0220 – Tejvir Singh Tej

Kavita:

मत्तगयन्द सवैया   –  विधान- ७भ+गु गु
**

देखि रहे नैना धर धीरज, तान बजावत जू स्वर-साधा।
बैन मधूमय कानन गूंजत, काटि रहे हिय की सिग व्याधा।
श्याम बिना सुकुमारि अधूरिहिं, कृष्ण-प्रिया बिन श्यामल आधा।
टेरत है शतचन्द्र प्रभा सुर, बैनन-सैन पुकारत राधा।

श्याम सखा हित आजु चलौ सखि, नीर भरें अरु नैन निहारें।
बाँकपनौ लखि लाल-रसालहिं, नैनहिं-नैन निकुंज बिहारें।
रूप-अनूप लखें मुरलीधर, आठहुँ याम सुनाम पुकारें।
आजु ठड़ौ छलिया तट यामुन, नेह भरी उर राह बुहारें।

धेनु चरावत यामुन के तट, बाजि रही मुरली सुखकारी।
मोर पखा धर शीश रिझावत, कान्ह लगै सखि री हितकारी।
सूरतिया मन मोह रही जनु, पूनम चन्द्र निशा उजियारी।
तेज हिलोर उठें मनवा महँ, देखत सैनन सौं गिरिधारी।


Kavita:

नशा  — विधा – चौपाई छंद

नशा नाश की जड़ है भाई।
जासों बड़ी नांहि अधमाई।
गुटखा-बिड़ी पान तम्बाकू।
उमर काटने के सब चाकू।
सुल्फा-भाँग अफीम निराली।
डोडा-पोस्त गिराते नाली।
जेहिं चरस-हेरोइन भाती।
तिनको मौत अकालहि आती।
नित्य-नेम जो पीते हाला।
उनके घर लग जाता ताला।
किसी नशे के हो यदि आदी।
निश्चित होनी है बर्बादी।
समय रहे इससे मुँह मोड़ो।
आदत बुरी नशे की छोड़ो।
लाज-शर्म का देश निकाला।
रामहि उनका है रखवाला।
नशा नाश को न्यौता देता।
यश-बल आयु सभी हर लेता।
तेज जहर को छोड़ो भाई।
प्रभु की कृपा मिले सुखदाई।


Kavita:

गुरुग्राम के 7 वर्षीय अबोध की हत्या के विरोध में उपजे तेज-जहरीले मनोभाव।
🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵🌵

गुरूग्राम को किया कलंकित, शिक्षा की इक शाला ने।
एक चिराग बुझाया फिर से, वहशी गड़बड़झाला ने।

शर्म-लिहाज रही न उर में, क्या विक्षिप्त समाज हुआ?
अब तक देखा नहीं सुना था, जैसा प्रकरण आज हुआ।।

बेमतलब इक कोख उजाड़ी,इक कुलदीपक बुझा दिया।
सवा अरब की आबादी का, मस्तक नीचे झुका दिया।

अरे नीच-पापी कुविचारी, वह अबोध-सा बालक था।
और तू बूढ़ा-सांड हरामी, देशद्रोहि कुल-घालक था।

काम-पिपासू शैतानो कुछ, तो सोचा समझा होता।
आज एक परिवार आँख के, तारे को तो ना खोता।

वहशत की नंगई न सोचा, तुम्हें कहाँ ले जायेगी?
हत्या की परिवार सहित ये, मौत तुम्हें नित आएगी!

अरे कलंकी क्रूर दरिंदो, वहशी मन समझा लेते।
इतनी ही गर आग लगी थी, कर-संधान करा लेते।

नीच हवस के वहशी कीड़ो, विष्ठा ही गर खानी थी!
वेश्या के कोठे पर जाकर, तन की आग बुझानी थी!

किया कलंकित तेज हिन्द का, अंग्रेजी परिपाटी ने!
अहो जने क्यों नर-पिशाच इस, शस्य-श्यामला माटी ने?

यथायोग्य हो जाँच यथोचित, जो दोषी हों सजा मिले।
पुनरावृत्ति न हो ऐसी फिर, नहीं कलंकित फ़िजा मिले!


Kavita:

छंद आनन्द आहूति

गिरधारी छंद  ✏विधान – स न य स

तुम सौ नटवर को है जग में।
दधि लूट भगत रोकै मग में।।
घर जाय पकरि पीटै जसुदा।
हम ते मति उरिझौ श्याम सदा।।

दधि की मति कनुआ लूट करै।
पित-मातन सर क्यों पाप धरै।।
रसिया अब मति थामें बहिंया।
चख तेज सरस मेरौ दहिया।।

कपटी गिरधर ओ श्याम सखा।
अब लेहु शरन मो ओर लखा।।
मुरली मनहर तू आज बजा।
चल यामुन तट पै रास सजा।।


Kavita:

 

मेरे प्यारे वतन तुझको शत-शत नमन।

ओ महकते चमन तुझको शत-शत नमन।

मेरे प्यारे वतन…..

 

तेरे पहरे पे हिमराज उत्तर दिशा।

वक्ष पर दिल-दीवाना मनोरम बसा।

मध्य-उत्तर प्रदेशों की शोभा अजब

रामराजा करें कष्ट-दुःख का शमन।

मेरे प्यारे वतन…..

 

माँ प्रकृति का तुझको ये वरदान है।

सभ्यता और संस्कृति की पहचान है।

छः ऋतु तीन मौसम की अनुपम छटा।

धो के चरणों को सागर करे आचमन।

मेरे प्यारे वतन…..

 

धानी चूनर ही माँ तेरा श्रृंगार है।

बहती नदियों का निर्मल गले हार है।

फूल-फल औषधि  सम्पदा अनगिनत।

पाके करता है क्यों नर यहाँ विष-वमन?

मेरे प्यारे वतन…..

 

धर्म-जाति अलग हैं अलग रंग हैं।

भाई-चारे से रहते सभी संग हैं।

एक-सी हैं इबादत सभी की यहाँ।

नित्य कर लें सभी अवगुणों का हवन।

मेरे प्यारे वतन…..

 

वेद-ग्रन्थों से अविरल सुयश जब बहा।

इसको सोने की चिड़िया जहां ने कहा।

विश्व कल्याण की भावना भारती।

तेज से कर रही विश्व का तम हरण।

मेरे प्यारे वतन…..

ओ महकते चमन…..


Kavita:

शुभ मङ्गलमय पर्व सभी को, शुभ मङ्गलमय बेला है।

अति सुखकर पावन फलदायी, प्रीति-पर्व अलबेला है।

निश्छल प्रेम बहन-भाई का, हिंद धरा की थाती है।

भ्रात-भगिनि की प्रीत सजाता, खुशियों का इक मेला है।

राखी के धागों के जैसा, बंधन कोई और नहीं।

जो बंध जाता ख़ुशी मनाता, खुशियों का  नवभोर यही।

बहनों ने भाई को बांधा,  रक्षासूत्र कलाई पर।

पावन पर्व हुआ मङ्गलमय, शीतल-मंद बयार बही।

कच्चा धागा बांध कलाई, बहन मंद मुस्काई है।

जीवन-भर तुम प्रीत निभाना, सब बहनों से भाई है।

रक्षा वचन दिया भाई ने, प्रीत कभी ना कम होगी।

सब बहनों का मान रखूँगा, कसम तेज यह खाई है।


Kavita :

पंकज वाटिका छंद

**

मोहत तन धन धानहि पाकर।
खोज करत सुख चैन गवाकर।।
मूढ़ जगत यह झूठ धरोहर।
राम भजन कर डूब सरोवर।।

कुंजन करत किलोल सुधाकर।
स्वामिनि पदरज श्रीहरि चाकर।।
श्याम सरस सज सुंदर सोहत।
देख मधुर छवि मानव मोहत।।

आज कमलपद दास पखारत।
श्याम चरण नित नैन निहारत।।
नाथ सकल तम मोर मिटावहु।
हाथ पकरि भव पार उतारहु।।

दीन सखन हरि दीन दयाकर।
रे मदमति नित जाप कियाकर।।
भाव सहज मम है मुरलीधर।
राखहु चरनन नाथ कृपाकर।।

दास तुमहि कर जोर मनावत।
गावत हरषत लाड़ लड़ावत।।
नाथ हरहु सिग संकट मोरहि।
तेज चरणरज किंकर तोरहि।।


Kavita:

सगुण भक्ति शाखा (रामाश्रयी) के अप्रतिम काव्यपुंज बाबा तुलसीदास के जन्मोत्सव की अनंत मङ्गल कामनाएं।

**

जाति-प्रथा सम्प्रदाय
का था जब बोलबाला
तुलसी ने रामनामी
अलख जगाई थी।

मानस के मानस को
जोड़ जन-मानस से
नाम सियाराम रूपी
लहर चलाई थी।

काल में विधर्मियों के
गढ़े नव प्रतिमान
दास तुलसी ने गंग
ज्ञान की बहाई थी।

धर्म अर्थ काम मोक्ष
जन-जन की तारणी
रामचरितामृत सी
मानस बनाई थी।


Kavita:

पृथ्वी का भूगोल

**

समझ इसे तरबूज बड़ा-सा, पकड़ बीच से काटो।
करो कल्पना और धरा को, दो भागों में बांटो।
कटा हुआ तरबूज सभी ने, बड़े ध्यान से देखा।
कहा गुरूजी ने तब ये है, भूमिमध्य की रेखा।
पश्चिम से पूरब को जाती, विषुवत वृत्त बनाती।
यहाँ रात-दिन लगें बराबर, धूप यही समझाती।
शून्य मान अक्षांश यहाँ का, समझें इसे कटोरा।
समय यहाँ दिन-रात बनाता, बारहमासी होरा।
साढ़े तेईस अंश यदि हम, उत्तरी ध्रुव पर जाएं।
खींच कल्पना से नव-रेखा, कर्क इसे समझाएं।
भूमिमध्य से यदि दक्षिण को, किये कल्पना जाते।
साढ़े तेईस अंश दूरहि, मकर रेख को पाते।
उत्तर ध्रुव पर शीत-क्षेत्र में, सघन आर्कटिक देखा।
दक्षिण में अंटार्कटिका को, मानो पंचम रेखा।
पृथ्वी का यह मानचित्र है, अक्षांशों की गणना।
यदी मापनी चाहो दूरी, इसे ध्यान से पढ़ना।
तेज सूर्य की किरणें भू पर, ज्यों ही करें पदार्पण।
मान काल्पनिक दूरी करते, परिस्थलीय निर्धारण।
जीवन को धारण करता है, ग्रह अनमोल निराला।
मिल्की-वे में रमें नवग्रह, सूरज है रखवाला।


Kavita:

पावस आमन्त्रण-गीत

**

जनमानस को तृप्त करे जो, ऐसा पावस परसो रे!
अबकी बार हमारे आँगन, घुमड़-घुमड़ घन बरसो रे!
आओ री मनभावन बदरी, तुम क्यों बिरथा तरसो रे!
बरखा को ले संग घटाओ, थिरको नाचो हर्षो रे!
जनमानस को…..१

देख-देख अँखियाँ पथराई, सुन ले मेघों के राजा।
धरती प्यासी तुझे बुलाये, ओ बादल अब तो आजा।
खेत और खलिहान तुम्हारी, राह तके बेहाल हुए।
जीवनदायी जल के वाहक, निर्जल नदिया-ताल हुए।
तृप्त धरा हो जीव प्रफुल्लित, बन के अमृत बरसो रे!
जनमानस को…..२

चातक मोर पपीहा कोकिल, राह तकत होकर आकुल।
पशु-पंछी सह सब नर-नारी, सूर्यताप से हैं व्याकुल।
जामुन आम करौंदा नीबू, नीर बिना रसहीन पड़े।
गुड़हल कमल गुलाब कुमुदिनी, उपवन में कुम्हलाये खड़े।
दीन-दशा में जीव चराचर, व्यथा धरा की दरसो रे!
जनमानस को…..३

आओ रे! मनभावन मेघा, आकर मन की पीर हरो।
मरुथल-सी हो चुकी धरा पर, अमृत-जल का लेप करो।
धीर धराओ मन को मोहन, मोहक मधुर मुरलिया से।
हार गया मैं तन-मन-जीवन, दिल जो लागा छलिया से।
तेज करे मनुहार-निवेदन, अब तो मेघा बरसो रे!
जनमानस को तृप्त करे जो, ऐसा पावस परसो रे!४
अबकी बार हमारे आँगन, घुमड़-घुमड़ घन बरसो रे!


Kavita:

मनहरण घनाक्षरी  –  शिल्प – ८८८७

सेहत जो हो खराब
तेज शर्करा दबाव
नीम सः करेला लीजै
नौन त्याग दीजिये!

जाओ सुसराल यदि
कहके मंगाओ रूखी
गर्वित दामाद वाली
टौन त्याग दीजिये!

खुश रहे घरवाली
हरषाये सास-साली
कुछ देर हेतु यदि
फौन त्याग दीजिये!

पत्नियां भी आजकल
जेम्सबॉण्ड हो गयीं हैं
कुछ भी छुपाइये न
मौन त्याग दीजिये!


Kavita :

जय जय श्रीराधे…..श्याम

 

कुंजन निकुंजन में
खेल-खेल लुका-छिपी
समझे हो मन-मांहि
बड़े ही खिलार हौ।

धार कें उंगरिया पै
थारी बिन पैंदे वारी
करौ अभिमान बड़े
तीक्ष्ण हथियार हौ।

देखौ रण-कौशल हू
भागि भये रणछोर
अरे डरपोक कहा
भौंथरी ही धार हौ।

हमऊँ हैं ब्रजबासी
झांसे में यों नाय आवैं
तेज भले कितने हो
पर तुम गमार हौ।

 

खेल रह्यौ घात कर
जीत की न बात कर
घने देखे तेरे जैसे
कृष्ण-नंदराय जू।

तेरे हों खिरक भरे
कमी हमारेउ नाय
अनगिन बंधी द्वार
जाय देख गाय जू।

नित करै रुमठाई
हमपै सही न जाय
जाय जसुदा के ढिंग
दें सब सुनाय जू।

बसते न तेरी ठौर
न ही तेरौ दियौ खामें
तेज ऐसे लच्छन न
हमकूं सुहाय जू।


Kavita :

मङ्गलाचरण में भगवान शिव स्तुति   –   दोधक/बन्धु/मधु छंद   –  शिल्प-भ भ भ+गु+गु

हे! अभयंकर हे! अविनाशी।
नाथ सनाथ करो दुःखनाशी।
को शिव शंकर तो सम दानी।
रावण लंक दई रजधानी।।

देव महा तुम हो नटराजा।
साधहु मोर करो शुभकाजा।
भूत गणादिक दास तुम्हारे।
नाग गले भव के भय हारे।।

