0204 – Anand Singhanpuri (Tridev Raj Anand Kishor)

Kavita:

“गुरतुर बोली”
तोर बोली अब्बड़ मिठाथे ,
सुन के मन हरसा जाथे।।
कोयली कस तोर बोली ,
मया पिरित के बन्धे हमजोली ।।
तोला देख के मन गदगदा जाथे,
तोर बोली अब्बड़ मिठाथे ।।1||

रूप रंग के मन माधुरी ,
का मोहनी डारे तय टुरी।।
तोर रंग रूप म मोहा गेव ,
रात दिन के सुरता में सुखागेव । ।
तोला देख आंखी मूंदा जाथे,
तोर बोली अब्बड़ मिठाथे ।।2||

जियत मरत के बांधे अचरा,
खोजे ल नई मिलय तोर कस अपसरा।।
आँखी तोर मिरिगनैनि कस चमके,
जात कोनो मैनखे देखे उतरके ।।
एक नजर देख कोनो मोहा जाथे ,
तोर बोली अब्बड़ मीठा थे ।।3।।

तोर चाल के “आनन्द” होगे दीवाना ,
मोला देख आस परोस के देवत हैं ताना।।
का पीरित के समाये हे तोला बीमारी ,
जम्मों संगी संगवारी देवत हे गारी ।।
मया पिरित म आंखी मूंदा जाथे ,
तोर बोली अब्बड़ मीठा थे ।।4।।


Kavita:

सौगातें
सँजो रखा है
मैंने
तेरे लिए सपनो की सौगात।

तू जब आंगन में
आये,
तेरे कदमों तले बिछे
पड़े रहेंगे।
सितारों की टिमटिमाते
नजारे।
फूलो की पंखुड़ियों
का स्तर
सौंधी मिट्टी की
महक
पुरवाईयों का बिखेरती
खुशबू।

और ना जाने
कितने अरमानों
की लड़ियाँ
सौगात देने की
चाह रख
हम निशदिन जिया करते हैं।


Kavita:

मेरी आवाज

चीखकर मेरी आवाज पुकारती हैं।
बिलखती,सहम ती
ये फरियाद करती हैं।।

अब ना तेरे दामन की भीख चाहिये।
बहुत हो गया हमें सम्मान चाहिये।।

मेरी शिक्षा, दीक्षा किसी की जागीर नही।
तेरे सामने घुटने टेकु ये मुझे मंजूर नही।।

बहुत हो गया अब न्याय की बाँट जोहता हूं।
मैं एक फार्मासिस्ट हूँ यह अभिमान से बोलता हूँ।।

गया वो बेबसी और लाचारी।
कौंसिल में अब हमारी बारी।।

बेरोजगारों की आस है जो पड़ी।।
सामना करने अब बन हथियार खडी।।

प्रण ले अपने स्वाभिमान की
अपने आत्म सम्मान की।
नही बेचेंगे अपने शिक्षा के मूल्यों को।
नही पनपने देंगे अपने दुर्गुण रूपी अवमूल्यों को।।

ऐसी विस्वास की जोत लिए खड़ा द्वार।
त्रिदेव राज करता निवेदन बार- बार।।

अबकी बार चुने , फार्मेसी डिग्री, डिप्लोमाधारी।।


Kavita:

जीवन सफर

जिंदगी के सफर में,कुछ तो अफ़साने होंगे।

इस अल्हड़ जिंदगानी के,कुछ तो मायने होंगे।।

 

चलती फिरती इस मंजर के,कुछ तो तराने होंगे।

इस हंसी दौड़ धूप में,कुछ तो गंवाने होंगे।।

जिंदगी के सफर में—–

परिंदो की चहचहाहट, दिल की सुगबुगाहट बन गई।

लब्जों पर लपकती टो टूक, आहट बन गई।।

 

वक्त की दरिया में चल,कुछ तो वक्त बिताने होंगे।

जिंदगी के सफ़र में……..

 

कुंठित मनसाओ से हार,भयमुक्त जीवन सँवार।

आशा ,तृष्णा पर लगा विराम,यही है जीवन सार।।

दुविधाओं की पोटली को,कुछ तो ढोने होंगे।

जिंदगी के सफर में…….

 

 


Kavita :

तुम्हारी मुस्कान

तुम्हारी हल्की सी
मन्द-मन्द मुस्कान।
छू जाती मेरे मन
अंतर्मन को।।
जब हँसी की पंखुड़िया
उड़कर ये कहा करती।
की तुम्हारे अन्तस् पटल में
बसकर तुम्हारे जीवन
में अनमोल
सतरंगी रंग भर दूँ।।

और तुम सदैव
हँसते मुस्काते
मुझे जब आलिंगन करो।
तब उन रंगों की
महक मेरे रूह
तक भांप सके।

और हमारे प्रेम पथ
पर खुशबु तरंगित हो।
अमिट नव गाथा वर्णित हो।
ऐसी अभिप्रेरणा ले
हम दोनों सदैव
कर्तव्य पथ पर
चलते रहे।
और
तुम्हारी हल्की सी
मन्द-मन्द मुस्कान।
मेरे अंतर्मन को छूकर अहसास दिलाती रहें।।

