0211 – Annang Pal Singh Bhadoriya ‘ Annang’

 

Muktak:

पवित्रता , सदग्यान सम , नहीं और संसार !
इसी ग्यान , सदग्यान से , होते शुद्ध विचार !!
होते शुद्ध विचार , शुद्ध जो करदें अंतर. !
सदकर्मों की तभी प्रेरणा , उठती अन्दर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि, यही सत्कर्म मित्रता !
आत्मानन्द विभोर करे , मन की पवित्रता !!

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मानव मन की गंदगी , भ्रम ,  अंधा विश्वास  !

अविश्वास भी तीसरा , इसका साथी  खास  !!

इसका साथी खास , करे पथ भ्रांत हमेशा    !

त्रिधा गंदगी का समझो  यह. ही है    पेशा  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,किया जग में यह अनुभव !

त्रिधा गन्दगी  है  जिसमें  वह  दूषित  मानव !!

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आत्म साधना  से  बढ़े , क्रांति , शांति , विश्रांति  !

स्वस्थ. होय तन मन तथा , रहे रोग  ना   भ्रांति  !!

रहे रोग ना भ्रांति , वाक  पटुता  उर    जागे       !

सर्वग्यता  प्राप्त  करके ,  सबको   अनुरागे      !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,रहे ना शेष  जानना      !

सबसे उत्तम. और. श्रेष्ठ  है   आत्म   साधना    !!


Muktak:

मानव जीवन लक्छ्य यह , ले खुद को पहचान. !
सेवा कर हर जीव की , यह इस हेतु विधान. !!
यह इस हेतु विधान , ध्यान परमेश्वर का कर. !
अहंकार को जीव मात्र की सेवा से हर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सभी से हो अपनापन. !
तभी सफल होगा , समझो यह मानव जीवन !!

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मर्यादा कर्तव्य को झुठलाना ना मुक्ति !
वरन् छुद्रता , दुष्टता,छुटकारे की युक्ति !!
छुटकारे की युक्ति ,चेतना दीप जलाओ !
सीमा से उपरत होकर ,असीम हो जाओ!!
कह ंअनंग ंकरजोरि,करो अपने से वादा !
कर्त्तव्यों के पथ चलकर साधो मर्यादित !!

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अंतरात्मा कभी भी , जल से साफ न होय !
आत्म नदी स्नान कर , इसको लीजै धोय. !!
इसको लीजै धोय , पुण्य. भागी बन जाओ !
संयम ही है तीर्थ , सत्व जल कूद नहाओ !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,शील तट नदी आत्मा !
दयापूर्ण. व्यवहार , लहर. है अंतरात्मा !!

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धर्म आत्मा वही जो , दर्शन , ग्यान सँयुक्त !
और सभी संयोग तो , बाह्य भाव से युक्त !!
बाह्य भाव से युक्त , आत्मा सिद्धि प्रदाता !
ग्यान , आत्मा का हमको,अमरत्व सिखाता!!
कह ंअनंग ंकरजोरि,मरे ना कभी आत्मा !
दर्शन , ग्यान सँयुक्त , कहाती धर्म. आत्मा !!


Muktak:

परिचय अपने आपसे ही है अंतरग्यान !
हम क्या हैं इसकी हमें हो जाती पहचान !!
हो जाती पहचान , वास्तविकता दिख जाती !
क्या होना है ठीक,! बात उर में है आती !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,ग्यान करता है निर्भय !
देता है सुख शांति ,कराता खुद से परिचय. !!
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मत, मतान्तर , पंथ , विधि , पूजा कर्म विधान !
धर्म ग्रंथ ,मंदिर सभी , ना ही आत्म समान. !!
ना ही आत्म समान , आत्मा ब्रह्म रूप. है !
कर्म., भक्ति वा ग्यान, सभी में यह स्वरूप है !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,ध्येय है यही मित्रवर. !
आड़े मत आने दो इसके , मत. , मतान्तर. !!


