0215 – Kirti Vidya Sinha

Kavita :

बारिश की नन्हीं बूंदे

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नन्हीं -नन्हीं बूंदे आईं,रिमझिम-रिमझिम करती आईं
फिर आई घनघोर घटा
बादल गरजा, बिजली चमकी
चमकी सृष्टि सारी
आई बारिश आई बारिश कहती दुनिया सारी
धरा थी प्यासी तृप्त हो गई
नदियां भी परिपूण हो गईं
ताल तलैया करें हठखेली
पर्वत श्रंखला हो गई नवेली
नाले नहर खूब है छलके
बाग बगीचे महके – महके
वन उपवन हैं चहके-चहके
डाल-डाल पर  पंछी फुदके
कूदें फांदें गाय बकरियॉ
मेढ़क मछली भी हैं फुदके
देखो क्या बारिश आई
धरती पर हरियाली छाई
नया रुप नया रंग लाई
चारों और खुशियां  सी छाईं
फिर नन्हीं सी बूंदे आईं
रिमझिम-रिमझिम करती आईं

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