कि तुम कभी मेरे
दिल के गलियारों में
बसा करते थे।
और हम तुम्हारे नाम
का तराना लिये
फिरते थे।।
यू ही कभी- कभी


Kavita :

कुछ शब्द बाकी हैं

तुझको क्या दूँ,
हिसाब दूँ।
या किताब दूँ
आवाज दूँ
या ख़िताब दूँ।
सुन तो लो, अभी भी
कुछ शब्द बाकी हैं।

तेरे मेरे बुनियाद के
कुछ फरियाद के
कुछ अफ़साने है
उन हंसी जज्बात के
कुछ शब्द बाकी हैं।।

उन लम्हों की दरमियाँ
गूंजती चहुँ छोर
मन मे फुदकते
उचकते ख़्वाब
भरे आशाएं
कुछ शब्द बाकी हैं।⁠⁠⁠⁠


Kavita :

”जख्म ”

जख्म आज भी
मेरे हरे हैं |
तुम्हारे खुरेदती
कचौटती
शब्द बाण
मेरे दिल को
निशदिन
गहरा व्रण बना देती है |
ना कोई दवा
ना मरहम
का कोई असर है |
अन्तस् पटल पर
यादों की
ओ लम्हें
मेरे जख्मों को
हरा बना कर
नासूर कर रही है |
और तुम्हारे बिछडन
मेरे जख्मों पर
नमक छिडक रही हैं |
किस कदर कहूँ
शब्द की बात
बेबुनियाद लगें |
तुम्हारे ना होना
मेरे दिल पर बाण
चुभना हैं |
और उसकी कहर
जख्म की भांति
हरे लगे |


Kavita :

”कुछ कहना है ”

कुछ कहना है तुम्हें;
जरा सुन तो लो |
यूँ दरकिनार कर
ना जाओ ||
बेदर्दी का आलम है
यूँ ना सताओं |
तुम्हे क्या ?लगता है
हम मर जायेंगे तेरे बिन
यूँ दगा देकर हमें
यूँ ना जलाओं |
यूँ दरकिनार कर
ना जाओ ||
कुछ कहना है तुम्हें
जरा सुन तो लो |

प्यार की रुसवाई
तेरी हर अंगड़ाई
समझ गया हूँ दिलबर |
बेइंतहा मोहब्बत का मारा
यूँ ना तडपाओ
यूँ दरकिनार कर
ना जाओ ||
कुछ कहना है तुम्हें
जरा सुन तो लो |

दे हमें छूठा दिलासा
करें हमसे बहाना ,
हम तुम्हें
नजदीकियों से भांप चुके है
तुम हमारे हो यही
आस लिए फिरते थे ||
आज हमें यूँ
ना टरकाओं |
यूँ दरकिनार कर
ना जाओ ||
कुछ कहना है तुम्हें
जरा सुन तो लो |


Kavita :

”दर्द की चुभन ”

दर्द के मयखाने में,
बैठा हूँ |
कोई आवाज तो दे दो,
सुनलो हमारी नगमों गजल
जरा उठकर दाद तो दे दो ||

उसकी विरहन
मासूम अदायिगी |
किस तरह कायल कर गई ,
चुभती दिल पर दर्द
की अंगड़ाई ,
हमें घायल कर गई
अब आस लगाये हैं ,
कोई हमें साथ तो दे दो ||
सुनलो हमारी नगमों गजल
जरा उठकर दाद तो दे दो ||

जी मचल जायें
नींद उड़ जायें |
पीकर तेरे नाम का जाम
सोच कर दिन कट जायें |
विरह की अग्नि में
जल भस्म बन गया हूँ |
दर्द की फरियाद ले
कहा -कहा जाऊं|
इस कदर दर किनार कर
किस दर जाऊ |
तुम्हीं बताओ
कुछ मशवरा राय तो  दे दो |
सुनलो हमारी नगमों गजल
जरा उठकर दाद तो दे दो ||


Kavita :

”व्यथित हूँ”

किस ओर चलूं ,
किस पायदान पर ||
चिंतित हूँ,
व्यथित हूँ |
कुछ ना सूझे
केवल मन की आस लिए ,
भटकता फिरूं
कहा इस जहान पर |
किस ओर चलूं,
किस पायदान पर ||0||
ना साथी है
ना कोई हमसफर ,
ना आगे है
ना पीछे
चलूं अम्बर छोर तले
जहाँ मेरा मन ले चले
क्या पता किस डगर पर,
किस ओर चलूं,
किस पायदान पर ||0||
अंतर्मन से क्या टटोले,
दिखता ना कुछ|
बस मन की आवाज
सुन क्या तोले क्या बोले,
व्यथा मन को खाई
मन पर क्या रस घोले
क्या मंथन करूं बीच मझधार पर |
किस ओर चलूं,
किस पायदान पर ||0||

898 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *