B 0214 – Dr. Prashant Dev Mishra

Kavita :

“कश की कश्मकश ”

***

सिगरेट,
पीना बुरी बात है-

सेहत ,रिवायत,मुहब्बत
सब के लिये।

मग़र,
तेरी बेपनाह यादों के जालों से
घिरा हुआ इंसान,
आखिर,

करे भी तो क्या?

शायद सिगरेट प्रतीक है-

“टूटे आशिकों के ज़ज़्बात को बहलाने का”

मैं,
सिगरेट इसलिये पीता हूं।
क्योंकि मुझे लगता है,
तुझे ,
मेरे करीब सिगरेट ही लायी थी।!!

उन दिनों ,
मैं बेफ़िक्र था।
जवां हसरतों का एहसास हुआ था।
जब पहली बार सिगरेट को छुआ था।

वो,
सफ़ेद गोल-लंबे कागज़ में
भरी हुई तंबाकू,
पीला-सफ़ेद , फ़िल्टर,

मर्दानगी को ललकारती वैधानिक चेतावनी-
“सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।”

लेकिन मैं पीता था,
आज़ादी से जीता था।

फिऱ,
तू आयी हयात में,
पहली मुलाक़ात में,
मैंने तुझे एक शहरी नुक्कड़ पर देखा।

पान की दुकान पर बेपरवाहः
सिगरेट पीता हुआ,
और,
तुझे चाहत की नज़र से ताकता हुआ,
मैं।

हर कश के साथ,
पटियाला-सलवार कुर्ता पहने,
झारखण्ड स्टाइल में जूड़ा बनाये,
क्या लग रही तू?

“लियोनार्डो डा विंसी ”
की “मोनालिसा”

मुझे तू ,
और अच्छी , और अच्छी ,लगती गयी।

कश की कशमकश में
हम करीब होते गए।
वाह!
क्या नसीब होते गए।

मैं सिगरेट और सुलगाने लगा।
तेरे और करीब आने लगा।
और तू हमदर्द बनी।
सिगरेट से हुई तेरी दुश्मनी।

तू ,मुझे सिगरेट पीते देखती।
तो सिगरेट तोड़ के फेंक देती।
एक बेरोज़गार के लिए,
पांच रूपये का नुक़सान भी बड़ी बात होती है।

मग़र ,
सह लेता था।
क्योंकि सिगरेट को तू अपनी सौतन समझने लगी थी।

मैं सिगरेट पीकर आता,
तुझसे उसकी महक छुपाता,
कभी सुपारी कभी इलायची से,
लेकिन ,

तू उँगलियों की महक से भी जान जाती थी,
कि मैंने सिगरेट पी है।
और एक जुमला,
जो आज़ भी याद है,
मुझे,

“एक सिगरेट इंसान की ज़िन्दगी के
पांच मिनट कम कर देती है”।

ये तूने किसी डॉक्टर के मुँह से सुन लिया था,
रोज़ यही जुमला तू मुझे सुनाती थी।

लेकिन,
मुझसे सिगरेट छोड़ने की ज़िद करने वाली,
जाने क्यों वादा-ए-हालात
तू मुझको छोड़ गयी।
और उस तन्हाई से जोड़ गयी।

जहाँ मैं दिन रात सिगरेट फूंकता हूं।
अब उसके धीमे-धीमे सुलगते,
धुंए से भरे कश ,
पहले से ज़्यादा खींचता हूं,

पर लुत्फ़ नहीं आता,
सिगरेट पीने में ,
और न तेरे बिन जीने में।

हर सिगरेट यही सोच के पीता हूं,
पांच-पांच मिनट करके ,
ज़िन्दगी को और कम कर लूं।
दिल-ए-ज़ज़्बात नम कर लूं।

तू,
जुदा हो गयी बेशक़ ,
मग़र,
ये ज़लती सिगरेट ,

तेरी यादों का नशा है,
और टूटे अरमानों का धुँआ
जो सुलग रहा है,

और पहुँच रहा है,
होंठ, हलक, दिल,
से होकर,
फेफड़ो तक,

इस नयी वैधानिक चेतावनी के साथ-
“स्मोकिंग किल्स”

मेरे लिए सिगरेट पीने से,
यादों का कैंसर कम होता है।
फिर ज़्यादा सिगरेट पीता हूं
जब गम होता है।

