0220 – Tejvir Singh Tej

Kavita :

हनुमत भजन

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संकट हरैगौ मेरौ राम जी कौ दास रे!
आऔ हनुमान अब टूट रही आस रे !

केसरी के सुत प्यारे अंजनी नै जाये हैं।
रूद्र के अवतार कपि हनुमत कहाये हैं।
कलजुग के देवता कौ घट-घट में बास रे!
संकट हरैगौ मेरौ…..

सूरज कुं भाख लियौ जानि रूप फल में।
सागर पै सेतु बन्ध कर दियौ पल में।
लंका कुं राख कर कियौ है विनाश रे!
संकट …..

सागर कू पार कियौ लंकपुरी धाये।
मइया कौ सन्देशौ राम जी कू लाये।
दुष्टन के बीच बैठी मइया उदास रे!
संकट…..

रामजी के काज करे सखा बने प्यारे।
ज्ञान गुण खान सिया माँ के दुलारे।
अष्टसिद्ध-नवनिध देत सुख राश रे!
संकट…..

बजरंग के द्वार जो भी दीन-दुखी आवै।
मन चाहौ वर संग सुख सम्पति पावै।
नाम लेत भूत-व्याधा फटकें न पास रे!
संकट…..

मंगल को जन्मे हैं मंगल ही करते।
जग की विपद कपि तेज सदा हरते।
आरती चालीसा पढ़ कर लै उपास रे!
संकट…..


Kavita :

दुश्मनी भी न हम से निभाई गई।
ये नज़र जब नज़र से मिलाई गई।

चाक हैं दिल-जिगर नैन में नीर है।
दिल्लगी ना किसी से बताई गई।

मैं सलाई चला बुन चुकी ख़्वाब जो।
आँख खुलते कहाँ ये बुनाई गई।

चोट दे-दे के सब बन रहे रहनुमां।
ए ख़ुदा तेरी कितको खुदाई गई।

रूह तक ज़ख्म का सिलसिला देखिए।
पर दवा भी न कोई लगाई गई।

प्यास से जान मेरी चली जा रही।
अंजुरी भर न उनसे पिलाई गई।

तेज सुर में कोई तो ग़ज़ल अब कहो।
जो न महफ़िल में अब तक सुनाई गई।


Kavita :

जय श्री राम

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त्रेता में जन्मे दशरथ घर अवधपुरी निज धाम।
पुरुषोत्तम आदर्श जगत के रघुकुल नन्दन राम।
अरे मन भज ले सीताराम,बनेंगे तेरे बिगड़े काम……

कौशल्या की गोदी खेले जग के पालनहारे।
दीन-दुखी अरु निज भक्तों के जो आँखों के तारे।
भाव सहित जो गया शरण में वो तर गया बिन दाम।
अरे मन भज ले सीताराम…..

असुरों के आतंक से पीड़ित थे सुर-नर मुनि सारे।
पितृ आज्ञा से गुरु विश्वामित्र आश्रम आन पधारे।
मार ताड़का और सुबाहु निर्भय किये गुरुधाम।
अरे मन भज ले सीताराम……

स्थापित आदर्श किये निज जीवन में अपनाकर।
मात-पिता का वचन निभाने त्याग चले ग्रह रघुवर।
वन में वास किया सीता संग लड़े बहुत संग्राम।
अरे मन भज ले सीताराम…..

पर्ण कुटी में जब सीता ने स्वर्ण मृग को देखा।
राम गए मृगछाला लेने लखन खींच गए रेखा।
रावण ने सीता को हरके कर ली नींद हराम।
अरे मन भज ले सीताराम ……

भीषण था रण सागर तट पे कम्पित था जग सारा।
वानर-रीछ लड़े असुरों से लेकर नाम सहारा।
रावण को निज दास बनाकर दिया सुखद परिणाम।
अरे मन भज ले सीताराम……

भवसागर की तेज लहर से राम नाम उद्धारे।
निज भक्तों पर करुणा करके भव बन्धन से तारे।
रूचि-रूचि रटो रमापति रघुवर रक्षक राजा राम।
अरे मन भज ले सीताराम बनेंगे तेरे बिगड़े काम।

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