0211 – Annang Pal Singh Bhadoriya ‘ Annang’

 

Muktak :

अपनाये दुख की डगर. सुख की रस्ता भूल. !
कभी चले अनुकूल मन, कभी चले पृतिकूल !!
कभी चले पृतिकूल, सत्य ना देय. दिखाई. !
फैलाये भृम जाल , स्वयं उसमें फँस जाई !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,असलियत उसे न भाये !
सुख की रस्ता भूल, डगर दुख की अपनाये !!


Muktak :

संस्कृति वा साहित्य में , भारत है धनवान !
महापुरुष इस भूमि पर , रचते नया विधान !!
रचते नया विधान, सिखाते जीवन. जीना !
करते हैं जन चूक, समझ यह पायँ कभीना !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,देश भारत अनुपम कृति !
परमेश्वर ने स्वयं रची है यहाँ संस्कृति !!


Muktak :

केवल मानव जीव ही एेसा दिखे जहान. !
जहाँ श्रेष्ठता , तुच्छता दोनों एक समान !!
दोनों एक समान ,चढ़े देवता बनादे !
अगर तुच्छता पर उतरे , पशु को शरमा दे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,समझिये मानव का बल !
धन रिण दोनों ओर भागता मानव केवल. !!


Muktak

पृवचन में मिथ्या कहें , जग के माया मोह !
पर जीवन व्यवहार में , ना छूटे व्यामोह. !!
ना छूटे व्यामोह, भेद. कथनी करनी में !
बनी रहे आसक्ति हमेशा घर. घरनी में !!
कहंअनंग ंकरजोरि,कर्म है अविकल जीवन !
खुद हैं शांति विहीन , और को देते पृवचन. !!


Muktak

डर के बल से भी बड़ा, बल है सच्चा प्यार !
बच्चों को समझाइये , कर सनेह व्यवहार. !!
कर सनेह व्यवहार , हृदय उनके घुस जाओ !
अंतर के अंतर में अपनी जगह. बनाओ. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,तुम्हारे रहें उमृ भर !
करो पृेम व्यवहार , दिखाओ मत उनको डर !!


:

Muktak :

रहता है जन अकेला, अहंकार के संग !
जीवन भर चलता अलग लेकर फीके रंग !!
लेकर फीके रंग , चले नित समानान्तर. !
अहंकार का बोझ उठाये फिरता बाहर. !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,जिन्दगी भर दुख सहता !
अहंकार को गला न पाता अकड़ा रहता !!


Muktak :

नित पाने की होड़ में , लगा हुआ संसार !
यही समस्या मूल है , समझो भली पृकार !!
समझो भली पृकार ,लगाहै व्यक्ति होड़ में !
स्वार्थ पूर्ति हित लगारहे निज जोड़ तोड़ में !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,वस्तुयें हैं अति सीमित !
आपा धापी मचा रहा है , हर मानव. नित. !!


Muktak :

जीवन में आध्यात्म कम, खरच दिखावा खूब !
रजोगुणी वह भक्त हैं , पूजा करते डूब. !!
पूजा करते डूब, खूब चिल्लाते जय. जय. !
अंदर हो दुख भले, दिखें बाहर से सुख मय !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,दिखाते हैं अपनापन !
आध्यात्म ना धर्म , कपट , छल से युत जीवन !!


Muktak :

मानव करता कर्म सब , अपनी पृकृति अधीन. !
बदल न पाता नियति निज,यद्यपि परम पृवीन !!
यद्यपि परम पृवीन ,जगत अपना वह. गढ़ता !
कर्म त्याग ना सके, आदतें लेकर. बढ़ता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कहूँ रिषियों के अनुभव !
अपनी पृकृति अधीन का सब करता मानव. !!


Muktak :

भूलें चूकें ,गल्तियाँ, होतीं मित्र समान !
अनजाने में ही सही, देती सीख महान !!
देती सीख महान ,सिखाती आगे बढ़ना !
गलती को स्वीकार, सीखिये ऊपर चढ़ना !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,भूल से हिलती चूलें !
उनसे लो कुछ सीख,सिखाती निश्चित भू लें !!


Muktak :

होता अच्छी भावनासे डर भय का नाश. !
मूर्खता का बुद्धि से होता सहज विनाश !!
होता सहज विनाश नमृता दुर्गति रोके !
दान करे से मिट जाते, दरिदृता झों के !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सादगी जो जनढोता !
.पाता है सम्मान सदा, हैरान न होता !!


Muktak :

आवश्यकता कम करो , सुख का यही उपाय !
जितनी बढ़ें जरूरतें , उतना ही सुख जाय. !!
उतना ही सुख जाय , कामना दुख की माता !
इच्छाओं के साथ , दुखों का गहरा नाता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,तभी सुख अंदर जगता !
इच्छायें घट जाँय , रहे ना आवश्यकता !!


Muktak :

डालो धागा सुई में, भले करो फिर छेद !
धागे से जुड़ जायगा ,उपजेगा जो भेद. !!
उपजेगा जो भेद ,उसे धागा जोड़ेगा !
धागा सुई एक होकर समाज मोड़ेगा !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,द्वेष मत उर में पालो !
सिल दो हर विखराव, सुई में धागा डालो !!


Muktak :

आत्मतत्व से जोड़कर , देखो कर्म विधान !
ईश्वर की परिकल्पना , हो जाती आसान !!
हो जाती आसान, कर्म सिद्धांत. जानिये !
बिना कर्म के जीवन चलता नहीं मानिये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कर्म के अति महत्व से !
सृष्ठा सृष्टि चलाता है यह, आत्म तत्व. से !!??


Muktak :

धर्मधारणा एक सी, होती कभी न मित्र !
एक धर्म में भी दिखें, बहु मतभेद विचित्र !!
बहु मतभेद विचित्र, धर्म को विकृत बनाते !
अपनेअपने तर्कों से निज पंथ. सजाते !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सभी की इक विचारणा !
कर्म विधान बिना ना कोई. , धर्म धारणा !!


Muktak :

खूबसूरती से अगर , करना चाहो काम !
करो स्वयं उस काम को,शुभ होंगे परिणाम !!
शुभ होंगे परिणाम,काम निज हाथ सँवारो !
निष्ठा,लगन,जुनून,जोश, उत्साह. उभारो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि, ईर्ष्या दृष्टि घूरती !
करो स्वयं निज काम, दिखे तब खूबसूरती !!


Muktak :

धंधे में ज्यों जरुरी , परिश्रम वा ईमान. !
श्रद्धा वा विश्वास का,वह घर में स्थान !!
वह घर में स्थान,सभी की मंशा जानो !
सबकी रुचि अनुसार,पूर्ति हित उपकृम ठानो !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,न बनकर रहिये अंधे !
सब पर रखो निगाह, तभी सब चलते धंधे !!


Muktak :

रिश्तों में बढ़ता दिखे , आज शिकायत दौर. !
भौतिक जग करता नहीं,अब रिश्तों पर गौर !!
अब रिश्तों पर गौर, नहीं करती भौतिकता !
भूखी,नंगी रुदन कर रही है नैतिकता !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कटे जीवन किश्तों में !
सौदा अथवा बोझ , आज दिखता रिश्तों में !!


Muktak :

मानव का व्यक्तित्व है, जैसे पुष्प सुगंध !
फैलाओ सद्भाव जग , यह पृभु का अनुबंध !!
यह पृभु का अनुबंध, इसे जो जग में तोड़े !
ईश्वर से विश्वासघात करि, निज पथ मोड़े !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,कहूँ अबतक के अनुभव !
काम नहीं ईश्वर के आया, जग में मानव. !!


Muktak :

अंतर,पद कद में बड़ा, पद बाहरी  विधान. !

कद लम्बा गरिमामयी , मानव की पहचान !!

मानव की पहचान, श्रेष्ठतम उसकी गरिमा  !

कद इसको ही कहें,यही है मानव. महिमा  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,झाँकिये अपने अंदर !

पद वा कद में,बहुत बड़ा  होता है  अन्तर   !!

 


Muktak :

मानवता निर्माण में दो कारण हैं  श्रेष्ठ  !

सदविचार वा ग्यान का सम्बल रहे यथेष्ठ !!

सम्बल रहे यथेष्ठ ,एक यदि कम पड़ जाये !

तो मानव को मानवता से दूर  हटाये  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,इसीमें है दानवता !

रखो संतुलन दोनों में, उपजे  मानवता  !!


Muktak :

बल महान है आत्मबल , और आत्म विश्वास  !

इससे ही हर विपति का , होय सामना खास. !!

होय सामना खास, विपति हर डर कर. भागे  !

मिले हमेशा विजय ,आत्मबल यदि उर जागे !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मसंयम हो केवल !

विपदाओं पर बहुत पड़ेगा भारी  यह.  बल  !!


Muktak :

जो जन अपने सामने , कहें और की बात. !

उससे अपने राज को, कभी न कहिये भृात !!

कभी न कहिये भृात, समझिये उसकी आदत !

कभी किसीके साथ कहीं कर जाय बगावत  !!

कह ंअनंग ंकरजोरि,राज रखिये अपने मन!

उससे कहो न भेद, और का कहता  जो जन !!


Muktak :

दूषित दृश्यों से भरे चिंतन और चरित्र !
आँखों से जो रस मिले, वह कितना अपवित्र !!
वह कितना अपवित्र, करे अंतरमन. मैला !
कुविचारों की भीड़ भरा मन माहिं तबेला !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,इन्ही से है जन भूषित !
फौज विचारों की घेरे रहती नित दूषित. !!


Muktak :

ेजो श्रम देता है हमें अतुलनीय आनंद !
आधि व्याधि का रास्ता कर देता है बंद !!
करदेता है बंद, वेदना की निवृति है !
देता है हर खुशी, मानवी यही पृकृति है !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,जानिये वह अमृत सम!
देता हैआनंद आंतरिक,तुमको जो श्रम. !!


Muktak :

जगत समन्दर रूप है परेशानियाँ नीर. !
पूरी छमता लगन से करो पृयास सुवीर !!
करो पृयास सुवीर,और मत सोचो आगे !
साहस,शौर्य देख विपदा खुद डर कर भागे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मबल है अति सुंदर !
इसके आगे छोटा लगता जगत समुन्दर. !!


Muktak :

परेशानियाँ पंथ की दृढ़ता देंय सिखाय !
दिक्कत निज अनुरूप ही देतीबड़ा बनाय !!
देती बड़ा बनाय, दिक्कतों से मत डरिये !
दिक्कत मार्ग स्वयं दिखलाती वह अनुसरिये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सहन कर लेउ हानियाँ !
उपजाती विश्वास अटल,ये परेशानियाँ !!

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