राजत भाल सदा शशि गंगा।
प्रेतहि-भूत नचाय मलंगा।
वास करै शमशान सुखारी।
देह भभूत रमा त्रिपुरारी।।

भूतपती भगवान पिनाकी।
सामप्रिया कर कोर कृपा की।
भीम अनीश्वर रूद्र कपाली।
सुक्ष्मतनू पशुनाथ कमाली।।

स्थाणु हरी कवची मृगपाणी।
शाश्वत देव गिरीश कल्याणी।
शंकर सोम शिवा कृतिवासा।
नाथ हरो मम घोर पिपासा।।

हो अज नाथ सदा सुखकारी।
‘तेज’ तुम्हार कृपा अनघारी।।
देव सुदेव रहूँ पग-धूली।
तार दयाकर तारक शूली।।


Kavita :

बचपन

**

अल्हड़ मस्त हुआ यह जीवन
पुलकित हो आया है तन-मन।
हुई व्योम सी उच्च उमंगें
स्वस्फूर्त उठ रहीं तरंगें।
निखर गया कुंदन सा जीवन।
बड़ा निराला होता बचपन।

चिंता-फिकर नहीं कोई घेरे
मार गुलाटी लेता फेरे।
खेल-खिलौने हैं सब न्यारे
सुंदर सरस सजीले सारे।
महक उठा फूलों सा उपवन।
बड़ा निराला होता बचपन।

जो मन कहता वो ही करते
परी लोक में रहें विचरते।
धरा-गगन कदमों में रहते
नित्य स्वप्न-सागर में बहते।
सुरभित हो उठता घर-आँगन।
बड़ा निराला होता बचपन।

तन तरुणाई तेज तरंगित
देख कलाएं जगत अचंभित।
ग्वाल-बाल संग शुभ परिहास
कान्ह रचावत हो जनु रास।
दर्शन से हों धन्य सकल-जन।
बड़ा निराला होता बचपन।


Gazal

लहू दान दे सरहदों पे डटे हैं।
वतन के सिपाही वतन पे मिटे हैं।

किया इश्क़ वर्दी औ जान-ए-चमन से।
चढ़ा शीश अपना ख़ुशी से कटे हैं।

उदासी न दिल में नहीं खौफ़ कोई।
चहे जान जाये मगर ना हटे हैं।

हिफ़ाजत सदा कर रहे भारती की।
बमों-गोलियों के मुहाने सटे हैं।

शरीरों में भर-भर के बारूदी जज़्बे।
समरभूमि में ज्यों तिरंगे अटे हैं।

शहादत तुम्हारी खुशाली चमन की।
बमों की तरहा दुश्मनों पे फ़टे हैं।

अगर याद आई कभी घर-गली की।
बहाये न आंसू न मग से हटे हैं।

नमन् कोटि-कोटी अटल हौसलों को।
सदा तेज नारे वतन के रटे हैं।


Kavita :

न-बूझकर पी बैठे हम प्रेम-गरल का प्याला जी।
पत्थर से टकराके दिल को पत्थर ही कर डाला जी।
मन्दिर मस्जिद गिरजा देखा उसमें कभी शिवाला जी।
प्रीत भरे दिन बीत गए अब नैना उगलें हाला जी।
जान-बूझकर पी…..

 

इश्क़ मुहब्बत प्यार की बातें केवल हमको भाती थीं।
शोख़ हवाएं भी तब उसके प्रेम सन्देशे लाती थीं।
सागर की लहरें भी उसके सुंदर गीत सुनाती थीं।
मनमोहन सी छवि मोहिनी नैनन घनी सुहाती थीं।
ज्यों साकी के इंतजार में रहती हो मधुशाला जी।
जान-बूझकर पी…..

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

चाँद-चकोरी सी जोड़ी को देख जमाना जलता था।
दो जोड़ी नयनों के उर में बीज प्रेम का पलता था।
पल भर का भी छोह हृदय को मानो वर्षों सलता था।
झंझावाती-तूफानों में भी दीप प्रीत का जलता था।
नैनन नेह-सनेह नैन सों नयना नयन उजाला जी।
जान-बूझकर पी…..

 

मोहक मधुरिम मधुर मुरलिया मन-मंदिर में बजती थी।
कान्ह दरश को पलक-पांवड़े बिछा गुजरिया सजती थी।
कृष्ण-करुण कौमार्य कली सी कोर-कोर सों लजती थी।
राधे जैसी भई दिवानी श्यामा-श्यामा भजती थी।
त्रेता युग की जनकसुता को भाई ज्यों मृगछाला जी।
जान-बूझकर पी…..

