0215 – Kirti Vidya Sinha

Kavita :

आम का पेड़

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मेरे आंगन का वह आम का पेड़
मेरे बचपन का वह आम का पेड़

माँ के हाथ की अचार में सनी रोटी
झूला झूलते हुये लम्बी सी चोटी
वह गुलगुले वह मीठे पराठे
आम के पेड़ के नीचे बैठ कर हम खाते
मेरे आंगन ——————–
जब लगी मैं दहलीज लाघंने
माँ की होने लगी हिदायतें
पर था वह आम का पेड़
जो देता था कुछ मुस्कराहटें
रोती खुश होती लिपट जाती थी मैं
छांव मे समेट लेता था
आगोश मे भर लेता था
बाहों में कस लेता था वह आम का पेड़
मेरे आंगन ——————-
पराई हो गई हूँ ऐसा कहते हैं लोग
पर उससे मिलती हूँ जब
मुलायम पत्तों से गाल सहलता है वह
अपनी खट्टी मीठी अमिया से
मुंह मीठा कराता है वह
लौटती हूँ जब
हरे हरे फलों से आंचल भर देता है वह
याद आता है वह
मेरे आंगन का वह आम का पेड़
मेरे बचपन का वह आम का पेड़


Kavita :

फूल की ख्वाइश

फूल हैं हम डाली पर रहने दो
मत छुओ मज़ा तो लेने दो

क्यूं तोड़ते हो हमें ज़रा खिलने तो दो
हमारे इस गुलशन मे ज़रा महकने दो

हम ख़ुद ब ख़ुद ज़मी पर आ जायेंगें
पर ज़मी पर आके भी बेदाग रह जायेंगें

तब उठा लेना हमें ,तब उठा लेना हमें
प्यार से सहला लेना हमें

बालों मे लगा लेना हमें
हो सके तो कमरे मे पनाह देना हमें

अगर रज़ा हो तेरी ,अगर रज़ा हो तेरी
रब से मिला देना हमें

तब तक तो ख़िल जाने दो
हमारी इस बहार से रुबरु तो होने दो

फूल हैं हम डाली पर रहने दो
मत छुओ मज़ा तो लेने दो !


Kavita :

बारिश की नन्हीं बूंदे

***

नन्हीं -नन्हीं बूंदे आईं,रिमझिम-रिमझिम करती आईं
फिर आई घनघोर घटा
बादल गरजा, बिजली चमकी
चमकी सृष्टि सारी
आई बारिश आई बारिश कहती दुनिया सारी
धरा थी प्यासी तृप्त हो गई
नदियां भी परिपूण हो गईं
ताल तलैया करें हठखेली
पर्वत श्रंखला हो गई नवेली
नाले नहर खूब है छलके
बाग बगीचे महके – महके
वन उपवन हैं चहके-चहके
डाल-डाल पर  पंछी फुदके
कूदें फांदें गाय बकरियॉ
मेढ़क मछली भी हैं फुदके
देखो क्या बारिश आई
धरती पर हरियाली छाई
नया रुप नया रंग लाई
चारों और खुशियां  सी छाईं
फिर नन्हीं सी बूंदे आईं
रिमझिम-रिमझिम करती आईं

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