B 0212 – Shabnam Sharma

Kavita :

अंधेरों में तैरते शब्द

**

 

कुछ अंधेरों में

जुगनुओं से तैरते

शब्द पकड़ने हैं मुझे,

पानी में उड़ती

तितलियों के परों

पर लिखनी है

कहानियाँ,

पर क्या करूँ,

बन्द हो गई है

मेरी ज़िन्दगी के

कमरे की सारी

खिड़कियाँ,

कभी-कभी आती

है रोशनी की

इक किरन,

चीर कर,

खिड़कियों के मोटे

परदों के बीच से,

तब तक सिर्फ

बुनती हूँ अपना

साँसों का स्वैटर

और ठिठुर जाती

है ज़िन्दगी,

कुछ आगे सोचते-सोचते।


Kavita :

रास्ता

**

 

होश संभलते ही

शुरु हो गया चलना

ज़िन्दगी के रास्ते की ओर,

बिन परवाह किये, गरम हवाओं की,

सरद थपेड़ों की, बर्फीले टीलों की,

गरम रेगिस्तानों की, मैं बढ़ती ही गई,

कई बार कोशिश थी ओलों की

जो बरसे मेरे सिर पर,

पर मैं न रुकी, क्यूंकि मुझे

पकड़नी थी मंजिल की वो हवा

जो सुकून देती ताउम्र,

आ गया मंजर, धीमी पड़ गई

दौड़ की गति,

लगा उलटी गिनती शुरु हो गई थी

कभी भावनाएँ, किसी भी मौसम से

न डरी,

अब मन सिर्फ सोच भर से कांपने लगा,

क्यूंकि दौड़ में शामिल हो गये थे

कई ज्वालामुखी, जिन्हें पार करना

मेरे बस में न था।


Kavita :

मेरी तस्वीर

***

मैंने अपने हाॅल में,

अपने बचपन, जवानी

और आज की तस्वीर

लगा दी,

आया वो बरसों बाद,

बैठा, निहारने लगा, कमरे में

लगी तस्वीरों को,

धीमे-धीमे कदमों से

चलता रहा, बुदबुदाता,

मुस्कराता, खुद से खुद

को कुछ कहता, फिर से

बैठ गया सोफे पर,

पूछ ही बैठी, ‘‘क्या सोच रहे हो?’’

चाय की चुसकी लेते,

मेरी ओर देखते मुस्कराया,

बोला, ‘‘ये तुम्हारी सब

तस्वीरें कुछ बोल रही,

वही सोच रहा था,

बस क्या कहूँ, बस इतना ही काफी

कि तुम बच्चा भी प्यारा थी,

लड़की भी और आज इक माँ और

बीवी भी सुन्दर हो।’’

 


Kavita :

पीड़ा

**

 

कितनी कठिन वो पीड़ा

सहनी, जो शब्द नहीं

रखती,

सिर्फ और सिर्फ

आप महसूस कर सकते,

जो तुम्हें अपनों ने

दी हो,

कुछ शब्दों से,

कुछ इशारों से,

टूट जाता है सब

बिखर जाता है सब

रह जाती सिर्फ़ ये

देह जो कुछ कर नहीं सकती,

तड़पता है दिन,

रोती है रात

पर क्या फ़र्क पड़ता है

किसी को?

पीड़ा सिर्फ उसकी है

जो सहन करते हैं

उनकी नहीं जो

देते हैं।


Kavita :

वो पल

**

 

वो पल जब तुम आये,

मेरा हाथ माँगने, पर

निकाल दिये गये घर से,

ये कहकर, ‘‘तुम्हारी जाति

हमसे मेल नहीं खाती।’’

टूट गई मैं

ब्याह दी गई अपनी जाति में,

जहाँ सदैव कुंठित रही,

एक भी साँस आज़ाद न था,

ज़लालत की हदें पार थी,

प्यार का मतलब सिर्फ

स्वार्थ ही था।

बर्बाद हो गया मेरा सम्पूर्ण

अस्तित्व। मैं सिर्फ बनी

उनके घर का इक पायदान।

याद आता मुझे सदैव

तुम्हारा वो बाँहों में समेटना,

छोटी-छोटी बात पर मुझे संभालना,

कहाँ थी जाति, सिर्फ मन और

आप। क्यूँ बंधते हैं हम

इन ढकोसलों में

मन की जगह।

215 Total Views 3 Views Today
Share This

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *