0209 – Pratap Singh Negi

Kavita :

“ अलविदा ”

चला गया वो

कल , अपनी निशानी

छोड़ कर I

ता – उम्र

भूला ना सकूँ

एक ऐसी  कहानी

छोड़ कर I

तडपता रह गया

ये दिल

मेरा प्यासा I

हो गया , वो रुखसत ,

पलकों में पानी

छोड़ कर I

निगाहें , ताकती रह गयी

मेरी उसको I

वो जुदा हो गया

कहा कर , अलविदा

मुझको I


Kavita :

“ अपने पराये ”

कहाँ गए  वो  रिश्ते  प्यारे ,

कहाँ गयी बचपन  की  प्रीत ,

माँ के हाथ की  प्यारी  रोटी ,

एक थाली  में बैठ कर खायी I

 

पढ़ने की  जब  बारी  आई ,

एक दूजे की  नक़ल  उतारी I

शैतानी  तो  जम कर  करते ,

पिटाई भी  साथ  में   खाते I

 

अब हम जब बड़े हो  गए ,

रिश्ते – नाते कहाँ खो गये ,

थाली तो अब भी  वही  है ,

खाने वाले  साथ  नहीं  हैं I

 

दुनियाँ की आप – धापी में ,

मिलने का भी वक़्त नहीं है ,

रंग बदलती इस दुनियाँ  में ,

अपनों का कहीं रंग नहीं है I

 

आज पराये अपने बन  कर ,

हर कदम पर साथ हैं चलते ,

जो जन्मे हैं एक  कोख  से ,

देख  दूर  से  राह  बदलते I

 

ये क्यों होता है  कोई  बताये ,

रिश्तों  की  पहली   समझाये ,

बचपन में  जो  साथ  बिताया ,

कोई उस वक़्त को वापस लाये I


Kavita :

‘ अन्तर – द्वन्द ‘

बदलता जीवन ,

है चेतना का ये

‘ अन्तर – द्वन्द ‘ I

निराशा , वेदना , सूना – पन ,

कहाँ जा डूबता ,

ये पागल मन I

ये दुनियां दारी ,

वो मस्त जीवन ,

ये जिम्मेदारी ,

वो अल्हड़पन I

डगमगा उठते बड़ते कदम ,

व्याकुल हो जाता

मेरा मन I

आती ग्रीष्म – बिताता बसंत ,

डूबती शाम का

स्वर संगम I

क्यों बदल रहा है

ये जीवन क्रम ?

चेतना का ये ‘ अन्तर – द्वन्द ‘ I

कहाँ जा डूबता ,

ये पागल मन I


Kavita :

“ अनजाने रिश्ते ”

ये कुछ ,

अनजाने रिश्ते ,

जाने कैसे

बांध जाते हैं ,

एक अद्श्य किन्तु

अटूट डोर में

प्यार से I

हर पल

प्रदान करता है ,

एक बल

कठोरता का इसमें I

गुजरते

वक़्त दे साथ ,

और भी

गहरे

होते चले जाते हैं

ये कुछ

अनजाने रिश्ते I


Kvita :

    अनजान के प्रति

 

तन तो माटी का पुतला है है ,

मन के दीप जला सकती हो I

 

मेरी   प्रेरणा   के तारों  को ,

वीणा के स्वर सा  अवलम्बन ,

प्रेरणा बन मंजिल  तक  मेरा ,

जीवन सफल बना सकती  हो I

 

तन तो बस एक प्रेम पाश  है ,

मन का प्यार दिला सकती हो I

 

साथ  मेरे   अकेलापन   है ,

गंभीर और  उदास  मन  है ,

ढूँढ रहा किसी साथी मन को ,

जीवन राह दिला  सकती हो I

 

तन पर युग मिटता आया है ,

मन से युग मिटा सकती हो I

 

चाहता हूँ एक आत्मां बंधन ,

प्रेम का एक अनोखा रूप ,

आँखों की दृष्टि बन मेरा ,

युग दर्शन करा सकती हो I

 

तन तो एक दिन मिट जायेगा ,

मन – आत्मा मिला सकती हो I

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