 

पावन-प्रीत पुनीत प्रेम-पथ प्रीतम प्यारी हो न सकी।
बिछड़ गयी नैनों की जोड़ी मैं अंधियारी धो न सकी।
सूख गए नयनों के आंसू चाह रही पर रो न सकी।
हृदयतल में दीर्घकाल प्रीतम की छवि संजो न सकी।
तेज विरह की पीर जलाये मनु बाती को ज्वाला जी।
जान बूझकर पी बैठे हम प्रेम गरल का प्याला जी।
पत्थर से टकरा के दिल को पत्थर ही कर डाला जी।


Kavita :

कुण्डलिया

मानव तन मुट्ठी भयौ , साँस भई हैं रेत।
फिसल-फिसल जाती रहें,लगा राम ते हेत।

लगा राम ते हेत,फसै जब भी मझधारे।
राम करिंगे पार,आय कें नाव किनारे।

माया मोहक लीन,बनौ ठाड़ौ नर-दानव।
रामनाम कौ तेज ,बनाए राखै मानव।


Kavita :

मनहरण घनाक्षरी  –  शिल्प- 8887 लघु गुरु

मांसाहार छोड़कर
शाकाहारी बनें सभी
मानवीय गुण हेतु
करिए प्रयास जी।

गऊ सेवा गऊ ग्रास
करते हैं पाप नाश
हिरदे में सद्गुण
करें सभी वास जी।

मातृभूमि निज मान
देश की बचाओ आन
कार्य है महान ऐसी
करें सभी आस जी।

भेद-भाव छोड़कर
भाईचारा जोड़कर
करना है तेज तुम्हें
हिन्द का विकास जी।


Kavita :

हृदय मयूर   –  कुण्डलिया

छवि देखी नैना भये ,नश्वर जगत ते दूर।
आह्लादित ह्वै नाचतौ,सुरभित हृदय मयूर।
सुरभित हृदय मयूर,सलौनी स्यामल सूरत।
ठाड़ी रह गइ ठगी,बनी माटी की मूरत।
सरस सवरिया स्याम,सखा-सौ सुभट सुलेखी।
छवि मनमोही निरखि,नहीं दूसर छवि देखी।


Kavita :

मनहरण घनाक्षरी  –  शिल्प – 8887 चरणान्त लघु गुरु

शुक्ल पक्ष तीज जब
आवत वैशाख मास
स्वयं सिद्ध महुरत
करौ पुण्य-दान जी!

पिटरन कूं पिण्ड-दान
फलदाई गङ्ग-स्नान
जप तप स्वाध्याय
अक्षय महान जी!!

अक्षय आनन्द मिलै
संग सुख-सम्पति सौ
करौ शुभारम्भ आज
शुभ दिन-मान जी!

अक्षय तृतीया पर्व
अक्षय फल दे सदा
ईश्वर कौ तेज मिलै
बन वरदान जी!!


Kavita :

आज की साधना
जलहरण घनाक्षरी   – शिल्प – 8888 चरणान्त लघु लघु

परम् प्रदाता पुण्य
पावन पुनीत पर्व
परै जु प्रदोष-पुष्ट
मिल जाय शुभ फल।

प्रथम तिथि है शुभ
सतयुग औ त्रेता की
बह्मा के पुत्र अक्षय
प्रकटे धरा के तल।।

बद्री नारायण बने
लक्ष्मी नारायण आज
बांके बिहारी विग्रह
चरण दर्श निर्मल।

पाप ताप शाप नष्ट
अति शुभ फलदाई
वेद औ पुराण कहें
महिमा कूं अविरल।।


Kavita :

दुर्मिल सवैया  🌴शिल्प- 8 सगण 12,12 पर यति🌴

यहि आस करूँ ब्रजबास करूँ
पद-पंकज नाथ रहूँ नम-तौ।

तन छोड़ दियौ धन छोड़ दियौ
अरु छोड़ दियौ मन कूं रम-तौ।

यह नेह सनेह मिलौ हमकूं
अब भावत नाहि कछू कम-तौ।

सुख चैन गयौ इन नैनन सों
अब तेज भये पगला हम-तौ।


Kavita :

अरसात सवैया 🌴शिल्प – 7 भगण + रगण🌴

मांगत खात नचावत नाचत
नैनन नेह निहारि अनोहतौ।

नंद कुमार हमार सखा नित
बाट जु यामुन घाटन जोहतौ।

सांझ सकार बिसार सबै सब
स्वामिन संग सुमारग सोहतौ।

माखन मेलि मधूमय मोहन
मादक सौ मुसिकावत मोहतौ।


Kavita :

सुकमा (छत्तीसगढ़) में नक्सलवादियों द्वारा किये गए हमले में हुई सैन्य-क्षति का विरोध करने हेतु उपजा शब्द-विद्रोह!!!)
**

हिन्द धरा के इतिहासों में जुड़ गयी नई कहानी है।
नक्सलवाद हुआ दुखदाई खून बहा ज्यों पानी है।

सुकमा की धरती फिर दहली टूटा फूलों का गमला।
भारत माता की छाती पर वज्र प्रहार बना हमला।

कब तक हिन्द सहेगा अपने घर की पत्थरबाजी को।
कोशिश करके दूर करो इस नादानी-नाराजी को।

नीति-नियंता नियम बनाकर कुछ तो यहाँ सुधार करें।
तलवारों में धार लगाकर रणभेरी तैयार करें।

कौरवदल में कृष्ण गए ज्यों शांतिदूत कहला भेजो!
जो अपने हैं मौका देकर उनको पास बुला भेजो!

फिर सेना को कूच करादो शंखनाद करवा करके।
चुन-चुन फिर कुत्तों को मारो जंगल में दौड़ा करके।

सत्ता की लाचारी मत गौरव पर भारी बनने दो।
शेरों की जंजीरें खोलो मुक्त शिकारी बनने दो!

रक्त बहाते जो पानी-सा उनको पाठ पढ़ा दो तुम।
लाश बिछाते जो वीरों की उनकी लाश बिछा दो तुम।

तुष्टिकरण की राजनीति या अंधभक्ति की यारी हैं।
मुट्ठी भर नक्सलवादी क्योंकर सेना पर भारी हैं।

स्यार लोमड़ी और कुतियों को नहीं नक्सली जनने दो।
शेरों को स्वच्छन्द करो जंगल का राजा बनने दो!

चीन-पाक भी देख रहे हैं नामर्दी – लाचारी को।
मुहर लगाकर पक्का कर दो भारत की खुद्दारी को।

शकुनी और जयचन्दों को गिन-गिनकर सबक सिखाने हैं।
ढूंढ़-ढूंढ़कर घर के भेदी सूली पर लटकाने हैं।

बंद करो शांति की भाषा सेना को मत क्रुद्ध करो!
जंगल में दावानल फूँको खान-पान अवरुद्ध करो!

द्वि-परिवेशीय भारत में अब राजसूय का अश्व चले!
असुर दुराचारी नीचों का यज्ञवेदि में हव्य डले।

तब भारत में रामचन्द्र की तेज-पताका फहराए!
अक्षुण और अखण्ड हिन्द का स्वप्न सूर्य-सा उग आए!

क्रय-विक्रय भण्डारण-वितरण नष्ट नक्सली मण्डी का!
रक्तबीज वध को आवाहन करना होगा चण्डी का!


Geet :

हम सफर में रहे हमसफ़र ढूंढते।
जो हमें चैन दे वो नजऱ ढूंढते।

ख्वाहिशें महफ़िलों की जुदाई मिली।
जुल्फ की छाँव मांगी विदाई मिली।
रह गए उल्फ़तों का असर ढूंढते।
हम सफर में रहे…..

चाँद ने रात मुझसे मुलाकात की।
दिल्लगी-सी महज मेरे साथ की।
रात गुजरी मेरी है सहर ढूंढते।
हम सफ़र में रहे…..

ए सितारो मुझे हो रहा है वहम !!
क्यों ख़ुदा भी हुआ इस क़दर बेरहम?
जिंदगी जा रही है लहर ढूंढते!
हम सफ़र में रहे…..

ये कशिश तेज दिल को डुबाने लगी।
मौत आग़ोश में भर के जाने लगी।
बस नज़र रह गयी है नज़र ढूंढते।
हम सफ़र में रहे…..


Kavita

विश्व पृथ्वी दिवस की अनन्त मंगल कामनाएं एवम् बधाइयाँ।
मनहरण घनाक्षरी

सबल सा तन देती
सरल सा मन देती
यश धन मान देती
भूमि व्यवहार में।

पालती औ पोषती है
सहकर भार सभी
कभी कमी नहीं करे
निज उपकार में ।

प्राणवायु जीवन को
अन्न जल फूल फल
नित प्रदत्त सस्नेह
प्रकृति के सार में।

दोहन करो न तेज
वृक्ष भी लगाओ सब
पृथ्वी बचाने से हम
बचेंगे संसार में।।


Kavita :

जलहरण घनाक्षरी

**

बेटी को बचाओ अब
बेटी को पढ़ाओ सब
बेटी पे टिका है जग
बेटी है परम धन।

बेटी भाग्य बेटी कर्म
बेटी मोक्ष बेटी धर्म
बेटी ही सृजन करे
पीढ़ियों के तन मन।।

बेटी है धरा का स्वर्ग
बेटी ज्ञान बेटी तर्क
बेटी ही विचार है तो
चलो करते मनन।

जीवन बचाना है तो
बेटी को बचाना होगा
संस्कार संस्कृति हेतु
तेज मिल हो परन।।


Kavita :

जलहरण घनाक्षरी – शिल्प-8888 पदांत लघु लघु

**

रुख- पेड़ कांटे दार
जमना कौ जल खारौ
टेढ़े मेढ़े लक्षण हैं
टेढ़ौई है नटवर।

टेढ़ी है जसोदा मात
टेढ़े खड़े नन्द राय
टेढ़े बलराम प्यारे
अग्रज हैं हलधर।

टेढ़े ही किये हैं काज
टेढ़े ही बनाए भक्त
टेढ़ी टांग वारे नेंक
इतकूँ नजर कर।

टेढ़े टेढ़े गोप-ग्वाल
टेढ़े टेढ़े चाल ढाल
टेढ़ी ही या मुरली नें
तेज करौ मनहर।


Kavita :

