0211 – Annang Pal Singh Bhadoriya ‘ Annang’

 

Muktak:

अच्छा लेने के लिये , खूब  बटोरो  ज्ञान  !

देने को शुभ दान है,त्याग हेतु अभिमान !!

त्याग हेतु अभिमान, और पीने को गम है !

निगलो निज अपमान,क्रोध इतना क्या कम है !!

कह”अनंग “करजोरि,लोभ ममता का वच्छा !

तृप्ति और संतोष ,भरो उर  यह  ही  अच्छा !!

**

अपने स्तर का जगत , रचता है जन आप  !

भाग्य और दुर्भाग्य का ,कायर करें प्रलाप !!

कायर करैं प्रलाप , भाग्य कर्मों का सहचर !

जैसे करते कर्म , बने  जन  वैसे  रुचिकर  !!

कह”अनंग”करजोरि,भाग्य के देख न सपने !

सोच समझकर कर्म,लेख जन लिखता अपने !!

**

परहित जीते जो जगत , वह हैं जीवन  मुक्त  !

नित हित वह करते नहीं,सुवधा शक्ति प्रयुक्त !!

सुविधा शक्ति प्रयुक्त ,कभी निज हित ना करते !

पाप  कर्म  से  दूर  ,  सदा   रहते  उर  डरते !!

कह”अनंग “करजोरि,और के लिये जियें  नित !

बनते जीवन मुक्त , वही  जो  करते  परहित  !!


Muktak:

प्रकृति बदलकर शुद्धता , के पथ पर दे मोड़  !

सर्वश्रेष्ठ  वह  धर्म  है ,  सब  धर्मों  को  छोड़ !!

सब धर्मों को  छोड़ , धर्म  वह  पकड़ो  भाई  !

सत्य  , आत्मा  दोउ , हृदय पुर  देय  मिलाई !!

कह”अनंग “करजोरि ,धर्म ना सीधी सी कृति  !

जितने मानव रूप , सभी हैं  धर्म की  प्रकृति !!

**

मेरा दृढ़  विश्वास है , धर्म  जरूरी  चीज  !

सही धर्म वह ही जहाँ,मानवता का बीज !!

मानवता का बीज , धर्म की बड़ी कमाई  !

सम्प्रदाय हैं अलग ,धर्म  एकहि  है  भाई !!

कह”अनंग “करजोरि,जहाँ मानवता डेरा  !

वह ही मानव धर्म ,  मानना  यह है  मेरा !!

 


Muktak:

परहित में रत जो रहे , बिना दम्भ अभिमान  !

उनका निश्चित रूप ही , सब प्रकार कल्यान !!

सब प्रकार कल़्यान , खुदहिं मत कर्ता मानो  !

होते  सबके  काम ,  करे  जो  वह  पहचानो !!

कह”अनंग”करजोरि,ध्यान रखिये उसका नित !

अवसर जिसने तुम्हें , दिया करने का  परहित !!

**

परमेश्वर अनुकूलता , करती हमें उदार. !

इससे अपना ही भला,करते हम संसार !!

करते हम संसार,और का क्या बिगड़ेगा !

अपना ही आनंद ,स्रोत मन से उजड़ेगा !!

कह”अनंग”करजोरि,कराये परहित ईश्वर !

पर  सेवा  संयोग ,  हमें  देता  परमेश्वर  !!

 


Muktak :

मानव के कल्याण हित , करते रहिये कर्म  !

सदविचार, सदभाव के , संग्रह हैं सब धर्म !!

संग्रह हैं  सब धर्म , अगर  है  अंतर  कोई  !

समय और स्थानों,  का  दिखता  है  सोई !!

कह”अनंग”करजोरि,परखिये अपनेअनुभव !

धर्म न जाने  धर्म  ,नाम पर  लड़ते  मानव !!

**

जानो सारे धर्म हैं , चरण कमल भगवान  !

धर्म रहस्य यही बड़ा  ,बस इतना ही जान !!

बस इतना ही जान, पुराण,कुरान न पढ़िये !

परमेश्वर ही लक्ष्य,सभीका उस पथ बढ़िये !!

कह”अनंग”करजोरि,धर्म क्षति ढ़ोगहिं मानो !

जिससे परहित होय , धर्म उसको ही जानो !!

**

रक्षित पूँजी  तुम्हारी  , समझो  जग में  दान  !

वैज्ञानिक विधि यह बड़ी,जान सके तो जान !!

जान सके तो जान ,जमा हो जाता यह  धन  !

वक्त जरूरत काम , यही  आता  अपनापन !!

कह”अनंग “करजोरि, धर्म इसमें परिलक्षित  !

दान  सुपात्रहिं  देउ  ,  रहेगी   पूँजी   रक्षित !!


Kavita :

स्वतंतृता दिवस

स्वतंतृता दिन के अवसर पर करदो उज्ज्वल आँगन !
जागृत करदो पृाण बसादो पृाणों में अपनापन !!

हृदय कोष निर्भयता भरदो ग्यान, बसादो मन में !
सदा न्याय पर शीष झुके माधुर्य रहे जीवन में !!
और घरों की दीवारों में ना सिमटे अपनापन !
स्वतंतृता दिन…………………………………!!

सत्य सृोत से बने शब्द ही मुखरित हों रसना पर !
मनमंदिर की दिव्य पूर्णता से महके अपना घर !!
करो अनर्थक उद्यम का भी सुन्दरतम आलिंगन !
स्वतंतृता दिन…………………………….!!

मिले ग्यान विग्यान धरा पर नित नूतन रूपों में !
रूढि़वाद का मिटे मरुस्थल ग्यान सलिल कूपों में !!

नित नूतन विस्तीर्ण कर्म में रत हो रहे सदा मन !
स्वतंतृता दिन………………………………


Muktak:

जितना जो कुछ प्रगट है , वही नहीं विज्ञान !
इसका अप्रकट रूप भी, जबरदस्त है जान !!
जबरदस्त है जान , उसे मत भूलो प्रियवर !
न्यायाचरण स्वरूप ,धर्म का पालो हितकर !!
कह”अनंग “करजोरि,सत्य बिन दिखता हित ना !
मिले शांति उतनी , अन्तर में सत् है जितना !!
**
जितने उत्तम कर्म हैं , वह सब समझो धर्म !
धर्म श्रेष्ठ है इसीसे , यही धर्म का मर्म !!
यही धर्म का मर्म , धार्मिक जन यश पाता !
अतः धर्म ही श्रेष्ठ,सकल जग में कहलाता !!
कह”अनंग “करजोरि,धर्म के धन हैं कितने !
यश ,वैभव वा शांति,सरसता सुख हैं जितने !!
**
बाहर समझो धर्म के , घृणा और विद्वेष !
इनको मत पालो हृदय ,करते सदा कलेश !!
करते सदा कलेश , नष्ट होते गुण सारे !
मिल सकते अनुदान , दया वा प्रेम सहारे !!
कह”अनंग “करजोरि,ज्ञान फैलाओ घर घर !
काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह सब करदो बाहर !!
**
मिलजुल मंथन कीजिये,हृदय सिंधु गुण खान !
आध्यात्म है देवता , और दैत्य विज्ञान !!
और दैत्य विज्ञान , हृदय सागर मथ डालो !
जितने चाहो श्रेष्ठ , रत्न इसमें से पालो !!
कह”अनंग”करजोरि,सरलतम विधि यह विल्कुल!
आध्यात्म – विज्ञान , श्रेष्ठता पाता मिलजुल !!
**
बिना एक के दूसरे , का महत्व कछु नाहिं !
आध्यात्म विज्ञान का ,श्रेष्ठ युग्म जगमाहिं !!
श्रेष्ठ युग्म जगमाहिं , बनेगा भोजन तबही !
आग खाद्य सामग्री , साधन होंगे जबही !!
कह”अनंग “करजोरि,दोउ साथी विवेक के !
हो जाता है पंगु , दूसरा बिना एक. के !!
**
विकसाओ संवेदना , और आस्था दोय !
भावों में इनको भरो , आत्मप्रगति तब होय !!
आत्मप्रगति तब होय , जगें आदर्श हमारे !
हो प्रगाढ़ परिपक्व , आस्था भाव सहारे !!
कह”अनंग “करजोरि, तत्व दर्शन यूँ पाओ !
ज्ञान पक्ष है यही , इसे अंदर विकसाओ !!
**
साहस,क्षमता,प्रखरता,सघन आत्मविश्वास !
संकल्पों की देन है , हमें बनाये खास !!
हमें बनाये खास , यही सर्वोपरि सम्पति !
आत्मज्ञान वाआत्मतेज विकसाये नितप्रति !!
कह”अनंग”करजोरि,हृदय संकल्प जगे बस !
मिले आत्मविश्वाश , प्रखरता,क्षमता,साहस !!
**
: आस्था संकट हरदिशा , में अँगड़ाई लेय !
आध्यात्म-विज्ञान का,विग्रह नित दुख देय !!
विग्रह नित दुख देय,व्यक्ति बन रहा विलासी !
आदर्शों का मूल्य, गिरा चहुँओर उदासी !!
कह”अनंग “करजोरि,दिखे धर्मों की खटपट !
अपराधी , अनुदार , स्वार्थी आस्था संकट !!
**
शाश्वत सत्ता जगत में , आध्यात्म की जान. !
पर अब उसके साथ ही , प्रौढ़ हुआ विज्ञान !!
प्रौढ़ हुआ विज्ञान , सतत् सहयोग लीजिये !
देव -दैत्य मिल मथा,सिंधु वह युक्ति कीजिये !!
कह”अनंग “करजोरि,यही है उन्नति का मत !
आध्यात्म-विज्ञान , दोउ बल समझो शाश्वत !!


