0203 – Brij Vyas ( Bhagwati Prasad Vyas “Neerad” )

Kavita :

” ये आंसू के धारे हैं ” !!

दर्द है जगा कहीं ,
आंखों में नमी नमी !
यादों के जंगल में ,
कांटों की कमीं नहीं !
कभी छुअन , बनी तड़पन –
हम आँसूं भी वारे हैं !!

दूर तक है खामोशी ,
आस है बुझी बुझी !
प्यार की पहेलियां भी ,
क्यों रही सदा उलझी !
रहे मगन , किये जतन –
ये आँसूं भी हारे हैं !!

खुशी तो है कपूर सी ,
कभी हुई है कैद भी !
जो मिली हैं मुस्कानें ,
कर गई वे भी ठगी !
कभी हार है मनुहार है –
ये आँसूं तो प्यारे हैं !!

मस्त ये धरा गगन ,
झूमता था मन मगन !
स्मृतियों के फेर में ,
यथार्थ का आलिंगन !
कभी सबब है , प्रेरणा है –
ये आँसूं तो न्यारे हैं !!


Kavita :

” हंसी हमारा गहना है ” !!

परिधान सजे रंगीले ,
आभूषण भी बड़े कटीले !
फूलोँ से है प्यार बड़ा ,
ऐसे लदे , लगे सजीले !
उन्मुक्त धरा ,उन्मुक्त गगन –
उन्मुक्त हमे रहना है !!

भाव भंगिमा सुमधुर ,
नयन नशीले बड़े मदिर !
आतप सहती है काया ,
नहीं थकें हम पल भर !
राह कंटीली है पथरीली –
खुशबू जैसा बहना है !!

प्रकृति की कलकल ,
जीवन है यहां निश्छल !
ज्यादह की ना चाहत ,
हम पीते रोज़ हलाहल ।
प्यार यहाँ कसौटी चढ़ता –
कांटों संग रहना है ।।

रंग कई बिखरे हैं ,
यहाँ स्वप्न सजे संवरें हैं !
है पराग बिखरा सा ,
औ खुशबू पर पहरे हैं !
तीर कमान खिचें कब जाने –
भाग्य बदा सहना है !!


Kavita :

” खुश होकर –
मौसम ने ,
रंग बिखेरे हैं ” !!

तैरते सन्देश –
हवा में ,
पा ही गये !
मूक थे अनुबन्ध –
जुबां पे ,
आ ही गये !
सिलसिले –
समझोतों के ,
बहुतेरे हैं !!

प्यास अधरों पे –
जगी तो ,
बढ़ती गयी !
श्वास काबू में –
कहाँ है ,
थमती नहीं !
अनचाहे –
प्रश्नों के लगे ,
कई फेरे हैं !!

गात पुलकित –
मन उड़े ,
जैसे हवाओं में !
दिल की सारी –
बातें सुन ली ,
जैसे फिजाओं ने !
छा रहे –
आशा के बादल ,
हैं घनेरे !!


Kavita :

हरी भरी धरती है ,
और घनेरी छाँव है !
यह हमारे गाँव हैं !!

गहरे कुँए , बहती नदिया ,
है पोखर में पानी !
यहाँ नहीं स्वीमिंग पूल होते ,
बच्चों की मनमानी !
दूजे , तीजे , चौथे , अंतिम ,
कूद रहा है बचपन !
अल्हड़पन ऐसे ही पलता ,
निडर यहाँ लड़कपन !
सूरज ने छाया कर दी है –
धूप के उखड़े पाँव हैं !!

पकड़म पाटी और कबड्डी ,
खो खो खेल निराला !
अपकी थपकी पेड़ पर चढ़ना ,
यह कुलाम डाला !
गली गली है आंख मिचौली ,
और है गिल्ली डंडा !
धूम धड़ाका दिन भर भइये ,
निशा का मिज़ाज़ ठंडा !
चौपालों पर दुख बंट जाते –
अपनेपन की छांव है !!

