0203 – Brij Vyas ( Bhagwati Prasad Vyas “Neerad” )

Kavita:

— फीके सभी मज़े हैं ” !!

कुंआ खाई सम्मुख है मेरे , राह नहीं सूझे है !
सही यार की कमी ज़िन्दगी , खलती आज मुझे है !!

गर्दिश में भी जिसके संग में , हम झूमा करते थे !
आज उसकी याद में गुमसुम , फीके सभी मज़े हैं !!

मस्त बहारें झूम के जब भी , गले हमारे पड़ती !
राह में पड़ने वाले पत्थर , हमसे गये पुजे हैं !!

दौलत शोहरत खूब कमाई , अवसर एक न चूका !
अपने , अपनापन खोया है , सपने बुझे बुझे हैं !!

रास रंग में डूबे ऐसे , दुनिया भूल गये हम !
समय की मार पड़ी है एसी , बारह आज बजे हैं !!

आंख मिचौली ,धींगा मस्ती , याद आ रहा सब कुछ !
प्रियवर सब कुछ हासिल है तो , भूले आज तुझे हैं !!

एक तेरी उम्मीद है बाकी , आस अभी ना टूटी !
गूढ़ पहेली ऐसी उलझी , तुम बिन ना सुलझे है !!


Kavita:

” तेरा रूठना कह दे बहना –
सचमुच एक बहाना है ” !!

जिन आंखों में आंसू बसते ,
उनमें मोती सजने दे !
अपने हाथों तुझे खिलाऊँ ,
नीर न अब तू बहने दे !
इतना मत रो मेरी बबली ,
क्या मुझे रुलाना है !!

मैं हूँ अबोध तू लगे सयानी ,
यही सभी का कहना है !
है सूझ बूझ नानी दादी सी ,
तू लागे ज्यों गहना है !
जिद थोड़ी अच्छी लगती है ,
औऱ मुसीबत ढाना है !!

सीधे मुंह अब बात भी कर ले,
ज्यादह भाव नहीं खाना !
राखी अब नजदीक आ गई ,
कहीं तुझे ना पड़े मनाना !
गिफ्ट , मिठाई और क्या चाहे –
हँसकर तुझे बताना है !!


Kavita:

—- हरकत मनमानों सी ” !!

सावन की रिमझिम बूंदों ने , प्यास बुझाई ऐसी !
हरियाली चुनरी ओढ़ी है , वसुन्धरा ने कैसी !!

तन मन हरषाये ऐसे हैं , कठिन थाह है पाना !
झूलों की पीगों में बढ़ चढ़ , लदी उमंगें ऐसी !!

लहराये गीतों के स्वर हैं , बसी हंसी अधरों पर !
आँखियों में है छवि तैरती , मनमूरत के जैसी !!

इतराया सा मौसम लगता , धरा गगन सब झूमें
कांधे पर चढ़कर बैठी हो , लदी बहारें ऐसी !!

डूब रहें हैं जलधारे में , हाहाकार मचा है !
मचल रहे हैं सागर नदिया , लहरें तूफानों सी !!

भीगा भीगा जग लगता है ,सब है भीगा भीगा !
बाल तरुण हर्षाये लगते , हरकत मनमानों सी!!


Kavita:

— चुनरी सरकी जाये ” !!

दप दप करता रूप तुम्हारा , ऋतुओं सा बल खाये !
आग का गोला काहे बरसे , तुमसे सहा न जाये !!

नज़रें हैं बेताब बता दो , किसकी है अगवानी !
इंतज़ार का पल पल आखिर , हाथों में ने आये !!

बाग बगीचे पीछे छूटे , राह नई है पकड़ी !
आज हवा से करती बातें , चुनरी सरकी जाये !!

रंग बिरंगे परिधानों में , निकली हो सज़ धज कर !
आज मुसाफिर का कसूर क्या , राहें भूला जाये !!

कौन कोण से देखें तुमको , नाज़ों अदा कायम है !
यहां रूप की गागर देखो , लहराती बल खाये !!

कौन लक्ष्य ठाना है दिल में , किसको आज पता है !
अंतरतम के भाव तुम्हारे , हम तो जान न पाये !!

आज लबों पर है खामोशी , खुशियां भी गुमसुम हैं !
दूर का राही तुमसे कोई , ठगी नहीं कर जाये !!


Kavita:

– अंखियन छूटा काजर ” !!

हंसी कैद घूँघट में देखो , खुशियां छलके बाहर !
हाथों में चुड़ले खनके हैं , पैरों बाजे झांझर !!

अभी बेड़ियां नहीं हैं छूटी , टूटे ना है बन्धन !
द्वार देहरी लाज है पल्लू , अंखियन छूटा काजर !!

घट पनघट हैं खेत खले हैं , चूल्हे चौके संग में !
दूध दही है माखन घी है , अगनां में हैं ढाँढर !!

खेतों की रखवाली है और, कभी डागले बैठे!
हाथों में पत्थर गोफन है , कभी उड़ाते पाखर !!

श्रम से है परहेज़ नहीं , कांधे जिम्मेदारी !
प्रभु की मेहर यहां बरसती , हम हैं निज के चाकर !!

हमने धन संतोष है पाया , बाकी सब धूसर है !!
थोड़े ही में खुश जानो हम , जितना पाया पाकर !!

आँगन शिक्षा चहक रही है , पीढ़ी अब बदलेगी !
अब विकास के द्वार खुले हैं , गीत खुशी के गाकर !!


Kavita:

अँखियाँ गहरी गहरी ” !!

अधरों पर कुछ राज़ छिपे हैं , मुस्कानें हैं गहरी !
मनवा में विश्वास बसा है , नज़रें ठहरी ठहरी !!

खुशियां चेहरे पर छलके है , बनी सादगी कातिल !
जाने कितने डूब गये हैं , अँखियाँ गहरी गहरी !!

बिखराया है जादू ऐसा , वशीकरण ये कैसा !
तुमसा सुंदर और न होगा , लागे छवि रूपहरी !!

खोये खोये दूर कहीं तुम , दूर हो गये हम भी !
कौन पास नज़रों के आया , वक़्त बना है प्रहरी !!

हम भी अब तक झांक न पाये , दिल के कोने कोने !
मोहपाश में बांध दिया है , बड़ी सयानी ठहरी !!

बिन स्वारथ के नेह लगाया , देह नहीं आकर्षण !
हमें प्यार में नहीं डूबना , हम तो हैं मनलहरी !!


Kavita :

” मन हुआ गुलबिया ” !!

लेपित चंदन ,
मले हल्दी –
और उबटन !
रूप सजा ,
संवरा तो –
लगा ज्यों कुंदन !
फिसलन ही –
फिसलन है ,
देह हुई रेशमिया !!

कजरारा काजर ,
आँखों में –
काढ़ लिया !
प्रियतम के ,
सपनों को –
ऐसे ही ताड़ लिया !
चितवन तो –
चितवन है ,
अँखियाँ नचनियां !!

आँचल हाथों से ,
फिसले औ –
लहराये !
जंजीर बनी ,
अलकें तो –
जब तब बल खाए !
संदेशा पाते –
भरती कुलांचें ,
ऐसी हिरनिया !!

बार बार लागे ,
है आहट –
द्वार पर !
चैन कहाँ ,
मानो अब –
पल पल मुखर !
खोया है धीरज –
हुए असहज ,
ऐसी लगनिया !!

इंतजार मानो ,
है बस की –
बात नहीं !
हाथों से छूटे ,
हैं लगते –
हालात कहीं !
खोई सुध बुध –
याद कहाँ अब कुछ ,
तेरी जुगनिया !!


Kavita :

अपने माथे चंदन ” !!

बिगड़ी बनती सरकारें हैं , कैसे हैं गठबंधन !
आज अछूत हुए वे अपने , करते थे अभिनन्दन !!

वोट साथ में मांगे थे , अब राहें बदल गई हैं !
उनके माथे काला टीका , अपने माथे चंदन !!

प्रेसवार्ता होती घर पर , सबको सुनना भर है !
यहां नाम पर अब भी देखो , होता महिमामंडन !!

डूब गए आकंठ यहां पर , भष्टाचार न छूटा !
वोटों के दम हैं पर मिलते ,यों बहुतेरे नमन !!

अपनी छवि को आज निहारें , दागी ना कहलाएं !
बीस माह से झूल रहा था , यहां महागठबंधन !!

एक दूजे पर दोषारोपण , कौन आइना देखे !
नैतिकता ने दम तोड़ा है , झूंठे हैं आलिंगन !!

कौन है सच्चा कौन है झूंठा , जनता विवश खड़ी है !
कुर्सी पर बैठी है सत्ता , लुटता केवल जन मन !!

रोज़ यहां बिछती है चौसर , राजनीति की चौखट !
अनहोनी होनी बन जाये , जन देखे परिवर्तन !!

मोहपाश सत्ता का ऐसा , तजना बड़ा कठिन है !
कांटों के संग फूल यहां पर , महके नंदन वन है !!


Kavita :

“तन हुआ बंसुरिया ”

प्रियतम का स्पर्श पा ,
मानो धन्य हुई |
छुअन की अनुभूति में ,
डूबी-मगन हुई |
चमक गई मन के अंधियारे –
ज्यों बिजुरिया ||

अधरों की छुअन मीठी ,
धडकनों में द्वन्द |
रोम रोम व्याप्त मौन ,
पलकें हुई बंद |
बदरी सी बरसी खुशियाँ –
अपनी डगरिया ||

सब टूट गये तटबंध यों ,
बहका सरित प्रवाह |
सागर से मिलने की ,
बढ़ती गयी चाह |
खो जाऊं अस्तित्व अपना –
उठती लहरिया ||

हैं जगे सुर मदिर ऐसे ,
हो गयी निहाल |
तन मन ने सुध खो दी,
लज्जावनत ,बेहाल |
सब कसे हुए बंध ढीले –
कमसिन उमरिया ||


Kavita :

” गड्ढे गड्ढे हिचकोले है ,
सड़कें खो गई ” !!

सड़क किनारे घर हैं ,
पोखर पोखर पानी !
यह विकास की गाथा ,
घर घर कहे कहानी !
सरकारी लेखे में तो है –
बातें बो गई !!

छप छप करते बच्चे ,
वाहन करे छपाक !
राजनीति को प्रणाम ,
रौब दाब और धाक !
बेचारा सा यहां प्रशासन –
आपे खो गई !!

खेती घटा मुनाफा ,
कृषक चढ़ रहे सूली !
पूंजी परदेसी है ,
यों ऊंचाई छू ली !
बैंक वसूली बढ़ती डूबत-
नीति धो गई !!

नोटबन्दी , जीएसटी ,
अब कहें सुधारबन्दी !
रोज़गार घटता सा
है उद्योगों में मंदी !
घोटाले हो रहे उजागर –
आँखें रो गई !!


Kavita :

” झूल रहा है ललना पलना ” !!

किस्मत की रेखाओं में दम !
हमें मिला है अथक परिश्रम !
हैं रोज बो रहे , रोज़ काटते –
भविष्य अनिष्चित लगता बेदम !
रो रो कर खुद चुप हो जाता ,
भूख को इसकी लगे न टलना !!

सिर पर बोझा लाद रखा है !
सुख का स्वाद कहाँ चखा है !
रात दिवस हैं थके थके से –
समय भी अपना कहां सखा है !!
सिरहाने अपने कांटें हैं ,
यों ही उम्र को है बस ढलना !!

है अभाव में लालन पालन !
झिड़की मिले , नहीं सम्भाषण !
वक्त नहीं मीठी बातों का ,
नजरों से ही यहां दुलारन!
धूप , नज़र से तुम्हे बचाऊं –
दुनिया ज़ालिम बड़ी है छलना !!

बड़ी हसरतों से पाला है !
पिया हलाहल का प्याला है !
अमावस के घेरे मिट जाए –
जीवन का तू उजियाला है !
बाधाओं से हार न मानी –
संभल संभल कर पग तू धरना !!


Kavita :

— नयना लड़े पड़े हैं ” !!

रूप रंग की छांव घनेरी , नख़रे नाज़ बड़े हैं !
हम तो अपने आप को भूले , नयना लड़े पड़े हैं !!

पावस की बूंदों ने छूक़र , तन मन लहराया है !
झलक तुम्हारे पाने में यों , छाते कई उड़े हैं !!

इतराये फूलोँ ने तेरी , जमकर की अगवानी !
आज यहां गुलज़ार को देखो , कैसे होश उड़े हैं !!

दिल के राज़ बड़े गहरे हैं , कब आंखों से छलके !
मौन प्रतीक्षा में छुपकर , हम तो यहां खड़े हैं !!

मुस्कानों के तीर चलाकर , हलचल पैदा कर दी !
बेबस होकर सरे राह यों , कई शिकार पड़े हैं !!

आज अदा में दिखता है कहीं , छुपा हुआ ईशारा !
उम्मीदों की डोर को बांधे , हम तो यहीं अड़े हैं !!

रची बसी होठों पर साज़िश , अँखियाँ करे शरारत !
चुनरी ने ले ली अँगड़ाई , हम मदहोश पड़े हैं !!


Kavita :

खुद को आज छलेगा ” !!

राजनीति की चौसर पर यह , कब तक खेल चलेगा !
मनमाने देगा बयान , और नेता हमें तलेगा !!

सीमा पर जो तन मन वारें , उनका मोल न जानें !
देशद्रोह इस देश में आखिर , कब तक यहां पलेगा !!

सोची समझी साजिश रचते , बनते बड़े मसीहा !
देश- दिलों को बांट रहे हैं , सबको यही खलेगा !!

प्रजातंत्र की आड़ में देखो , विषधर खूब पले हैं !
राजनीति के गलियारे में , उनको कौन दलेगा !

सबसे पहले देश हमारा , और उसके रखवारे !
उन पर आंच अगर आयी तो , कुछ भी नहीं टलेगा !!

निंदा के प्रस्तावों से बस , आगे की कुछ सोंचें !
कानूनों की सख्ती से ही , देश का रंग बदलेगा !!

मृत्युदण्ड हो देशद्रोह पर , या फांसी का फंदा !
न्याय तुला पर इससे नीचे , काम नहीं चलेगा !!

देशहितों पर आंच आ रही , खून अगर ना खौले !
हिंदुस्तानी होने का भ्रम , खुद को आज छलेगा !!


Kavita :

” फटा पुराना हमको दो ,
नया नया हम से ले लो ” !!

गली गली का फेरा है ,
द्वार द्वार पर टेरा है ।
गठरी है सिर कांधे पर ,
और धूप का डेरा है ।
मोल भाव जुबां मीठी ,
दिन भर खेल यही खेलो ।

दबा पेट दबे गाल हैं ,
चमचम सा हाथ माल है ।
पानी पी भूख मिटा लें ,
स्वाभिमान का सवाल है ।
कौन अब तरस खाए है –
दिन भर ही खुद को ठेलो ।।

राम राम कर दिन बीते ,
हैं सवाल सब अनचीते !
बोहनी हो जाये अच्छी ,
मिल जाएं हमें सुभीते !
उपरवाला है रहमदिल –
जितना मिले वही ले लो !!


Kavita :

समय का ईशारा है ” !!

ये जो तेरी आंखें हैं , जीने का सहारा हैं !
प्यास है कि घटती नहीं , सावन का नज़ारा है !!

बगावत हुई जग से , पराये लगे अपने !
पलको पे आँसूं पले , स्वाद मिला खारा है !!

हसरतें जवां हो गई , सपने लगे पलने!
आज हो न हो अपना , कल तो हमारा है !!

जागीरें हैं बेनामी , चरित्तर हैं सब खोखले !
लुटे यहां जनधन है , वोट बस हमारा है !!

मीडिया नहीं है खरा , कमाई करे नित नयी !
मुद्दों को देना हवा , इसे लगे न्यारा है !!

गोलियां धमाके हैं , धुंआ धुंआ मौसम है !
संगीनों पे जां है टिकी , देश हमें प्यारा है !!

रंगों के मेले हैं , खुशबूओं के डेरे हैं !
घटा बनके बरसो तुम , समय का इशारा है !!


Kavita :

” यहां ज़िन्दगी ,
बोझ तले है ” !!

निज का काम ,
निज को साजे !
हाथ पैर को ,
कब तक बांधें !
सदा बोझ को
ढोते आये –
मजबूत अभी ,
जानो कांधे !
खुशियां यहां ,
बड़ी दूर हैं –
यहां जिंदगी ,
गले गले है !!

पीछे छोड़ा
आज समय को !
हमें जीतना
आज समर तो !
अब दूर खड़ी
हैं बाधाएं ,
यहां हारना –
आज उमर को !
घूंट घूंट भर
पी है पीड़ा –
यहां जिंदगी ,
तभी पले है !!

रोटी, पेट है ,
आगे आया !
इसने हमको ,
है धमकाया !
यों लक्ष्य सदा
छूटा हाथों –
परिश्रम का ही ,
है सरमाया !
हार जीत क्या
खोया पाया –
यहां जिंदगी
कभी खले है !!

आस निरास का ,
खेल निराला !
हाथ रहा है ,
खाली प्याला !
बूंद बूंद को
रहे तरसते ,
कठिनाई से –
मिला निवाला !
उम्मीदों ने
सींची आशा –
यहां जिंदगी ,
हमें छले है !!


Kavita :

” ये आंसू के धारे हैं ” !!

दर्द है जगा कहीं ,
आंखों में नमी नमी !
यादों के जंगल में ,
कांटों की कमीं नहीं !
कभी छुअन , बनी तड़पन –
हम आँसूं भी वारे हैं !!

दूर तक है खामोशी ,
आस है बुझी बुझी !
प्यार की पहेलियां भी ,
क्यों रही सदा उलझी !
रहे मगन , किये जतन –
ये आँसूं भी हारे हैं !!

खुशी तो है कपूर सी ,
कभी हुई है कैद भी !
जो मिली हैं मुस्कानें ,
कर गई वे भी ठगी !
कभी हार है मनुहार है –
ये आँसूं तो प्यारे हैं !!

मस्त ये धरा गगन ,
झूमता था मन मगन !
स्मृतियों के फेर में ,
यथार्थ का आलिंगन !
कभी सबब है , प्रेरणा है –
ये आँसूं तो न्यारे हैं !!


Kavita :

” हंसी हमारा गहना है ” !!

परिधान सजे रंगीले ,
आभूषण भी बड़े कटीले !
फूलोँ से है प्यार बड़ा ,
ऐसे लदे , लगे सजीले !
उन्मुक्त धरा ,उन्मुक्त गगन –
उन्मुक्त हमे रहना है !!

भाव भंगिमा सुमधुर ,
नयन नशीले बड़े मदिर !
आतप सहती है काया ,
नहीं थकें हम पल भर !
राह कंटीली है पथरीली –
खुशबू जैसा बहना है !!

प्रकृति की कलकल ,
जीवन है यहां निश्छल !
ज्यादह की ना चाहत ,
हम पीते रोज़ हलाहल ।
प्यार यहाँ कसौटी चढ़ता –
कांटों संग रहना है ।।

रंग कई बिखरे हैं ,
यहाँ स्वप्न सजे संवरें हैं !
है पराग बिखरा सा ,
औ खुशबू पर पहरे हैं !
तीर कमान खिचें कब जाने –
भाग्य बदा सहना है !!


Kavita :

” खुश होकर –
मौसम ने ,
रंग बिखेरे हैं ” !!

तैरते सन्देश –
हवा में ,
पा ही गये !
मूक थे अनुबन्ध –
जुबां पे ,
आ ही गये !
सिलसिले –
समझोतों के ,
बहुतेरे हैं !!

प्यास अधरों पे –
जगी तो ,
बढ़ती गयी !
श्वास काबू में –
कहाँ है ,
थमती नहीं !
अनचाहे –
प्रश्नों के लगे ,
कई फेरे हैं !!

गात पुलकित –
मन उड़े ,
जैसे हवाओं में !
दिल की सारी –
बातें सुन ली ,
जैसे फिजाओं ने !
छा रहे –
आशा के बादल ,
हैं घनेरे !!


Kavita :

हरी भरी धरती है ,
और घनेरी छाँव है !
यह हमारे गाँव हैं !!

गहरे कुँए , बहती नदिया ,
है पोखर में पानी !
यहाँ नहीं स्वीमिंग पूल होते ,
बच्चों की मनमानी !
दूजे , तीजे , चौथे , अंतिम ,
कूद रहा है बचपन !
अल्हड़पन ऐसे ही पलता ,
निडर यहाँ लड़कपन !
सूरज ने छाया कर दी है –
धूप के उखड़े पाँव हैं !!

पकड़म पाटी और कबड्डी ,
खो खो खेल निराला !
अपकी थपकी पेड़ पर चढ़ना ,
यह कुलाम डाला !
गली गली है आंख मिचौली ,
और है गिल्ली डंडा !
धूम धड़ाका दिन भर भइये ,
निशा का मिज़ाज़ ठंडा !
चौपालों पर दुख बंट जाते –
अपनेपन की छांव है !!

कंचे खेलो,पतंग उड़ाओ ,
हो गए खेल पुराने !
अब क्रिकेट है खेत-खले में ,
हाथ लगे आजमाने !
है सुविधाओं ने पैर पसारे ,
गांव शहर से आगे !
रोज़गार के अवसर ना हैं ,
यही बुरा बस लागे !
कोलतार की सड़कें बिछ गई –
शहर को बढ़ते पांव है !!

पैदल चलना भूल गए हैं ,
साइकिल रास न आये !
धूम मचाई बाइक ने अब ,
हैं कारें धूल खाये !
निर्धन भी है, हैं अमीर भी ,
खाई बढ़ती जाए !
धरती माता उगले सोना ,
कुछ हाथ ही पाएं !
गलहार बने ,फांसी का फंदा –
अभी मिले ना ठाँव हैं !!


Kavita :

” पल मुस्कराने लग गये ”

कदम क्या संभले हमारे ,
वे पास आने लग गये |

अपना पराया पहचानने में ,
हमको जमाने लग गये |

आंसुओं ने पाला पोसा ,
रिश्ते पुराने कह गये |

दहलीज़ तक ना थे गंवारा ,
दिन पुराने लद गये |

अपना नहीं बेगाना समझा ,
रिश्ते निभाने लग गये |

आज वे हमदर्द बनकर ,
झूंठे फसाने कह गये |

दगा करते आये हमसे ,
वे आज़माने लग गये |

साफगोई दिल में ना थी ,
फिर से बहाने कर गये |

वक्त क्या बदला सितमगर ,
पल मुस्कराने लग गये |

माँ की दुआएं साथ थी ,
सपने सुहाने सज गये |


Kavita :

” गगन से उतरी परियां मां की –
अंतरिक्ष को छू लें हम ” !!

गणवेश किया है धारण ,
बस्ता पीछे लाद लिया है !
मास्टरजी का होमवर्क भी ,
हमने रट्टा मार लिया है !
धूलभरी राहें आतुर हैं –
स्वागत को अपने हमदम !!

हाथ थाम कर हाथों में ,
हमको राह नई गढ़ना है !
बाधाएं हैं कई सामने ,
हमको बस पढ़ना पढ़ना है !
खेल कूद में अव्वल आकर –
दिखलाना हमको दमखम !!

सबके सपने कांधे पर ले ,
मजबूत इरादे कर बैठे हैं !
अभी बहुत कुछ हासिल करना ,
कदम कदम पर सितम मिले हैं !!
सफलता कदम चूमने निकले –
यही प्रयास रखें हरदम !!


Kavita :

” सचमुच सच्चा सखा चाहिये ” !!

अंतर्मन के भाव हमारे ,
अधरों के मधुगान हमारे !
अनुभूति की हर तरंग को –
छू लें जब उन्मान हमारे !
जीवन में जो राज छिपे हैं ,
उनके लिए दिशा चाहिए |

दिल से दिल की गहराई तक ,
बचपन से ले तरुणाई तक !
रोम रोम में रचा बसा हो –
साँसों की जो गहराई तक !
खुशियां जिसकी झोली में हो ,
रास रचाती निशा चाहिए !!

शिक्षा दीक्षा ज्ञान न कम हो ,
तर्कशक्ति में उसके दम हो !
सहयोग सद्भाव बसा हो –
और कलाओं का संगम हो !
सुख दुख का बंटवारा मुश्किल –
चाहत सबकी ईशा चाहिए !!


Kavita :

” आहत हो रहा ,
गिलहरी सा मन ” !!

जातियों में बंट गये हैं !
समूहों में डट से गये हैं !
स्वार्थपरता की ललक है ,
लक्ष्य से भी हट गये हैं !
राजनीति अवसर तलाशे –
मच रहा क्रंदन !!

अपने पशुधन को सम्भालें !
कट रहे उनको बचा लें !
खाने को तो है बहुत कुछ ,
अहिंसा भी आजमां लें !
बीफ़ प्यारा उनको कह दें –
ना मथें जीवन !!

लूट है बटमार भी है !
मैले आँचल, गुहार भी है !
बावले सा समय लागे ,
हम डूबते मझधार ही हैं !
होगें रक्षित , और सुरक्षित –
कब यहां जन-धन !!

यहां घोटाले बड़े हैं !
नेताओं से सब डरे हैं !
भूख ने दामन ना छोड़ा ,
ग़रीब जीते जी मरे हैं !
भ्रष्ट धन , सरकारी नज़रें –
हो रहा मंथन !!

वेदना सहती रही हैं !
अभी बेड़ियां टूटी नहीं हैं !
तीन तलाक़ या अन्य रस्में ,
धार अश्रु बहती रही है !
बदलाव तो लाना ही होगा –
घर घर आँगन !!

घाटी में अलगाव की बू !
हम ही देते हैं हवा क्यूँ !
मुख्य धारा से जुड़े अब ,
हो कब तक भटकाव यूँ !
एकजुट हो राजनीति –
करे कुछ जतन !!

सीमा पर हैं लाल मां के !
हैं सजीले वीर बांके !
दांव खेले ज़िन्दगी का ,
सोच न्यारी है जहां से !
उंगलियां उन पर उठे ना –
हो शत शत नमन !!

अपनों से ही दुख मिला है !
दूर तक ना सुख मिला है !
रिश्ते सब बेमानी से हैं ,
जो मिला कुछ कुछ मिला है !
धूप है , कभी छांव भी है –
लद रही थकन !!


Kavita :

” मुस्कराहट खा रही चुगली ” !!

तैरते सपने दिखे हैं ,
Mail भी कितने लिखे हैं !
Pics भी इतनी बटोरी ,
भावना में सब बहे हैं !
बोल्ड हो गया कोई –
किसी ने डाल दी गुगली !!

नवल धवल प्यार है ,
खुशियों का उपहार है !
मिल गए हैं मन से मन ,
यों बहुतेरे इकरार हैं !
खूब बरतें सावधानी –
फिर भी उड़ चले गिल्ली !!

बढ़ गया विश्वास है ,
कुछ पाने का एहसास है !
उड़ने लगे हैं आसमां में –
अजीब सा आभास है !
रन दौड़ने में हैं जुटे –
मौसम हो रहा टल्ली !!


Kavita :

” अब तक ना आये ” !!

इंतज़ार अब और नहीं !
होगा कोई शोर नहीं !
पल-पल होगें चुप्पी साधे ,
चले किसी का ज़ोर नहीं !
रंग बिरंगी इस दुनिया में –
होगें रंगी साये !!

रंग सजे हैं गहरे गहरे !
खुशियों ने बैठाये पहरे !
हाथ सफलता के पैमाने ,
अँखियों में हैं भाव रूपहरे !
पुलकित हुई समय की धारा –
ऐसे मन भाये !!

बैचेनी का दौर नहीं है !
उम्मीदों का ठौर नहीं है !
रोम-रोम में सिहरन दौड़े ,
खुद पर खुद का ज़ोर नहीं है!
भूल गयी है राह प्रतीक्षा –
नभ में तुम छाये !!


Kavita :

” मुस्कराया है गगन भी ” !!

बन्धनों में ,
हूँ बंधी सी !
खुशबूओं से ,
हूँ लदी सी !
अनुबन्ध रंगीले हुए हैं –
खिलखिलाया है चमन भी !!

ताने बाने ,
बुन रखे हैं !
प्यारे प्यारे ,
रंग सजे हैं !
साकार सी अब कल्पनाएं –
आ भी जाओ है लगन सी !!

प्रश्न बहुतेरे ,
मुखर हैं !
अपनों से ही ,
अब तो डर है !
हाथ थामा छोड़ना ना –
हो गयी मैं तो मगन सी !!

नज़रें हुई ,
बेताब सी !
फीकी हुई ,
मुस्कान भी !
वादे से तेरा यों मुकरना –
प्यार में भी है ठगन सी !!


Kavita :

” मदहोशियाँ छाई हुई हैं ” !!

चकाचौंध है ,
सज़ धज ऐसी !
हम तो क्या ,
लुट गये परदेसी !
खुद में ही –
डूबे डूबे हो !
खामोशियाँ ढाई हुई हैं !!

दीवानों सा ,
चढ़ा खुमार है !
महकी बहकी ,
ये बहार है !
प्यासे प्यासे –
अधर कह रहे !
सरगोशियाँ चाही हुई हैं !!

ना सम्मोहन ,
वशीकरण है !
डूबा डूबा ,
जाये मन है !
दुनिया की अब –
खबर किसे है !
स्मृतियां मन भाई हुई हैं !!


Kavita :

” इस क़दर ,
शरमाओ ना ” !!

बोलती है ,
बन्द मेरी !
लगे श्वासें ,
ठहरी ठहरी !
साकार सी –
हैं कल्पनाएं !
अब यों ही ,
भरमाओ ना !!

बंध गये हैं ,
मोह पाश !
अब देखकर ,
नये अंदाज़ !
बन्द पलकें –
बांधा समां !
इतनी भी ,
हरषाओ ना !!

नेह के रंग ,
रंग गयी हो !
मनुहार से बंध ,
सी गयी हो !
बन्ध टूटे –
देह निखरी !
अब और यों ,
मदमाओ ना !!


Kavita :

” बड़ी तीखी है ,
धार कजरे की ” !!

कुंदन देह ,
निखरी निखरी !
आभूषण से ,
छवि है निखरी !
जगी उम्मीदें –
सिर चढ़ बोलें !
बड़ी तीखी है ,
मार नखरे की !!

चंचल नयना ,
कजरारे से !
हम तो सब कुछ,
हैं हारे से !
देहरी पर –
वक़्त हरकारा !
बहकी हुई ,
बयार गजरे सी !!

रूप दमकता ,
दर्पण देखे !
भाव तुम्हारे ,
रहते ऐंठे !
हाथ नहीं कुछ –
रहा निरखना !
चुरा गयी हो ,
तुम नज़रें भी !!


Kavita :

” इरादा कत्ल का या ,
साज़िशों का दौर है ” !!

गहरा सागर ,
डूबने का डर !
जाने कैसा ,
होगा मंज़र !
अब है परवाह किसको ,
दूर तक ना छोर है !!

हैं होठों पर ,
कितने फ़साने !
मद के प्याले ,
राम जाने !
प्यास जन्मों की मिटेगी ,
हाथ अब ना ठौर है !!

रंगीनियां अब ,
रंग चढ़ी हैं !
उंगलियों में ,
जादूगरी है !
कशिश आंखों में कितनी ,
चाहतें पुरज़ोर है !!

डूबे हुए हो ,
सोच गहरी !
हम तो मौजी ,
ठहरे लहरी !
अंज़ाम तो रब के हवाले ,
लुट गये ये शोर है !!


Kavita :

” भा गयी तेरी अदाऐं ” !!

रंगीनियां ऐसी ,
चढ़ी हैं !
आंखों पर ऐनक ,
खड़ी है !
नज़रों की साज़िश है कोई ,
आड़ लेकर मुस्कराये !!

स्वप्न सिंदूरी ,
बुने हैं !
भाव सतरंगी ,
चुने हैं !
शोखियाँ सर चढ़ बोलती हैं ,
गुनगुनाती हैं हवाएं !!

हाथ हाथों में ,
लिया है !
मन सुवासित अब ,
किया है !
कानों में सरगोशी कर यों ,
तुमने कितने बल खाये !!

मुस्कराये इस ,
कदर हो !
बैठे लेते हैं ,
लहर वो !
बावरा मन भटके हरदम ,
और ना दो अब सजाएं !!


Kavita :

” हंसी तुम्हारी ,
धारदार है ” !!

सजे सजे से ,
लागे तन मन !
खुशी आवरण ,
है पुलक वदन !
स्निग्ध गात है ,
अधर गुलाबी !
हंसी तुम्हारी ,
एक खुमार है !!

बांकी चितवन ,
ओढ़ चुनरिया !
दमकी हंसी ,
ज्यों बिजुरिया !
दिवास्वप्न हैं ,
जगी उमंगें !
हंसी तुम्हारी ,
एक कटार है !!

भाव अनकहे ,
समझाते हो !
आँखियों से ही ,
बतियाते हो !
लाज लता पर ,
लदी शोखियाँ !
हंसी तुम्हारी ,
करे वार है !!


Kavita :

” नये नये अंदाज़ तुम्हारे ” !!

रंग रंगीली ,
सजी है काया !
ऋतुओं का भी ,
मन भरमाया !
हंसी दर्प में ,
डूबी लगती –
ऐसा है विश्वास जगा रे !!