Muktak :

झूठा है  विज्ञान  भी , बिना  धर्म  संसार  !

अंधा समझो धर्म को,बिन विज्ञान प्रसार !!

बिन विज्ञान प्रसार, धर्म भी दिशाहीन  है  !

बुद्धिवाद ही धर्म , व्याख्या  में  प्रवीन  है !!

कह”अनंग “करजोरि,धर्म विज्ञान अनूठा  !

बिना ज्ञान -विज्ञान ,धर्म भी समझो झूठा !!

**

सरपट दौड़ लगा रहे , बुद्धि और विज्ञान. !

शांति प्रगति अवरोध ही , इनकी हलचल जान !!

इनकी हलचल जान, सृजन विज्ञान कर रहा  !

साधन तो हैं बहुत , किन्तु उपयोग  डर  रहा !!

कह”अनंग “करजोरि, साधनों की नित खट-पट !

विपति और दुर्गति सी,  लगती  है गति  सरपट !!


MUKTAK:

पहचानो खुद को तथा , फिर लो लक्ष्य दृढ़ाय  !

बुद्धि पूर्वक कर्म निज , करिये सब मिल जाय !!

करिये सब मिल जाय , चीज जो तुम्हें जरूरी  !

कल्पवृक्ष , पारस ,  अम्मृत  तुम , इच्छा  पूरी !!

कह”अनंग “करजोरि,सफलता तुम  हो जानो  !

साक्षात्  तुम  मूर्ति ,  सफलता  की  पहचानो !!

**

महानता पहचानिये ,  पिता तुम्हार महान  !

नीच,पतित,आधीन मत,तू अपने को मान !!

तू अपने को मान, श्रेष्ठतम  सबसे  जग में  !

पराधीन मत समझ,चलो तनकर हर मग में !!

कह”अनंग “करजोरि,दूर कर निज अज्ञानता !

अवुभव और विचार , करो अपनी महानता !!


Muktak:

भटको मत भ्रमजाल में अपना रूप विसार  !

सत् चित् वा आनंदमय , सच्चा रूप तुम्हार !!

सच्चा  रूप  तुम्हार ,  उसे  जानो  पहचानो  !

जो है वह, वह ही तुम हो , दृढ़ता  से  मानो !!

कह”अनंग”करजोरि,लोक आकर्षण झटको !

खुद को खुद में ही ढूँढ़ो , मत बाहर  भटको !!

**

शक्ति-सम्पदा , सुघड़ता , के अजस्र भण्डार  !

अपने  अन्दर  भरे  हैं ,  बाहर  लेउ  निकार  !!

बाहर लेउ निकार , रहे  ना  दुख  जीवन  में  !

कुरूपता वा दरिद्रता  , मिट  जााये  क्षन  में !!

कह”अनंग “करजोरि, मिटाये सकल आपदा !

अंतर में  खोजो  विभूतियाँ  शक्ति – सम्पदा !!

**

मत दौड़ो उनकी तरफ , जिनके सुन्दर रूप  !

आप निहारो प्यार से , रुग्ण , दरिद्र , कुरूप !!

रुग्ण ,दरिद्र ,कुरूप , अभावों  का  कारण है !

चमक  नहीं  आँखों में  आशा  साधारण  है !!

कह”अनंग “करजोरि,उन्हें मत करिये आहत !

जिनके सुन्दर रूप ,तरफ उनके  भागो  मत !!

**

उतरो मेरे ध्यान में , करके कृपा महान  !

ले चलिये सदराह पर,हो जाये कल्यान !!

हो जाये कल्यान,वास्तविक ध्येय तुम्ही हो !

तुम्हीं ज्ञान ,ज्ञाता  वा सच्चे ज्ञेय तुम्हीं  हो !!

कह”अनंग”करजोरि,ध्यान से कभी न निकरो !

करके कृपा महान , ध्यान सागर  मम  उतरो !!

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आध्यात्मिक व्यक्ति वह , जिसके उर ईमान  !

श्रद्धा ,दया , उदारता ,  प्रेम , सत्य का  ज्ञान !!

प्रेम ,सत्य का ज्ञान ,  और उत्साह  भाव  हो  !

करुणा ,ममता ,अपनेपन से युत स्वभाव  हो !!

कह”अनंग “करजोरि, यही शक्तियाँ आत्मिक !

जिसमें  ये  भरपूर ,  वही जन   आध्यात्मिक !!

 


Muktak:

प्रगति  और  कर्तव्य से ,  मुँह  लेते  जो  मोड़  !
समझो वह आध्यात्म से,सकें न खुद को जोड़ !!
सकें न खुद को जोड़ , नहीं निष्क्रियता इसमें  !
बैठ जाउ चनपचाप ,  शांति का अर्थ न उसमें !!
कह”अनंग “करजोरि ,  चराचर सबमें है  गति  !
यही तत्व दर्शन ,  गति से ही  होय नित प्रगति !!
**

प्रगति  और  कर्तव्य से ,  मुँह  लेते  जो  मोड़  !
समझो वह आध्यात्म से,सकें न खुद को जोड़ !!
सकें न खुद को जोड़ , नहीं निष्क्रियता इसमें  !
बैठ जाउ चनपचाप ,  शांति का अर्थ न उसमें !!
कह”अनंग “करजोरि ,  चराचर सबमें है  गति  !
यही तत्व दर्शन ,  गति से ही  होय नित प्रगति !!
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लौकिक, परलौकिक सभी  , सुख श्रम के आधीन !
मनोयोग , कर्तव्य , श्रम  ,  करो   नियोजित  तीन !!
करो   नियोजित   तीन  ,  विचारों  में  शुभता  हो  !
अशुभ न हो  आचार , बोल  मत  जो  चुभता  हो !!
कह”अनंग “करजोरि , सजाओ सुख परलौकिक  !
आध्यात्मिकता  में  ही ,  सब  कुछ  है  लौकिक !!

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शुचिता, संयमशीलता , वा महानता  तीन  !
मानव गरिमा बनाते,  महिमा इनकी  चीन !!
महिमा इनकी चीन्ह,जाँचिये अनुभव कौशल !
पद,धन,साधन,स्वास्थ्य और शिक्छण सबके बल !!
कह”अनंग “करजोरि, सुधारो निज चरित्रता  !
बनता वही महान , भरी मन जिसके शुचिता !!


Muktak:

सम्पति वह सब कुछ नहीं , जो पदार्थ के रूप  !
गहराई  में  जो  छुपा  , वह  भी  श्रेष्ठ  स्वरूप !!
वह भी श्रेष्ठ स्वरूप ,  देख  जड़   की  गहराई  !
इससे   हरा  भरा  रहता  है  ,   वृक्छ   सुहाई  !!
कह”अनंग “करजोरि , सत्य है  गोपनीय. अति  !
बाहर जो कुछ दिखे सभी कुछ जड़ की सम्पति!!