कंचे खेलो,पतंग उड़ाओ ,
हो गए खेल पुराने !
अब क्रिकेट है खेत-खले में ,
हाथ लगे आजमाने !
है सुविधाओं ने पैर पसारे ,
गांव शहर से आगे !
रोज़गार के अवसर ना हैं ,
यही बुरा बस लागे !
कोलतार की सड़कें बिछ गई –
शहर को बढ़ते पांव है !!

पैदल चलना भूल गए हैं ,
साइकिल रास न आये !
धूम मचाई बाइक ने अब ,
हैं कारें धूल खाये !
निर्धन भी है, हैं अमीर भी ,
खाई बढ़ती जाए !
धरती माता उगले सोना ,
कुछ हाथ ही पाएं !
गलहार बने ,फांसी का फंदा –
अभी मिले ना ठाँव हैं !!


Kavita :

” पल मुस्कराने लग गये ”

कदम क्या संभले हमारे ,
वे पास आने लग गये |

अपना पराया पहचानने में ,
हमको जमाने लग गये |

आंसुओं ने पाला पोसा ,
रिश्ते पुराने कह गये |

दहलीज़ तक ना थे गंवारा ,
दिन पुराने लद गये |

अपना नहीं बेगाना समझा ,
रिश्ते निभाने लग गये |

आज वे हमदर्द बनकर ,
झूंठे फसाने कह गये |

दगा करते आये हमसे ,
वे आज़माने लग गये |

साफगोई दिल में ना थी ,
फिर से बहाने कर गये |

वक्त क्या बदला सितमगर ,
पल मुस्कराने लग गये |

माँ की दुआएं साथ थी ,
सपने सुहाने सज गये |


Kavita :

” गगन से उतरी परियां मां की –
अंतरिक्ष को छू लें हम ” !!

गणवेश किया है धारण ,
बस्ता पीछे लाद लिया है !
मास्टरजी का होमवर्क भी ,
हमने रट्टा मार लिया है !
धूलभरी राहें आतुर हैं –
स्वागत को अपने हमदम !!

हाथ थाम कर हाथों में ,
हमको राह नई गढ़ना है !
बाधाएं हैं कई सामने ,
हमको बस पढ़ना पढ़ना है !
खेल कूद में अव्वल आकर –
दिखलाना हमको दमखम !!

सबके सपने कांधे पर ले ,
मजबूत इरादे कर बैठे हैं !
अभी बहुत कुछ हासिल करना ,
कदम कदम पर सितम मिले हैं !!
सफलता कदम चूमने निकले –
यही प्रयास रखें हरदम !!


Kavita :

” सचमुच सच्चा सखा चाहिये ” !!

अंतर्मन के भाव हमारे ,
अधरों के मधुगान हमारे !
अनुभूति की हर तरंग को –
छू लें जब उन्मान हमारे !
जीवन में जो राज छिपे हैं ,
उनके लिए दिशा चाहिए |

दिल से दिल की गहराई तक ,
बचपन से ले तरुणाई तक !
रोम रोम में रचा बसा हो –
साँसों की जो गहराई तक !
खुशियां जिसकी झोली में हो ,
रास रचाती निशा चाहिए !!

शिक्षा दीक्षा ज्ञान न कम हो ,
तर्कशक्ति में उसके दम हो !
सहयोग सद्भाव बसा हो –
और कलाओं का संगम हो !
सुख दुख का बंटवारा मुश्किल –
चाहत सबकी ईशा चाहिए !!


Kavita :

” आहत हो रहा ,
गिलहरी सा मन ” !!

जातियों में बंट गये हैं !
समूहों में डट से गये हैं !
स्वार्थपरता की ललक है ,
लक्ष्य से भी हट गये हैं !
राजनीति अवसर तलाशे –
मच रहा क्रंदन !!

अपने पशुधन को सम्भालें !
कट रहे उनको बचा लें !
खाने को तो है बहुत कुछ ,
अहिंसा भी आजमां लें !
बीफ़ प्यारा उनको कह दें –
ना मथें जीवन !!

