B 0208 – Ramesh Raj


Kavita :

।। अब पढ़ना है ।।
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सैर-सपाटे करते-करते
जी अब ऊब  चला
अब पढ़ना है आओ
पापा लौट चलें बंगला।

पिकनिक खूब मनायी हमने
जी अपना हर्षाया
देखे चीते भालू घोड़े
चिड़ियाघर मन भाया
तोते का मीठा स्वर लगता कितना भला-भला।
अब पढ़ना है आओ पापा लौट चलें बँगला ।|

पूड़ी और पराठे घी के
बड़े चाव से खाये
यहाँ झील, झरने पोखर
अति अपने मन को भाये
खूब बजाया चिड़ियाघर में बन्दर ने तसला।
अब पढ़ना है आओ पापा लौट चलें बँगला।|
-रमेशराज


Kavita :

।। सही धर्म का मतलब जानो ।।
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धर्म एक कविता होता है
फूलों-भरी कथा होता है

बच्चो तुमको इसे बचाना
केवल सच्चा धर्म निभाना।

यदि कविता की हत्या होगी
किसी ऋचा की हत्या होगी

बच्चो ऐसा काम न करना
कविता में मधु जीवन भरना।

सही धर्म का मतलब जानो
जनसेवा को सबकुछ मानो

यदि मानव-उपकार करोगे
जग में नूतन रंग भरोगे।

यदि तुमने यह मर्म न जाना
गीता के उपदेश जलेंगे

कुरआनों की हर आयत में
ढेरों आँसू मित्र मिलेंगे

इसीलिए बच्चो तुम जागो
घृणा-भरे चिन्तन से भागो

नफरत में मानव रोता है
धर्म एक कविता होता है।


Bal Kavita :

।। सही धर्म का मतलब जानो ।।
———————————–
धर्म एक कविता होता है
फूलों-भरी कथा होता है

बच्चो तुमको इसे बचाना
केवल सच्चा धर्म निभाना।

यदि कविता की हत्या होगी
किसी ऋचा की हत्या होगी

बच्चो ऐसा काम न करना
कविता में मधु जीवन भरना।

सही धर्म का मतलब जानो
जनसेवा को सबकुछ मानो

यदि मानव-उपकार करोगे
जग में नूतन रंग भरोगे।

यदि तुमने यह मर्म न जाना
गीता के उपदेश जलेंगे

कुरआनों की हर आयत में
ढेरों आँसू मित्र मिलेंगे

इसीलिए बच्चो तुम जागो
घृणा-भरे चिन्तन से भागो

नफरत में मानव रोता है
धर्म एक कविता होता है।


lekh :

नवरात्र में नारी शक्ति की पूजा 

क्वार सुदी प्रतिपदा से नवमी तक पवित्र मन के साथ अत्यंत संयम से नवरात्र में रखे जाने वाले व्रत में माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। प्रतिपदा के दिन प्रातः ही स्नानादि के उपरांत ‘दुर्गासप्तशती’ का पाठ नियमित रूप से हर दिन किया जाता है। वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर 9 दिन तक ‘रामचरित मानस’ का पाठ करते है। नवरात्र के दिनों में अनेक स्थानों पर रामलीला और श्रीकृष्णलीला का भी भव्य आयोजन होता है। माँ दुर्गा के मन्दिरों की भव्य सजावट की जाती है। इन मन्दिरों और लीला स्थलों पर भक्तजनों की भारी भीड़ रहती है।

क्वार सुदी अष्टमी को दुर्गाष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है। इन दिन मंदिरों में भगवती दुर्गा को उबले हुए चने, हलुवा, पूड़ी, खीर आदि से भोग लगाकर प्रसाद का वितरण किया जाता है। इस  दिन महाशक्ति को प्रसन्न करने के लिये हवन आदि भी किया जाता है। जहाँ इस शक्ति की अधिक मान्यता है वहाँ यह त्यौहार एक उत्सव का रूप धारण कर लेता है। इस दिन कन्या लाँगुराओं को भोजन कराया जाता है। शक्ति की ज्योति की जय-जयकार की जाती है।

माँ दुर्गा नारी की महाशक्ति की प्रतीक हैं। देवताओं पर जब-जब भी भीषण संकट आया, उनके सिंहासन डाँवाडोल हुए, आसुरी शक्तियों के सामने वे थर-थर काँपे, तब-तब माँ दुर्गा का एक नया शक्ति-रूप प्रकट हुआ। इस नारी-शक्ति रूप ने देवी महाकाली बनकर कैटभ और मधु नामक उन दो दैत्यों का संहार किया जो ब्रह्माजी की हत्या करना चाहते थे। इन दैत्यों ने भगवान विष्णु से 5000 साल युद्ध किया। अत्यंत कुशल रणनीति से माँ महाकाली ने इन दोनों दैत्यों का वध कर स्वर्गलोक में शान्ति स्थापित की। माँ दुर्गा ने देवी महालक्ष्मी का रूप उस समय धारण किया, जब महिषासुर नामक दैत्य समस्त पृथ्वीलोक के राजाओं को हराकर स्वर्गलोक पहुँच गया और उसके समक्ष युद्ध के दौरान देवता हारकर भागने लगे। यह देख माँ दुर्गा ने महालक्ष्मी का रूप धारण किया और महिषासुर को युद्ध में मौत के घाट उतारा। देवी महा सरस्वती का नारी शक्तिरूप तब सामने आया जब शुम्भ-निशुम्भ नामक अत्यंत बलशाली दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण किया और देवता स्वर्ग से भागकर विष्णु की स्तुति करने लगे। उस समय भगवान विष्णु के शरीर से एक ज्योति उत्पन्न हुई। इस ज्योति ने नारीरूप धारण कर शुम्भ-निशुम्भ, धूम्राक्ष, रक्तबीज, चण्डमुण्ड नामक सभी दैत्यों को मारकर देवताओं को पुनः स्वर्ग में स्थापित किया। देवी योगमाया के रूप में माँ दुर्गा उस समय प्रकट हुईं जब कंस नामक राक्षस पृथ्वी लोक में अत्याचार कर रहा था। देवी योग माया ने योग विद्या और महाविद्या बनकर श्रीकृष्ण का सहयोग करते हुए कंस के साथ-साथ चाणूर जैसी अनेक आसुरी शक्तियों को मौत के घाट उतारा। माँ दुर्गा ने पाँचवा नारीशक्ति रूप तब धारण किया जब वैप्रचिति नामक असुर के कुकर्मों से पूरी पृथ्वी व्याकुल थी। उस समय देवी रक्त दंतिका ने अवतार लिया और अपने दाँत गाड़कर वैप्रचिति और अन्य असुरों का रक्तपान कर उन्हें निर्जीव बना डाला। ठीक इसी प्रकार माँ दुर्गा ने शाकुम्भरी, देवी श्री दुर्गा, देवी भ्रामरी, देवी चण्डिका के रूप में नारी शक्ति का प्रयोग करते हुए सूखा के समय जल की वर्षा, दुर्गम नामक राक्षस का वध, सतीत्व को नष्ट करने वाले कामातुर राक्षस अरुण का वध, किया।

वर्तमान युग में भी माँ दुर्गा की नारी शक्ति चेतना के रूप समय-समय पर प्रकट होते रहे हैं। भारतीय नारियाँ अपने शौर्य, पराक्रम, वीरता और सतीत्व रक्षा के लिए पूरे संसार में प्रसिद्धि के शिखर पर रही हैं। एक नहीं अनेक नारियों ने सतीत्वरक्षा हेतु अग्नि शिखाओं का आलिंगन किया है। देश और जाति अथवा नारी सम्मान के लिये प्राणों को उत्सर्ग किया है। वीरागंना वीरमती, रानी दुर्गावती, महारानी कर्मवती, रानी कर्मवती, राजमाता जीजाब़ाई, येसुबाई, राजकुमारी रत्ना ने जहाँ क्रूर, अत्याचारी मुगलशासकों की तलवारों को धूल चटा दी, वहीं रानी लक्ष्मीबाई, वेलु नाचियार, भीमाबाई, रानी चेन्नम्मा, बेगम हजरत महल, पार्वती देवी, प्रीतिलता ने अंग्रेजी साम्राज्य को ध्वस्त करने के लिये तीर तलवार धारण कर यह सिद्ध कर दिया कि वे भी साक्षात दुर्गा हैं।

खनन माफियाओं पर नकेल कसने वाली दुर्गानागपाल, तालिबानियों को टक्कर देती मलाला युसुफ जई, मेरठ की रजिया सुल्तान और बलत्कृत दामिनी के पक्ष में जंतर-जंतर पर लाठियों के वार झेलती नारी शक्ति इसका ज्वलंत प्रमाण हैं कि समाज पर जब भी संकट के बादल छाये हैं, तब-तब नारीशक्ति का एक ज्योतिरूप अँधेरे को चीरता हुआ प्रकट हुआ है।

 


lekh :

