0204 – Anand Singhanpuri (Tridev Raj Anand Kishor)

Kavita :

कुछ शब्द बाकी हैं

तुझको क्या दूँ,
हिसाब दूँ।
या किताब दूँ
आवाज दूँ
या ख़िताब दूँ।
सुन तो लो, अभी भी
कुछ शब्द बाकी हैं।

तेरे मेरे बुनियाद के
कुछ फरियाद के
कुछ अफ़साने है
उन हंसी जज्बात के
कुछ शब्द बाकी हैं।।

उन लम्हों की दरमियाँ
गूंजती चहुँ छोर
मन मे फुदकते
उचकते ख़्वाब
भरे आशाएं
कुछ शब्द बाकी हैं।⁠⁠⁠⁠


Kavita :

”जख्म ”

जख्म आज भी
मेरे हरे हैं |
तुम्हारे खुरेदती
कचौटती
शब्द बाण
मेरे दिल को
निशदिन
गहरा व्रण बना देती है |
ना कोई दवा
ना मरहम
का कोई असर है |
अन्तस् पटल पर
यादों की
ओ लम्हें
मेरे जख्मों को
हरा बना कर
नासूर कर रही है |
और तुम्हारे बिछडन
मेरे जख्मों पर
नमक छिडक रही हैं |
किस कदर कहूँ
शब्द की बात
बेबुनियाद लगें |
तुम्हारे ना होना
मेरे दिल पर बाण
चुभना हैं |
और उसकी कहर
जख्म की भांति
हरे लगे |


Kavita :

”कुछ कहना है ”

कुछ कहना है तुम्हें;
जरा सुन तो लो |
यूँ दरकिनार कर
ना जाओ ||
बेदर्दी का आलम है
यूँ ना सताओं |
तुम्हे क्या ?लगता है
हम मर जायेंगे तेरे बिन
यूँ दगा देकर हमें
यूँ ना जलाओं |
यूँ दरकिनार कर
ना जाओ ||
कुछ कहना है तुम्हें
जरा सुन तो लो |

प्यार की रुसवाई
तेरी हर अंगड़ाई
समझ गया हूँ दिलबर |
बेइंतहा मोहब्बत का मारा
यूँ ना तडपाओ
यूँ दरकिनार कर
ना जाओ ||
कुछ कहना है तुम्हें
जरा सुन तो लो |

दे हमें छूठा दिलासा
करें हमसे बहाना ,
हम तुम्हें
नजदीकियों से भांप चुके है
तुम हमारे हो यही
आस लिए फिरते थे ||
आज हमें यूँ
ना टरकाओं |
यूँ दरकिनार कर
ना जाओ ||
कुछ कहना है तुम्हें
जरा सुन तो लो |


Kavita :

”दर्द की चुभन ”

दर्द के मयखाने में,
बैठा हूँ |
कोई आवाज तो दे दो,
सुनलो हमारी नगमों गजल
जरा उठकर दाद तो दे दो ||

उसकी विरहन
मासूम अदायिगी |
किस तरह कायल कर गई ,
चुभती दिल पर दर्द
की अंगड़ाई ,
हमें घायल कर गई
अब आस लगाये हैं ,
कोई हमें साथ तो दे दो ||
सुनलो हमारी नगमों गजल
जरा उठकर दाद तो दे दो ||

जी मचल जायें
नींद उड़ जायें |
पीकर तेरे नाम का जाम
सोच कर दिन कट जायें |
विरह की अग्नि में
जल भस्म बन गया हूँ |
दर्द की फरियाद ले
कहा -कहा जाऊं|
इस कदर दर किनार कर
किस दर जाऊ |
तुम्हीं बताओ
कुछ मशवरा राय तो  दे दो |
सुनलो हमारी नगमों गजल
जरा उठकर दाद तो दे दो ||


Kavita :

”व्यथित हूँ”

किस ओर चलूं ,
किस पायदान पर ||
चिंतित हूँ,
व्यथित हूँ |
कुछ ना सूझे
केवल मन की आस लिए ,
भटकता फिरूं
कहा इस जहान पर |
किस ओर चलूं,
किस पायदान पर ||0||
ना साथी है
ना कोई हमसफर ,
ना आगे है
ना पीछे
चलूं अम्बर छोर तले
जहाँ मेरा मन ले चले
क्या पता किस डगर पर,
किस ओर चलूं,
किस पायदान पर ||0||
अंतर्मन से क्या टटोले,
दिखता ना कुछ|
बस मन की आवाज
सुन क्या तोले क्या बोले,
व्यथा मन को खाई
मन पर क्या रस घोले
क्या मंथन करूं बीच मझधार पर |
किस ओर चलूं,
किस पायदान पर ||0||

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