0221 – Dinesh Pratap Singh Chauhan

Kavita :

“राजनीति की कविता”
धंधे और व्यापार हो रहे ,राजनीति में अब तो
सौ के कई हजार हो रहे,राजनीति में अब तो
जनता के ही बीच के प्रतिनिधि होते थे पहले तो
पेश कई अवतार हो रहे,राजनीति में अब तो
राज बदल लो चेहरे बदलो बदले मगर न किस्मत
अलीबाबा के यार हो रहे,राजनीति में अब तो
पर उपदेश कुशल बहुतेरे ब्रह्म सूत्र सत्ता का
उपदेशक भरमार हो रहे,राजनीति में अब तो
पढ़ लिखकर क्या होना,रोना और उदर भर लेना
मंत्री कई गंवार हो रहे,राजनीति में अब तो
राजनीति के रा का भी कुछ पता नहीं है जिनको
सब वो भी स्वीकार हो रहे,राजनीति में अब तो
सेहत और हालत से जनता भोगे चाहे दुर्दिन
ऐश वहां भरमार हो रहे,राजनीति में अब तो
पुश्तों के भविष्य आरक्षित दस परसेंट कमीशन
सब अवसर भरमार हो रहे,राजनीति में अब तो
लुच्चे, गुंडे, चोर, मवाली, छुटभैये, व्यापारी
हम तुम सब बेकार हो रहे,राजनीति में अब तो
वही परीक्षा देने वाला वही परीक्षक बनता
प्रश्न सभी बेकार हो रहे,राजनीति में अब तो
देश पटे लाशों से चाहे, पर सत्ता मिल जाए
लाशों के व्यापार हो रहे,राजनीति में अब तो
सत्ता की खातिर माँ को भी गाली से ना हिचकें
गद्दी को गद्दार हो रहे,राजनीति में अब तो


Kavita :

“भारतीय किसान की कविता”
जो भी पैदा हुआ है उसको एक दिन मरना पड़ता है
देहकां की मज़बूरी जिसको हर दिन मरना पड़ता है
सरे देश की भूख मिटाने को जो मेहनत करता है
देश बता क्यूँ उसको अक़्सर फ़ाक़ा रखना पड़ता है
राजनीति में हर दल ने बस भरमाया है और छला
अधिकारों की मांग पे उसको मौत से लड़ना पड़ता है
गोरे अंग्रेजों को देखा, अब देखे काले अंग्रेज
तब भी रोना पड़ता था और अब भी रोना पड़ता है
उसकी फसल का मूल्य लगाते नेता,लाला और दलाल
किस व्यापारी को बाजार में, ऎसा सहना पड़ता है
एक अंगौछे की ख़ातिर भी वो तो जीता मर मर कर
बिचौलियों के गले हमेशा स्वर्ण का गहना पड़ता है


Kavita :

मन का दुःख किससे कहें,सब दुःख के आधीन
हम बतलइहें एक दुःख ,सब बतलइहें तीन।
धर्मध्वजा सौंपी जिन्हें ,धर्म का करते नाश
चाँद बादलों ने ढका ,जुगुनू करत प्रकाश।
संचारों ने कर लिया ,पृथ्वी को आधीन
घटे फासले तो मगर ,दूर हुए गुन तीन।
डिग्री लिए प्रदेश में ,मूरख फिरते आज
वेद लादकर पीठ पर,गधे चरें ज्यों घास।
धर्म जाति सब अलग थे ,पर मन से थे एक
राजनीति ने हर लिए ,सबके ज्ञान ,विवेक।
मानवीय संवेदना, सबसे बड़ा है धर्म
बढ़ती जाती भागवत,घटता जाता मर्म।
करते थे भंडारे जो ,एक वर्ष में तीन
आज उन्होंने छीन ली ,भाई की ही ज़मीन।
नागनाथ को हराकर ,ले न पाये थे सांस
सत्ता सौंपी अब जिसे ,वो भी निकला सांप।
काम थे पैसे जेब में ,लेकिन था उल्लास
धन से जेब भरी मगर ,मन हो गया उदास।
मित्र जानकर दर्द का ,जिसको किया बयान
इठला इठला जगत में वही करे अपमान।
नीर पिएं और त्रण भखैं ,हंसों का अपमान
क्षीर पात्र के साथ अब वक पाएं सम्मान।
जो मंदिर में कर रहे ,पूजा सौ सौ बार
मूर्ति बेच भगवान् की ,वही करें व्यापार।
बहुत लगाई अक्ल पर ,नहीं पा सके पार ,
सत्ता के दरबार में ,ठगे गए हर बार।
धन को कमाना सिखाते ,सब शिक्षा संस्थान
पर सुख कैसे कमाना ,उससे सब अंजान।
इतने भरोसे हट गए,इस दुनिया में आज
अपने हाथ से सकुच कर ,मिलता दूजा हाथ।
जो खम्भा था तीर और तोप को करता मात
धन -सत्ता के चक्र ने ,उसे किया बर्बाद।
कोई मुकदमा जनम भर ,अगर न निर्णय पाय
अगला जनम तो है अभी ,मन काहे घबराए।


Kavita :

इस ओर भी नेता हैं और उस ओर भी नेता
इंसान भी मिलेगा? या बस नेता ही नेता
जब राजनीति लाशों पर ही करनी है तुझे
शम्शान को ही घर तू बना क्यों नहीं लेता?
जन्मों का इंतिज़ार भला क्यों करेंगे हम
इस जन्म में ही उनको सज़ा क्यों नहीं देता?
जो देश भर का पेट भरते रहते हैं हरदम
भरपेट देश उनको ग़िज़ा क्यों नहीं देता?
सुखसुविधा का सामान सभी जोड़ लिया पर
जीवन हमें ये उतना मज़ा क्यों नहीं देता?
जो रोज लड़ाती हों हमें,तुम्हें और सबको
इंसां उन किताबों को जला क्यों नहीं देता?


Kavita :

तंत्र सभी बेहाल देखिये
राजनीति बदहाल देखिये
कोई उत्तर नहीं मिल रहे
कितने करें सवाल देखिये
आश्वासन हर बार मिले हैं
छले गए हर बार देखिये
अस्पताल खुलते जाते हैं
देश रहा बीमार देखिये
शर्म छुपाती फिरती चेहरा
बेशर्मी की चाल देखिये
राज बदलते रहते है पर
हाल वही हर बार देखिये
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई
सभी वोट का माल देखिये
गाय भैंस से किसको मतलब
वोट की सारी चाल देखिये
धर्मनिरपेक्ष वही हैं जो भी
माँ पर करें सवाल देखिये
मज़हब किसान और गरीबी
सब सत्ता की ढाल देखिये
धन के बिना न चलता जीवन
धन ही बना जंजाल देखिये
जीवन सदैव ख़्वाब रहेगा
सत्य रहेगा काल देखिये
बुद्धिमान सब लोग हुए तो
घर में हुई दीवाल देखिये
जेब भरी है धन से सबकी
मन लेकिन कंगाल देखिये
स्कूलों की नहीं है गिनती
और शिक्षा के हाल देखिये
ईद पे है इफ्तार यहां पर
होली पर न जुहार देखिये


Kavita :

“जय जवान जय किसान”

हमेशा सर झुकायें उन जवानों के लिए
जो अपना परिवार
देश के सभी परिवारों की रक्षा के लिए छोड़ देते हैं
जिनकी वज़ह से
हम निश्चिंतता से परिवार के लोगों का
जन्म दिन मनाते हैं
जिनकी वज़ह से
हम निश्चिन्त होकर परिवार के साथ
छुट्टियों का आनंद उठा सकते हैं
इसी के साथ साथ सबसे बड़ी बात
जिनकी वज़ह से
दुनियाँ में हमारे देश का और हमारा सर गर्व से ऊँचा है
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हमेशा सर झुकायें उस बाप के सामने
जिसने अपने बुढ़ापे के एकमात्र सहारे को
देश की रक्षा के लिए दांव पर लगा दिया
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हमेशा सर झुकायें उस माँ के लिए
जिसने बेटे के माथे पर टीका लगाकर
विदा कर दिया यह कहकर
कि अपनी जान की कीमत पर भी
अपनी भारत माँ की
अस्मत का सौदा मत मंजूर करना
मुझे वापस
तेरा मुंह देखने को चाहे न भी मिले
कोई दुःख नहीं
पर दुश्मन को
किसी भी कीमत पर
तेरी पीठ देखने को न मिले
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हमेशा सर झुकायें उस पत्नी के लिए
जो देश के सारे सुहागों की
सलामती के लिए
अपना सुहाग
देश की सीमा के हवाले कर देती है
इस सोच के साथ
कि मेरा पति केवल मेरा पति ही नहीं है
अपनी जन्म भूमि
और देश के करोङों माँ बापों का बेटा भी है
देश की करोड़ों बहनों का भाई भी है
,देश और इस देश के नागरिकों का
मुहाफ़िज़ भी है
और न जाने कितने मौकों पर
अपने आंसू इसलिए पी जाती है
कि बच्चों
और माँ बाप के आंसू न छलक जाएँ

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हमेशा सर झुकायें उन बहनों के लिए
जो रक्षा का सूत्र बांधकर
अपने भाई को देश की सारी
बहनों की रक्षा का भार सौंपकर
भीगी आँख की कोरों में भी
मुस्कराहट को खोने नहीं देतीं
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हमेशा सर झुकायें उन बेटों के लिए
जो मम्मी पापा बोलने से पहले
जयहिन्द और भारत माता की जय
बोलना सीख जाते हैं
जिनके नन्हे हाथ
पूजा के लिए अर्घ्य देने से पहले
सेल्यूट देना सीख लेते हैं
जो कच्ची उम्र में ही यह जान लेते हैं
कि वो उस बहादुर पिता की संतान हैं
जिसके कारण
दुश्मन उनके देश से भय खाता है
वह उस गौरवशाली पिता की संतान हैं
जिन्हें देश के प्रधानमंत्री
और राष्ट्रपति भी सलामी देते हैं
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हमेशा सर झुकायें
उन लाखों किसानों के लिए
जिनके पसीने की बूँदें
देश की भूख की दुश्मन बन जातीं हैं
जो दुनिया का सबसे बड़ा जुआरी बनकर
अपनी सारी पूँजी खुले आस्मां के नीचे
केवल ईश्वर के नाम पर
दांव पर लगा देता है
केवल इसलिए
कि दुनिया उसके देश को
भूखों का देश कहकर
अपमानित न कर सके
जो नेताओं ,अफसरों ,व्यापारियों
और दलालों से
बेशर्मी से बार बार
छले जाने के बावजूद
देश और समाज को
छलने का पाप नहीं करना चाहता
भले देश ,राजनीति ,समाज उसकी भूख
उसकी मौत की भी परवाह न करे
पर वह हमेशा परवाह करता है
कि उसके जीवित रहते
देश में किसी की भी मौत भूख से न हो


Kavita :

रीढ़ रखना, ज़ुर्म की धारा बना है
कोर्निश करिये यहाँ तनना मना है
चारणों की भीड़ है फिर राजपथ पर
नौरत्न चुनने की हुई उद्घोषणा है
तीरगी की हुक़ूमत चलने लगी है
रोशनी से महल का रिश्ता बना है
आज फिर पेशी हुई गैलीलियो की
लग रहा है सूर्य को फिर घूमना है
जख़्म ही बस हमारी किस्मत में आये
फूल या पत्थर कोई जब भी चुना है


Kavita :