मनहरण घनाक्षरी  – शिल्प – 8-8-8-7

**

कहाँ गए भांड सब

सोये लम्बी तान सब
लुप्त हुए आप कहाँ
सैन्य अपमान पे।

कहाँ हैं सहिष्णु लोग
जिन्हें डर लगता था
अब भी तो कहो कुछ
अपने ईमान पे।

कहाँ गए सेक्युलर
जिनको सताता डर
छुपे कहाँ धरा-बोझ
बोलो खानदान पे।

सेना का पुनीत काज
बदल रहा समाज
तेज जय हिंद कहो
भारत की शान पे।।

 


Kavita :

मनहरण घनाक्षरी   =  शिल्प – 8-8-8-7

सेना कौ नयौ प्रयोग

ख़ुशी अति भये लोग
सब दोऊ हाथन ते
तालियां बजा रहे।

बांध जो चले हो आप
जीप पर जिहादी को
शोहदों के सुधार कुं
रीत अपना रहे।

देख-देख कहें लोग
पीछे भी तौ बांधौ एक
कोउ पत्थर मार दे
यही समझा रहे।

तेज करी सेवाचार
पिछवाड़े पै प्रहार
जय हिंद कह अब
खूबई चिल्ला रहे।।


Kavita :

भारत देश महान हमारा हर कोई यहाँ स्वतन्त्र हुआ।
लूला-लंगड़ा अंधा-बहरा ये सरकारी तन्त्र हुआ।

छला गया सेना का गौरव सरेआम जब घाटी में।
शस्त्र हाथ में फिर भी सैनिक मूक-बधिर परतन्त्र हुआ।

जिन हराम के पिल्लों को सेना ने वहां बचाया है।
आज उन्हीं कश्मीरी कुत्तों ने कोहराम मचाया है।

राजद्रोह भी देशद्रोह भी धारा ही उल्टी मोड़ी।
भारत माँ पर वार किया है बेशर्मी की हद तोड़ी।

कैसे सहन करेगा भारत इन काली करतूतों को।
सबक सिखाना हुआ जरूरी पाक परस्ती जूतों को।

सेना है अभिमान हमारा ये सेना पर वार करें।
गो इंडिया के लगा के नारे सैनिक पर प्रहार करें।

भारत में कश्मीर मगर लगता है देश विराना क्यों?
इन दल्लों को भारत से मिलता है खाना-दाना क्यों?

घाव हुआ नासूर करो कुछ वरना फिर पछताओगे!!
धीरज टूट गया सेना का कैसे देश बचाओगे?

आस्तीन के साँपों को मर्यादा में लाना ही होगा!!
हिन्द भूमि का वंदन करना इन्हें सिखाना ही होगा!!

इन्हें पकड़कर स्वतन्त्रता की परिभाषा बतलाओ अब!
सेना का सम्मान पुष्ट हो ऐसी रीत चलाओ अब !

कहते हो कश्मीर हमारा पर अधिकार नहीं देते!!
देशद्रोही की छाती बींधे वो हथियार नहीं देते!!

सत्ताधारी करें कभी तो अनुभव उनके दर्दों का।
तुष्टिकरण की नीति त्यागें मोह छोड़ें हमदर्दों का।

एक बार घाटी सेना के हाथ सौंपकर के देखो!!
कितने कुत्ते बेनक़ाब हों गिनती तो करके देखो!!

तेज स्वरों में जय हिन्द गूंजे फिजां तिरंगी कर दें।
पागल कुत्तों की छाती में जी भर लोहा भर दें।

इतने छेद करेंगे कि अनुमान नहीं होगा!!!
घाटी में पैदा फिर कोई शैतान नहीं होगा!!

देशद्रोहियों का घाटी में नाम निशान नहीं होगा!!
कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा!!


Kavita :

सैनिकों के सम्मान को समर्पित रचना

**

क़तरा-क़तरा लहू टपकता भारत माँ की आँखों से।

कलम आज अंगार उगलती नापाकी एहसासों से।

हिन्द-धरा से भूल हुई क्या जो दल्ले जन डाले हैं?
माँ के आँचल पर दहशत के बद्दिमाग ये छाले हैं।

स्वाभिमान को तार-तार करने की ये तैयारी है?
सेना की खुद्दारी पर इनकी ये चोट करारी है।

वर्दी भी हथियार हाथ में लेकर आज कराह रही।
पत्थरबाजों को मौका दे सत्ता भी क्या चाह रही।

राजनीति के तुष्टिकरण में भारत सब कुछ हार गया।
पाक-परस्त ज़िहादी भारत माँ को थप्पड़ मार गया।

सहनशीलता के प्याले में लहू कब तलक पी लोगे?
वीर जवानों की अस्मत का सौदा कर क्या जी लोगे?

गद्दारों की गद्दारी को भूल समझना बन्द करो।
अब या तो कश्मीर छोड़ दो या फिर इनसे द्वन्द करो।

छप्पन इंची सीना अब फिर से खोल दिखा दो जी!
पागल कुत्तों को गोली है ये आदेश थमा दो जी !

दिल्ली कब तक मौन रहेगी इस हरक़त नापाकी पे?
कब तक पत्थरबाजी होगी गद्दारों की ख़ाकी पे?

घाटी की मजबूरी समझो इतिहासों को याद करो!
चाहते हो कश्मीर बचाना तो सेना आजाद करो!

घाटी को नापाक करे वो सर ही कलम करा दो अब!
हूर बहत्तर दे जन्नत का रस्ता इन्हें दिखा दो अब!

ठण्ड कलेजे को पहुंचेगी सवा अरब को खुश कर दो!
ढूंढ़-ढूंढ़ दहशत-गर्दों के पिछवाड़े में भुस भर दो!

याद रहे जय हिन्द इन्हें होठों पर जन-गण गान रहे!
घाटी में मंगल धुन गूंजे भारत माँ की आन रहे।

तेज धार की शमशीरों को अब चमकाना ही होगा!!
कुत्तों को औकात दिखा कर पाठ पढ़ाना ही होगा!!


Kavita :

हनुमत भजन

**

संकट हरैगौ मेरौ राम जी कौ दास रे!
आऔ हनुमान अब टूट रही आस रे !

केसरी के सुत प्यारे अंजनी नै जाये हैं।
रूद्र के अवतार कपि हनुमत कहाये हैं।
कलजुग के देवता कौ घट-घट में बास रे!
संकट हरैगौ मेरौ…..

सूरज कुं भाख लियौ जानि रूप फल में।
सागर पै सेतु बन्ध कर दियौ पल में।
लंका कुं राख कर कियौ है विनाश रे!
संकट …..

सागर कू पार कियौ लंकपुरी धाये।
मइया कौ सन्देशौ राम जी कू लाये।
दुष्टन के बीच बैठी मइया उदास रे!
संकट…..

रामजी के काज करे सखा बने प्यारे।
ज्ञान गुण खान सिया माँ के दुलारे।
अष्टसिद्ध-नवनिध देत सुख राश रे!
संकट…..

बजरंग के द्वार जो भी दीन-दुखी आवै।
मन चाहौ वर संग सुख सम्पति पावै।
नाम लेत भूत-व्याधा फटकें न पास रे!
संकट…..

मंगल को जन्मे हैं मंगल ही करते।
जग की विपद कपि तेज सदा हरते।
आरती चालीसा पढ़ कर लै उपास रे!
संकट…..


Kavita :

दुश्मनी भी न हम से निभाई गई।
ये नज़र जब नज़र से मिलाई गई।

चाक हैं दिल-जिगर नैन में नीर है।
दिल्लगी ना किसी से बताई गई।

मैं सलाई चला बुन चुकी ख़्वाब जो।
आँख खुलते कहाँ ये बुनाई गई।

चोट दे-दे के सब बन रहे रहनुमां।
ए ख़ुदा तेरी कितको खुदाई गई।

रूह तक ज़ख्म का सिलसिला देखिए।
पर दवा भी न कोई लगाई गई।

प्यास से जान मेरी चली जा रही।
अंजुरी भर न उनसे पिलाई गई।

तेज सुर में कोई तो ग़ज़ल अब कहो।
जो न महफ़िल में अब तक सुनाई गई।


Kavita :

जय श्री राम

***

त्रेता में जन्मे दशरथ घर अवधपुरी निज धाम।
पुरुषोत्तम आदर्श जगत के रघुकुल नन्दन राम।
अरे मन भज ले सीताराम,बनेंगे तेरे बिगड़े काम……

कौशल्या की गोदी खेले जग के पालनहारे।
दीन-दुखी अरु निज भक्तों के जो आँखों के तारे।
भाव सहित जो गया शरण में वो तर गया बिन दाम।
अरे मन भज ले सीताराम…..

असुरों के आतंक से पीड़ित थे सुर-नर मुनि सारे।
पितृ आज्ञा से गुरु विश्वामित्र आश्रम आन पधारे।
मार ताड़का और सुबाहु निर्भय किये गुरुधाम।
अरे मन भज ले सीताराम……

स्थापित आदर्श किये निज जीवन में अपनाकर।
मात-पिता का वचन निभाने त्याग चले ग्रह रघुवर।
वन में वास किया सीता संग लड़े बहुत संग्राम।
अरे मन भज ले सीताराम…..

पर्ण कुटी में जब सीता ने स्वर्ण मृग को देखा।
राम गए मृगछाला लेने लखन खींच गए रेखा।
रावण ने सीता को हरके कर ली नींद हराम।
अरे मन भज ले सीताराम ……

भीषण था रण सागर तट पे कम्पित था जग सारा।
वानर-रीछ लड़े असुरों से लेकर नाम सहारा।
रावण को निज दास बनाकर दिया सुखद परिणाम।
अरे मन भज ले सीताराम……

भवसागर की तेज लहर से राम नाम उद्धारे।
निज भक्तों पर करुणा करके भव बन्धन से तारे।
रूचि-रूचि रटो रमापति रघुवर रक्षक राजा राम।
अरे मन भज ले सीताराम बनेंगे तेरे बिगड़े काम।

1048 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *