभी इतराते हैं मोहब्बत के हसीन लम्हें,
कभी नफरतों के पल, रुलाने चले आते हैं !

पहले देते हैं लोग ग़मों का ज़हर खुद ही,
और बाद इसके, शोक जताने चले आते हैं !

कैसी है ये दुनिया और कैसे हैं लोग इसके,
कि दिल जलों के, दिल जलाने चले आते हैं !

अफ़सोस कि न देखता कोई भी घर अपना,
मगर औरों का घर, वो जलाने चले आते हैं !

सब जानते हैं “मिश्र” कि ज़रा सी है ज़िंदगी,
फिर भी आग इसमें, वो लगाने चले आते हैं !


Gazal :

मैंने तो समझा कि, दर्द बंटाने आया था !
लगा कि दुःख में, साथ निभाने आया था !

दिखाए थे ज़ख्म सारे मरहम की आस में,
पर वो बेवफा तो, नमक लगाने आया था !

चढ़ा दिया हमको बिना पतवार कश्ती पर,
और हम समझे कि, पार लगाने आया था !

पानी से भरी गागर फोड़ दी उसने यूं ही,
हम समझ बैठे कि, प्यास बुझाने आया था !

न समझ पाए हम इस दुनिया को अब तक,
वो था कि दस्तूर-ए-जफ़ा, निभाने आया था !


Gazal :

अइ दिल तू हर किसी से, इतना प्यार मत कर !
मस्त है ये दुनिया, किसी का इंतज़ार मत कर !

रहना है तुझे अकेला बस कर जुगत उसकी तू,
यारा किसी और के काँधे पर, ऐतबार मत कर !

न समझता है दुःख दर्द कोई भी किसी के अब,
अपने ग़मों का तमाशा, तू सरे बाज़ार मत कर !

ये चमकते सितारे तो मिल्कियत हैं आसमां की,
फ़िज़ूल उनकी चाहत में, दिल बेक़रार मत कर !

बड़ी मुश्किल से पनपता है मोहब्बत का गुलशन,
तू अपनी नफरतों से उसको, सुपुर्दे खार मत कर !


Gazal :

इज़्ज़त बचानी है, तो ईमान बचा के रखिये !
अपने हसीन सपनों को, यूँही सजा के रखिये !

गर अंधेरों से डर लगता है तो मुस्तैद हो कर,
आँधियों से अपने चरागों को, बचा के रखिये !

किस्मत के सहारे बैठ कर कुछ नहीं मिलता,
यारो हाथ पैरों में, ज़रा जुम्बिश बना के रखिये !

दर्द तो होता है दुनिया के दिए ज़ख्मों में यारा,
पर दिल के तूफां पे ज़रा कब्ज़ा बना के रखिये !

तैयार बैठे हैं शिकारी ले कर फरेबों का जाल,
न आना किसी लोभ में, खुद को बचा के रखिये !

ग़लतफ़हमी में न रहिये “मिश्र” कि सब अपने हैं,
अपने दिल कि बातें ज़रा, दिल में छुपा के रखिये !


Gazal :

एक मुसाफिर हूँ यारो, कोई तो साथ दे दो !
थोड़ी सी देर को, मोहब्बत की छांव दे दो !

अब थक चूका हूँ मैं इस लंबे सफर से यारो,
मुश्किल है आगे बढ़ना, ज़रा सा हाथ दे दो !

बड़ी ज़िल्लतों से पहुंचा हूँ मैं यहां तलक भी,
बस कुछ वक़्त ठहरूंगा, ज़रा सी ठाँव दे दो !

बड़ी ही बेरहम हैं ज़िन्दगी की ये राहें “मिश्र”,
आँखों में नींद है, कोई प्यारा से ख़्वाब दे दो !


Gazal :

इश्क़ से हमने तो यारो, बंदगी कर ली !
यूं ही तबाह बेकार में, ज़िन्दगी कर ली !

हमें तो उजाले दौड़ते हैं काटने को अब,
हमने तो चरागों की, गुल रोशनी कर ली !

अपनों की मोहब्बत ने धोखा दिया यारो,
इसलिए गैरों से हमने, आशिक़ी कर ली !

रखा है क्या हसीनों की महफ़िलों में “मिश्र’
छोड़ कर सब को, तन्हा ज़िन्दगी कर ली !


Gazal :

नए रिश्तों को पनपने में, देर तो लगती है !
यूं दुनिया को परखने में, देर तो लगती है !

नहीं बिकती मोहब्बत बाज़ार में कहीं भी,
यारो दिलों में उतरने में, देर तो लगती है !

चाहे आजमाओ नुस्खा किसी हकीम का,
मगर ज़ख्मों के भरने में, देर तो लगती है !

ज़माने की ठोकरों से घायल पड़ा जो दिल,
उसके फिर से मचलने में, देर तो लगती है !

न घबराइये “मिश्र” देख कर बदला मौसम,
इंसान को भी बदलने में, देर तो लगती है !


Gazal :

ये ज़िन्दगी सँवर जाये, अगर तो अपने पास हों !
बदल जाएँ शामो सहर, अगर तो अपने पास हों !

ठहरी हैं जो उदासियाँ आंखों में हमारी दोस्तो,
हो जाय उनका खात्मा, अगर तो अपने पास हों !

महकता है गुलशन भी मौसम के हिसाब से ही,
महकेगा वेवक़्त वो भी, अगर तो अपने पास हों !

तन्हाइयों की ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी है यारो,
जमेंगी फिर से महफ़िलें, अगर तो अपने पास हो !

निरी उलझनों का सामान है ये ज़िन्दगी भी “मिश्र”,
सुलझेगी हर उलझन भी, अगर तो अपने पास हों !


Gazal :

गर राहों की मुश्किलों को, सह सको तो चलो !
गर तुम बेरुखी की धुंध में, रह सको तो चलो !

ये जमाना न बदला है न बदलेगा कभी भी,
गर उसके बिछाए काँटों से, बच सको तो चलो !

कोई न निकलने देगा अपने से आगे दोस्त,
गर गिरा के तुम किसी को, बढ़ सको तो चलो !

डूबा हुआ है सूरज अब शराफ़त का आजकल,
गर इस गर्दिश ए अंधेरां में, चल सको तो चलो !

बदल चुकी है हवाओं की तासीर भी अब तो,
गर खिलाफ इन हवाओं के, चल सको तो चलो !

ये अपने परायों का मसला छोड़ भी दो “मिश्र”,
गर छोड़ कर अब शराफ़तें, चल सको तो चलो !


Gazal :

अब इस भीड़ में घुटता है दम, चलो कहीं और चलें !
ढूंढनी है सर-सब्ज़ फ़िज़ा, तो चलो कहीं और चलें !

सांस लेना भी है दूभर इस कंक्रीट के जंगल में अब,
गर लेनी है साँसें सुकून की, तो चलो कहीं और चलें !

तू भी दुखी है मैं भी दुखी हूँ इस मंज़र से अय दिल,
सुलझेंगे अपने भी मसले उधर, चलो कहीं और चलें !

कभी गूंजती थीं हर तरफ शहनाइयों की मीठी धुन,
अब तो हर तरफ है बस हंगामा, चलो कहीं और चलें !

कभी बहती थीं नदियां दूध की कहते हैं पुराने लोग,
मगर अब तो मौज़ है शराब की, चलो कहीं और चलें !

कभी महकती थीं खुशुबुएं इस हमारे शहर में “मिश्र”,
इधर तो धुंध ही धुंध है हर तरफ, चलो कहीं और चलें !


Gazal :

खुद अपने ही दीये ने, अपना घर जला दिया !
समझा जिसे दिल, उसने ही दिल जला दिया !

तमन्नाओं का हुज़ूम लिए बैठे रहे उम्र भर,
इंतज़ार ए वक़्त ने, हमें बुझदिल बना दिया !

न जीना ही सीख पाए ठीक से न मरना ही,
हमने खुद को ही, खुद का क़ातिल बना दिया !

न चाहत सुकून की न फ़िक्र मौजों की यारो,
ज़िन्दगी को बेकसी की, महफ़िल बना दिया !

किसको दोष दूं खुद को या तक़दीर को “मिश्र”,
संभलते संभलते भी, अपना दामन जला दिया !


Gazal :

होती हर किसी पे दौलत, तो जाने क्या होता !
हो जाती चाहतें सब पूरी, तो जाने क्या होता !

किसी के दिल में है क्या न जानता कोई भी,
उसका मन भी पढ़ सकते, तो जाने क्या होता !

मुंह सीं के जी लिए इस दुनिया में हम तो यारो,
गर हमारी भी जुबां चलती, तो जाने क्या होता !

सर झुका के रहे तब तो उठाईं जिल्लतें इतनी,
गर सर उठा कर चलते हम,तो जाने क्या होता !

बामुश्किल मिली है मंज़िल चलके सीधी राहों पे,
गर हम भी चलते चाल टेढ़ी, तो जाने क्या होता !

एक ख़ुदा नचाता है दुनिया को इशारों पे अपने,
अगर सब के सब ख़ुदा होते, तो जाने क्या होता !

कई बार सोचा है ख़ुदा बन कर हमने भी “मिश्र”,
अगर हम न रहते दुनिया में, तो जाने क्या होता !


Gazal :

डर है कि कहीं वो, बेवफ़ा न हो जाए !
बे-सबब ये ज़िंदगी, तबाह न हो जाए !

वो तो बेख़बर है दुनिया की चालों से,
फंस कर कहीं वो, गुमराह न हो जाए !

फ़ितरत बदलते नहीं लगती देर यारो,
गलती से कहीं उससे, गुनाह न हो जाए !

दोस्ती का भरोसा भी न रहा आज कल,
कहीं प्यार किसी से, बेपनाह न हो जाए !

सोचते रहिये दोस्त बस ये बेतुकी बातें,
कहीं दिमाग़ तेरा भी, ख़राब न हो जाए !


Gazal :

अपने को अब भाती नहीं, शरारत किसी की !
अब तो समझ आती नहीं, इबारत किसी की !

कोई उठाये भले ही तबालतें उम्र भर यूं ही,
पर बदलती नहीं है दोस्तों, आदत किसी की !

ज़िन्दगी मिली है तो ज़रा प्यार से जी लो इसे,
फ़िज़ूल में क्यों लेते उधार, अदावत किसी की !

इज़्ज़त है अब उसी की है जिसके पास दौलत,
अब तो न काम आती इधर, शराफत किसी की !

न गुनगुनाइए “मिश्र” अब चाहत के वो तराने,
इधर ख़ुदा भी न सुनता अब, इबादत किसी की !


Gazal :

जब कभी बादल, मेरे आँगन पे गरजते हैं !
तब तब उनकी यादों के, साये लरजते हैं !

कैसे भुलाएं वो मोहब्बत के हसीन लम्हें,
उनके सहारे तो, सुबह ओ शाम गुज़रते हैं !

वो तो पूंछते हैं नफ़रत से हमारा रिश्ता,
हम हैं कि इसे उनका, अंदाज़ समझते हैं !

कोई कैसे भूल सकता है अपने वादे इरादे,
पर अफ़सोस, जुबां से लोग कैसे पलटते हैं !

यही ज़िन्दगी है “मिश्र”अफ़सोस मत करिये,
इधर तो ऐसे ही, हर पल नज़ारे बदलते हैं !


Gazal :

न दिन को चैन, न रातों को आराम आता है !
है पाया नसीब ऐसा, कि दर्द बेलगाम आता है !

न रहा कुछ बाक़ी इस बुत से शरीर में दोस्त,
दिल को तो याद उनका, बस इल्ज़ाम आता है !

बरसती हैं सावन की घटायें हो कर आँखों से,
अब हर हवा का झोखा, दर्द का पैगाम लाता है !

अगर जीना है ज़िन्दगी तो दर्द को भूलो “मिश्र”,
यूं ही घुट घुट के जीना, मुश्किलें तमाम लाता है!


Gazal :

तूने अय ख़ुदा, ये अजीब दुनिया क्यों बनाई !
मोहब्बत बनाई, तो फिर नफ़रत क्यों बनाई !

जब तेरी ही तासीर है हर इंसान में अय रब,
तो फिर दोस्ती बना के, दुश्मनी क्यों बनाई !

सुना है कि तू ही लिखता है मुकद्दर सभी के,
बस इतना बता दे कि, बदनसीबी क्यों बनाई !

जब तेरी ही औलाद है दुनिया का हर इंसान,
तो फिर तूने, अमीरी और गरीबी क्यों बनाई !

जब तू ही समाया है हर तरफ हर ज़र्रे में रब,
फिर हर चीज़ तूने, अपनी परायी क्यों बनाई !

क्या मज़ा आता है तुझे दुनिया के इस खेल में,
बेइज़्ज़ती बनानी थी, फिर इज़्ज़त क्यों बनाई !

जब मौत ही है आखिरी मंज़िल हम सभी की,
तो फिर भटकने को तूने, ज़िन्दगी क्यों बनाई !


Gazal :

झूठी दिलासा से, गम कभी कम नहीं होते !
बाद मरने के भी, ये झंझट कम नहीं होते !

ज़रा रखिये खोल कर अपनी आँखे ज़नाब,
दुश्मनी करने में, अपने भी कम नहीं होते !

लफ़्ज़ों का कितना ही मरहम लगाए कोई,
पर दिल पे लगे ज़ख्म, कभी कम नहीं होते !

चरागों के बुझाने से भला क्या होगा दोस्त,
अंधेरों में छुप जाने से, गुनाह कम नहीं होते !

भले ही सारी ज़ागीर दे दो किसी को “मिश्र”,
मगर तब भी अरमान उसके, कम नहीं होते !


Gazal :

मेरी शराफ़त ने ही, मुझको बर्बाद कर दिया !
अपना घर फूंक, औरों का आबाद कर दिया !

बड़ा ही घमंड पाल रखा था अपने खून पे मैंने,
उसने आज रिश्तों से, मुझे आज़ाद कर दिया !

अफ़सोस, कि खून भी मतलब परस्त हो गया,
मतलब निकलते ही, रिश्तों को हलाल कर दिया !

हमतो निभाते रहे बस बड़प्पन का लिहाज़ दोस्तो,
पर उसने अपना ज़मीर, समझो खाक कर दिया !

समझते रहे जिसको अपना ही सब कुछ “मिश्र”,
उसने ही मेरी सख़्शियत को, बदहाल कर दिया !


Gazal :

यारो हम तो सपने ही, बस बुनते रह गए !
बस व्यर्थ की बातों में, सर धुनते रह गए !

लोग तो आसमाँ तक भी घूम आये मगर,
हम तो सिर्फ आसमाँ को, तकते रह गए !

दोस्तों ने कर लीं पार जाने मंज़िलें कितनी,
मगर हम तो सिर्फ सोच में, घुलते रह गए !

समंदर में उतर कर पा लिए लोगों ने रत्न,
और हम किनारे पे खड़े, हाथ मलते रह गए !

पस्त इस कदर हो गए हमारे हौसले “मिश्र”,
कि ज़िन्दगी के खेल में, हम उलझते रह गए !


Gazal :

दर्द ए दिल मैं अपना,बताऊँ किस तरह !
मैं तराना ज़िंदगी का,सुनाऊँ किस तरह !

हो चुकी है जुबां बंद सदमों से मेरी यारो,
अफ़साने ज़िंदगी के,मैं बताऊँ किस तरह !

देखना है तो देख लो आँखों में झांक कर,
अब दिल में मेरे क्या है,बताऊँ किस तरह !

ताउम्र मैं सहता रहा दुनिया के रंजो ग़म,
अब तक हूँ हाथ खाली,जताऊं किस तरह !

बहुत कांटे हैं अब भी इस सफर में “मिश्र”,
थक गया हूँ इतना,उन्हें हटाऊँ किस तरह !


Gazal :

मैं तो बसता हूँ उनकी साँसों में मगर,
वो मंदिरों मस्जिदों में खोजते फिरते हैं !

मैं मिलता हूँ सिर्फ इंसानियत में मगर,
लोग हैं कि मज़हबों में खोजते फिरते हैं !

मैं तो एक था एक ही रहूँगा सदा मगर,
लोग तो मुझे टुकड़ों में खोजते फिरते हैं !

हर जगह हूँ मैं मगर देखता कोई नहीं,
मैं पास हूँ मगर वो दूर खोजते फिरते हैं !

न करते हैं याद मेरी वो अच्छे दिनों में,
जब आते हैं बुरे दिन तो खोजते फिरते हैं !

कर दिया भेंट हर पल नफरतों को “मिश्र”,
अब बिखरे हुए रिश्तों को खोजते फिरते हैं !


Gazal :

जैसे कि रंग पहले थे, न दिख रहे हैं आज कल !
सितारे वो चाहत के, न दिख रहे हैं आज कल !

यहाँ तो कांटे ही नज़र आते हैं इधर गुलशन में,
अब फूलों भरे वो गोशे, न दिख रहे हैं आज कल !

ज़िन्दगी के सफर में हमें रोज़ मिलते थे कभी वो,
अब मुस्कान भरे चेहरे, न दिख रहे हैं आज कल !

क्या हुआ है मेरे अज़ीज़ों की महफिलों को दोस्तो,
अब कहकहों के सुर भी, न दिख रहे हैं आज कल !

हमसे न पूँछिये इस पुराने दिल के हालात “मिश्र”,
उसे तो अपनों के साये भी, न दिख रहे हैं आज कल !


Gazal :

दुनिया दिल के हौसले, आजमाती क्यों है !
हर किसी मोड़ पर, कांटे बिछाती क्यों है !

ज़िन्दगी का खेल तो खेलते हैं हम मगर,
खेल के क़ानून, ये दुनिया बनाती क्यों है !

हार जाएँ तो बनाती है तमाशा सरेआम,
गर जीत जाएँ तो भी, शोर मचाती क्यों है !

होती है ग़मज़दा देख कर सुख औरों का,
पर ख़ुशी पे औरों की, आंसू बहाती क्यों है !

न समझ पाए ये बात हम आज तक “मिश्र”,
कि ये ज़िंदगी, गैरों पे दिल लुटाती क्यों है !


Gazal :

हर किसी ने चेहरे पे अब, मुखौटे लगा रखे हैं !
किसी ने मुस्कान, किसी ने ग़म सजा रखे हैं !

अंदर की असलियत भला कैसे जान पाएं हम,
अब लोगों ने अपने दिलों पर, पर्दे लगा रखे हैं !

घूमते हैं भेड़िये अब आदमी की शक्ल में यारो,
उसने दिल में फितरतों के, तूफ़ान सज़ा रखे हैं !

न रहीं आसान अब ज़िन्दगी की वो राहें “मिश्र”
रोकने के लिए राहों में, अब कांटे बिछा रखे हैं !


Gazal :

जमीं पे रह कर, आसमां झुकाने की फितरत है मेरी !

जो न मिल सका किसी को, पाने की हसरत है मेरी !

न चला हूँ मैं अकेला न चलूँगा कभी आगे भी दोस्तो,

ख़ुदाया दुनिया का प्यार, पाने की बस हसरत है मेरी !

ये ज़िन्दगी का सफर तो ग़मों का समन्दर है यारो,

पर इस राह की हर जोखिम, उठाने की आदत है मेरी !

मेरे अहसास को कोई समझे या न समझे ग़म नहीं,

मगर बुझते हुए चरागों को, जलाने की आदत है मेरी !

कोई माने या न माने ये तो दीगर सी बात है “मिश्र”,

मगर यूंही हस्र नफरतों का, बताने की फितरत है मेरी !


Gazal :

किसी को बेसबब, यूं सताने की कोशिश न करो !

अपनी गलती पे, मुँह छुपाने की कोशिश न करो !

बिता दो ज़िन्दगी बस मोहब्बत के सहारे यारा,

यूं ही झूठे सपनों को, सजाने की कोशिश न करो !

ये ख्वाहिशों के मेले तो न होंगे ख़त्म मरने तक,

जो मिल गया है, उसे गवाने की कोशिश न करो !

न बदलो जश्ने ज़िन्दगी को यूं ही रुसबाइयों में,

जज़्बात ए दिल को, दिखाने की कोशिश न करो !

गर बदलोगे ख़ुद तो बदलेगा ज़माना भी “मिश्र”,

व्यर्थ औरों को यूं, बदलवाने की कोशिश न करो !


Gazal :

ये ज़िंदगी के खेल भी, कितने अजीब होते हैं !

सच्चाई की राह में, हमेशा काँटे नसीब होते हैं !

न चाहता है कोई भी अपनों से दूर होना मगर,      

देते हैं वही धोखे, जो ज़िगर के करीब होते हैं !