**

आध्यात्मिक व्यक्ति वह , जिसके उर में प्यार. !
करुणा , दया , उदारता , हो जिसके व्यवहार !!
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हो जिसके व्यवहार , उमंगों भरी सत्यता  !
हो  ईमानदारिता  ,  श्रद्धा -भक्ति,मित्रता !!
कह”अनंग”करजोरि,यही आनंद आत्मिक !
जिसमें यह सदगुण हों वह ही आध्यात्मिक!!
अनंग पाल सिंह भदौरिया ग्वालियर
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आध्यात्मिक व्यक्ति वह , जिसके उर में प्यार. !
करुणा , दया , उदारता , हो जिसके व्यवहार !!
हो जिसके व्यवहार , उमंगों भरी सत्यता  !
हो  ईमानदारिता  ,  श्रद्धा -भक्ति,मित्रता !!
कह”अनंग”करजोरि,यही आनंद आत्मिक !
जिसमें यह सदगुण हों वह ही आध्यात्मिक!!


Muktak:

करो नियोजित मन दशा , अंतरंग  की  खोज  !

भौतिक सम्पति से बड़ी , अंतर सदगति ओज !!

अंतर   सदगति  ओज  ,  भरा  है  अंतरंग  में  !

उसको  ढूँढ़ो  जो  रहता  है  ,  नित्य   संग  में !!

कह”अनंग “करजोरि,  इसीमें  है अपना  हित  !

अंतरंग  में  मनः दशा  को  , करो

**

अंदर  झाँको पींजड़े में बुधि , बल  भण्डार  !

शक्ति स्रोत भीतर छुपा, उसको लेउ निकार !!

उसको लेउ निकार , हाथ में करलो मन को  !

एकाग्रता राह पर  लाओ  निज  जीवन  को !!

कह”अनंग”करजोरि,  उमंगों  भरा  समन्दर  !

आध्यात्मिक  पथ   का  , राही   तेरे  अंदर !!


Muktak :

धन पैसे से भी  बड़ा ,  श्रेष्ठ  आत्म सम्मान  !
रक्छा इसकी प्राण-पण से करिये हित जान !!
से करिये हित जान , श्रेष्ठ धन  इसे  मानिये  !
इसको रखो सँभाल , उचित ईमान  जीनिये !!
कह”अनंग
**

:कह”अनंग “करजोरि, सदगुणों से भरलो मन  !
बढ़े आत्म सम्मान ,  यही  सबसे  उत्तम  धन !!
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धन पैसे से भी  बड़ा ,  श्रेष्ठ  आत्म सम्मान  !
रक्छा इसकी प्राण-पण से करिये हित जान !!
से करिये हित जान , श्रेष्ठ धन  इसे  मानिये  !
इसको रखो सँभाल , उचित ईमान  जीनिये !!
कह”अनंग “करजोरि, सदगुणों से भरलो मन  !
बढ़े आत्म सम्मान ,  यही  सबसे  उत्तम  धन !!
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धन पैसे से भी  बड़ा ,  श्रेष्ठ  आत्म सम्मान  !
रक्छा इसकी प्राण-पण से करिये हित जान !!
से करिये हित जान , श्रेष्ठ धन  इसे  मानिये  !
इसको रखो सँभाल , उचित ईमान  जानिये !!
कह”अनंग “करजोरि, सदगुणों से भरलो मन  !
बढ़े आत्म सम्मान ,  यही  सबसे  उत्तम  धन !!

**

जहाँ  पड़ेंगे  उगेंगे , ये वैचारिक  बीज  !
मेंट सकें हर अशुभता, ये हैं एसी चीज !!
ये हैं एसी चीज ,वृक्छ जब बन जायेंगें  !
शीतल ,मंद,सुगंध , पवन लेकर आयेंगे !!
कह”अनंग “करजोरि,यही बन अस्त्र लड़ेंगे !
मेट  निराशा  को  देंगे  ,ये  जहाँ  पड़ेगे  !!


Muktak:

शक्ति-सम्पदा   से  भरा  ,   है  अंदर  भण्डार  !
मात्र सुसज्जा  व्यवस्था ,  बाहर  का  आधार !!
बाहर  का  आधार , आंतरिक  बल  है जीवन  !
चुक जाती जब शक्तिआंतरिक, मर जाता तन !!
कह”अनंग “करजोरि, शक्ति  से  मिटे आपदा  !
उसको विकसित करो, भरी उर शक्ति-सम्पदा !!

**

सरिता सी शालीनता , सूरज सदृश उदार  !
सहनशीलता धरा सी , यह ईश्वर का प्यार !!
यह ईश्वर का प्यार , यही वर उसका जानो !
परमात्मा प्रसन्न हुआ  है ,  यह  अनुमानो !!
कह”अनंग”करजोरि,यही है प्रभु की प्रभुता !
परमारथ हित सजग , सूर्य,धरती वा सरिता !!

**

धन  रखिये  परलोक  में , वहाँ न चोरी होय  !
अहंकार,दुख, ईर्ष्या , डर ,भय  ,जाते  खोय !!
डर,भय जाते खोय,धरा पर जमा न कर धन !
आत्मग्यान सच्चा धन , इससे सँवरे जीवन !!
कह”अनंग “करजोरि,बढ़ाओ नित अपनापन !
जहाँ नघटता और न लुटता वहाँ  रखो  धन !!


Muktak:

मन मानव का मान है , मन विकार की खान !
विकल वासनायें यहाँ , पातीं हैं स्थान !!
पाती हैं स्थान , पूर्ति इनकी आवश्यक !
किन्तु एक सीमा तक ही , ये उत्तम बेशक !!
कह”अनंग “करजोरि , संतुलित करिये भोजन !
इच्छाओं पर करो नियंत्रण , रोको निज मन !!

**

खाना उतना चाहिये , जिससे तन हित होय !
ज्यादा खाना देह का, भला करे ना कोय !!
भला करे ना कोय , संतुलन को पहचानो !
रख समत्व का भाव ,करो उपयोग सुजानो !!
कह”अनंग ” करजोरि,रखो हर भाव समाना !
भोग , वासना , और मनोरंजन या खाना !!

**

विपदा और अतृप्ति से , जीवन नीरस होय !
गरिमा अंतःकरण की , सहसा जाती खोय !!
सहसा जाती खोय , जगाओ श्रद्धा अंदर !
हो अभाव तब भी प्रफुल्लता रहती बेहतर !!
कह”अनंग “करजोरि, सदेच्छा हरे आपदा !
सुख साधन से नहीं , सोच से आती विपदा !!


Muktak:

आध्यात्मिक जिन्दगी , आत्मतत्व है जान !
इसमें ही अमरत्व है , इसमें ही है ग्यान !!
इसमें ही है ग्यान , शक्ति है अदभुत इसमें !
है अनुभव की चीज, डूब जाओ यदि उसमें!!
कह”अनंग” करजोरि,शक्ति है श्रेष्ठ आत्मिक !
उत्तम कार्य कराये , जीवन आध्यात्मिक !!

**

अंतर की गहराइयों , में जीवन आनंद !
बाहर तो बस हलचलें ,दिखतीं केवल मंद !!
दिखतीं केवल मंद ,उसे मत खोजो बाहर !
सुख हो या आनंद , केन्द्र है सबका अंदर !!
कह”अनंग”करजोरि,प्रगति जड़ सींच निरंतर !
तृप्ति,तुष्टि वा शांति ,सभी कुछ है मन अंतर !!

**

एक बूँद में है निहित , सरवर की पहचान !
चिन्गारी में भरा है , अग्नितत्व का ग्यान !!
अग्नितत्व का ग्यान,खोजिये अपने अंदर !
अणु जैसा विभु और बूँद सा बृहत समुंदर !!
कह” अनंग” करजोरि,वही अपने बजूद में !
ध्यान पूर्वक देखो , सरवर एक बुँद में !!


Muktak:

भाग्य तुम्हारे हाथ में , शक्ति तुम्हारे हाथ !
सब कुछ अंदर आपके,तुम जो चाहो साथ !!
तुम जो चाहो साथ ,वही पौरुष, बल अंदर !
इसीलिये नित भाग्य बनाओ,अपना सुन्दर !!
कह”अनंग “करजोरि , साथ हैं संग सहारे !
सब प्रकार से है हाथों में , भाग्य तुम्हारे !!

**

सूरज दिखता घड़े में , घड़ा जाय यदि फूट !
तो भी सूरज रहेगा , घड़ा गया है छूट !!
घड़ा गया है छूट , सूर्य का नाश न होता !
इसीतरह से आत्मतत्व इस तन को ढोता !!
कह”अनंग”करजोरि,आत्मा चेतनकण रज !
हर तन दिखे, घड़े में दिखता है ज्यों सूरज !!


Muktak:

सुख न कहीं संतोष सम , तप नहिं शांति समान  !

व्याधि नहीं तृष्णा सरिस. धर्म  दया   का  दान   !!

धर्म दया का दान ,  पाप ,  दुख  है  अग्यानता    !

ग्यानी  एसा  जान  , घृणा  को  नहीं   मानता    !!

कह”अनंग “करजोरि , दया कर मेटे हर   दुख     !

पाकर धन  संतोष , सदा   ही  पाता वह सुख.   !!

**

निजी सम्पदा निजी पन , कहलाता व्यक्तित्व  !

भौतिकता का जिन्दगी , में ना अधिक महत्व !!

में ना अधिक महत्व , लोक व्यवहार  मात्र  है !

वजनदार वह व्यक्ति , जहाँ व्यक्तित्व पात्र  है !!

कह”अनंग “करजोरि, दूर  हर  रहे  आपदा    !

गरिमा रखो सँभाल , यही  है  निजी सम्पदा !!

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संयम, सेवा ,साधना ,  स्वाध्याय ,  सत्संग  !

इन्हें आत्म उत्कर्ष हित,समझो उत्तम अंग !!

समझो उत्तम अंग ,देह  हित भोजन  जैसे  !

श्रम वा शयन जरूरी है, इस तन को  वैसे !!

कह”अनंग “करजोरि,मनालें यदि मन को हम !

सध  जा़ये  सदभाव , साधना,  सेवा,  संयम. !!


Muktak:

शुचिता इस संसार में , ना है ग्यान समान !
सद् इच्छा सद् ग्यान ही,सदविचार की खान !!
सदविचार की खान ,भरे अंदर पवित्रता !
इससे ही सत्कर्मों से , हो जाय मित्रता !!
कह”अनंग “करजोरि,निकल जाती अनुचितता !
आत्मानन्द विभोर करे , शुचि मन की शुचिता !!

**

अनुचित उचित विचार का , जब हो अन्तर्द्वन्द  !

तो समझो सुख शांति का , द्वार खुल रहा बंद. !!

द्वार खुल रहा बंद , शांति-सुख दिन  नियराये   !

अनुचित का परित्याग, उचित को जगह दिलाये !!

कह”अनंग”करजोरि,सदेच्छा करती  नित  हित !

ढूँढ़-ढूँढ़ अंदर से बाहर ,  कर  दो    अनुचित  !!


Muktak:

सोना, चाँदी ,धन जमा , तो भय चारों ओर !
कभी छीन सकता इसे , राजा ,डाकू , चोर !!
राजा, डाकू ,चोर , सगे सम्बंधी सब जन !
रखते सदा कुदृष्टि , देख. लेते यदि बहुधन !!
कह”अनंग”करजोरि , करावे यह बरवादी !
इसीलिये मत जमा करो , घर सोना -चाँदी !!

**

सच्चा धन तो मानिये, आत्म ग्यान संसार !
इससे निर्भयता बढ़े , बढ़े सभीसे प्यार !!
बढ़े सभीसे प्यार , नम्रता , शुचिता , बढ़ती !
सहनशीलता वा उदारता ऊपर चढ़ती !!
कह “अनंग ” करजोरि,बने शालीन शांत जन !
अपने अंदर छिपा खजाना ही सच्चा धन !!

**

भौतिक इच्छा भार से , मानव दबा जहान !
कभी सोच पाता नहीं , वहअपना कल्यान !!
वह अपना कल्यान ,सोच ना पाता बिल्कुल !
इच्छाओं वा प्रलोभनों से , रहता मिल जुल !!
कह” अनंग” करजोरि,कर्म करवाय अनैतिक !
भरमाती है मानव को , हर इच्छा भौतिक !!


Muktak:

नहीं छुपाये छुप सके , मानव श्रेष्ठ जहान !
जैसे खुशबू पुष्प की , खुद यश करे बखान !!
खुद यश करे बखान , श्रेष्ठता सबको भाती !
निज गुण , कर्म ,स्वभाव हेतु सबको उकसाती !!
कह”अनंग” करजोरि , गुणों की चर्चा भाये !
श्रेष्ठ गुणों की खुशबू ,छिपती नहीं छुपाये !!

**

वक्त बहुत है कीमती , इसे न समझो आम !
खर्च हो गया वक्त जो ,मिले न खर्चे दाम !!
मिले न खर्चे दाम , वक्त को यूँ मत छोड़ो !
एक एक पल करो नियोजित ,मकसद जोड़ो !!
कह”अनंग”करजोरि ,यही हर ग्रंथ कहत है !
चलो वक्त के साथ , कीमती वक्त बहुत है !!

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शुद्ध कर लिया मन अगर , तीर्थ राज हो जाय !
सबसे उत्तम तीर्थ यह , इस जग में कहलाय. !!
इस जग में कहलाय , शुद्धता मन की नीकी !
शुद्ध मनः स्थिति के आगे , दुनियाँ फीकी !!
कह”अनंग ” करजोरि , नित्य मन माहिं युद्धकर !
तीर्थ यही निकटस्थ ,श्रेष्ठ ,नित मनहिं शुद्ध कर !!

**

मौत जानिये जिंदगी की रिवर्स रफ्तार !
इसीलिये हर छण जियो करके सबसे प्यार !!
करके सबसे प्यार , जियो जीवन का हर छण !
काम करो सबके हित,जोड़ो परहित कण कण !!
कह ” अनंग “करजोरि,अमानत इसे मानिये !
सहचर, सहयोगी जीवन की मौत. जानिये !!

**

ऐसे मन के तीर्थ में , करो नित्य अस्नान !
ग्यान रूप तालाब में , ध्यान रूप जल मान !!
ध्यान रूप जल मान,द्वेष रूपी मल धोलो !
यही परम गति मार्ग , इसीके राही होलो !!
कह “अनंग ” करजोरि,सुधारो अपना जीवन !
राग द्वेष मल धोकर. स्वच्छ करो ऐसे मन !!


Muktak:

पवित्रता , सदग्यान सम , नहीं और संसार !
इसी ग्यान , सदग्यान से , होते शुद्ध विचार !!
होते शुद्ध विचार , शुद्ध जो करदें अंतर. !
सदकर्मों की तभी प्रेरणा , उठती अन्दर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि, यही सत्कर्म मित्रता !
आत्मानन्द विभोर करे , मन की पवित्रता !!

**

मानव मन की गंदगी , भ्रम ,  अंधा विश्वास  !

अविश्वास भी तीसरा , इसका साथी  खास  !!

इसका साथी खास , करे पथ भ्रांत हमेशा    !

त्रिधा गंदगी का समझो  यह. ही है    पेशा  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,किया जग में यह अनुभव !

त्रिधा गन्दगी  है  जिसमें  वह  दूषित  मानव !!

**

आत्म साधना  से  बढ़े , क्रांति , शांति , विश्रांति  !

स्वस्थ. होय तन मन तथा , रहे रोग  ना   भ्रांति  !!

रहे रोग ना भ्रांति , वाक  पटुता  उर    जागे       !

सर्वग्यता  प्राप्त  करके ,  सबको   अनुरागे      !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,रहे ना शेष  जानना      !

सबसे उत्तम. और. श्रेष्ठ  है   आत्म   साधना    !!


Muktak:

मानव जीवन लक्छ्य यह , ले खुद को पहचान. !
सेवा कर हर जीव की , यह इस हेतु विधान. !!
यह इस हेतु विधान , ध्यान परमेश्वर का कर. !
अहंकार को जीव मात्र की सेवा से हर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सभी से हो अपनापन. !
तभी सफल होगा , समझो यह मानव जीवन !!

**

मर्यादा कर्तव्य को झुठलाना ना मुक्ति !
वरन् छुद्रता , दुष्टता,छुटकारे की युक्ति !!
छुटकारे की युक्ति ,चेतना दीप जलाओ !
सीमा से उपरत होकर ,असीम हो जाओ!!
कह ंअनंग ंकरजोरि,करो अपने से वादा !
कर्त्तव्यों के पथ चलकर साधो मर्यादित !!

**

अंतरात्मा कभी भी , जल से साफ न होय !
आत्म नदी स्नान कर , इसको लीजै धोय. !!
इसको लीजै धोय , पुण्य. भागी बन जाओ !
संयम ही है तीर्थ , सत्व जल कूद नहाओ !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,शील तट नदी आत्मा !
दयापूर्ण. व्यवहार , लहर. है अंतरात्मा !!

**

धर्म आत्मा वही जो , दर्शन , ग्यान सँयुक्त !
और सभी संयोग तो , बाह्य भाव से युक्त !!
बाह्य भाव से युक्त , आत्मा सिद्धि प्रदाता !
ग्यान , आत्मा का हमको,अमरत्व सिखाता!!
कह ंअनंग ंकरजोरि,मरे ना कभी आत्मा !
दर्शन , ग्यान सँयुक्त , कहाती धर्म. आत्मा !!


Muktak:

परिचय अपने आपसे ही है अंतरग्यान !
हम क्या हैं इसकी हमें हो जाती पहचान !!
हो जाती पहचान , वास्तविकता दिख जाती !
क्या होना है ठीक,! बात उर में है आती !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,ग्यान करता है निर्भय !
देता है सुख शांति ,कराता खुद से परिचय. !!
**

मत, मतान्तर , पंथ , विधि , पूजा कर्म विधान !
धर्म ग्रंथ ,मंदिर सभी , ना ही आत्म समान. !!
ना ही आत्म समान , आत्मा ब्रह्म रूप. है !
कर्म., भक्ति वा ग्यान, सभी में यह स्वरूप है !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,ध्येय है यही मित्रवर. !
आड़े मत आने दो इसके , मत. , मतान्तर. !!


Muktak:

प्रलय काल में जिस तरह. , जल ही जल सर्वत्र !
इसी तरह यह आत्मा , सभी ओर है मित्र. !!
सभी ओर है मित्र , करूँ क्या?जाउँ कहाँ पर. !
क्या छोड़ूँ ?क्या पकड़ूँ ?सबका अर्थ यहाँ पर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,विश्व है आत्म जाल में !
जल ही जल सर्वत्र ,ज्यों दिखे प्रलय काल में !!
**

:जग जंगल है विषय सम , अनजानी हर राह !
इसमें देता साथ जो , वह है आत्म प्रवाह. !!
वह है आत्म प्रवाह , राह जो स्वयं बनाये !
आत्म निरीक्छण करे , ग्यान अंदर उपजाये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आचरण करिये वह मग !
जिससे लें जन सीख , राह. ढूँढ़े जंगल जग. !!


Muktak:

अपने अंदर स्वर्ग है , उसमें करो प्रवेश !
बाहर मत ढूँढ़ो विषय , अंदर अपना देश !!
अंदर अपना देश , अमरपुर उसको जानो !
अंदर ही आनंद धाम है , वह पहचानो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,न देखो बाहर सपने !
बाजारों में नहीं खुशी , है अन्दर. अपने !!


Muktak:

धन , सम्पति,ऐश्वर्य,बल , ना यह पुण्य प्रभाव. !
पुण्य जगाये सत्प्रवृति , सदविचार सदभाव. !!
सदविचार सदभाव. और सदबुद्धि पुण्य फल !
दुर्विचार , दुर्भाव और दुर्बुद्धि पाप. मल. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,पाप ना करता निर्धन. !
हरता सबकी बुद्धि और दुख देता है धन !!

**

,भोजन , पानी , हवा सम, नैतिकता अनिवार्य !
मानव के निर्माण हित , यह आवश्यक. कार्य !!
यह आवश्यक कार्य , प्रेरणा नैतिकता की !
लेते रहिये नित्य. जरूरत भौतिकता की !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,धरे नैतिकता जो जन. !
श्रेष्ठ रूप में करे नित्य , भौतिकता भोजन. !!

**

हर जबाब है हृदय में , जो सवाल मन माहिं !
उतर जाइये हृदय सर , और तरीका नाहिं !!
और तरीका नाहिं , खोजिये अपने अंदर. !
शांति , सरसता , सुख सबका है यही समुंदर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि, ढूँढ़िये अपने भीतर. !
छुपा हुआ अपने ही अंदर. है जबाब. हर. !!


Muktak:

ग्यानीजन मन डरा ना, सकता भय संसार !
चाहे वह आकर खड़ा, होजाये निज संसार !!
हो जाये निज द्वार , खड़ा जन ना घबराये !
जैसे तीर नुकीला , पत्थर. से मुड़ जाये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,नहीं दहशत आये मन !
आत्मतत्व ना मरता , जाने यह. ग्यानी जन !!

**

: बाहर दिखे न वस्तु वह , जो अंदर है नाहिं !
अंदर का सौंदर्य ही , दिखता है जग माहिं !!
दिखता है जग माहिं , यही सम्बंध हमारा !
सबका आदर करो , विश्व अपना है सारा !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,वृहत् का लघु अपना घर !
इसमें जो कुछ भरा , वही दिखता है बाहर. !!

**

लाभ दिलाता जगत में , वह है केवल प्यार !
आलोचना, बुराइयाँ , लाभ न दें संसार !!
लाभ. न दें संसार , देखिये यह प्रयोग कर. !
काम बना ना पाता जग में कभी अनादर. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,प्रेम सब काम बनाता !
सहचरता, सहयोग जगत में लाभ दिलाता !!
**

अगर निष्कपट भाव से , रहना प्रभु के पास !
तो मत करिये किसी से, कपट और परिहास !!
कपट और परिहास , जिसे भी दुख पहुँचाये !
उस दुख की आवाज ,व्याप्त प्रभु को तड़पाये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,जान लो तुम यह झटपट !
पहुँचोगे प्रभु पास , भाव हो अगर निष्कपट. !!


Muktak:

नहीं महत्ता आत्मा से ज्यादा जग और !
तत्व सार्वलौकिक यही, इसमें सबका ठौर !!
इसमें सबका ठौर, परे ना इससे कोई. !
आत्मतत्व से बड़ी महत्ता और न होई. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सृष्टि सब उसकी सत्ता !
सकल सृष्टि में इससे बढ़कर. नहीं महत्ता !!

**

विषय वासना भूमि पर होय न आत्म विकास. !
समतल भूमि बनाइये , ले सनेह. हल खास !!
ले सनेह हल खास , यत्न करि भूमि सुधारो !
प्रेम वारि से सींच तपन सब खींच निकारो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,भस्म कर बीज कामना !
आत्म विकास पौध रोपो , तजि विषय वासना !!


Muktak:

पण्डित वा ग्यानी वही खुद को ले जो जान !
अन्तः चेतन भाव ही आत्मरूप पहचान !!
आत्मरूप पहचान जान ले जो अपने को !
वह भविष्य ग्याता , देखे भावी सपने को !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मा होय न खण्डित !
जो खुद को ले जान , वही कहलाये पण्डित. !!

**

आत्म साधना करो नित , नश्वर है यह देह. !
पाना है अमरत्व तो बनकर रहो विदेह. !!
बनकर रहो विदेह , करो पूजा जीवन की !
ढ़ूँढ़ो अपने अंदर , धारा अपने पन. की !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,यही सच्ची उपासना !
पल भर में ही सुखी बना दे आत्म साधना !!
**

मत ढ़ूँढ़ो बाहर जगत , सच्चे सुख का स्रोत !
सच्चे सुख का स्रोत तो अपने अंदर. होत !!
अपने अंदर होत , वही आनंद प्रदायक. !
बाह्य जगत में कहीं नहीं सुख अपने लायक!!

कह ंअनंग ंकरजोरि, बढ़ाओ अंदर चाहत !

बाहर आभासी सुख हैं, इनमें उलझो मत. !!

**

लड़ना है तो आत्मा से लो युद्ध रचाय !
जीत गये तो ठीक है हारे हार न आय. !!
हारे हार न आय, आत्मा मालिक घर की !
मन की उल्टी चाल कामना दुनियाँ भर की !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मबल सँग नित बढ़ना !
बाहर करो न युद्ध सदा अंदर ही लड़ना !!

**

जैसे मन की कामना , तन वासना प्रधान !
आत्मतत्व आवाज है ,अंतःकरण महान. !!
अंतःकरण महान , सदा सुन इसकी प्यारे !
आत्मतत्व के इसी रूप में दिखें नजारे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मा जानो एसे !
पुष्प प्रफुल्लित होकर , खुशबू देता जैसे !!
**

जाग्रत करिये हृदय में , आत्मरूप का मान !
तत्पश्चात विचार कर , करिये कर्म जहान. !!
करिये कर्म जहान , आत्मा जो करवाये !
वही करो वा सुनो उसीकी , भ्रम ना आये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,हृदय उपजाओ सतव्रत !
आत्म सनेही दीप, हृदय में रखिये जाग्रत. !!


Muktak:

जीवन सतत चले सदा, बिन , मन , वा प्रान. !
बिन इन्दियँ वा मन बिना,जिसका रहता ग्यान !!
जिसका रहता ग्यान,खुशी गम जिसको है सम !
उसी तत्व को आत्मरूप कहते जग में हम. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,जान ले जो जग में जन !
लगे एकसा उसको जन्म , मृत्यु वा जीवन. !!
**

अपने को जाने बिना दूर न होय अभाव !
आत्मग्यान ही जगत का,अंतिम ग्यान प्रभाव !!
अंतिम ग्यान प्रभाव, आत्म ग्यानी ही ईश्वर !
आत्मग्यान से सभी ग्यान दुनियाँ के कमतर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,ग्यान के देखो सपने !
आत्मग्यान से प्राणि मात्र सब लगते अपने !!
**

जिसने जग में पा लिया , दुनियाँ का सब ग्यान !
पर खुद को जाना नहीं , वह बेकार. जहान. !!
वह बेकार जहान , निरर्थक ग्यान. जुटाता !
सतत चेतना भाव जगत का जान न पाता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सृष्टि उपजायी उसने !
पिण्ड तत्व में चेतनता भरवाई. जिसने !!


Muktak :

सदगुण हों यदि शुरू से , लें अपनापन खींच !
आत्मीयता , धैर्य को , पैदा करते सींच. !!
पैदा करते सींच , न आती मन अधीरता !
सफल पारिवारिक जीवन की खिले वीरता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,निकालो सारे दुर्गुण. !
शनैः शनैःभर लेउ खींचकर अन्दर सदगुण. !!

**
घर में सुख की खोज,करो सुख लाओ ऊपर !
स्वयं सिद्ध सुख ही स्थाई. होता भू_ पर. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,दुखों की करो विदाई !
जमा करो छोटे छोटे सुख कर. स्थाई. !!

**

पहला सुख निर्मल वदन , दूजा धन सम्पत्ति !
दुरुपयोग इनका हुआ , तो ये बने विपत्ति !!
तो ये बने विपत्ति , तीसरा है शिक्छा सुख. !
अहंकार से बचो अन्यथा यह देगा दुख. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मसुख सब पर दहला !
स्थाई वा स्वयं सिद्ध सुख यह. ही पहला !!

 

**

धधकाता वा धधकता अंगारा है क्रोध !
बैर भाव इससे जगे ,जिसका फल प्रतिशोध !!
जिसका फल प्रतिशोध,जलाये अंदर अंदर. !
दुश्मन जले न जले , किन्तु खुद जले निरन्तर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि, क्रोध भारी तड़पाता !
सदविचार ,सदभाव, जलाता वा धधकाता !!

**

केवल शब्दों पर टिका है भाषा विग्यान. !
लेकिन उसमें भाव से डाले जाते प्रान !!
डाले जाते प्रान , चेतना भाव जगाती !
शब्द, अर्थ वा वाणी मिल भाषा बन जाती !!
कह अनंग ंकरजोरि,यही है भाषा का बल !
वाणी, शब्द और भावों से नाता केवल. !!

**

सदा परस्पर कीजिये , सज्जनता व्यवहार. !
उदारता स्नेह से , सबका करो दुलार. !!
सबका करो दुलार ,बनो सबके सहयोगी !
परहित नित उर धारि, बनो सबके उपयोगी !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,चलो सतपंथ निरंतर !
शिष्ट और शालीन भाव हो सदा परस्पर !!
**

मैं किसका हूँ ?कौन हूँ ? खुद से करो सवाल !
मानव जीवन लक्छ्य क्या ?क्या है इसका हाल !!
क्या है इसका हाल , करूँ में पूजा किसकी ?
क्या है मेरा धर्म ?धारणा सोचूँ जिसकी !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,उजाला जग में जिसका !
उसका हूँ या अंधकार का, हूँ मैं किसका ??
अनंग पाल सिंह भदौरिया ग्वालियर


Muktak :

आत्मीयता , समझ वा गहन प्रेम की राह !
इससे अंतर्जगत में पैदा होती चाह. !!
पैदा होती चाह , स्वभाव न बने अचानक !
संचित संस्कार जन्मों के , दिखलाते हक !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,श्रेष्ठ गुण है वरीयता !
सबसे करो सनेह , जगाओ. आत्मीयता !!


Muktak :

खुशियाँ हृदय विचारिये , खुशियाँ आतीं दौड़ !
दुख का किया विचार तो,दुख का बनता जोड़ !!
दुख का बनता जोड़, सोच की ताकत. भारी !
सकारात्मक सोच हेतु , करिये तैय्यारी !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सोच पथ चलती दुनियाँ !
दुख सोचो दुख मिले , खुशी से मिलतीं खुशियाँ !!


Muktak :

अगर प्रयोजन में रहे अपना दृढ़ विश्वास !
तो निश्चय कर मानिये बदल जाय इतिहास !!
बदल जाय इतिहास,प्रयोजन लक्छ्य बनाओ !
दृढ़ता वा संकल्प शक्ति अंदर. उपजाओ. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सफलता देय यह डगर !
प्रवल आत्मविश्वास , प्रयोजन हेतु है अगर. !!


Muktak :

जन्मा हूँ जिस देश में , उसकी शान महान. !
हिमगिरि सा पुण्यात्मा , सुरसरि सा वरदान !!
सुरसरि सा वरदान , महाराणा सा दमखम. !
वीर शिवाजी जैसे योध्दा हैं जग में कम !!
कह ंअनंग. ंकरजोरि,जन्म ले यहाँ अजन्मा !
मैं गर्वित हूँ इसी देश में मैं हूँ जन्मा !!


Muktak :

जिम्मेदारी स्वयं की ले लो अपने हाथ !
फिर तुम खुद चल पड़ोगे निज सपनों के साथ !!
निज सपनों के साथ,जगेगी उन्नत चाहत !
विकसित होगी प्रवल कामना जो दे राहत !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,शक्ति है अंदर भारी !
ले लो अपने हाथ स्वयं की जिम्मेदारी !!


Muktak :

अपने को पहचानना अाध्यात्म आधार !
अपने में उस रूप को देखो भली प्रकार !!
देखो भली प्रकार,साथ है वह नित तेरे !
चिन्ता ,भय,अवसाद , बना लेते निज घेरे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,न दे अग्यान पनपने !
जो कुछ सृष्


Muktak :

समय अवधि वा कार्यमें , व्यवहारिकता लाव !
वरना पैदा करेगी , यह मन माहिं तनाव. !!
यह मन माहिं तनाव , देय अवसाद. घनेरा !
अतः समय के बंधन. पर मत खींचो घेरा !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,रिक्त कुछ करो वक्त तय !
फिर तनाव ना देगा तुमको, कभी ये समय. !!