लूट है बटमार भी है !
मैले आँचल, गुहार भी है !
बावले सा समय लागे ,
हम डूबते मझधार ही हैं !
होगें रक्षित , और सुरक्षित –
कब यहां जन-धन !!

यहां घोटाले बड़े हैं !
नेताओं से सब डरे हैं !
भूख ने दामन ना छोड़ा ,
ग़रीब जीते जी मरे हैं !
भ्रष्ट धन , सरकारी नज़रें –
हो रहा मंथन !!

वेदना सहती रही हैं !
अभी बेड़ियां टूटी नहीं हैं !
तीन तलाक़ या अन्य रस्में ,
धार अश्रु बहती रही है !
बदलाव तो लाना ही होगा –
घर घर आँगन !!

घाटी में अलगाव की बू !
हम ही देते हैं हवा क्यूँ !
मुख्य धारा से जुड़े अब ,
हो कब तक भटकाव यूँ !
एकजुट हो राजनीति –
करे कुछ जतन !!

सीमा पर हैं लाल मां के !
हैं सजीले वीर बांके !
दांव खेले ज़िन्दगी का ,
सोच न्यारी है जहां से !
उंगलियां उन पर उठे ना –
हो शत शत नमन !!

अपनों से ही दुख मिला है !
दूर तक ना सुख मिला है !
रिश्ते सब बेमानी से हैं ,
जो मिला कुछ कुछ मिला है !
धूप है , कभी छांव भी है –
लद रही थकन !!


Kavita :

” मुस्कराहट खा रही चुगली ” !!

तैरते सपने दिखे हैं ,
Mail भी कितने लिखे हैं !
Pics भी इतनी बटोरी ,
भावना में सब बहे हैं !
बोल्ड हो गया कोई –
किसी ने डाल दी गुगली !!

नवल धवल प्यार है ,
खुशियों का उपहार है !
मिल गए हैं मन से मन ,
यों बहुतेरे इकरार हैं !
खूब बरतें सावधानी –
फिर भी उड़ चले गिल्ली !!

बढ़ गया विश्वास है ,
कुछ पाने का एहसास है !
उड़ने लगे हैं आसमां में –
अजीब सा आभास है !
रन दौड़ने में हैं जुटे –
मौसम हो रहा टल्ली !!


Kavita :

” अब तक ना आये ” !!

इंतज़ार अब और नहीं !
होगा कोई शोर नहीं !
पल-पल होगें चुप्पी साधे ,
चले किसी का ज़ोर नहीं !
रंग बिरंगी इस दुनिया में –
होगें रंगी साये !!

रंग सजे हैं गहरे गहरे !
खुशियों ने बैठाये पहरे !
हाथ सफलता के पैमाने ,
अँखियों में हैं भाव रूपहरे !
पुलकित हुई समय की धारा –
ऐसे मन भाये !!

बैचेनी का दौर नहीं है !
उम्मीदों का ठौर नहीं है !
रोम-रोम में सिहरन दौड़े ,
खुद पर खुद का ज़ोर नहीं है!
भूल गयी है राह प्रतीक्षा –
नभ में तुम छाये !!


Kavita :

” मुस्कराया है गगन भी ” !!

बन्धनों में ,
हूँ बंधी सी !
खुशबूओं से ,
हूँ लदी सी !
अनुबन्ध रंगीले हुए हैं –
खिलखिलाया है चमन भी !!

ताने बाने ,
बुन रखे हैं !
प्यारे प्यारे ,
रंग सजे हैं !
साकार सी अब कल्पनाएं –
आ भी जाओ है लगन सी !!

प्रश्न बहुतेरे ,
मुखर हैं !
अपनों से ही ,
अब तो डर है !
हाथ थामा छोड़ना ना –
हो गयी मैं तो मगन सी !!

नज़रें हुई ,
बेताब सी !
फीकी हुई ,
मुस्कान भी !
वादे से तेरा यों मुकरना –
प्यार में भी है ठगन सी !!


Kavita :

” मदहोशियाँ छाई हुई हैं ” !!

चकाचौंध है ,
सज़ धज ऐसी !
हम तो क्या ,
लुट गये परदेसी !
खुद में ही –
डूबे डूबे हो !
खामोशियाँ ढाई हुई हैं !!

दीवानों सा ,
चढ़ा खुमार है !
महकी बहकी ,
ये बहार है !
प्यासे प्यासे –
अधर कह रहे !
सरगोशियाँ चाही हुई हैं !!

ना सम्मोहन ,
वशीकरण है !
डूबा डूबा ,
जाये मन है !
दुनिया की अब –
खबर किसे है !
स्मृतियां मन भाई हुई हैं !!


Kavita :

” इस क़दर ,
शरमाओ ना ” !!

बोलती है ,
बन्द मेरी !
लगे श्वासें ,
ठहरी ठहरी !
साकार सी –
हैं कल्पनाएं !
अब यों ही ,
भरमाओ ना !!

बंध गये हैं ,
मोह पाश !
अब देखकर ,
नये अंदाज़ !
बन्द पलकें –
बांधा समां !
इतनी भी ,
हरषाओ ना !!

नेह के रंग ,
रंग गयी हो !
मनुहार से बंध ,
सी गयी हो !
बन्ध टूटे –
देह निखरी !
अब और यों ,
मदमाओ ना !!


Kavita :

” बड़ी तीखी है ,
धार कजरे की ” !!

कुंदन देह ,
निखरी निखरी !
आभूषण से ,
छवि है निखरी !
जगी उम्मीदें –
सिर चढ़ बोलें !
बड़ी तीखी है ,
मार नखरे की !!

चंचल नयना ,
कजरारे से !
हम तो सब कुछ,
हैं हारे से !
देहरी पर –
वक़्त हरकारा !
बहकी हुई ,
बयार गजरे सी !!

रूप दमकता ,
दर्पण देखे !
भाव तुम्हारे ,
रहते ऐंठे !
हाथ नहीं कुछ –
रहा निरखना !
चुरा गयी हो ,
तुम नज़रें भी !!


Kavita :

” इरादा कत्ल का या ,
साज़िशों का दौर है ” !!

गहरा सागर ,
डूबने का डर !
जाने कैसा ,
होगा मंज़र !
अब है परवाह किसको ,
दूर तक ना छोर है !!

हैं होठों पर ,
कितने फ़साने !
मद के प्याले ,
राम जाने !
प्यास जन्मों की मिटेगी ,
हाथ अब ना ठौर है !!

रंगीनियां अब ,
रंग चढ़ी हैं !
उंगलियों में ,
जादूगरी है !
कशिश आंखों में कितनी ,
चाहतें पुरज़ोर है !!

डूबे हुए हो ,
सोच गहरी !
हम तो मौजी ,
ठहरे लहरी !
अंज़ाम तो रब के हवाले ,
लुट गये ये शोर है !!


Kavita :

” भा गयी तेरी अदाऐं ” !!

रंगीनियां ऐसी ,
चढ़ी हैं !
आंखों पर ऐनक ,
खड़ी है !
नज़रों की साज़िश है कोई ,
आड़ लेकर मुस्कराये !!

स्वप्न सिंदूरी ,
बुने हैं !
भाव सतरंगी ,
चुने हैं !
शोखियाँ सर चढ़ बोलती हैं ,
गुनगुनाती हैं हवाएं !!

हाथ हाथों में ,
लिया है !
मन सुवासित अब ,
किया है !
कानों में सरगोशी कर यों ,
तुमने कितने बल खाये !!

मुस्कराये इस ,
कदर हो !
बैठे लेते हैं ,
लहर वो !
बावरा मन भटके हरदम ,
और ना दो अब सजाएं !!


Kavita :

” हंसी तुम्हारी ,
धारदार है ” !!

सजे सजे से ,
लागे तन मन !
खुशी आवरण ,
है पुलक वदन !
स्निग्ध गात है ,
अधर गुलाबी !
हंसी तुम्हारी ,
एक खुमार है !!

बांकी चितवन ,
ओढ़ चुनरिया !
दमकी हंसी ,
ज्यों बिजुरिया !
दिवास्वप्न हैं ,
जगी उमंगें !
हंसी तुम्हारी ,
एक कटार है !!

