B 0211 – Annang Pal Singh Bhadoriya ‘ Annang’

Muktak :

अंतर,पद कद में बड़ा, पद बाहरी  विधान. !

कद लम्बा गरिमामयी , मानव की पहचान !!

मानव की पहचान, श्रेष्ठतम उसकी गरिमा  !

कद इसको ही कहें,यही है मानव. महिमा  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,झाँकिये अपने अंदर !

पद वा कद में,बहुत बड़ा  होता है  अन्तर   !!

 


Muktak :

मानवता निर्माण में दो कारण हैं  श्रेष्ठ  !

सदविचार वा ग्यान का सम्बल रहे यथेष्ठ !!

सम्बल रहे यथेष्ठ ,एक यदि कम पड़ जाये !

तो मानव को मानवता से दूर  हटाये  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,इसीमें है दानवता !

रखो संतुलन दोनों में, उपजे  मानवता  !!


Muktak :

बल महान है आत्मबल , और आत्म विश्वास  !

इससे ही हर विपति का , होय सामना खास. !!

होय सामना खास, विपति हर डर कर. भागे  !

मिले हमेशा विजय ,आत्मबल यदि उर जागे !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मसंयम हो केवल !

विपदाओं पर बहुत पड़ेगा भारी  यह.  बल  !!


Muktak :

जो जन अपने सामने , कहें और की बात. !

उससे अपने राज को, कभी न कहिये भृात !!

कभी न कहिये भृात, समझिये उसकी आदत !

कभी किसीके साथ कहीं कर जाय बगावत  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,राज रखिये अपने मन!

उससे कहो न भेद, और का कहता  जो जन !!


Muktak :

दूषित दृश्यों से भरे चिंतन और चरित्र !
आँखों से जो रस मिले, वह कितना अपवित्र !!
वह कितना अपवित्र, करे अंतरमन. मैला !
कुविचारों की भीड़ भरा मन माहिं तबेला !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,इन्ही से है जन भूषित !
फौज विचारों की घेरे रहती नित दूषित. !!


Muktak :

ेजो श्रम देता है हमें अतुलनीय आनंद !
आधि व्याधि का रास्ता कर देता है बंद !!
करदेता है बंद, वेदना की निवृति है !
देता है हर खुशी, मानवी यही पृकृति है !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,जानिये वह अमृत सम!
देता हैआनंद आंतरिक,तुमको जो श्रम. !!


Muktak :

जगत समन्दर रूप है परेशानियाँ नीर. !
पूरी छमता लगन से करो पृयास सुवीर !!
करो पृयास सुवीर,और मत सोचो आगे !
साहस,शौर्य देख विपदा खुद डर कर भागे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मबल है अति सुंदर !
इसके आगे छोटा लगता जगत समुन्दर. !!


Muktak :

परेशानियाँ पंथ की दृढ़ता देंय सिखाय !
दिक्कत निज अनुरूप ही देतीबड़ा बनाय !!
देती बड़ा बनाय, दिक्कतों से मत डरिये !
दिक्कत मार्ग स्वयं दिखलाती वह अनुसरिये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सहन कर लेउ हानियाँ !
उपजाती विश्वास अटल,ये परेशानियाँ !!

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