रोटियों से भी लड़ी गयी आज़ादी की जंग

+रमेशराज

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   कुछ कांग्रेस के पिट्टू इतिहासकार आज भी जोर-शोर से यह प्रचार करते हैं कि बिना खड्ग और बिना तलवार के स्वतंत्रता संग्राम में कूदने वाले कथित अहिंसा के पुजारियों के आत्मसंयम, आत्मबल और स्वपीड़ासे भयभीत होकर आताताई और बर्बर अंग्रेज भारत को आजाद करने को मजबूर हुए। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असली तस्वीर नहीं है। अगर आजादी सावरमती के संत के ब्रहमचर्य के प्रयोगोंके बूते आयी तो कांग्रेस उस काल के 1942 के जन आंदोलन को भारतीय जनमानस के सम्मुख क्यों नहीं लाती, जिसमें भले ही गांधी जी ने अहिंसात्मक आंदोलन किये जाने पर जोर दिया था, किंतु सरकारी दमन से विक्षिप्त और क्रुद्ध होकर कथित अहिंसा को नकारते हुए जनता ने अंग्रेजों के सरकारी 250 रेलवे स्टेशनों को नष्ट कर दिया। 600 डाकघरों को आग के हवाले किया। 3500 टेलीफोन और टेलीग्राम के तारों को काट दिया। 70 थानों को जलाकर राख किया। 85 सकारी भवनों को धूल-धूसरित कर डाला। 9 अगस्त 1942 से लेकर 31 दिसम्बर 1942 तक बौखलायी सरकार ने 940 स्वतंत्रता सेनानियों को गोलियों से भूनकर सदा के लिये संसार से विदा कर दिया। पुलिस और सेना की गोलियों की बौछार के बीच 1630 क्रान्तिवीर घायल हुए। 18000 सेनानियों को रक्षा कानून के अंतर्गत तो 60229 सेनानियों को हिंसा फैलाने और रक्तपात करने के आरोप में सलाखों के पीछे भेजा गया।

   भारत छोड़ो आन्दोलन का यह क्रान्तिकारी स्वरूप गांधी जी की अहिंसा और उनकी स्व पीड़नकी नीति पर एक तमाचा था। इस तमाचे और अहिंसावादियों के तमाशे के बीच सिर उठाती कटु सच्चाई केवल यही बयान करती है कि भारतवर्ष गांधी जी की अहिंसा से नहीं, क्रान्ति की फैलती ज्वाला के कारण आजाद हुआ। इस तथ्य को चर्चिलइग्लैंड की लोकसभा में इस प्रकार रखते हैं-‘‘कांग्रेस ने अब अहिंसा की उस नीति को, जिसे गांधी जी एक सिद्धांत के रूप में अपनाने पर जोर देते आ रहे थे, त्याग दिया है और क्रान्तिकारी आन्दोलन का रास्ता अपना लिया है।’’

   भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर यदि समग्र दृष्टि से सोचा-विचारा जाये तो यह तथ्य छुपा नहीं रह जाता है कि जो क्रान्ति की ज्वाला 1857 में भड़़की थी, उसे भड़काने में उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का महत्वपूर्ण योगदान है जो 1780 से ही सक्रिय थे। तत्समय एक विदेशी नागरिक ने कलकत्ता से देश का पहला अखबार बंगाल गजट’ और ‘जनरल एडवाइजरजिसे हीकीज गजटके नाम से भी पुकारा जाता है, में तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हैस्टिंग्ज और कम्पनी के अधिाकरियों की अनीति और मनमानी पर प्रहार किये थे। 1785 में बंगाल जर्नल’, ‘द वर्ल्ड ’, ‘टेली ग्राफ’, ‘कलकत्ता गजटनामक समाचार पत्रों में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अफसरों की घूसखोरी, अन्य काले कारनामों के खिलाफ जमकर लिखा गया। 9 अप्रैल 1807 को आम सभाओं पर प्रतिबंध लगने के बाद क्रान्तिवीरों ने पर्चे छापकर बाँटे और क्रान्ति की आग धधकायी। भारतीय पत्रकारिता के पहले शहीद मौलवी मोहम्मद वकार ने फिरंगियों और उनकी सरकार के खिलाफ  जमकर कलम चलायी।

   स्वतंत्रता संग्राम के कलम के सिपाहियों में एक तरफ  जहाँ लोकमान्य तिलक, विवेकानंद, भगत सिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद, बालकृष्ट भट्ट, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बालमुकुन्द गुप्त, राजा रामपाल सिंह, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, यशपाल, मन्मथनाथ गुप्त, सावरकर, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जैसे अनेक पुरोधा हैं, वहीं तीर-तलवार लेकर अंग्रेजों का रक्त-सत्कार करने वालों में रानी लक्ष्मीबाई, मदनलाल धींगरा, खुदीराम बोस, तात्या तोपे, मंगल पांडेय, सूर्यसेन, दामोदर चाफेकर, बेगम हजरत महल आदि का नाम जगत विख्यात है। लाला लाजपतराय, विपिनचन्द्र पाल, स्वामी श्रद्धानंद, सुभाषचन्द्र बोस चन्द्रशेखरआजाद , भगत सिंह, सूर्यसेन, अशफाक़उल्ला, रामप्रसाद बिस्मिल   आदि का जनभावनाओं को उभारकर अंगेजों के प्रति जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन करना भी एक ऐसा क्रान्तिकारी हथियार रहा है, जिसके आगे अंगेज थर-थर कांप उठे।

   क्रान्ति की भूमिका तैयार करने में कवियों-शायरों ने कविता को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का भी काम किया। स्वतंत्रता संग्राम का पैगाम जन-जन तक पहुँचाने में महीदुद्दीन सलीम, शौक किदवई, फैज, मजाज, कैफी आजमी, साहिर लुधिायानवी, बहादुरशाह जफर, तिलक चंद, गोपीनाथ, झम्मन, आनंद नारायण मुल्ला, जोश मलीहाबादी, सोहनलाल द्विवेदी, राम प्रसाद बिस्मिल, आदि का योगदान भी अविस्मरणीय है।

   क्रान्ति की आग को घर-घर तक फैलाने या पहुँचाने के लिये रोटियोंका प्रयोग भले ही आश्चर्यजनक लगे किन्तु यह भी एक ऐसी सच्चाई है जिसका वर्णन इतिहास के पन्नों में दर्ज है। 1857 में एक तरफ जहाँ क्रान्तिकारियों की तलवारें चमकीं, बन्दूकें और तोपें गरजीं वहीं क्रान्ति की ज्वाला धधकाने के लिये और लोगों को अंग्रेजों के विरूद्ध संगठित करने के लिए गावं-गांव में चपातियाँभेजी गयीं। चपातियाँ म.प्र. के इन्दौर से निमाड़ में बाँटी गयीं। उत्तर भारत के अनेक जिलों जैसे मथुरा, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, बुलंदशहर, मेरठ आदि में ये चपातियाँ 1857 के जनवरी-फरवरी माह में बाँटी गयी। रोटियाँ बँटवाने का यह कार्य मद्रास में भी हुआ जिसके फलस्वरूप वैल्लौर में विप्लव हुआ। ये चपातियाँ कौन बनाता है और कहाँ से भेजी जाती हैं, इसका का पता अंगे्रजों के जासूस नहीं लगा पाये। चपातियों के माधयम से क्रान्ति का संदेश भेजने का ब्यौरा अंग्रेज अफसर थार्नाईल की डायरी के पृष्ट 23 पर दर्ज है।


Bal Kavita :

|| हम बच्चे हममें पावनता ||

मुस्काते रहते हम हरदम
कुछ गाते रहते हम हरदम
भावों में अपने कोमलता
खिले कमल-सा मन अपना है ।

मीठी-मीठी बातें प्यारी
मन मोहें मुस्कानें प्यारी
हम बच्चे हममें पावनता
गंगाजल-सा मन अपना है ।

जो फुर-फुर उड़ता रहता है
बल खाता, मुड़ता रहता है’
जिसमें है खग-सी चंचलता
उस बादल-सा मन अपना है ।

सब का चित्त मोह लेते हैं
स्पर्शों का सुख देते हैं
भरी हुई हम में उज्जवलता
मखमल जैसा मन अपना है ।


Bal Kavita :

|| अब कर तू विज्ञान की बातें ||
——————————————
परी लोक की कथा सुना मत
ओरी प्यारी-प्यारी  नानी,
झूठे सभी भूत के किस्से
झूठी है हर प्रेत-कहानी।|

इस धरती की चर्चा कर तू
बतला नये ज्ञान की बातें
कैसे ये दिन निकला करता
कैसे फिर आ जातीं रातें?
क्यों होता यह वर्षा-ऋतु में
सूखा कहीं-कही पै पानी।|
कैसे काम करे कम्प्यूटर
कैसे चित्र दिखे टीवी पर
कैसे रीडिंग देता मीटर
अब कर तू विज्ञान की बातें
छोड़ पुराने राजा-रानी
ओरी प्यारी-प्यारी  नानी,


Bal Kavita :

|| हम बच्चे ||
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हम बच्चे हर दम मुस्काते
नफरत के हम गीत न गाते।

मक्कारी से बहुत दूर हैं
हम बच्चों के रिश्ते-नाते।

दिन-भर सिर्फ प्यार की नावें
मन की सरिता में तैराते।

दिखता जहाँ कहीं अँधियारा
दीप सरीखे हम जल जाते।

बड़े प्रदूषण लाते होंगे
हम बच्चे वादी महँकाते।

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