“देश में दिन प्रतिदिन हो रहे नारी अपमान और रेप की घटनाओं पर”
नारी पूजन में ,देवों का वास, जो देश बताता था
धरती नदियों तक को अपनी मां के तुल्य जताता था
उस देश के कुछ निर्लज़्ज़ों ने है किया काम शैतानों का
धूल में देश का मान मिला सिर झुका सभी इंसानों का
जो देश था वीर जवानों का
वहां अब डेरा हैवानों का।
जहां पर नारी की रक्षा में एक गीध प्राण दे देता है
वीर शिवा स्वराज की शिक्षा जीजा मां से लेता है
हिन्दू को बना बहन रक्षा का भार हुमायूँ लेता है
उस देश की कोख लजाने वाला कार्य है इन संतानों का
धूल में देश का मान मिला सिर झुका सभी इंसानों का
जो देश था वीर जवानों का
वहां अब डेरा हैवानों का।
लेकिन सत्ता के शिखरों की लापरवाही भी दोषी है
दलों में अपराधी ,गुंडों की वाहवाही भी दोषी है
और प्रशासन की ढुलमुल ये कार्यवाही भी दोषी है
कुम्भकर्ण कब जागेगा इन सत्ता के ऐवानों का
धूल में देश का मान मिला सिर झुका सभी इंसानों का
जो देश था वीर जवानों का
वहां अब डेरा हैवानों का।


Kavita :

बहुत दिनों से नहीं हो रहा मौसम बेईमान
अब मौसम की जगह हो गया बेईमान इंसान
करें रक्षा अब कृपानिधान
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मुल्ला और पंडितों के चक्कर में नहीं रह पाते
जो साथ साथ रहना भी चाहें, राम और रहमान
करें रक्षा अब कृपानिधान
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यूनिवर्सिटी और डिग्रियों, ने पकड़ी ऊंचाई
किन्तु धरातल पर आ पहुंचा देखो मानव ज्ञान
करें रक्षा अब कृपानिधान
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कई ग्रेजुएट,पोस्टग्रेजुएट शहर के हैं वाशिंदे
पर,लाइब्रेरी की जगह खुल गए पार्लर और दुकान
करें रक्षा अब कृपानिधान
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मंदिर और महात्मा कम थे,धर्म था लेकिन ज्यादा
किन्तु छलावे और ढोंग ने धर्म किया बदनाम
करें रक्षा अब कृपानिधान
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दूर दूर चाहे रहते थे ,नज़दीकी थी मन में
दूरी सात समंदर की अब,एक हो चाहे मकान
करें रक्षा अब कृपानिधान
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गैरत और शर्म ने कर ली ,बेशर्मी से शादी
शर्मदार से ज्यादा है ,बेशर्मों का सम्मान
करें रक्षा अब कृपानिधान
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भाग्यविधाता भारत के मुस्तक़्बिल का क्या होगा
राजनीति वैश्या है,हाक़िम करें दलाल का काम
करें रक्षा अब कृपानिधान


Kavita :

“समय के स्वर”
करोड़ों के नोटों की माला पहनने के बाद
उन नोटों से बाजार में ख़रीदारी के
उनके प्रयास विफल
विक्रेताओं का कथन
उनके पहने नोटों के अवमूल्यन के बाद
इनका मौद्रिक मूल्य शून्य हो चुका है
————————————————————————————————-
विरोधियों ने उनपर जूते फेंके
पर आश्चर्यजनक रूप से
जूतों ने उन्हें स्पर्श से परहेज़ किया
—————————————————————————————————–
हिंसक जानवरों ने जब अपने इलाके में
उनके दौरे
और सम्बोधन सभा का समाचार पाया
तो मीटिंग करके
सभी जानवरों को वहां न जाने की ताक़ीद की
जिससे वो इंसानों की भाँति
हिंसक होना न सीख जाएँ
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सर्पों ने एक जनहित याचिका में
निवेदित किया
कि जितने ज़हर के लिए
हजारों हजार सर्पों को
प्रताड़ित किया जाता है
उससे कई गुना ज़हर तो
केवल एक नेता से ही
प्राप्त किया जा सकता है
————————————————————————————————————-
अपने को सिक्कों से तुलवाने के बाद
वे उन्हें गरीबों में दान करने गए
तो उन्हें उत्तर मिला
कि अभी हम इतने भी गरीब नहीं


Kavita :

“महाराणा प्रताप जयंती पर”
राज्य की ख़ातिर नहीं, बस मान की ख़ातिर लड़े
देश और इस देश के, अभिमान की ख़ातिर लड़े
ग़ुलामी से, देश की रक्षा का प्रण, पूरा किया
राष्ट्र, और इस राष्ट्र की, पहचान की ख़ातिर लड़े


Kavita :

“एक समाचार -अमेरिका पकिस्तान को मदद देता रहेगा पर भारत की मदद बंद ”

आरती अमरीका सर की ,जगत के स्वयंभू अफसर की
हैं क़ाज़ी सारी दुनिया के ,हैड दुनिया के बनिया के
जिन्हें ये आतंकी कहते ,उन्हीं को भर झोली देते
अजब है मति इनके सर की
आरती,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तेल है इन्हें बहुत प्यारा ,न जाने कितनों को मारा
बहाना कोई बना लेंगे ,धवल को स्याह बता देंगे
यू एन ओ है इनके घर की
आरती,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
जगत पर जो तोहमत धरते ,काम ख़ुद वही रोज करते
कभी ख़ुद बाज न आएंगे ,फटे में टांग अड़ायेंगे
ख़ामखाँ बड़ी बुआ घर की
आरती,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इन्हीं के ख़ून का मानी है ,और का ख़ून तो पानी है
चोट पर ख़ुद की हंगामा ,और की चोट सिर्फ ड्रामा
ग़ज़ब हैं बन्दा परवर भी
आरती,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


Kavita :

हर बार देश की आँखों में ये पानी, आखिर कब तक?
लापरवाही की, हर बार कहानी, आखिर कब तक?
माना, जंग आखिरी विकल्प होना चाहिए,लेकिन
अमन की आशा में हर दिन क़ुरबानी,आख़िर कब तक?
रोज हमारे बेटे शहीद ,कब तक,कब तक,कब तक?
यहाँ मुहर्रम ,वहां ईद, ये कब तक,कब तक,कब तक?
दुश्मन तो दुश्मन है उससे हमको क्या आशा रखनी
घर में दुश्मन की ताईद, ये कब तक,कब तक,कब तक?
जान चुकी है जनता सब कुछ, मांगेगी अब लेखा
जाग चुकी है जनता सारी, अब न सहेगी धोखा
शांति चाहते हैं हम भी,पर ये भी मत है हमारा
अगर जंग है अमन की कीमत ,होने दो जो होता
और भी बेटे हम दे सकते ,लेकिन शांति हो अब तो
तन,मन,धन सारा दे देंगे ,लेकिन शांति हो अब तो
माना युद्ध से ध्वंस बहुत हो सकता है, पर भाई
शांति हो केवल शांति हो केवल शांति हो केवल अब तो
वीर जवानों की जां पर भी राजनीति ,बेशर्मो
केवल वोटों की ख़ातिर ही राजनीति ,बेशर्मो
हर नेता से, हर दल से ये कहता हूँ मैं सुन लो
देश की कीमत पर न करो ये राजनीति बेशर्मो


Kavita :

नेता का है, अफसर का है, ईमान माल्या
इस देश में हर दिल का है अरमान माल्या।
जादू का पिटारा है ,हर रोज नया खेल
दुनिया में, मेरे देश का, गुमान माल्या।
भ्रष्टनारयन की कथा, का है एक प्रसंग
भ्रष्टों का मेरे देश में, यजमान माल्या।
हर बदन है उघडा हुआ, हर व्यवस्था नंगी
सत्ता की नंगई का, है हम्माम माल्या।
तेरा है न मेरा है पूरे, देश का गौरव
भारत महान की है ,एक ढलान माल्या।
हम माल्या ,तुम माल्या ,सब देश माल्या
अब होगा मेरे देश की ,पहचान माल्या।
आईना है, जो देख सको, गौर से देखो
इस व्यवस्था पे काला एक निशान माल्या।


Kavita :

जब तक हम यूँ मौन रहेंगे ,जब तक हम चुप बैठेंगे ,
तब तक यूँ ही, माली, अपने बाग़ की खुशबू बेचेंगे।
नहीं कृष्ण, अब हमको ही, ये सूर्य छुपाना होगा रे ,
वरना अर्जुन की आहुति, ये कौरव छल से ले,लेंगे।
कल जिन सज्जन को हमने ,मधुशाला से आते देखा ,
वही, सुना है, दारूबंदी का आंदोलन छेड़ेंगे।
खुली पाठशालाएं ऐसी ,गाँव गाँव और नगर नगर ,
धोखे और फरेब की शिक्षा ,जिसमें सारे लेवेंगे।
एक तुग़लक़ के नाम का चर्चा ,करते हैं हम आजतलक ,
जाने अब इस देश के अंदर ,कितने तुगलक होवेंगे।
गंदा पानी भी हमको तो ,नहीं मिल रहा हफ़्तों से ,
उनका कहना है हम नल में ,डिस्टिल वाटर भेजेंगे।
सब्र कीजिये,माल गया है ,इज़्ज़त फिर भी बाकी है ,
रपट करेंगे तो भैयाजी ,वो इज़्ज़त भी खो देंगे।
अग्नि परीक्षा बहुत हो चुकी ,इस समाज में सीता की ,
एक बार क्या यही परीक्षा ,राम भी देकर देखेंगे ?
बहुत हो चुकी हानि धर्म की ,लेलो अब अवतार प्रभो ,
वरना आश्वासन हम तेरा धोखा साबित कर देंगे।


Kavita :

कुछ हालिया घटनाओं पर छंद मुक्त टिप्पणियां ”

बाप ने खाया चारा ,और बेटा मिटटी खाय
तेजस्वी अब ख़ानदान की ऎसे रीत निभाय
ऎसे रीत निभाय ,फँस गए बुरे सुपुत्तर
ख़ून ने आखिर दिखा दिया है अपना चरित्तर
घाघ कवी ने ये कह कर, कर दिया बखेड़ा
बाप पे पूत सवार पे घोडा ज़रूर होगा थोड़ा थोड़ा

बड़ी बड़ी सैद्धांतिक बातें बड़े बड़े थे बोल
मानहानि के केस ने खोल दी लेकिन पोल
खोल दी लेकिन पोल घिरे हैं चतुर केजरी
जनता के पैसे से फीस वकील को दे दी
मुंह से बड़े बोलवालों पर करो न तुम विश्वास
जे आचरहिं ते नर न घनेरे कहि गए तुलसीदास

क्या अजीब बातें हैं आजकल राजनीति में भाई
धर्म को अलग तरह की दिशा इस राजनीति ने दिखाई
राजनीति ने दिखाई ,गद्दी क्या न करा ले
सुबह, दोपहर, शाम के बाप ही अलग बना ले
सब कहते हैं राजनीति में धर्म का ना हो मेल
तो फिर क्या अधर्म का होगा राजनीति में मेल ?

राजनीति का पहलवान बेटे के हाथ से ढेर
सारी चालें विफल हो गयीं चकरी दांव भी फेल
चाकरी दांव भी फेल लुट गयी सभी विरासत
भाई और बेटे में बंटी नेता की चाहत
युग युग की है रीत यही होता आया है
धृतराष्ट्रों के हिस्से बस रोना आया है

नब्ज़ नहीं पकड़ी जनता की और मशीन को रोते
बची खुची जो साख रह गयी उसको भी वो खोते
उसको भी वो खोते हास्यास्पद बन बैठे
रेत में नाव चलाकर रोना भाग्य का रोते
ख़ुद जीते तो ये मशीन लगाती थी प्यारी
हार गए तो वही लगे तुमको हत्यारी


Kavita :


“कांग्रेस के नए अध्यक्ष का चुनाव 15 ओक्टोबर को -समाचार”
बदहवास सेना के पति का ,भार धरें अब राहुल जी
कोंग्रेसियों की चाहत ,उद्धार करें अब राहुल जी
तार -तार गरिमा कॉंग्रेसी ,हर मोर्चे पर मात मिले
डगमग कांग्रेस की नैया ,पार करें अब राहुल जी
शस्त्र नहीं लड़ती है जवानी ,शायद वो ये भूल रहे
घायल सेना साथ में ले ,क्या ख़ाक करें अब राहुल जी

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