Muktak:

प्रलय काल में जिस तरह. , जल ही जल सर्वत्र !
इसी तरह यह आत्मा , सभी ओर है मित्र. !!
सभी ओर है मित्र , करूँ क्या?जाउँ कहाँ पर. !
क्या छोड़ूँ ?क्या पकड़ूँ ?सबका अर्थ यहाँ पर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,विश्व है आत्म जाल में !
जल ही जल सर्वत्र ,ज्यों दिखे प्रलय काल में !!
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:जग जंगल है विषय सम , अनजानी हर राह !
इसमें देता साथ जो , वह है आत्म प्रवाह. !!
वह है आत्म प्रवाह , राह जो स्वयं बनाये !
आत्म निरीक्छण करे , ग्यान अंदर उपजाये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आचरण करिये वह मग !
जिससे लें जन सीख , राह. ढूँढ़े जंगल जग. !!


Muktak:

अपने अंदर स्वर्ग है , उसमें करो प्रवेश !
बाहर मत ढूँढ़ो विषय , अंदर अपना देश !!
अंदर अपना देश , अमरपुर उसको जानो !
अंदर ही आनंद धाम है , वह पहचानो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,न देखो बाहर सपने !
बाजारों में नहीं खुशी , है अन्दर. अपने !!


Muktak:

धन , सम्पति,ऐश्वर्य,बल , ना यह पुण्य प्रभाव. !
पुण्य जगाये सत्प्रवृति , सदविचार सदभाव. !!
सदविचार सदभाव. और सदबुद्धि पुण्य फल !
दुर्विचार , दुर्भाव और दुर्बुद्धि पाप. मल. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,पाप ना करता निर्धन. !
हरता सबकी बुद्धि और दुख देता है धन !!

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,भोजन , पानी , हवा सम, नैतिकता अनिवार्य !
मानव के निर्माण हित , यह आवश्यक. कार्य !!
यह आवश्यक कार्य , प्रेरणा नैतिकता की !
लेते रहिये नित्य. जरूरत भौतिकता की !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,धरे नैतिकता जो जन. !
श्रेष्ठ रूप में करे नित्य , भौतिकता भोजन. !!

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हर जबाब है हृदय में , जो सवाल मन माहिं !
उतर जाइये हृदय सर , और तरीका नाहिं !!
और तरीका नाहिं , खोजिये अपने अंदर. !
शांति , सरसता , सुख सबका है यही समुंदर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि, ढूँढ़िये अपने भीतर. !
छुपा हुआ अपने ही अंदर. है जबाब. हर. !!


Muktak:

ग्यानीजन मन डरा ना, सकता भय संसार !
चाहे वह आकर खड़ा, होजाये निज संसार !!
हो जाये निज द्वार , खड़ा जन ना घबराये !
जैसे तीर नुकीला , पत्थर. से मुड़ जाये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,नहीं दहशत आये मन !
आत्मतत्व ना मरता , जाने यह. ग्यानी जन !!

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: बाहर दिखे न वस्तु वह , जो अंदर है नाहिं !
अंदर का सौंदर्य ही , दिखता है जग माहिं !!
दिखता है जग माहिं , यही सम्बंध हमारा !
सबका आदर करो , विश्व अपना है सारा !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,वृहत् का लघु अपना घर !
इसमें जो कुछ भरा , वही दिखता है बाहर. !!

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लाभ दिलाता जगत में , वह है केवल प्यार !
आलोचना, बुराइयाँ , लाभ न दें संसार !!
लाभ. न दें संसार , देखिये यह प्रयोग कर. !
काम बना ना पाता जग में कभी अनादर. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,प्रेम सब काम बनाता !
सहचरता, सहयोग जगत में लाभ दिलाता !!
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अगर निष्कपट भाव से , रहना प्रभु के पास !
तो मत करिये किसी से, कपट और परिहास !!
कपट और परिहास , जिसे भी दुख पहुँचाये !
उस दुख की आवाज ,व्याप्त प्रभु को तड़पाये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,जान लो तुम यह झटपट !
पहुँचोगे प्रभु पास , भाव हो अगर निष्कपट. !!


Muktak:

नहीं महत्ता आत्मा से ज्यादा जग और !
तत्व सार्वलौकिक यही, इसमें सबका ठौर !!
इसमें सबका ठौर, परे ना इससे कोई. !
आत्मतत्व से बड़ी महत्ता और न होई. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सृष्टि सब उसकी सत्ता !
सकल सृष्टि में इससे बढ़कर. नहीं महत्ता !!

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विषय वासना भूमि पर होय न आत्म विकास. !
समतल भूमि बनाइये , ले सनेह. हल खास !!
ले सनेह हल खास , यत्न करि भूमि सुधारो !
प्रेम वारि से सींच तपन सब खींच निकारो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,भस्म कर बीज कामना !
आत्म विकास पौध रोपो , तजि विषय वासना !!


Muktak:

पण्डित वा ग्यानी वही खुद को ले जो जान !
अन्तः चेतन भाव ही आत्मरूप पहचान !!
आत्मरूप पहचान जान ले जो अपने को !
वह भविष्य ग्याता , देखे भावी सपने को !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मा होय न खण्डित !
जो खुद को ले जान , वही कहलाये पण्डित. !!

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आत्म साधना करो नित , नश्वर है यह देह. !
पाना है अमरत्व तो बनकर रहो विदेह. !!
बनकर रहो विदेह , करो पूजा जीवन की !
ढ़ूँढ़ो अपने अंदर , धारा अपने पन. की !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,यही सच्ची उपासना !
पल भर में ही सुखी बना दे आत्म साधना !!
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मत ढ़ूँढ़ो बाहर जगत , सच्चे सुख का स्रोत !
सच्चे सुख का स्रोत तो अपने अंदर. होत !!
अपने अंदर होत , वही आनंद प्रदायक. !
बाह्य जगत में कहीं नहीं सुख अपने लायक!!

कह ंअनंग ंकरजोरि, बढ़ाओ अंदर चाहत !

बाहर आभासी सुख हैं, इनमें उलझो मत. !!

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लड़ना है तो आत्मा से लो युद्ध रचाय !
जीत गये तो ठीक है हारे हार न आय. !!
हारे हार न आय, आत्मा मालिक घर की !
मन की उल्टी चाल कामना दुनियाँ भर की !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मबल सँग नित बढ़ना !
बाहर करो न युद्ध सदा अंदर ही लड़ना !!

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जैसे मन की कामना , तन वासना प्रधान !
आत्मतत्व आवाज है ,अंतःकरण महान. !!
अंतःकरण महान , सदा सुन इसकी प्यारे !
आत्मतत्व के इसी रूप में दिखें नजारे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मा जानो एसे !
पुष्प प्रफुल्लित होकर , खुशबू देता जैसे !!
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जाग्रत करिये हृदय में , आत्मरूप का मान !
तत्पश्चात विचार कर , करिये कर्म जहान. !!
करिये कर्म जहान , आत्मा जो करवाये !
वही करो वा सुनो उसीकी , भ्रम ना आये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,हृदय उपजाओ सतव्रत !
आत्म सनेही दीप, हृदय में रखिये जाग्रत. !!


Muktak:

जीवन सतत चले सदा, बिन , मन , वा प्रान. !
बिन इन्दियँ वा मन बिना,जिसका रहता ग्यान !!
जिसका रहता ग्यान,खुशी गम जिसको है सम !
उसी तत्व को आत्मरूप कहते जग में हम. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,जान ले जो जग में जन !
लगे एकसा उसको जन्म , मृत्यु वा जीवन. !!
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अपने को जाने बिना दूर न होय अभाव !
आत्मग्यान ही जगत का,अंतिम ग्यान प्रभाव !!
अंतिम ग्यान प्रभाव, आत्म ग्यानी ही ईश्वर !
आत्मग्यान से सभी ग्यान दुनियाँ के कमतर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,ग्यान के देखो सपने !
आत्मग्यान से प्राणि मात्र सब लगते अपने !!
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जिसने जग में पा लिया , दुनियाँ का सब ग्यान !
पर खुद को जाना नहीं , वह बेकार. जहान. !!
वह बेकार जहान , निरर्थक ग्यान. जुटाता !
सतत चेतना भाव जगत का जान न पाता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सृष्टि उपजायी उसने !
पिण्ड तत्व में चेतनता भरवाई. जिसने !!


Muktak :

सदगुण हों यदि शुरू से , लें अपनापन खींच !
आत्मीयता , धैर्य को , पैदा करते सींच. !!
पैदा करते सींच , न आती मन अधीरता !
सफल पारिवारिक जीवन की खिले वीरता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,निकालो सारे दुर्गुण. !
शनैः शनैःभर लेउ खींचकर अन्दर सदगुण. !!

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घर में सुख की खोज,करो सुख लाओ ऊपर !
स्वयं सिद्ध सुख ही स्थाई. होता भू_ पर. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,दुखों की करो विदाई !
जमा करो छोटे छोटे सुख कर. स्थाई. !!

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पहला सुख निर्मल वदन , दूजा धन सम्पत्ति !
दुरुपयोग इनका हुआ , तो ये बने विपत्ति !!
तो ये बने विपत्ति , तीसरा है शिक्छा सुख. !
अहंकार से बचो अन्यथा यह देगा दुख. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मसुख सब पर दहला !
स्थाई वा स्वयं सिद्ध सुख यह. ही पहला !!

 

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धधकाता वा धधकता अंगारा है क्रोध !
बैर भाव इससे जगे ,जिसका फल प्रतिशोध !!
जिसका फल प्रतिशोध,जलाये अंदर अंदर. !
दुश्मन जले न जले , किन्तु खुद जले निरन्तर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि, क्रोध भारी तड़पाता !
सदविचार ,सदभाव, जलाता वा धधकाता !!

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केवल शब्दों पर टिका है भाषा विग्यान. !
लेकिन उसमें भाव से डाले जाते प्रान !!
डाले जाते प्रान , चेतना भाव जगाती !
शब्द, अर्थ वा वाणी मिल भाषा बन जाती !!
कह अनंग ंकरजोरि,यही है भाषा का बल !
वाणी, शब्द और भावों से नाता केवल. !!

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सदा परस्पर कीजिये , सज्जनता व्यवहार. !
उदारता स्नेह से , सबका करो दुलार. !!
सबका करो दुलार ,बनो सबके सहयोगी !
परहित नित उर धारि, बनो सबके उपयोगी !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,चलो सतपंथ निरंतर !
शिष्ट और शालीन भाव हो सदा परस्पर !!
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मैं किसका हूँ ?कौन हूँ ? खुद से करो सवाल !
मानव जीवन लक्छ्य क्या ?क्या है इसका हाल !!
क्या है इसका हाल , करूँ में पूजा किसकी ?
क्या है मेरा धर्म ?धारणा सोचूँ जिसकी !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,उजाला जग में जिसका !
उसका हूँ या अंधकार का, हूँ मैं किसका ??
अनंग पाल सिंह भदौरिया ग्वालियर


Muktak :

आत्मीयता , समझ वा गहन प्रेम की राह !
इससे अंतर्जगत में पैदा होती चाह. !!
पैदा होती चाह , स्वभाव न बने अचानक !
संचित संस्कार जन्मों के , दिखलाते हक !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,श्रेष्ठ गुण है वरीयता !
सबसे करो सनेह , जगाओ. आत्मीयता !!


Muktak :

खुशियाँ हृदय विचारिये , खुशियाँ आतीं दौड़ !
दुख का किया विचार तो,दुख का बनता जोड़ !!
दुख का बनता जोड़, सोच की ताकत. भारी !
सकारात्मक सोच हेतु , करिये तैय्यारी !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सोच पथ चलती दुनियाँ !
दुख सोचो दुख मिले , खुशी से मिलतीं खुशियाँ !!


Muktak :

अगर प्रयोजन में रहे अपना दृढ़ विश्वास !
तो निश्चय कर मानिये बदल जाय इतिहास !!
बदल जाय इतिहास,प्रयोजन लक्छ्य बनाओ !
दृढ़ता वा संकल्प शक्ति अंदर. उपजाओ. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सफलता देय यह डगर !
प्रवल आत्मविश्वास , प्रयोजन हेतु है अगर. !!


Muktak :

जन्मा हूँ जिस देश में , उसकी शान महान. !
हिमगिरि सा पुण्यात्मा , सुरसरि सा वरदान !!
सुरसरि सा वरदान , महाराणा सा दमखम. !
वीर शिवाजी जैसे योध्दा हैं जग में कम !!
कह ंअनंग. ंकरजोरि,जन्म ले यहाँ अजन्मा !
मैं गर्वित हूँ इसी देश में मैं हूँ जन्मा !!


Muktak :

जिम्मेदारी स्वयं की ले लो अपने हाथ !
फिर तुम खुद चल पड़ोगे निज सपनों के साथ !!
निज सपनों के साथ,जगेगी उन्नत चाहत !
विकसित होगी प्रवल कामना जो दे राहत !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,शक्ति है अंदर भारी !
ले लो अपने हाथ स्वयं की जिम्मेदारी !!


Muktak :

अपने को पहचानना अाध्यात्म आधार !
अपने में उस रूप को देखो भली प्रकार !!
देखो भली प्रकार,साथ है वह नित तेरे !
चिन्ता ,भय,अवसाद , बना लेते निज घेरे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,न दे अग्यान पनपने !
जो कुछ सृष्


Muktak :

समय अवधि वा कार्यमें , व्यवहारिकता लाव !
वरना पैदा करेगी , यह मन माहिं तनाव. !!
यह मन माहिं तनाव , देय अवसाद. घनेरा !
अतः समय के बंधन. पर मत खींचो घेरा !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,रिक्त कुछ करो वक्त तय !
फिर तनाव ना देगा तुमको, कभी ये समय. !!


Muktak :

अभिमानी यदि देवता , तो वह दानव जान !
शिष्ट , नम्र, व्यवहारयुत, मानव देव समान. !!
मानव देव समान , अहं जिसने ठुकराया !
देव ,दनुज बन जाय,अहं यदि उसमें आया !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,बात यह बहुत पुरानी !
कभी न जग में आदर पाता जन अभिमानी !!


Muktak :

प्रसन्नता की शत्रु हैं , इच्छायें अतिरिक्त. !
कम से कम यदि कामना,तो जन प्रेमासिक्त !!
तो जन प्रेमासिक्त, कामनायें दुख देतीं !
चिन्ता, भय ,अवसाद, मुफ्त में जग से लेतीं !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कामना और खिन्नता!
दोनों एकइ रूप. हड़प करलें प्रसन्नता !!


Muktak :

जैसे सरिता जल बहे , आसमान में वायु !
वैसे ही ये रात दिन , लेकर उड़ते आयु !!
लेकर उड़ते आयु , लौटकर ना वह आते !
इसी तरह निज उम्र आदमी यहाँ गँवाते !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,काटिये जीवन एसे !
सत्कर्मों में हर पल छण प्रयुक्त हो जैसे !!


Muktak :

समय कमी की शिकायत, करते वह इंसान !
दुरुपयोग जो समय का, करते बिना विधान !!
करते बिना विधान , करें ना उचित प्रबंधन. !
जब देखो तब समय कमी का करते क्रंदन. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,युक्ति आसमां जमीं की !
देखो, फिर ना रहे शिकायत ,समय कमी की !!


Muktak :

नौका में पानी तथा घर में धन की बाढ़ !
दोनों हाथ उलीचिये , बाहर करिये काढ़ !!
बाहर करिये काढ़ , बुध्दिमानी यह जानो !
धन का संग्रह दुख देता है बहुत सुजानो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,चूक मत परहित मौका !
अगर न बाहर किया नीर धन डूबे नौका !!


Muktak :

इच्छा ही बढ़कर बने सुघड़ कामना रूप. !
होय कामना परिष्कृत. तो संकल्प स्वरूप !!
तो संकल्प स्वरूप , भक्ति ईश्वर की पाता !
भौतिकता की सीढ़ी भी यह ही चढ़वाता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,उच्चता देय सदेच्छा !
आध्यात्मिकता भौतिकता देती है इच्छा !!


Muktak :

इच्छा भी इक शक्ति है, इसे न खाली छोड़ !
अनुशासन में राखिये, इसको तोड़ मरोड़ !!
इसको तोड़ मरोड़ , बाँधिये परमेश्वर से !
बिना धर्म ना बँधे धारणा अपने घर. से !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,व्यवस्थित होना अच्छा !
इससे अंदर पैदा होती अच्छी अच्छी इच्छा!!


Muktak :

जो जो चीजें मिलाकर , विधि ने रचा मनुष्य !
उन्हें हटा दो अगर तो, वह मिट जाय अवश्य !!
वह मिट जाय अवश्य , श्रेष्ठ कोई निर्माता !
जो है रचनाकार. सृष्टि भर रंग. रचाता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,श्रेष्ठ जो उसको खोजो !
कैसे रचे मिलाय, चीज. आवश्यक जो जो !!


Muktak :

मानव को जीवित रखे , शक्ति श्रेष्ठ विश्वास !
अगर हिला विश्वास तो, छूटे जीवन आश. !!
छूटे जीवन आश , अंत जीवन का मानो !
श्रेष्ठ शक्ति विश्वास सजाकर. रखो सुजानो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,यही लोगों के अनुभव !
है विश्वास शक्ति ही जिससे जीवित. मानव. !!


Muktak :

हित,मित,गृाही जो वचन , बोलो एसा सत्य !
बोला कटुसत्य तो नहीं रुचे यह. कृत्य. !!
नहीं रुचे यह कृत्य , हजम ना होय सचाई. !
सम्वेदना,पृसंसा मिश्रित. बोलो भाई. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,ध्यान रखिये यह नितनित !
बोलो एसे वचन दिखे जिसमें सबका हित. !!


Muktak :

अवसर वा तैय्यारियों का जो मेल मिलाप. !
किस्मत बनकर उभरता इसको समझो आप !!
इसको समझो आप, करो भरसक तैय्यारी !
अवसर जब भी आये , बन जाये हितकारी !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सतत उपयोगी श्रमकर !
देंगें लाभ. तुम्हें , आयेंगे जो भी अवसर. !!


Muktak :

कर्मशीलता, उदासी , का ना कोई योग. !
वह उदास रहते नहीं , कर्मशील जोलोग !!
कर्मशील जो लोग, सदा उत्साह सँजोते !
लोग आलसी और पृमादी रहते रोते !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,उचित ना दीन हीनता !
साथ साथ ना रहे, उदासी, कर्मशीलता !!


Muktak :

इच्छायें या इरादे , दें भविष्य. में ठेल !
वर्तमान आनंद को ,अंदर भरो धकेल. !!
अंदर भरो धकेल , जियो गरिमामय जीवन !
इच्छायें आनंदहीन. कर देती है मन. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कामनायें तड़पायें !
इसीलिये बाहर कर दो, निकाल इच्छायें !!


Muktak :

वक्त इकाई से बनी , है जीवन की डोर !
व्यर्थ. नष्ट मत कीजिये, देखो इसकी ओर !!
देखो इसकी ओर , व्यर्थ मत इसे गँवाओ !
श्रेष्ठ मनुज तन मिला,इसे सदराह चलाओ !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,बड़ी इसकी पृभु ताई !
श्रेष्ठ कार्य हित करो नियोजित वक्त इकाई !


Muktak :

अपनाये दुख की डगर. सुख की रस्ता भूल. !
कभी चले अनुकूल मन, कभी चले पृतिकूल !!
कभी चले पृतिकूल, सत्य ना देय. दिखाई. !
फैलाये भृम जाल , स्वयं उसमें फँस जाई !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,असलियत उसे न भाये !
सुख की रस्ता भूल, डगर दुख की अपनाये !!


Muktak :

संस्कृति वा साहित्य में , भारत है धनवान !
महापुरुष इस भूमि पर , रचते नया विधान !!
रचते नया विधान, सिखाते जीवन. जीना !
करते हैं जन चूक, समझ यह पायँ कभीना !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,देश भारत अनुपम कृति !
परमेश्वर ने स्वयं रची है यहाँ संस्कृति !!


Muktak :

केवल मानव जीव ही एेसा दिखे जहान. !
जहाँ श्रेष्ठता , तुच्छता दोनों एक समान !!
दोनों एक समान ,चढ़े देवता बनादे !
अगर तुच्छता पर उतरे , पशु को शरमा दे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,समझिये मानव का बल !
धन रिण दोनों ओर भागता मानव केवल. !!


Muktak

पृवचन में मिथ्या कहें , जग के माया मोह !
पर जीवन व्यवहार में , ना छूटे व्यामोह. !!
ना छूटे व्यामोह, भेद. कथनी करनी में !
बनी रहे आसक्ति हमेशा घर. घरनी में !!
कहंअनंग ंकरजोरि,कर्म है अविकल जीवन !
खुद हैं शांति विहीन , और को देते पृवचन. !!


Muktak

डर के बल से भी बड़ा, बल है सच्चा प्यार !
बच्चों को समझाइये , कर सनेह व्यवहार. !!
कर सनेह व्यवहार , हृदय उनके घुस जाओ !
अंतर के अंतर में अपनी जगह. बनाओ. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,तुम्हारे रहें उमृ भर !
करो पृेम व्यवहार , दिखाओ मत उनको डर !!


:

Muktak :

रहता है जन अकेला, अहंकार के संग !
जीवन भर चलता अलग लेकर फीके रंग !!
लेकर फीके रंग , चले नित समानान्तर. !
अहंकार का बोझ उठाये फिरता बाहर. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,जिन्दगी भर दुख सहता !
अहंकार को गला न पाता अकड़ा रहता !!


Muktak :

नित पाने की होड़ में , लगा हुआ संसार !
यही समस्या मूल है , समझो भली पृकार !!
समझो भली पृकार ,लगाहै व्यक्ति होड़ में !
स्वार्थ पूर्ति हित लगारहे निज जोड़ तोड़ में !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,वस्तुयें हैं अति सीमित !
आपा धापी मचा रहा है , हर मानव. नित. !!


Muktak :

जीवन में आध्यात्म कम, खरच दिखावा खूब !
रजोगुणी वह भक्त हैं , पूजा करते डूब. !!
पूजा करते डूब, खूब चिल्लाते जय. जय. !
अंदर हो दुख भले, दिखें बाहर से सुख मय !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,दिखाते हैं अपनापन !
आध्यात्म ना धर्म , कपट , छल से युत जीवन !!


Muktak :

मानव करता कर्म सब , अपनी पृकृति अधीन. !
बदल न पाता नियति निज,यद्यपि परम पृवीन !!
यद्यपि परम पृवीन ,जगत अपना वह. गढ़ता !
कर्म त्याग ना सके, आदतें लेकर. बढ़ता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कहूँ रिषियों के अनुभव !
अपनी पृकृति अधीन का सब करता मानव. !!


Muktak :

भूलें चूकें ,गल्तियाँ, होतीं मित्र समान !
अनजाने में ही सही, देती सीख महान !!
देती सीख महान ,सिखाती आगे बढ़ना !
गलती को स्वीकार, सीखिये ऊपर चढ़ना !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,भूल से हिलती चूलें !
उनसे लो कुछ सीख,सिखाती निश्चित भू लें !!


Muktak :

होता अच्छी भावनासे डर भय का नाश. !
मूर्खता का बुद्धि से होता सहज विनाश !!
होता सहज विनाश नमृता दुर्गति रोके !
दान करे से मिट जाते, दरिदृता झों के !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सादगी जो जनढोता !
.पाता है सम्मान सदा, हैरान न होता !!


Muktak :

आवश्यकता कम करो , सुख का यही उपाय !
जितनी बढ़ें जरूरतें , उतना ही सुख जाय. !!
उतना ही सुख जाय , कामना दुख की माता !
इच्छाओं के साथ , दुखों का गहरा नाता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,तभी सुख अंदर जगता !
इच्छायें घट जाँय , रहे ना आवश्यकता !!


Muktak :

डालो धागा सुई में, भले करो फिर छेद !
धागे से जुड़ जायगा ,उपजेगा जो भेद. !!
उपजेगा जो भेद ,उसे धागा जोड़ेगा !
धागा सुई एक होकर समाज मोड़ेगा !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,द्वेष मत उर में पालो !
सिल दो हर विखराव, सुई में धागा डालो !!


Muktak :

आत्मतत्व से जोड़कर , देखो कर्म विधान !
ईश्वर की परिकल्पना , हो जाती आसान !!
हो जाती आसान, कर्म सिद्धांत. जानिये !
बिना कर्म के जीवन चलता नहीं मानिये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कर्म के अति महत्व से !
सृष्ठा सृष्टि चलाता है यह, आत्म तत्व. से !!??


Muktak :

धर्मधारणा एक सी, होती कभी न मित्र !
एक धर्म में भी दिखें, बहु मतभेद विचित्र !!
बहु मतभेद विचित्र, धर्म को विकृत बनाते !
अपनेअपने तर्कों से निज पंथ. सजाते !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सभी की इक विचारणा !
कर्म विधान बिना ना कोई. , धर्म धारणा !!


Muktak :

खूबसूरती से अगर , करना चाहो काम !
करो स्वयं उस काम को,शुभ होंगे परिणाम !!
शुभ होंगे परिणाम,काम निज हाथ सँवारो !
निष्ठा,लगन,जुनून,जोश, उत्साह. उभारो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि, ईर्ष्या दृष्टि घूरती !
करो स्वयं निज काम, दिखे तब खूबसूरती !!


Muktak :

धंधे में ज्यों जरुरी , परिश्रम वा ईमान. !
श्रद्धा वा विश्वास का,वह घर में स्थान !!
वह घर में स्थान,सभी की मंशा जानो !
सबकी रुचि अनुसार,पूर्ति हित उपकृम ठानो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,न बनकर रहिये अंधे !
सब पर रखो निगाह, तभी सब चलते धंधे !!


Muktak :

रिश्तों में बढ़ता दिखे , आज शिकायत दौर. !
भौतिक जग करता नहीं,अब रिश्तों पर गौर !!
अब रिश्तों पर गौर, नहीं करती भौतिकता !
भूखी,नंगी रुदन कर रही है नैतिकता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कटे जीवन किश्तों में !
सौदा अथवा बोझ , आज दिखता रिश्तों में !!


Muktak :

मानव का व्यक्तित्व है, जैसे पुष्प सुगंध !
फैलाओ सद्भाव जग , यह पृभु का अनुबंध !!
यह पृभु का अनुबंध, इसे जो जग में तोड़े !
ईश्वर से विश्वासघात करि, निज पथ मोड़े !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कहूँ अबतक के अनुभव !
काम नहीं ईश्वर के आया, जग में मानव. !!


Muktak :

अंतर,पद कद में बड़ा, पद बाहरी  विधान. !

कद लम्बा गरिमामयी , मानव की पहचान !!

मानव की पहचान, श्रेष्ठतम उसकी गरिमा  !

कद इसको ही कहें,यही है मानव. महिमा  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,झाँकिये अपने अंदर !

पद वा कद में,बहुत बड़ा  होता है  अन्तर   !!

 


Muktak :

मानवता निर्माण में दो कारण हैं  श्रेष्ठ  !

सदविचार वा ग्यान का सम्बल रहे यथेष्ठ !!

सम्बल रहे यथेष्ठ ,एक यदि कम पड़ जाये !

तो मानव को मानवता से दूर  हटाये  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,इसीमें है दानवता !

रखो संतुलन दोनों में, उपजे  मानवता  !!


Muktak :

बल महान है आत्मबल , और आत्म विश्वास  !

इससे ही हर विपति का , होय सामना खास. !!

होय सामना खास, विपति हर डर कर. भागे  !

मिले हमेशा विजय ,आत्मबल यदि उर जागे !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मसंयम हो केवल !

विपदाओं पर बहुत पड़ेगा भारी  यह.  बल  !!


Muktak :

जो जन अपने सामने , कहें और की बात. !

उससे अपने राज को, कभी न कहिये भृात !!

कभी न कहिये भृात, समझिये उसकी आदत !

कभी किसीके साथ कहीं कर जाय बगावत  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,राज रखिये अपने मन!

उससे कहो न भेद, और का कहता  जो जन !!


Muktak :

दूषित दृश्यों से भरे चिंतन और चरित्र !
आँखों से जो रस मिले, वह कितना अपवित्र !!
वह कितना अपवित्र, करे अंतरमन. मैला !
कुविचारों की भीड़ भरा मन माहिं तबेला !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,इन्ही से है जन भूषित !
फौज विचारों की घेरे रहती नित दूषित. !!


Muktak :

ेजो श्रम देता है हमें अतुलनीय आनंद !
आधि व्याधि का रास्ता कर देता है बंद !!
करदेता है बंद, वेदना की निवृति है !
देता है हर खुशी, मानवी यही पृकृति है !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,जानिये वह अमृत सम!
देता हैआनंद आंतरिक,तुमको जो श्रम. !!


Muktak :

जगत समन्दर रूप है परेशानियाँ नीर. !
पूरी छमता लगन से करो पृयास सुवीर !!
करो पृयास सुवीर,और मत सोचो आगे !
साहस,शौर्य देख विपदा खुद डर कर भागे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मबल है अति सुंदर !
इसके आगे छोटा लगता जगत समुन्दर. !!


Muktak :

परेशानियाँ पंथ की दृढ़ता देंय सिखाय !
दिक्कत निज अनुरूप ही देतीबड़ा बनाय !!
देती बड़ा बनाय, दिक्कतों से मत डरिये !
दिक्कत मार्ग स्वयं दिखलाती वह अनुसरिये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सहन कर लेउ हानियाँ !
उपजाती विश्वास अटल,ये परेशानियाँ !!

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