भाव अनकहे ,
समझाते हो !
आँखियों से ही ,
बतियाते हो !
लाज लता पर ,
लदी शोखियाँ !
हंसी तुम्हारी ,
करे वार है !!


Kavita :

” नये नये अंदाज़ तुम्हारे ” !!

रंग रंगीली ,
सजी है काया !
ऋतुओं का भी ,
मन भरमाया !
हंसी दर्प में ,
डूबी लगती –
ऐसा है विश्वास जगा रे !!

आँचल हाथों ,
बल खाता है !
रूप सजीला ,
लहराता है !
सभी की नजरें ,
आज थमी हैं –
लगे उल्लसित आज बहारें !!

चंचल नयना ,
हैं बाज़ीगर !
शहद धरा है ,
अधरों पर !
नखरों संग ,
बिखरे हैं कुन्तल –
मुखरित करते राज तुम्हारे !!


Kavita :

” घनेरी जुल्फें
घटा सी छाई ” !!

हवा में नमी है ,
बिखरी है खुशबू !
मौसम है बहका ,
जगा ऐसा जादू !
गज़ल सी काया –
अदा रुबाई !!

बंद हैं पलकें ,
राज़ हैं गहरे !
अधर पाँखुरी से ,
हैं गात रूपहरे !
निखरा है यौवन –
लिए अंगड़ाई !!

खुद में हो खोये ,
कैसा सितम है !
तलाश ये कैसी ,
बिसुरे से हम हैं !
डूबो न ज़्यादा –
लिए गहराई !!

बेखबर से तुम ,
बाख़बर हैं हम !
चाहतों के दौर ,
ना होगें ख़तम !
मुस्कराये तुम –
निधियाँ पाई !!


Kavita :

” धर्म हमारा बड़ा लचीला ”

मन्त्रों में , वेदों में है वो ,
पत्थर की मूरत में है वो |
ना मानो तो निराकार है ,
मानो तो घट घट में है वो |
नहीं बंदिशों में बाँधा है –
सचमुच है यह बड़ा रंगीला ||

मात-पिता हैं तीरथ जैसे ,
गुरुजनों की बात निराली |
दुखीजनों की पीड़ा समझी ,
टल जाती ग्रह दशा हमारी |
साधु-संतों ने ज्ञान दिया है –
अंतर्मन का चोगा ढीला ||

परिवर्तन स्वीकार किये हैं ,
धर्म ने अंगीकार किये हैं |
सामाजिक बदलाव के चलते ,
बदले से व्यवहार किये हैं |
कई जगह उपहास हुए हैं –
क्यों नहीं है, यह हठीला ||

सच, नई-नई बेला है आई ,
नारी जागृति की अंगड़ाई |
दर्शन की बस होड़ लगी है ,
पुरुष खड़े ले रहे जम्हाई |
न्यायालय , भारी धर्म पर –
कैसा है यह ,हंसी -ठिठौला ||

सेवा में धर्म बस हम जाने ,
कर्मों से हम गये पहचाने |
नया -पुरातन रखा सामने ,
खोते जा रहे ठौर -ठिकाने |
कातर धर्म खड़ा कोने में –
बदल रहा है पल-पल चोला ||


Kavita :

” आंखें मुन्द रही हैं ,
प्यार में ” !!

कल्पनाएं मधुर ,
पलकों पर विराजी !
सिमटी लाज में ,
काया कसमसाती !
कनक आवरण सजा –
खुमार में !!

मुस्कराना नाम ,
तेरे कर दिया है !
खुशहाली को ,
एक नया घर दिया है !
भावनाएं रंग भरे –
मनुहार में !!

नज़राना मिला ,
मीठी सी ठगी का !
इतराना हुआ ,
मेरी बन्दगी का !
तर-बतर मन हुआ –
पुकार में !!


Kavita :

” लहरों का किलोल ,
मन को भाता है ” !!