आँचल हाथों ,
बल खाता है !
रूप सजीला ,
लहराता है !
सभी की नजरें ,
आज थमी हैं –
लगे उल्लसित आज बहारें !!

चंचल नयना ,
हैं बाज़ीगर !
शहद धरा है ,
अधरों पर !
नखरों संग ,
बिखरे हैं कुन्तल –
मुखरित करते राज तुम्हारे !!


Kavita :

” घनेरी जुल्फें
घटा सी छाई ” !!

हवा में नमी है ,
बिखरी है खुशबू !
मौसम है बहका ,
जगा ऐसा जादू !
गज़ल सी काया –
अदा रुबाई !!

बंद हैं पलकें ,
राज़ हैं गहरे !
अधर पाँखुरी से ,
हैं गात रूपहरे !
निखरा है यौवन –
लिए अंगड़ाई !!

खुद में हो खोये ,
कैसा सितम है !
तलाश ये कैसी ,
बिसुरे से हम हैं !
डूबो न ज़्यादा –
लिए गहराई !!

बेखबर से तुम ,
बाख़बर हैं हम !
चाहतों के दौर ,
ना होगें ख़तम !
मुस्कराये तुम –
निधियाँ पाई !!


Kavita :

” धर्म हमारा बड़ा लचीला ”

मन्त्रों में , वेदों में है वो ,
पत्थर की मूरत में है वो |
ना मानो तो निराकार है ,
मानो तो घट घट में है वो |
नहीं बंदिशों में बाँधा है –
सचमुच है यह बड़ा रंगीला ||

मात-पिता हैं तीरथ जैसे ,
गुरुजनों की बात निराली |
दुखीजनों की पीड़ा समझी ,
टल जाती ग्रह दशा हमारी |
साधु-संतों ने ज्ञान दिया है –
अंतर्मन का चोगा ढीला ||

परिवर्तन स्वीकार किये हैं ,
धर्म ने अंगीकार किये हैं |
सामाजिक बदलाव के चलते ,
बदले से व्यवहार किये हैं |
कई जगह उपहास हुए हैं –
क्यों नहीं है, यह हठीला ||

सच, नई-नई बेला है आई ,
नारी जागृति की अंगड़ाई |
दर्शन की बस होड़ लगी है ,
पुरुष खड़े ले रहे जम्हाई |
न्यायालय , भारी धर्म पर –
कैसा है यह ,हंसी -ठिठौला ||

सेवा में धर्म बस हम जाने ,
कर्मों से हम गये पहचाने |
नया -पुरातन रखा सामने ,
खोते जा रहे ठौर -ठिकाने |
कातर धर्म खड़ा कोने में –
बदल रहा है पल-पल चोला ||


Kavita :

” आंखें मुन्द रही हैं ,
प्यार में ” !!

कल्पनाएं मधुर ,
पलकों पर विराजी !
सिमटी लाज में ,
काया कसमसाती !
कनक आवरण सजा –
खुमार में !!

मुस्कराना नाम ,
तेरे कर दिया है !
खुशहाली को ,
एक नया घर दिया है !
भावनाएं रंग भरे –
मनुहार में !!

नज़राना मिला ,
मीठी सी ठगी का !
इतराना हुआ ,
मेरी बन्दगी का !
तर-बतर मन हुआ –
पुकार में !!


Kavita :

” लहरों का किलोल ,
मन को भाता है ” !!

भीड़भाड़ हो ,
या तनहा हों !
सुख के पल हों ,
या दुखवा हो !
इन टूट रहे ,
तटबन्धों से !
सच दिल अपना –
जुड़ सा जाता है !!

रंग बिरंगे से ,
परिधान सजे !
तन मन उठती ,
ज्यों लहरें हैं !
गहरा अन्तस –
कई ज्वार उठे !
सागर से दिल का –
गहरा नाता है !!

गहराई पर ,
यों पहरे हैं !
अब गहरे जख्म ,
हुए गहरे हैं !
चाक कर रहे ,
सीना अब तो !
गहरापन ही सबको –
लहरा जाता है !!


Kavita :

“सांझ देखो खिलखिलाई है !
अरुणिमा अम्बर पे छाई है ” !!

थका हारा दिन ,
हो गया है पस्त !
रात की जवनिया ,
है सदा अलमस्त !
सृजन की चाहतें –
भोर होते मुस्कराई हैं !!

चित्र खींचे जो ,
परिश्रम तूलिका है !
जो किया हासिल ,
स्वप्न भूमिका है !
उपलब्धियों ने फिर –
खुशियां थपथपाई हैं !!

डरे हुऐ हम ,
अनिश्चय ने छला !
जुटा ली हिम्मत ,
बहुत कुछ है टला !
हमकदम का साथ –
ज़िन्दगी गुनगुनाई है !!

साथ ना छूटे ,
इतनी सी ठानी है !
दौड़ समय की ,
हमसे सयानी है !
कल क्या होना –
उम्मीदें कसमसाई हैं !!


Kavita :

” उठे हिया में हिलोर ” !!

***

द्वार पे आकर ,
लौट गये तुम !
उम्मीदें सब यों ,
हो गई गुमसुम !
सजे धजे अरमान –
ढूंढे प्यार का छोर !!

स्वप्न सजे फिर ,
बिखर गये हैं !
हम तो हर पल ,
सिहर गये हैं !
अकुलाया मन चाहे –
परिवर्तन का दौर !!

दिन दिशा बदले ,
हम सोचते यही !
खुशियों का नर्तन ,
फिर होगा सही !
बिसुरा नहीं पाओगे –
है चाहत पुरजोर !!


Kavita :

” सर्र से , आँचल –
सरकता जाये है ” !!

छट गये ,
बादल गम के !
होश खो बैठे ,
कसम से !
राह चलता कारवां –
मुझको बुलाये है !!

जाने कब ,
नज़रें मिली थी !
यादें लेकिन ,
चुलबुली थी !
सरसराती हवाऐं –
महकी जायें हैं !!

एक नज़र ,
झलक पा के !
हम तो गये ,
इठला से !
लाज आंखों में बसा –
हम मुस्कराये हैं !!

फिर मिलें ,
वादा ये करना !
वक़्त से भी ,
थोड़ा डरना !
हाथ अपने कुछ नहीं –
चाहत जगाये हैं !!


Kavita :

” हो गये पल में पराये ‘ !!

नेह के धागे बन्धे थे ,
द्वार खुशियों से सजे थे !
बचपन की यादें सुहानी ,
अंखियों में वे रतजगे थे !
जाने कैसी घड़ी आयी –
बोल बागी नज़र आये !!

झनझना कर तार टूटे ,
रिश्ते लगे बेकार झूंठे !
टूट कर चाहा था जिनको ,
ले अहं का भाव रूठे !
महके महके ख़्वाब टूटे –
पलकों पे ना संवर पाये !!

जब कभी शीशा दरका ,
उसकी कोई ना सुनता !
दूसरा सजने को आतुर ,
जो टूटा , टूटा औ बिखरता !
वक़्त बांधे ना बंधे है –
बनते बिगड़ते अपने साये !!


Kavita :

” हम तो तुम्हरे दास हो गये ” !!

कमर कटीली ,
भुजदंड कसे !
है रूपगर्विता ,
मद छलके !
नटखट नज़रें ,
हमें छू गई –
हम खुशियों के पास हो गये !!

अरुणिम अधर ,
बोल मीठे !
यौवन के हैं ,
तीर कसे !
आँचर का यों ,
पल्लू थामा –
हम आम थे खास हो गये !!

गहनों का भी ,
भार लदा !
खुशियों ने है ,
तंज़ कसा !
वक़्त देखकर ,
फेरी नज़रें –
हम सचमुच उदास हो गये !!


Kavita :

” कितना और सजोगी ” !!

नख से शिख ,
अलंकरण है !
सजे सजे से ,
तन मन हैं !
नज़रों से ऐसा –
बाँधा है ,
जादू है या
वशीकरण है !
अधरों पर है ,
मूक निमंत्रण –
कितना और हंसोगी !!

रूप रंग है ,
आँचल फहरा !
नागिन लट हैं ,
काजल गहरा !
गंध सुगंध यों –
लहर गई ,
जागा ऐसा ,
भाव रूपहरा !
मौसम बहका ,
भरमाने को –
कितने स्वांग रचोगी !!

रात दिवस अब ,
हुए सुहाने !
लबों पे मीठे ,
प्रेम तराने !
आसमान भी –
रंग बिखेरे ,
इंद्रधनुष को ,
ख़ुशी में ताने !
अलबेली सी ,
सभी अदाएँ-
कितना और छलोगी !!


Geet :

सच तुम रूठ जाओ तो
मनाने का मज़ा कुछ और है !!

बातों बातों में ठुनकना !
होठों से निर्झरणी बहना !
भूकम्प के झटके से लगते
भरभरा चीजों का गिरना !
उस बिगड़े सन्तुलन का –
जब तब दिखता नहीं कोई ठौर है !

भाल की बिंदी बिदकना
और जुल्फों का बिखरना !
चूड़ियां ऊपर को चढ़ती
पल्लू का वो कमर कसना !
चिंगारियां आँखों में भड़के –
बस कब थमे, कब रुके यह दौर है !

हथेलियों का रगड़ खाना
मुठ्ठियों का बंध ही जाना !
तमतमाये गाल हों और
मुस्कराकर ख़म दिखाना !
इस वीरांगना के स्वागत में –
बस मुस्कराने का मज़ा कुछ और है !!

समर्पण मुझको है करना
कानों को है बन्द रखना !
घिरी है सावन बदरिया
भीगने से अब क्या डरना !
बिजलियाँ चमके तो चमके –
रिमझिम रिमझिम बूंदों का ही शोर है !!


Geet :

हम तुम
रंग गये हैं ,
एक ही रंग में !

अबीर है गुलाल है ,
बहकी हुई चाल है !
पीली भंगिया कहीं ,
सुरूर है , धमाल है !
तन मन भीगे हुए हैं –
किसी तरंग में !!

अमीर हैं गरीब हैं ,
दूर ना करीब हैं !
भेद कहीं आज नहीं ,
जगे सब नसीब हैं !
खुशियों का नर्तन है –
उत्सव संग में !!

धमाल है बवाल है ,
उठे कहीं सवाल हैं !
है मस्तियाँ चढ़ी कहीं ,
चुप्पियां बदहाल है !
पल्लवित है आशाएं –
नई उमंग में !!

शिकवा है मितवा है ,
नेता है फितवा है !
है कोई मलाल नहीं ,
सबका मन रितवा है !
रंग से परहेज नहीं  –
ऐसे रंग में !!


Geet :

गुलाल है ,
धमाल है ,
कहिये क्या –
ख़याल है !!

रंगों की महफिल ,
डूबे डूबे से हैं !
सब अपने लगते ,
रंग अजूबे से हैं !
रंग उड़ाया  ऐसा –
मची धमाल है !!

भारी है हुड़दंग ,
मस्ती यहाँ वहां !
अब परवाह किसे ,
कोई गुमाँ कहाँ !
खुशियां काँधे चढ़ी –
करे सवाल है !!

तुमको रंगना है ,
अब गहरे रंग से !
दूजा रंग चढ़े ना ,
प्रीत बढ़े ढंग से !
दुनिया बढ़ी अजूबी –
रोज़ बवाल है !!

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