Muktak :

अभिमानी यदि देवता , तो वह दानव जान !
शिष्ट , नम्र, व्यवहारयुत, मानव देव समान. !!
मानव देव समान , अहं जिसने ठुकराया !
देव ,दनुज बन जाय,अहं यदि उसमें आया !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,बात यह बहुत पुरानी !
कभी न जग में आदर पाता जन अभिमानी !!


Muktak :

प्रसन्नता की शत्रु हैं , इच्छायें अतिरिक्त. !
कम से कम यदि कामना,तो जन प्रेमासिक्त !!
तो जन प्रेमासिक्त, कामनायें दुख देतीं !
चिन्ता, भय ,अवसाद, मुफ्त में जग से लेतीं !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कामना और खिन्नता!
दोनों एकइ रूप. हड़प करलें प्रसन्नता !!


Muktak :

जैसे सरिता जल बहे , आसमान में वायु !
वैसे ही ये रात दिन , लेकर उड़ते आयु !!
लेकर उड़ते आयु , लौटकर ना वह आते !
इसी तरह निज उम्र आदमी यहाँ गँवाते !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,काटिये जीवन एसे !
सत्कर्मों में हर पल छण प्रयुक्त हो जैसे !!


Muktak :

समय कमी की शिकायत, करते वह इंसान !
दुरुपयोग जो समय का, करते बिना विधान !!
करते बिना विधान , करें ना उचित प्रबंधन. !
जब देखो तब समय कमी का करते क्रंदन. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,युक्ति आसमां जमीं की !
देखो, फिर ना रहे शिकायत ,समय कमी की !!


Muktak :

नौका में पानी तथा घर में धन की बाढ़ !
दोनों हाथ उलीचिये , बाहर करिये काढ़ !!
बाहर करिये काढ़ , बुध्दिमानी यह जानो !
धन का संग्रह दुख देता है बहुत सुजानो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,चूक मत परहित मौका !
अगर न बाहर किया नीर धन डूबे नौका !!


Muktak :

इच्छा ही बढ़कर बने सुघड़ कामना रूप. !
होय कामना परिष्कृत. तो संकल्प स्वरूप !!
तो संकल्प स्वरूप , भक्ति ईश्वर की पाता !
भौतिकता की सीढ़ी भी यह ही चढ़वाता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,उच्चता देय सदेच्छा !
आध्यात्मिकता भौतिकता देती है इच्छा !!


Muktak :

इच्छा भी इक शक्ति है, इसे न खाली छोड़ !
अनुशासन में राखिये, इसको तोड़ मरोड़ !!
इसको तोड़ मरोड़ , बाँधिये परमेश्वर से !
बिना धर्म ना बँधे धारणा अपने घर. से !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,व्यवस्थित होना अच्छा !
इससे अंदर पैदा होती अच्छी अच्छी इच्छा!!


Muktak :

जो जो चीजें मिलाकर , विधि ने रचा मनुष्य !
उन्हें हटा दो अगर तो, वह मिट जाय अवश्य !!
वह मिट जाय अवश्य , श्रेष्ठ कोई निर्माता !
जो है रचनाकार. सृष्टि भर रंग. रचाता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,श्रेष्ठ जो उसको खोजो !
कैसे रचे मिलाय, चीज. आवश्यक जो जो !!


Muktak :

मानव को जीवित रखे , शक्ति श्रेष्ठ विश्वास !
अगर हिला विश्वास तो, छूटे जीवन आश. !!
छूटे जीवन आश , अंत जीवन का मानो !
श्रेष्ठ शक्ति विश्वास सजाकर. रखो सुजानो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,यही लोगों के अनुभव !
है विश्वास शक्ति ही जिससे जीवित. मानव. !!


Muktak :

हित,मित,गृाही जो वचन , बोलो एसा सत्य !
बोला कटुसत्य तो नहीं रुचे यह. कृत्य. !!
नहीं रुचे यह कृत्य , हजम ना होय सचाई. !
सम्वेदना,पृसंसा मिश्रित. बोलो भाई. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,ध्यान रखिये यह नितनित !
बोलो एसे वचन दिखे जिसमें सबका हित. !!


Muktak :

अवसर वा तैय्यारियों का जो मेल मिलाप. !
किस्मत बनकर उभरता इसको समझो आप !!
इसको समझो आप, करो भरसक तैय्यारी !
अवसर जब भी आये , बन जाये हितकारी !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सतत उपयोगी श्रमकर !
देंगें लाभ. तुम्हें , आयेंगे जो भी अवसर. !!


Muktak :

कर्मशीलता, उदासी , का ना कोई योग. !
वह उदास रहते नहीं , कर्मशील जोलोग !!
कर्मशील जो लोग, सदा उत्साह सँजोते !
लोग आलसी और पृमादी रहते रोते !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,उचित ना दीन हीनता !
साथ साथ ना रहे, उदासी, कर्मशीलता !!


Muktak :

इच्छायें या इरादे , दें भविष्य. में ठेल !
वर्तमान आनंद को ,अंदर भरो धकेल. !!
अंदर भरो धकेल , जियो गरिमामय जीवन !
इच्छायें आनंदहीन. कर देती है मन. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कामनायें तड़पायें !
इसीलिये बाहर कर दो, निकाल इच्छायें !!


Muktak :

वक्त इकाई से बनी , है जीवन की डोर !
व्यर्थ. नष्ट मत कीजिये, देखो इसकी ओर !!
देखो इसकी ओर , व्यर्थ मत इसे गँवाओ !
श्रेष्ठ मनुज तन मिला,इसे सदराह चलाओ !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,बड़ी इसकी पृभु ताई !
श्रेष्ठ कार्य हित करो नियोजित वक्त इकाई !


Muktak :

अपनाये दुख की डगर. सुख की रस्ता भूल. !
कभी चले अनुकूल मन, कभी चले पृतिकूल !!
कभी चले पृतिकूल, सत्य ना देय. दिखाई. !
फैलाये भृम जाल , स्वयं उसमें फँस जाई !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,असलियत उसे न भाये !
सुख की रस्ता भूल, डगर दुख की अपनाये !!


Muktak :

संस्कृति वा साहित्य में , भारत है धनवान !
महापुरुष इस भूमि पर , रचते नया विधान !!
रचते नया विधान, सिखाते जीवन. जीना !
करते हैं जन चूक, समझ यह पायँ कभीना !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,देश भारत अनुपम कृति !
परमेश्वर ने स्वयं रची है यहाँ संस्कृति !!


Muktak :

केवल मानव जीव ही एेसा दिखे जहान. !
जहाँ श्रेष्ठता , तुच्छता दोनों एक समान !!
दोनों एक समान ,चढ़े देवता बनादे !
अगर तुच्छता पर उतरे , पशु को शरमा दे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,समझिये मानव का बल !
धन रिण दोनों ओर भागता मानव केवल. !!


Muktak

पृवचन में मिथ्या कहें , जग के माया मोह !
पर जीवन व्यवहार में , ना छूटे व्यामोह. !!
ना छूटे व्यामोह, भेद. कथनी करनी में !
बनी रहे आसक्ति हमेशा घर. घरनी में !!
कहंअनंग ंकरजोरि,कर्म है अविकल जीवन !
खुद हैं शांति विहीन , और को देते पृवचन. !!


Muktak

डर के बल से भी बड़ा, बल है सच्चा प्यार !
बच्चों को समझाइये , कर सनेह व्यवहार. !!
कर सनेह व्यवहार , हृदय उनके घुस जाओ !
अंतर के अंतर में अपनी जगह. बनाओ. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,तुम्हारे रहें उमृ भर !
करो पृेम व्यवहार , दिखाओ मत उनको डर !!


:

Muktak :

रहता है जन अकेला, अहंकार के संग !
जीवन भर चलता अलग लेकर फीके रंग !!
लेकर फीके रंग , चले नित समानान्तर. !
अहंकार का बोझ उठाये फिरता बाहर. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,जिन्दगी भर दुख सहता !
अहंकार को गला न पाता अकड़ा रहता !!