भीड़भाड़ हो ,
या तनहा हों !
सुख के पल हों ,
या दुखवा हो !
इन टूट रहे ,
तटबन्धों से !
सच दिल अपना –
जुड़ सा जाता है !!

रंग बिरंगे से ,
परिधान सजे !
तन मन उठती ,
ज्यों लहरें हैं !
गहरा अन्तस –
कई ज्वार उठे !
सागर से दिल का –
गहरा नाता है !!

गहराई पर ,
यों पहरे हैं !
अब गहरे जख्म ,
हुए गहरे हैं !
चाक कर रहे ,
सीना अब तो !
गहरापन ही सबको –
लहरा जाता है !!


Kavita :

“सांझ देखो खिलखिलाई है !
अरुणिमा अम्बर पे छाई है ” !!

थका हारा दिन ,
हो गया है पस्त !
रात की जवनिया ,
है सदा अलमस्त !
सृजन की चाहतें –
भोर होते मुस्कराई हैं !!

चित्र खींचे जो ,
परिश्रम तूलिका है !
जो किया हासिल ,
स्वप्न भूमिका है !
उपलब्धियों ने फिर –
खुशियां थपथपाई हैं !!

डरे हुऐ हम ,
अनिश्चय ने छला !
जुटा ली हिम्मत ,
बहुत कुछ है टला !
हमकदम का साथ –
ज़िन्दगी गुनगुनाई है !!

साथ ना छूटे ,
इतनी सी ठानी है !
दौड़ समय की ,
हमसे सयानी है !
कल क्या होना –
उम्मीदें कसमसाई हैं !!


Kavita :

” उठे हिया में हिलोर ” !!

***

द्वार पे आकर ,
लौट गये तुम !
उम्मीदें सब यों ,
हो गई गुमसुम !
सजे धजे अरमान –
ढूंढे प्यार का छोर !!

स्वप्न सजे फिर ,
बिखर गये हैं !
हम तो हर पल ,
सिहर गये हैं !
अकुलाया मन चाहे –
परिवर्तन का दौर !!

दिन दिशा बदले ,
हम सोचते यही !
खुशियों का नर्तन ,
फिर होगा सही !
बिसुरा नहीं पाओगे –
है चाहत पुरजोर !!


Kavita :

” सर्र से , आँचल –
सरकता जाये है ” !!

छट गये ,
बादल गम के !
होश खो बैठे ,
कसम से !
राह चलता कारवां –
मुझको बुलाये है !!

जाने कब ,
नज़रें मिली थी !
यादें लेकिन ,
चुलबुली थी !
सरसराती हवाऐं –
महकी जायें हैं !!

एक नज़र ,
झलक पा के !
हम तो गये ,
इठला से !
लाज आंखों में बसा –
हम मुस्कराये हैं !!

फिर मिलें ,
वादा ये करना !
वक़्त से भी ,
थोड़ा डरना !
हाथ अपने कुछ नहीं –
चाहत जगाये हैं !!


Kavita :

” हो गये पल में पराये ‘ !!

नेह के धागे बन्धे थे ,
द्वार खुशियों से सजे थे !
बचपन की यादें सुहानी ,
अंखियों में वे रतजगे थे !
जाने कैसी घड़ी आयी –
बोल बागी नज़र आये !!

झनझना कर तार टूटे ,
रिश्ते लगे बेकार झूंठे !
टूट कर चाहा था जिनको ,
ले अहं का भाव रूठे !
महके महके ख़्वाब टूटे –
पलकों पे ना संवर पाये !!

जब कभी शीशा दरका ,
उसकी कोई ना सुनता !
दूसरा सजने को आतुर ,
जो टूटा , टूटा औ बिखरता !
वक़्त बांधे ना बंधे है –
बनते बिगड़ते अपने साये !!


Kavita :

” हम तो तुम्हरे दास हो गये ” !!

कमर कटीली ,
भुजदंड कसे !
है रूपगर्विता ,
मद छलके !
नटखट नज़रें ,
हमें छू गई –
हम खुशियों के पास हो गये !!

अरुणिम अधर ,
बोल मीठे !
यौवन के हैं ,
तीर कसे !
आँचर का यों ,
पल्लू थामा –
हम आम थे खास हो गये !!

गहनों का भी ,
भार लदा !
खुशियों ने है ,
तंज़ कसा !
वक़्त देखकर ,
फेरी नज़रें –
हम सचमुच उदास हो गये !!


Kavita :

” कितना और सजोगी ” !!

नख से शिख ,
अलंकरण है !
सजे सजे से ,
तन मन हैं !
नज़रों से ऐसा –
बाँधा है ,
जादू है या
वशीकरण है !
अधरों पर है ,
मूक निमंत्रण –
कितना और हंसोगी !!

रूप रंग है ,
आँचल फहरा !
नागिन लट हैं ,
काजल गहरा !
गंध सुगंध यों –
लहर गई ,
जागा ऐसा ,
भाव रूपहरा !
मौसम बहका ,
भरमाने को –
कितने स्वांग रचोगी !!

रात दिवस अब ,
हुए सुहाने !
लबों पे मीठे ,
प्रेम तराने !
आसमान भी –
रंग बिखेरे ,
इंद्रधनुष को ,
ख़ुशी में ताने !
अलबेली सी ,
सभी अदाएँ-
कितना और छलोगी !!


Geet :

सच तुम रूठ जाओ तो
मनाने का मज़ा कुछ और है !!

बातों बातों में ठुनकना !
होठों से निर्झरणी बहना !
भूकम्प के झटके से लगते
भरभरा चीजों का गिरना !
उस बिगड़े सन्तुलन का –
जब तब दिखता नहीं कोई ठौर है !

भाल की बिंदी बिदकना
और जुल्फों का बिखरना !
चूड़ियां ऊपर को चढ़ती
पल्लू का वो कमर कसना !
चिंगारियां आँखों में भड़के –
बस कब थमे, कब रुके यह दौर है !

हथेलियों का रगड़ खाना
मुठ्ठियों का बंध ही जाना !
तमतमाये गाल हों और
मुस्कराकर ख़म दिखाना !
इस वीरांगना के स्वागत में –
बस मुस्कराने का मज़ा कुछ और है !!

समर्पण मुझको है करना
कानों को है बन्द रखना !
घिरी है सावन बदरिया
भीगने से अब क्या डरना !
बिजलियाँ चमके तो चमके –
रिमझिम रिमझिम बूंदों का ही शोर है !!


Geet :

हम तुम
रंग गये हैं ,
एक ही रंग में !

अबीर है गुलाल है ,
बहकी हुई चाल है !
पीली भंगिया कहीं ,
सुरूर है , धमाल है !
तन मन भीगे हुए हैं –
किसी तरंग में !!

अमीर हैं गरीब हैं ,
दूर ना करीब हैं !
भेद कहीं आज नहीं ,
जगे सब नसीब हैं !
खुशियों का नर्तन है –
उत्सव संग में !!

धमाल है बवाल है ,
उठे कहीं सवाल हैं !
है मस्तियाँ चढ़ी कहीं ,
चुप्पियां बदहाल है !
पल्लवित है आशाएं –
नई उमंग में !!

शिकवा है मितवा है ,
नेता है फितवा है !
है कोई मलाल नहीं ,
सबका मन रितवा है !
रंग से परहेज नहीं  –
ऐसे रंग में !!


Geet :

गुलाल है ,
धमाल है ,
कहिये क्या –
ख़याल है !!

रंगों की महफिल ,
डूबे डूबे से हैं !
सब अपने लगते ,
रंग अजूबे से हैं !
रंग उड़ाया  ऐसा –
मची धमाल है !!

भारी है हुड़दंग ,
मस्ती यहाँ वहां !
अब परवाह किसे ,
कोई गुमाँ कहाँ !
खुशियां काँधे चढ़ी –
करे सवाल है !!

तुमको रंगना है ,
अब गहरे रंग से !
दूजा रंग चढ़े ना ,
प्रीत बढ़े ढंग से !
दुनिया बढ़ी अजूबी –
रोज़ बवाल है !!

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