B 0206 – Vinod Sagar

Kavita :

~- इंतज़ार -~~~

एक तेरे आने की ख़ुशी
एक तेरे जाने का ग़म,
आँख़ों में अश्क़ों के मेले
दर्द ही अब मेरा मरहम।

चन्द पलों का साथ तेरा
और उम्रभर की जुदाई,
मैं तेरी याद में मर रहा
तुम्हें याद ना मेरी आई।

जब प्यार हमारा बच्चा था
दिल भी हमारा सच्चा था,
आज जो यहाँ रुसवाई है
कल तलक सब अच्छा था।

तेरे जाने के बाद तो सनम
जीवन जैसे शमशान है,
यादें हैं प्यार की वो क़ब्र
जिसमें ख़ामोश ये जान है।

अच्छा होता जो मैं तुमसे
न टूटके ऐसे प्यार करता,
फिर न ख़ून के आँसू रोता
और न तेरा इंतज़ार रहता…!


Gazal :

वीर शहीदों की क़ुर्बानी पर किताब लिखें।
चलो दोस्तों आज हम भी इंक़लाब लिखें।

भगत सिंह, सुखदेव एवं राजदेव की जय।
हमसब मिलकर गायें यही गीत हो अभय।
वीरों की शहादत पर क़ुर्बान ग़ुलाब लिखें।
चलो दोस्तों आज हम भी इंक़लाब लिखें।

धन्य थीं माँयें, धन्य थीं उनकी बलिदानी।
धन्य वे लाल, फाँसी थी जिनकी दीवानी।
भारतोदय का वही एक आफ़ताब लिखें।
चलो दोस्तों आज हम भी इंक़लाब लिखें।

देश में फिर से अराजकता का आलम है।
कहीं आरक्षण तो कहीं जातीय मातम है।
‘जय हिन्द’ के जयकारा का शबाब लिखें।
चलो दोस्तों आज हम भी इंक़लाब लिखें।

वीर शहीदों की क़ुर्बानी पर किताब लिखें।
चलो दोस्तों आज हम भी इंक़लाब लिखें।


Gazal :

मेरा ये दिल तो अब बच्चा नहीं है।
तभी तो पास यह रहता नहीं है।

तड़पता है ये दिल चाहत में उसकी,
कभी ये मेरी भी सुनता नहीं है।

लुटा है प्यार में आख़िर वही जो,
मुहब्बत को अभी समझा नहीं है।

दवा क्या मेरे दर्दे- दिल की यारो,
उसे जो ज़ख़्म ये दिखता नहीं है।

ग़ज़ल अपनी है ‘सागर’ से भी गहरी,
बिना इसके मुझे रहना नहीं है।

 


Kavita :

~~ पानी ~~

ज्ञानी हो या फिर अज्ञानी।
सबकी बस यही ज़ुबानी।
हे दाता! समझो परेशानी!
सबको पीने को दो पानी।

जल बिन जग सूना-सूना।
लगे शमशान का नमूना।
देखो तड़पते दाता-दानी।
सबको पीने को दो पानी।

नदी हो या निर्झर झरना।
सिखलाता है आगे बढ़ना।
तू नहीं तो ख़तम कहानी।
सबको पीने को दो पानी।

हवा और पानी का संगम।
हरता जीवन का यह ग़म।
यही है ज़िंदगी की रवानी।
सबको पीने को दो पानी।

‘सागर’ हो या फिर दरिया।
सबपर तेरी एक नज़रिया।
जल कल की है ज़िंदगानी।
सबको पीने को दो पानी।


Kavita :

~~- कविता -~~~~

मेरी रग- रग की तू रवानी कविता।
तू ही तो है मेरी ज़िंदगानी कविता।

तुझमें ही डूबा रहता हूँ मैं हरपल,
मेरे होने की तू है कहानी कविता।

जी लेता हूँ जिगर से लगाके तुम्हें,
तू है मेरे दिल की सुहानी कविता।

हर लब्ज़ नया एहसास दिलाता है,
चाहे वो नई हो या पुरानी कविता।

यूँ ही “सागर” दीवाना नहीं है तेरा,
तू भी है उसी की दीवानी कविता।


Kavita :

अजन्मा

**

नैन से जो नैन लड़ें

फिर आँख़ें चार हुई

लोक-लाज़ गौण सब

दिमाग़ की हार हुई

रिश्ते पीछे छूट से गये

एक चेहरा ख़ास हुआ

यार के दीदार से जैसे

जीवन मधुमास हुआ

आँख सागर जिसका

होंठ भी मधुशाला था

तन-मन समर्पण किया

जो एक दिलवाला था

भावनाओं में ऐसे बही

जैसे तन कोई सेज हुआ

लूट गया दिल का खज़ाना

मन को भी न परहेज़ हुआ

पलने लगा फिर गर्भ में

प्यार का अनमोल बीज

होश आते समाज दिखी

हुआ मन भ्रूण से खीज

नौ से दो माह से पहले

बच्चे का तो काल आया

अविवाहिता माँ ने जाकर

ख़ुद ही गर्भपात करवाया

रो रही है क़लम “सागर”

कर रहा अश्क़ सन्ताप

जब सारा कुछ प्यार था तो

अजन्मा हुआ कैसे पाप…?

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