Muktak :

नित पाने की होड़ में , लगा हुआ संसार !
यही समस्या मूल है , समझो भली पृकार !!
समझो भली पृकार ,लगाहै व्यक्ति होड़ में !
स्वार्थ पूर्ति हित लगारहे निज जोड़ तोड़ में !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,वस्तुयें हैं अति सीमित !
आपा धापी मचा रहा है , हर मानव. नित. !!


Muktak :

जीवन में आध्यात्म कम, खरच दिखावा खूब !
रजोगुणी वह भक्त हैं , पूजा करते डूब. !!
पूजा करते डूब, खूब चिल्लाते जय. जय. !
अंदर हो दुख भले, दिखें बाहर से सुख मय !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,दिखाते हैं अपनापन !
आध्यात्म ना धर्म , कपट , छल से युत जीवन !!


Muktak :

मानव करता कर्म सब , अपनी पृकृति अधीन. !
बदल न पाता नियति निज,यद्यपि परम पृवीन !!
यद्यपि परम पृवीन ,जगत अपना वह. गढ़ता !
कर्म त्याग ना सके, आदतें लेकर. बढ़ता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कहूँ रिषियों के अनुभव !
अपनी पृकृति अधीन का सब करता मानव. !!


Muktak :

भूलें चूकें ,गल्तियाँ, होतीं मित्र समान !
अनजाने में ही सही, देती सीख महान !!
देती सीख महान ,सिखाती आगे बढ़ना !
गलती को स्वीकार, सीखिये ऊपर चढ़ना !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,भूल से हिलती चूलें !
उनसे लो कुछ सीख,सिखाती निश्चित भू लें !!


Muktak :

होता अच्छी भावनासे डर भय का नाश. !
मूर्खता का बुद्धि से होता सहज विनाश !!
होता सहज विनाश नमृता दुर्गति रोके !
दान करे से मिट जाते, दरिदृता झों के !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सादगी जो जनढोता !
.पाता है सम्मान सदा, हैरान न होता !!


Muktak :

आवश्यकता कम करो , सुख का यही उपाय !
जितनी बढ़ें जरूरतें , उतना ही सुख जाय. !!
उतना ही सुख जाय , कामना दुख की माता !
इच्छाओं के साथ , दुखों का गहरा नाता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,तभी सुख अंदर जगता !
इच्छायें घट जाँय , रहे ना आवश्यकता !!


Muktak :

डालो धागा सुई में, भले करो फिर छेद !
धागे से जुड़ जायगा ,उपजेगा जो भेद. !!
उपजेगा जो भेद ,उसे धागा जोड़ेगा !
धागा सुई एक होकर समाज मोड़ेगा !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,द्वेष मत उर में पालो !
सिल दो हर विखराव, सुई में धागा डालो !!


Muktak :

आत्मतत्व से जोड़कर , देखो कर्म विधान !
ईश्वर की परिकल्पना , हो जाती आसान !!
हो जाती आसान, कर्म सिद्धांत. जानिये !
बिना कर्म के जीवन चलता नहीं मानिये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कर्म के अति महत्व से !
सृष्ठा सृष्टि चलाता है यह, आत्म तत्व. से !!??


Muktak :

धर्मधारणा एक सी, होती कभी न मित्र !
एक धर्म में भी दिखें, बहु मतभेद विचित्र !!
बहु मतभेद विचित्र, धर्म को विकृत बनाते !
अपनेअपने तर्कों से निज पंथ. सजाते !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सभी की इक विचारणा !
कर्म विधान बिना ना कोई. , धर्म धारणा !!


Muktak :

खूबसूरती से अगर , करना चाहो काम !
करो स्वयं उस काम को,शुभ होंगे परिणाम !!
शुभ होंगे परिणाम,काम निज हाथ सँवारो !
निष्ठा,लगन,जुनून,जोश, उत्साह. उभारो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि, ईर्ष्या दृष्टि घूरती !
करो स्वयं निज काम, दिखे तब खूबसूरती !!


Muktak :

धंधे में ज्यों जरुरी , परिश्रम वा ईमान. !
श्रद्धा वा विश्वास का,वह घर में स्थान !!
वह घर में स्थान,सभी की मंशा जानो !
सबकी रुचि अनुसार,पूर्ति हित उपकृम ठानो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,न बनकर रहिये अंधे !
सब पर रखो निगाह, तभी सब चलते धंधे !!


Muktak :

रिश्तों में बढ़ता दिखे , आज शिकायत दौर. !
भौतिक जग करता नहीं,अब रिश्तों पर गौर !!
अब रिश्तों पर गौर, नहीं करती भौतिकता !
भूखी,नंगी रुदन कर रही है नैतिकता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कटे जीवन किश्तों में !
सौदा अथवा बोझ , आज दिखता रिश्तों में !!


Muktak :

मानव का व्यक्तित्व है, जैसे पुष्प सुगंध !
फैलाओ सद्भाव जग , यह पृभु का अनुबंध !!
यह पृभु का अनुबंध, इसे जो जग में तोड़े !
ईश्वर से विश्वासघात करि, निज पथ मोड़े !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कहूँ अबतक के अनुभव !
काम नहीं ईश्वर के आया, जग में मानव. !!


Muktak :

अंतर,पद कद में बड़ा, पद बाहरी  विधान. !

कद लम्बा गरिमामयी , मानव की पहचान !!

मानव की पहचान, श्रेष्ठतम उसकी गरिमा  !

कद इसको ही कहें,यही है मानव. महिमा  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,झाँकिये अपने अंदर !

पद वा कद में,बहुत बड़ा  होता है  अन्तर   !!

 


Muktak :

मानवता निर्माण में दो कारण हैं  श्रेष्ठ  !

सदविचार वा ग्यान का सम्बल रहे यथेष्ठ !!

सम्बल रहे यथेष्ठ ,एक यदि कम पड़ जाये !

तो मानव को मानवता से दूर  हटाये  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,इसीमें है दानवता !

रखो संतुलन दोनों में, उपजे  मानवता  !!


Muktak :

बल महान है आत्मबल , और आत्म विश्वास  !

इससे ही हर विपति का , होय सामना खास. !!

होय सामना खास, विपति हर डर कर. भागे  !

मिले हमेशा विजय ,आत्मबल यदि उर जागे !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मसंयम हो केवल !

विपदाओं पर बहुत पड़ेगा भारी  यह.  बल  !!


Muktak :

जो जन अपने सामने , कहें और की बात. !

उससे अपने राज को, कभी न कहिये भृात !!

कभी न कहिये भृात, समझिये उसकी आदत !

कभी किसीके साथ कहीं कर जाय बगावत  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,राज रखिये अपने मन!

उससे कहो न भेद, और का कहता  जो जन !!


Muktak :

दूषित दृश्यों से भरे चिंतन और चरित्र !
आँखों से जो रस मिले, वह कितना अपवित्र !!
वह कितना अपवित्र, करे अंतरमन. मैला !
कुविचारों की भीड़ भरा मन माहिं तबेला !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,इन्ही से है जन भूषित !
फौज विचारों की घेरे रहती नित दूषित. !!


Muktak :

ेजो श्रम देता है हमें अतुलनीय आनंद !
आधि व्याधि का रास्ता कर देता है बंद !!
करदेता है बंद, वेदना की निवृति है !
देता है हर खुशी, मानवी यही पृकृति है !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,जानिये वह अमृत सम!
देता हैआनंद आंतरिक,तुमको जो श्रम. !!


Muktak :

जगत समन्दर रूप है परेशानियाँ नीर. !
पूरी छमता लगन से करो पृयास सुवीर !!
करो पृयास सुवीर,और मत सोचो आगे !
साहस,शौर्य देख विपदा खुद डर कर भागे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मबल है अति सुंदर !
इसके आगे छोटा लगता जगत समुन्दर. !!


Muktak :

परेशानियाँ पंथ की दृढ़ता देंय सिखाय !
दिक्कत निज अनुरूप ही देतीबड़ा बनाय !!
देती बड़ा बनाय, दिक्कतों से मत डरिये !
दिक्कत मार्ग स्वयं दिखलाती वह अनुसरिये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सहन कर लेउ हानियाँ !
उपजाती विश्वास अटल,ये परेशानियाँ !!

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