मैं,
तो सिगरेट पियूँगा ख़ूब,
लो फिर एक नयी सिगरेट
जला दी मैंने,
तेरी याद भुला दी मैंने।

इस गीत को गुनगुनाते हुए-
“मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया,
हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया”


Kavita :

तुम्हारी ज़िद के सामने,

मैं, बेबस और मज़लूम था,

और हूं।

 

तुम घोंघे के कवच जैसे

ऊपर से सख़्त और चिकने,

कठोर और मज़बूत हो।

तुम पर प्रेम की हल्की थपकियाँ

असर नहीं करतीं।

 

तुम और तुम्हारी मग़रूर जिद को तोड़ने के लिए,

मुझे, तुम्हें

ज़ज़्बात के खौलते पानी में डालना होगा,

फ़िर खंगालना होगा।

ताकि तुम अपने ज़िद के कवच से पिघलकर बाहर आ जाओ,

लेकिन मुझे डर है कि

तुम फ़िर हृदय से मृतप्रायः न हो जाओ।

 

इतनी ज़िद और गुरुर अच्छा नहीं होता,

तुम क्यों नहीं समझते?

 

ज़िद तूफ़ान में खड़े,

बड़े से बड़े,

दमदार शज़र को भी धराशायी कर देती है।

उखाड़ फेंकती है जड़ समेत

उस शज़र को ,

जो गुरुर की मिट्टी में दबा बरसों से खड़ा है।

ज़िद ने इतिहास में भी कई कौतुक  रचे हैं,

मुहम्मद बिन तुग़लक़ का नाम

तो तुमने सुना ही होगा,

वो भी ज़रखेज़ था,

अपनी ज़िद से लबरेज़ था।

 

उसने कई बार,

दिल्ली से दौलताबाद,

दौलताबाद से दिल्ली रूख़ किया,

मुद्रा बदली,राजधानी बदली

लोगों की निशानी बदली,

फ़िर वो पागल घोषित कर दिया गया।

 

मैं नहीं चाहता कि तुम

घोंघा के जैसे कठोर,

या तुग़लक़ के तरह पागल बनो।

चाहता हूं, मेरे प्रेम की धरती पे

छाया चाहत का बादल बनो।

बोलो मन्जूर है?

या अब भी बने रहोगे

वैसे ही ज़िद्दी


Kavita :

भूल नहीं सका,

वो महाविद्यालयी सेमिनार

दो द्विवसीय,जिसका विषय

“प्रेम ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता है”

था,

जिसमें तू

बेल्वेट की बैंगनी साड़ी-ब्लाउज़,

खुले बाल लिए,लिपलाइनर लगाये,

मस्कारा चिपकाये

कानों में नये रोल्गोल्ड के

झुमके लटकाये,

और कोई कनोजिया इत्र महकाये,

प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुई थी

कितनी व्यस्त दिख रही थी?

जैसे,

सारी ज़िम्मेदारी तेरे नाज़ुक कंधो पे हो सेमिनार की।

और मैं, तुझे ,

कई पहर तक ठगा सा देखता रहा था।

 

कितनी ख़ूबसूरत लग रही थी,

तू,माशाल्लाह!

तुझपे आ रहा था प्यार,

वो भी बेशुमार,

दिल में  गूंज रहा था एक गीत-

“न कजरे की धार,न मोतियों के हार

न कोई किया सिंगार,

फ़िर भी कितनी सुन्दर हो?”

 

पहली बार अच्छा लगा

वो गीत और तू

दोनों,

तेरे वो नये झुमके दिखाने की अदा,

जो कर सकती थी किसी को भी फ़िदा,

 

तू वो झुमके दिखाने को

खामख्वाह गर्दन मटकाती,

ताकि वो हिलें,

और चाहने वालों के दिल जलें।

 

लेकिन,

मैंने एक बार भी नहीं पूछा

कहाँ से ,और कितने के लिए?

यक़ीनन,

तू मुझसे चिढ़ गयी होगी।

चाहत अपनी बढ़ गयी होगी।

 

तू बार-बार मेरे सामने से गुज़र जाती

कभी कॉफी लिए,क़भी ब्रेड लिए

और वो बेल्वेट साड़ी

जिसका फ़ैशन अब नहीं,

पहन के धूप में खड़ी हो जाती

तो लगता  था,

किसी बैंगनी ताज़महल की मीनार पर

सूरज की किरणें

इन्द्रधनुष बना रही हों।

 

चमक,दमक,लहक,चहक,

सब उस दिन तुझमें थी।

 

महसूस होता है,कि अब भी मैंने तेरा ज़िक्र ,

सलीक़े से नहीं किया है।

काश ,

 

उस समय ये एंड्राइड फ़ोन होते,

तो ,

तेरे साथ एक सेल्फ़ी लेके,

फेसबुक पोस्ट करके ,

तुझे टैग कर दिया होता।

 

और बार-बार,

लाइक और कमेंट भी ,

 

कर रहा होता,

पर ,

कुछ ख़्वाब,

ख़्वाब ही रह जाते हैं।

 

जाने क्यों?

 

और आज़ भी

सेमिनार होते हैं,

जिनमें,

 

मैं, मेज़बान नहीं,

मेहमान होता हूं।

सारी बज़्म का साहिब-ए-इमान होता हूं।

 

और सुनने वालों में ढूँढता हूं।

 

सिर्फ़ तुझे बस तुझे,

लेक़िन तू कहीं नहीं होती।

 

सिवाय ,

मेरे यादों के जहनोदिल में,

 

फ़ैशन लौट आता है

साल दर साल के बाद

पर,

 

तू नहीं लौटी मेरे ख़राब

हाल के बाद,

 

पर वो विषय ज़िन्दा है,

 

जिसपे तू कोयल की तरह ,

बोली थी,

जिसके एक-एक शब्द पे ,

 

मेरा दिल आज़ भी सोच के

धड़कता है।

कि

“प्रेम ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता है”

 


Kavita :

तुम,

तुम हो,

बढ़िया,लाज़वाब,बेमिसाल,

बहुत ख़ूब, वाह ,कमाल

 

अनगिनत ज़रखेज़ ,ज़र्द सफ़ेद,

कोहिनूर से चमकते ग़ुलाब,

चमन में एक साथ खिले हों

 

उनसे भी ख़ूबसूरत है,

तुम्हारी मदमस्त हंसी,

 

प्लेटो,नेप्च्युन, मरकरी,

मंगल,चाँद,शुक्र,धरती,

सभी,

तैरती आकाश गंगा में,

शनि की वलय में,

उल्का पिंड,नक्षत्रों में

मुझे लगता है,

तुम्हारे जैसा कोई नहीं,

 

नज़दीक अगर तुम हो,

तो महसूस होता है

कि मुफ़लिस के पास

कोई अलादिनी चिराग़ है

या

दरिद्र के हाथ अक्षय पात्र है,

 

आज तक,

जो भी ख़ूबसूरती के ,

फ़साने ,ग्रन्थ,रिसाले ,दीवान,

उपनिषद,वेद, पुरान,

सबको ,

मैं आज ख़ुद ,

जानकर, जान बूझ कर,

खुद को दीवाना ,शैदाई,

आवारा,पाग़ल, मानते हुए,

माफ़ी के साथ ,

 

मैं सबको झूठा साबित करता हूं।

क्योंकि मैं बेपनाह मुहब्बत

से तुम पे मरता हूं,

 

मुझे पता है,

मेरे लिए, और सिर्फ़ मेरे ही लिए,

तुम ,

 

इन सब से ज़्यादा ख़ूबसूरत हो।

नायाब ,तोहफ़ा -ए-क़ुदरत हो।

 

ये देख़ कर कहने वाली ,

मेरी मग़रूर, ज़िद्दी,पाग़ल आँखे हैं

जो ,

कम्बख्त सिर्फ़ इस क़ायनात में ,

हर दिन, सुबहो ,शाम ,रात में,

 

सिर्फ़ तुम्हें देखना चाहती हैं।

हर पल,हर घडी,हर पहर,

हर कूंचा, डगर-डगर,

बस

 

तुम ,

महज़,फ़क़त ,

अब,

मुस्कुरालो मेरे इस हाल पर,

अश्कों के सवाल पर,

लेकिन सुनो ,

मुहब्बत भी कोई चीज़ होती है।।

 

मग़र,

आज कुछ ज़्यादा हो गया,

खता मुआफ़,

शुक्रिया,आदाब,

अल्लाह हाफ़िज़,

जय श्री राम

 

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