ठुकराते हैं जो किसी को भी दौलत के नशे में,  

सच्चाई तो ये है, कि वो दिल के गरीब होते हैं !

जो ढूढने लगते हैं खोट अपनों के दिलों में भी,  

“मिश्र” वो लोग तो, सचमुच में बदनसीब होते हैं ! 


Kavita :

मेरी ज़िन्दगी की, बस इतनी सी कहानी है  !

बस चेहरे पर बेबसी, और आँखों में पानी है !

समझा जिसे अपना, वो तो बेवफा निकला ;

सोचा था क्या हमने, मगर वो क्या निकला ;

मारना ही था तो फिर, ज़िन्दगी क्यों दे दी ;

अच्छा भला था मैं, ये शर्मिंदगी क्यों दे दी ;

यही रंजोग़म तो, मोहब्बत की निशानी है !

चेहरे पे बस बेबसी —————–!

मेरी ज़िन्दगी की ——————-!

अपनों पे यकीन कर, पछताते रहे रात दिन ;

रिसते हुए ज़ख्मों को, सहलाते रहे रात दिन;

खा के भी धोखा, दिल में बिठाये रखा उसे ;

दुनिया के सामने, अपना बनाये रखा उसे  ;

मेरे फूटे नसीब की, बस यही मेहरवानी है !

चेहरे पे बस बेबसी —————–!

मेरी ज़िन्दगी की ——————-!

यूं ही मुश्किलों में, ज़िन्दगी बिता दी हमने ;

पर कोंन पराया है, पहिचान करा दी सबने;

दूर किनारे पर खड़े, हाथ हिलाते रहे अपने ;

हमें डूबता हुआ देखा, तो मुस्कराते रहे अपने ;

पर लोग कहते हैं कि, यही तो ज़िंदगानी है !

बस चेहरे पर बेबसी —————-!

मेरी ज़िन्दगी की ——————-!


Gazal :

दिल की हरकतें, जुबां पे आने लगी हैं धीरे धीरे  !

अब अंदर से हसरतें, मुस्कराने लगी हैं धीरे धीरे !

बहुत जी लिए घुट घुट के अब मुश्किल है दोस्तो,

अपनों की शरारतें, दिल दुखाने लगी हैं धीरे धीरे !

हर जज़्बात को जुबां पर लाना मुश्किल है यारो,

मगर दिल की तरंगें, सुगबुगाने लगी हैं धीरे धीरे !

वक़्त ए सलामती न पहिचान आया अपना पराया,

अब लोगों की फितरतें, समझ आने लगी हैं धीरे धीरे !


Gazal :

 

चलो हंसने की कोई, हम वजह ढूंढते हैं !

न हो जिधर कोई ग़म, वो जगह ढूंढते हैं !

 

 बहुत उड़ लिए ऊंचे आसमानों में यारो,

चलो जमीं पे ही कहीं, हम सतह ढूंढते हैं !

 

छूटा संग कितनों का ज़िंदगी की जंग में,

चलो उनके दिलों की, हम गिरह ढूंढते हैं !

 

बहुत वक़्त गुज़रा भटकते हुए अंधेरों में,

चलो अँधेरी रात की, हम सुबह ढूंढते हैं !


Gazal :

जिधर देखता हूँ उधर, अँधेरा ही अँधेरा है !

न जाने कितनी दूर, मेरी रात का सवेरा है !

 

बामुश्किल बचा हूँ मैं दुश्मनों के चंगुल से,

मगर अफ़सोस मुझे, अपनों ने आ के घेरा है !

 

क्या गुल खिलाते हैं लोग देखना है ये आगे,

यहां तो हर तरफ, बस डाकुओं का बसेरा है !

 

ख़ुशी का कोई कोना न मिलता ढूंढने से अब,

जिधर देखो बस उधर, अब दहसतों का घेरा है !

 

लड़ रहे हैं लोग सब हड़पने को चीज़े गैरों की,

पर भूलते हैं कि दुनिया में, न मेरा है न तेरा है !

 

कब तक बचोगे “मिश्र” जमाने की साजिशों से,

दुनिया में हर शख्स ही, दिखता अब लुटेरा है !

 


Gazal :

मिली है ज़िन्दगी, तो जीना भी आएगा !

दुनिया के ग़मों को, सहना भी आएगा  !

 

अभी उदास हैं ज़माने के सताए हैं हम,     

मगर कभी तो यारो, हंसना भी आएगा !

 

चुप चुप के जी रहे हैं अब तलक तो हम,

पर एक दिन जुबां से, कहना भी आएगा !

 

हैं नफरतें ही जिनका करम आज कल,   

कभी मोहब्बत से उन्हें, रहना भी आएगा !

 

वक़्त की चट्टानों ने रोका जिस पानी को,

बंधनों के हटते ही, उसे बहना भी आएगा !   

 

जिधर देखता हूँ अपने ही दिखते हैंमिश्र“,

कभी कसौटी पे, उनको कसना भी आएगा !


Gazal :

नज़दीक रह कर भी, तू जुदा सी लगती है !

हर वक़्त जाने क्यों, तू खफा सी लगती है !

ज़िन्दगी आया समझ हमें तेरा फ़लसफ़ा,

कभी हमसफ़र तो कभी, सजा सी लगती है !

हर लम्हा गुज़ारा है इस कशमकश में हमने,  

कि तू वफ़ा की आड़ में, ज़फ़ा सी लगती है !

जाने कितने रंग देखे हैं इन आँखों ने तेरे,

मगर हर ढंग में हमेशा, तू जुदा सी लगती है !

समझ पाए हम कि क्या है ज़िन्दगीमिश्र“,

कभी तो दुश्मन तो कभी, ख़ुदा सी लगती है !


Gazal :

यहां किसी को, किसी में भी दिलचश्पी नहीं  !

लोगों के मुखड़ों पर, वो बात वो मस्ती नहीं !

 

अब याद आते हैं अपने वो गुज़रे हुए ज़माने,  

मगर उधर भी, वो बस्ती अब वो बस्ती नहीं !

 

बड़ा ही अजीब दरिया है ये ज़िन्दगी भी यारो,

यहां पतवार तो हैं, लेकिन कोई भी कस्ती नहीं !

 

इस शहर में बना पाये किसी को भी अपना

हूँ तो मैं मुसाफिर ही, मेरी तो कोई हस्ती नहीं !

 

हर चीज़ नहीं है नसीबों में हर किसी केमिश्र” 

ईमान छोड़ कर यहां, कोई भी चीज़ सस्ती नहीं !


Gazal :

देखा हसीन राहों को, तो बस चलता चला गया !  

कुछ सोचा समझा, बस बढ़ता चला गया

 

डर गया था मैं देख कर रास्ते अपनी मंज़िल के,

बस देखी जिधर भी भीड़ उधर चलता चला गया !

 

पता था हमें कि वो तो धोखे के नज़ारे थे सारे,  

बेमंज़िल के सफर में, अँधेरा बढ़ता चला गया

 

चलता अपनी राह तो मिल जाती मंज़िल शायद

पर बेखुदी की हवाओं में बस उड़ता चला गया !

 

पानी है मंज़िल तो मन को भटकने दो यारो,

रोओगे सोच कर कि, वक़्त सरकता चला गया !


Gazal :

मेरी चुप को, मेरी कमज़ोरी मत समझ लेना !

तुम अपने खयालात को, सच मत समझ लेना !

 

मैं सुनता हूं सभी की बात को दिल लगा कर,

जवाब न देपाना, मेरी मज़बूरी मत समझ लेना !

 

ये तो मेरी शराफत है कि सहता हूँ हर सितम,

मेरी इस आदत से, मुझे कायर मत समझ लेना !

 

मेरा तो ये उसूल है कि बात की जड़ समझूँ,

मेरे खयालात पर, मुझे पागल मत समझ लेना !

 

सिर्फ बातों के युद्ध में देखी हैं बर्बादियाँ मैंने,

मेरी इस बात को यारो, बे बात मत समझ लेना !

 

शब्दों की चोट तन पै नहीं दिल पै घाव करती है,

इस फ़लसफे को, कोरी बकबास मत समझ लेना !


Gazal :

न बची जीने की चाहत, तो मौत का सामान ढूंढता है !

क्या हुआ है दिल को, कि कफ़न की दुकान ढूंढता है !

 

समझाता हूँ बहुत कि जी ले आज के युग में भी थोड़ा,

मगर वो है कि बस, अपने अतीत के निशान ढूंढता है !

 

मैं अब कहाँ से लाऊं वो निश्छल प्यार वो अटूट रिश्ते ,

बस वो है कि हर सख़्श में, सत्य और ईमान ढूंढता है !

 

दिखाई पड़ते हैं उसे दुनिया में न जाने कितने ही अपने,

मगर वो तो हर किसी में, अपने लिए सम्मान ढूंढता है !

 

मूर्ख है “मिश्र” न समझा आज के रिश्तों की हक़ीक़त,

अब रिश्तों से मुक्ति पाने को, आदमी इल्ज़ाम ढूंढता है !


Gazal :

दुनिया के दिए ज़ख्मों के, निशान अभी बाकी हैं !

हम जी रहे हैं इसलिए कि, अरमान अभी बाकी हैं !

 

देख कर हमें बदल देते हैं लोग अपना रास्ता अब,

शायद आते हैं वो ये देखने कि, प्राण अभी बाकी हैं !

 

छोड़ देते ये शहर ये गलियां सदा के लिए हम तो,

पर क्या करें कुछ लोगों के, अहसान अभी बाकी हैं !

 

“मिश्र” लुट तो चुके हैं हम इस दुनिया के बाजार में,

पर घर में मेरी यादों के कुछ, सामान अभी बाकी हैं !

 


Gazal :

चाहे दरकीं हैं दीवारें, मगर घर अभी बाक़ी है !

हालात बदले हों भले ही, असर अभी बाक़ी है !

 

दिल में कितने ही सवालात हों ख़िलाफ़त के,

मगर जैसा भी है, रहने को शहर अभी बाक़ी है !

 

बड़ी ही शान थी इन दर ओ दीवार की कभी,

मिट गयी वो रंगत, मगर खंडहर अभी बाक़ी है !

 

यहाँ बसती है मेरे अहसासों की दुनिया दोस्तो,

बस जीलूं कुछ और, इतना सबर अभी बाक़ी है !


Gazal :

जो चलाते हैं खंज़र, भला उनका क्या जाता है !

देख कर दर्द औरों का, उनको तो मज़ा आता है !

 

नहीं ढूढता हल कोई किसी की मुश्किलों का, 

इस शहर में लोगों को, बस खेल करना आता है !

 

नफरतें, हिकारतें जम चुकी हैं दिलों में अब तो,  

बस ज़रा सी बात पर ही, बवाल करना आता है !

 

बेग़ैरती तो बन चुकी है ज़िन्दगी का एक हिस्सा,

इसी के चलते लोगों को, कमाल करना आता है !

 

दौलत के नशे में कुछ भी कर गुज़रता है आदमी, 

इसी के बल पे उसे, सच को झूठ करना आता है !


Gazal :

किसी भी हालात में, जीना आता है हमें ! 

ग़मों को ज़िगर से, लगाना आता है हमें !

 

जानते हैं कि फितरतें कैसी हैं दुश्मनों की, 

मगर हाथ फिर भी, मिलाना आता है हमें ! 

 

ज़िन्दगी गुज़ार दी यूंही फासलों में हमने, 

दूर रह के भी, साथ निभाना आता है हमें !

 

बेख़बर हैं दिल में उमड़ते शोलों से हम तो,

क्योंकि चाहत में, दिल जलाना आता है हमें !

 

ग़म नहीं कि चमन में कुछ न बचा “मिश्र”,

फिजां को खुशगवार, बनाना आता है हमें !


Gazal :

मोहब्बत के निशां, हम पीछे छोड़ आये हैं !

ख्वाबों की ज़िंदगी, हम पीछे छोड़ आये हैं !

 

हम भी चले थे मोहब्बत की राहों पर कभी ,

पर बे-अंजाम सफ़र, हम पीछे छोड़ आये हैं !

 

दिल के मचलने से कभी ज़िंदगी नहीं चलती,

चाहतों का हर सबब, हम पीछे छोड़ आये हैं !

 

ज़रुरत नहीं हमें किसी के मशविरे की दोस्त,

नसीहतों का दौर तो, हम पीछे छोड़ आये हैं !

 

जो न था नसीब में उसे क्या याद करें “मिश्र”,

यादों से भरी पोटली, हम पीछे छोड़ आये हैं !


Gazal :

पूछूँगा विधाता से मैं, कि ये कैसा मुकद्दर बना दिया !

न बचा था ठौर कोई, जो आँखों को समंदर बना दिया !

 

सारी ज़िंदगी गुज़र गयी यूं ही अपनों के आगे झुकते,

क्या बिगाड़ा था उसका, जो इतना कमतर बना दिया !

 

दर्द औरों का देख कर खुशियां भुला दीं मैंने अपनी,

मगर मेरे लिए हर दिल, उसने क्यों पत्थर बना दिया !

 

जिसे भी समझा कुछ अपना चला गया देकर धोखा,

क्यों ज़िन्दगी को उसने, बोझिल इस कदर बना दिया !

 

अगर और भी सितम थे झोली में उसकी वो भी दे देता,

भुगत लेता उनको भी, अब तो दिल बेअसर बना दिया !

 

नहीं हूँ मैं अकेला जाने कितनों के ये जज़्बात हैं “मिश्र”,

कि उसने ज़िंदगी तो दे दी, पर जीना बदतर बना दिया !


Gazal :

कुछ लोगों को बस, कमियां गिनने की आदत होती है !

दूसरों के घर में, झाँक कर निकलने की आदत होती है !

 

ख़ुदाया भले ही न आता जाता हो उनको कुछ भी मगर, 

खुद को हर फन में, माहिर समझने की आदत होती है !

 

कोंन है दुनिया में जो न जानता ऐसे लोगों की फितरतें,

फिर भी उन्हें जाने क्यों, सुर्ख़रू बनने की आदत होती है !

 

ज़रा बच के ही रहने में कुशल है ऐसे कुशल लोगों से “मिश्र”,

उन्हें बिना मांगे ही, मशवरा देते रहने की आदत होती है !


Gazal :

रंगा है उनका खंज़र भी, मेरे ही खून से !

कर गए वो क़त्ल मेरा, बड़े ही सुकून से !

नहीं था पता कि क़ातिलों की गली है ये,

हार बैठा सब कुछ मैं. अपने ही जूनून से !

न रहे वो दोस्त न रहा वो अपनापन ही,

अब लगता है डर हमें, अपने ही खून से  !

इंसानियत कैद है सिर्फ किताबों में “मिश्र”,

कुछ न होगा अब, उसमें लिखे मज़मून से !


Gazal :

उनका दिया हर रंजो गम, हमें अच्छा लगता है !

उनका ढहाया हर सितम, हमें अच्छा लगता है !

सुकून मिलता है उनकी दी हर चोट से दिल को,

रिसते ज़ख्मों को सहलाना, हमें अच्छा लगता है !

उनकी जफ़ाओं से दिल लबरेज़ रहता है हर दम,

पर उनके लिये आंसू बहाना, हमें अच्छा लगता है !

मेरी तड़प से गर वो खुश हैं तो शिकवा नहीं दोस्त ,

उनकी खुशियों का हर ढंग, हमें अच्छा लगता है !


Gazal :

सुकून मिलता है, जब मुलाक़ात होती है !

वो ज़िन्दगी की, एक हसीन रात होती है !

चले जाते हैं वो छोड़ कर जब साथ मेरा,

यादों में उनकी, ये सारी कायनात रोती है !

क्या करें दिल का न मानता वो किसी की,

आँखों से, सावन भादों की बरसात होती है !

मिटा नहीं सकता कोई तक़दीर का लिखा,

जहां भी जाते हैं हम, वो हमारे साथ होती है !

ये ज़िंदगी भी एक खेल है शतरंज का “मिश्र”,

इस में कभी तो शह, तो कभी मात होती है !


Gazal :

जो न मिल सके, उसे पाने की कोशिश न कीजिये !

अंजान को, अपना बनाने की कोशिश न कीजिये !

ये जो दुनिया है घाघों का एक ठिकाना है दोस्तो,

उनके दिल से, दिल मिलाने की कोशिश न कीजिये !

हर रास्ता मंज़िल पर पहुंछाएगा ये ज़रूरी नहीं,

यूं ही अंजान राहों पे, जाने की कोशिश न कीजिये !

मुखौटे में छुपाए फिरते हैं लोग औकात अपनी,

उनके झांसे में, कभी आने की कोशिश न कीजिये !

तज़ुर्बा है कि नहीं मिलता मुफ्त में कुछ भी कहीं,

खुद को लालच में, फंसाने कि कोशिश न कीजिये  !

जल मरते हैं क्यों परवाने भला शमा को क्या खबर,

मगर खुद को यूं ही, जलाने की कोशिश न कीजिये !


Gazal :

बिसरी यादों को दिल से, हम निकलने नहीं देंगे !

सताए कितना भी ये दिल, हम मचलने नहीं देंगे !

भले ही भर जाये मेरा दिल ज़फाओं के ज़ख्मों से,

मगर अपनी जुबाँ से आह, हम निकलने नहीं देंगे !

चाहे कितना भी ज़ोर डालें ये ज़माने की साजिशें,

दिल से मोहब्बत का जज़्बा, हम सिमटने नहीं देंगे !

ज़िन्दगी का जीना कोई खेल तमाशा नहीं दोस्तो,

इसे मनहूसियत के लबादे में, हम लिपटने नहीं देंगे !

बड़े ही अजीब हैं ज़िन्दगी के ताने बाने भी “मिश्र”,

मगर अपना भी वादा है कि, हम उलझने नहीं देंगे !


Gazal :

हमें तो दिल लगाने के, अब लायक न छोड़ा !

दिल को और ग़म उठाने के, लायक न छोड़ा !

 

कुछ इस क़दर ज़ुल्म ढाये हैं अय ज़िंदगी तूने,

कि हमें तो मुस्कराने के, अब लायक न छोड़ा !

 

कभी बहुत रसूक था अपना भी जमाने में मगर,

बद वक़्त ने नज़र मिलाने के, लायक न छोड़ा !

 

अब तो आती है हंसी हमें अपने झूठे गुरूर पर,

ख़ुदाया ख़ुद को ही जमाने के, लायक न छोड़ा !

 

फ़ितरतों ने ऐसा खिलाया गुल अपनों के साथ,

कि हमें फिरसे दिल मिलाने के, लायक न छोड़ा !


Gazal :

मुस्कान देखी मगर, दिल का बबंडर नहीं देखा,

चेहरे की चमक देखी, पर मन के अंदर नहीं देखा !

खुशियों के नज़ारे देखते रहे ज़िंदगी भर तुम तो,

पर कभी दर्द से मरने वालों का, मंज़र नहीं देखा !

शीशे के ये महल तो बनवा लिये बड़े ही शौक से,

पर कब टकरा कर तोड़ दे, वो पत्थर नहीं देखा !

भला अपनों से बिछड़ने का दर्द जानेगा वो क्या,

जिसने ज़िंदगी में अपनों से, मिल कर नहीं देखा !

वाह, औरों में ढूढता फिरता हैं कमियां हज़ार वो,

जिसने अपना गिरेवां, कभी झाँक कर नहीं देखा  !


Gazal :

आज कल दुनिया में, भला मुस्कराता कोंन है,

ज़िंदगी की इस दौड़ में, हंसता हंसाता कोंन है !

तारों को ताकते गुज़र जाती हो रात जिनकी,

उनको क्या पता कि, ख्वाबों में आता कोंन है !

सबके दिल में होती है मुस्कराने की चाहत,

पर उनके होठों से हंसी, आखिर चुराता कोंन है !

इस पेट की खातिर भागती दौड़ती है दुनिया,

अब हंसने के लिये, भला वक़्त बचाता कोंन है !

 


Shayari :

चाहा उनको इतना, कि हम दीवाने हो गए !

पर न जाने क्यों, वो हमसे बेगाने हो गए !

वो ढूढते फिरते हैं मोहब्बत औरों में “मिश्र”,

क्योंकि हम तो अब, गुज़रे जमाने हो गए !


Shayari :

एक हद के बाद, दर्द भी दवा बन जाता है !

एक हद के बाद, झूठ भी सच बन जाता है !

यही तो है असलियत जिंदगी की “मिश्र”,

एक हद के बाद, दुश्मन भी दोस्त बन जाता है !


Shayari :

ये दबदबा ये हुक़ूमत का मज़ा, हमेशा नहीं रहा करता !

ये दौलतों ये सौहरतों का नशा, हमेशा नहीं रहा करता !

कोई नहीं जानता ख़ुदा के इशारों को “मिश्र”,

यहाँ अंधेरों व उजालों का समां, हमेशा नहीं रहा करता !


Kavita :

कह नहीं पाता बच्चा फिरभी, माता सब कुछ लेती जान

क्या है ज़रूरत बच्चे की, ये सब उसको हो जाता ज्ञान

उसको भूख तभी लगती, जब बच्चे की भूख मिटा देती

उसको नींद तभी आती, जब पहले बच्चे को सुला देती

वो बच्चा जब यौवन पाता, ये सब कुछ कैसे जाता भूल

मात पिता की हर शिक्षा, उसको क्यों लगती है प्रतिकूल

उसकी हर इच्छा को पूर्ण किया, बिना किये कोई भी भूल

मात पिता की लघु इच्छा भी, उसको क्यों लगती है सूल

बीवी से ज्यादा इस दुनिया में, उसे प्यारा कोई और नहीं

समझो उसके जीवन में, अब माता के लिये कोई ठौर नहीं

बच्चों के लिये वो लाख लुटाये, मां के लिये वो कंगला है

माता को कोई जगह नहीं, भले ही अपना गाड़ी बंगला है 

बीवी को कोई दुख ना पहुंचे, पर मां के दुख की खबर नहीं

कुत्तों को खाना मिले समय पै, मां के पेट की खबर नहीं

ये तो कुदरत का ही चक्र है यारो, अब इसमें कोई फेर नहीं

अब ऐसी ही हालत होगी उसकी, अब इसमें ज्यादा देर नहीं

जिन बच्चों पै उसने जान लुटाई, अब अपना धर्म निभाएंगे

जैसे कर्ज़ उतारा अपनी माँ का, बैसे बच्चे भी फ़र्ज़ निभाएंगे


Kavita :

जब भी आती है याद मुझे, मैं मंथन करने लगता हूँ

गांव शहर की स्मृतियों का, मैं अंकन करने लगता हूँ

वहां फटे हुये गंदे कपडों में, मेहनत की बू बसती है

यहां चटकीले सुन्दर कपडों में, फैशन की बू बसती है

वे रिश्तों की एक प्रबल डोर में, सब बंध कर रहते हैं

यहां रिश्तों का कोई चलन नहीं, सब अपने में रहते हैं

वहां पर कोई नहीं पराया, सब अपना जैसा लगता है

पर ऐसी बातें यहाँ सोचना, बस सपना जैसा लगता है

वहां लोग गैरों के लिये भी, अपना नुकसान उठाते हैं

यहां लोग अपनों के लिये भी, गैरों सा भाव दिखाते हैं

खेतों में अन्न उगाने में, वो दिन रात परिश्रम करते हैं

खुद का पेट पाल कर वो, शहरों का भी पोषण करते हैं   

मिट्टी के घरों में रहने वाले, मन के अति भोले होते हैं

उनके मन में कोई प्रपंच नहीं, वे दिल को खोले होते हैं

भूल न पाता अपने गाँव को, जहाँ पर मैने जन्म लिया

भूल न पाता मिट्टी को, जहां बचपन मैने खत्म किया

इतना सब कुछ होने पर भी, सब गांव छोड क्यों भाग रहे

गांव की शुद्ध हवायें छोड़, शहरों का धुआँ क्यों फांक रहे


Kavita :

रंग मंच है जीवन अपना, हमें तो खेल दिखाना है !

एक नियंता ऊपर वाला, उसका निर्देश निभाना है !

दुख सुख या वियोग मिलन या मरने जीने का,
खुले आसमां के नीचे, सबको किरदार निभाना है !

करना हमको वही पड़ेगा जो लिख भेजा है उसने,

चाहे भले ही नाच न आवै, फिर भी नाच दिखाना है !

कोई बनता नायक तो कोई खलनायक बन जाता,

पर नायक तो नायक है, उसे अपनी जीत दिखाना है !

खेल खत्म होने को है बस अब पर्दा गिरने वाला है,

जितना वक़्त बचा है प्यारे, कुछ करके दिखलाना ह़ै !

“मिश्र” करो कुछ ऐसा कि कोई पात्र नहीं कर पाये,

दुनिया तुम पर नाज़ करे, कुछ ऐसा चरित्र निभाना है !

रंग मंच है जीवन अपना,————————-——–


Shayari :

प्यार कोई दीया नहीं, जब चाहा जला दिया बुझा दिया !‬‬
ये बालू का महल नहीं, जब चाहा बना लिया मिटा दिया !
ये तो रस है जो निकलता है दिल की गहराइयों से “मिश्र”,
ये बच्चों का खेल नहीं, जिसे चाहा हरा दिया जिता दिया !


Gazal :

आखिर किसी को हम, भुलाएँ कैसे !
किसी को बे सबब हम, रुलायें कैसे !

झूठे सपने दिखाना नहीं आता हमें,
किसी को चंगुल में हम, फँसाएं कैसे !

कितने ग़म दिए हैं ज़माने ने हमें,
किसी को दर्द ए दिल हम, बताएं कैसे !

लोग उड़ाते हैं हंसी हालात की यूं ही,
किसी को मुकद्दर हम, दिखाएँ कैसे !

सहते रहे कितनों के फिकरे उम्र भर,
मगर औकात उनकी हम, बताएँ कैसे !

भले ही कुचल डाला दिल हमारा “मिश्र”,
उनको ज़ख्म अपने हम, दिखाएँ कैसे !


Shayari :

दुनिया ने ठोकर मार कर, हमको चलना सिखा दिया !
इस जीवन के रंज़ो ग़म ने, हमको रहना सिखा दिया !
बनते रहे मतलब के रिश्ते प्यार का पहने मुखौटा,
पर दुनिया की नसीहतों ने, हमको पढ़ना सिखा दिया !


Shayari :

धन तो मिल गया लेकिन, सुकून की दौलत न मिली !
घर तो मिला लेकिन, हमें रहने की मोहलत न मिली !
दौड़ते रहे यूंही झूठी शानो शौकत के लिए इधर उधर,
किसको कहें हम अपना, समझने की फुर्सत न मिली !


Gazal :

कभी हम भी उनके नज़दीक रहा करते थे !
उनके दिए हर दर्द ओ ज़ख्म सहा करते थे !

अपनी ज़िंदगी को न जाना कभी अपना,
सिर्फ उनके ही लिए हम जिया मरा करते थे !

लोग तो आते पूंछने खैरियत हमारी लेकिन,
हम थे कि सिर्फ उनकी बात किया करते थे !

हमारी औकात कुछ न थी ज़माने में दोस्तो.
हर महफ़िल में उन्हीं का नाम लिया करते थे !

एक साया गुज़र गया क़रीब से तो याद आया,
कभी हम भी किसी से प्यार किया करते थे !


Gazal :

बर्बाद आशियाँ की सदायें, तू साथ लिए जा !
ये टूटी हुई साँसों की आहें, तू साथ लिए जा !

जीने की तमन्ना न रही अब हमको दोस्त,
अपनी यादों की वो बलाएँ, तू साथ लिए जा !

मेरा गम कुछ भी नहीं गर तू खुश है यारा,
अपने गम की सारी दवाएं, तू साथ लिए जा !

अब तेरे बिन इन बहारों का क्या होगा “मिश्र”,
इस जहां की सारी फ़िज़ाएं, तू साथ लिए जा !


Gazal :

न दिन को चैन, न रातों को क़रार मिला !
मेरे नसीब के हिस्से, बस इंतज़ार मिला !

न पा सका उनको ये मेरी बद्नसीबियां,
मगर ख़यालों में उनसे, मैं सौ बार मिला !

जिधर भी निकला ज़रा से सुकूँ के लिए,
मुझे तो हर जगह, मौसमे तक़रार मिला !

अब तो न रहा खुद पे भी भरोसा “मिश्र”,
मुझे तो हर जगह, झूठ का व्यापार मिला !


Gazal :

अगर हौसला है, तो मंज़िल मिल ही जाएगी !
गर न मिली आज, तो कल मिल ही जाएगी !

हिम्मत न हार अपने पथ से न भटक दोस्त,
अगर भरोसा है खुद पर, राह मिल ही जाएगी !

मत भूल कि वक़्त को बदलते देर नहीं लगती,
खुदाया एक दिन, तेरी चाहत मिल ही जाएगी !

जीत के लिए अपनी हार को न भुलाओ “मिश्र”,
अगर सच्ची है लगन, तो जीत मिल ही जाएगी !


Gazal  :

क्यों चले आते हैं लोग, यूं ही जी जलाने के लिए !

कर के खुशियों का वादा, उम्र भर रुलाने के लिए !

खुद ही तो पास आते हैं दिलरुबा बन कर वो तो,
फिर कोंन कहता है उन से, दूरियां बढ़ाने के लिए !

निभाते हैं कुछ लोग तो प्यार का बंधन उम्र भर,
पर कुछ लोग बनते हैं मीत, मतलब बनाने के लिए !

क्या जानेगा भला वो अश्कों की कीमत “मिश्र”,
आता है जो बाज़ार में, फ़क़त धंधा ज़माने के लिए !


Gazal  :

जिन्दगी की कशमकश ने, चाहतों को मार डाला !
धूप की इस तपिश ने, ठंडी हवाओं को मार डाला !

खुशियों की तमन्ना लिए आये थे इस शहर में हम,
मगर इसकी बेरुखी ने, सारे ख़्वाबों को मार डाला !

कितनी बदल गयी ये दुनिया समझ आ गया अब,
मतलब निकलते ही, लोगों ने रिश्तों को मार डाला !

कहाँ हैं वो दिल जिनमें कभी खुशियां ही खुशियां थीं,
अब तो नफरतों ने मिल के, मोहब्बतों को मार डाला !

इस लम्बी उम्र में जाने क्या क्या देख डाला “मिश्र”,
खुद अपनों ने गैरों से मिल के, अपनों को मार डाला !


कविता

कभी तो सियासतदां दिल के कपाट खोलता होगा
और तब ज़रूर सोचता होगा कि————
****************************
ये राजनीति है खेल हमारा !
और नहीं है कुछ भी प्यारा !!
जनता को बस मूर्ख बनाना !
यही है अपना काम पुराना !!
हम तो ऐसे ऐसे रंग जमाते !
गिरगिट भी हमसे शरमाते !!
बस वोटों से है प्यार हमारा !
और नहीं है कुछ भी प्यारा !!
ईमान धर्म से न कोई नाता !
करते वही जो हमको भाता !!
पढ़ लिख कर क्या करते हम !
बस रोटी दाल को मरते हम !!
ये सियासत भरती पेट हमारा !
और नहीं है कुछ भी प्यारा !!
जनता को लूटना काम हमारा !
फुसलाना उसको काम हमारा !!
पढ़े लिखों पर हुकुम चलाते !
हम पांच वर्ष तक पाँव चटाते !!
यही है अपना धन्धा प्यारा !
और नहीं है कुछ भी प्यारा !!
सच में ये जनता भोली भाली !
पर नियति हमारी धोखे वाली !
हम एक महीना उनको ढूंढें !
पर पांच वर्ष वो हमको ढूंढें !!
है दिल इतना बेशर्म हमारा  !
और नहीं है कुछ भी प्यारा !!


ग़ज़ल

कब तक जियेंगे ये परिंदे, टूटे हुए पर लिये हुए
नफ़रतों के शहर में, ये उजड़े हुए घर लिए हुए !

जब नागों ने घेर रखा है सारा का सारा गुलशन,
कैसे जियेंगी तितलियाँ, विष का असर लिए हुए !

बाग़बाँ भी हताश है देख कर उपवन का हाल,
कब तक बहेंगी ये हवाएं, मौत का डर लिए हुए !

जहां हर रोज़ होते हैं क़त्ल धर्म और ईमान के,
कैसे जियेगी ये ज़िन्दगी, जां दर ब दर लिए हुए !


ज़िन्दगी ने जाने कितना असर देखा है !
बेगाने लोग और अंजाना सफर देखा है !

फितरती लोगों की बात मत पूंछो यारो,
मैंने हर इंसान को इधर बेसबर देखा है !

घड़ियाली आंसू बहाते लोग कैसे कैसे,
उनके अंदर उबलता मैंने ज़हर देखा है !

गैरों ने फिर भी दिखाई हमदर्दी हम से,
पर अपनों के दिलों को बेअसर देखा है !

ऊंचे महल देखे उनकी शानो सौकत भी,
मगर मैंने उन्हें होते हुए खंडहर देखा है !

दुनिया में कुछ नहीं जिस पे ऐतबार करें,
लोगों के दिलों में फरेबी समंदर देखा है !

जो बेचते हैं ईमानो धर्म टके के भाव “मिश्र,”
मैंने उन्हीं को फलते फूलते अक्सर देखा है !


ग़ज़ल :

बस तमाम उम्र, गलती यही वो करता रहा !
औरों की गलतियां, अपने सर वो धरता रहा !

लिए फिरता रहा भले ही धूल चहरे पे अपने,
मगर औरों के चेहरों को, साफ़ वो करता रहा !

न देखी खुशियां कभी उसके चेहरे पर हमने,
जाने कितनों के ग़म, दिल में वो भरता रहा !

अफ़सोस कि न दिया किसी ने साथ उसका,
खुद के लिए दुनिया से, अकेला वो लड़ता रहा !

तारीफ़ में शब्द भी बोनें नज़र आते है “मिश्र”,
दगा के बाद भी, भला औरों का वो करता रहा !

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3 thoughts on “0202 – Shanti Swaroop Mishra

  • March 20, 2017 at 8:00 am
    Permalink

    My photo has been removed from my each ghazal /poetry . why ?

    Reply
  • April 1, 2017 at 9:06 am
    Permalink

    your “click here to submit your article” is not working. kindly check and get it rectified.

    Reply
  • April 1, 2017 at 9:08 am
    Permalink

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    Reply

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