0221 – Dinesh Pratap Singh Chauhan


Kavita:

काँटों में राह बनानी आती हो तो चलो

सूरज को आँख दिखानी आती हो तो चलो

मक़सद की ज़िद है मंजिलें पाने की नहीं ज़िद

मक़सद पे मंज़िल छोड़नी आती हो तो चलो

ख़ैरात नहीं अब हमें अधिकार चाहिए

सत्ता को आँख दिखानी आती हो तो चलो

हर कलंदर के पाँव में सम्राटों के सर हैं

गद्दी को लात लगानी आती हो तो चलो

दस्तार रहे सर भले जाता हो तो जाए

सर देके पगड़ी बचानी आती हो चलो

प्याला हो या सलीब हो या तोपों के मुंह हों

हर हाल सच बयानी जो आती हो तो चलो


Kavita:

सुनते सुनते सुन्न हैं ये कान,अब मत बोलिये

सब हमारे ही लिए एहकाम?,अब मत बोलिये

बर्फ बनकर रह गए हैं सर्द  जेहन हो गया

आग बन जाएँ न हम श्रीमान,अब मत बोलिये

आपका जिनपर अक़ीदा मान देंगे हम उन्हें

है हमारा भी कोई भगवान्?,अब मत बोलिये

ज़ुबाँ पर कुछ अस्ल में कुछ सोच में कुछ और है

हो गयी बस आपकी पहचान ,अब मत बोलिये

इस क़दर लूटे गए हैं रूह भी बाकी नहीं

क्या सियासत लेही लेगी जान,अब मत बोलिये

आपको सूरज मुबारक़ हमको जुगनू तो मिले

ख्वाब में बस रौशनी का गाँव ,अब मत बोलिये

आँख में आंसू नहीं अब आग का सैलाब है

भस्म हो जाएँगे ये ऐवान ,अब मत बोलिये

कर्तव्य सब स्वीकार हैं पूरे करेंगे जान दे

है कोई अधिकार का भी ध्यान?,अब मत बोलिये

कोई नीला कोई पीला लाल या कोई हरा

सियासत में सारे बेईमान ,अब मत बोलिये

सर झुकाएं मान दें और सींचें अपने खून से

फिर बाप का किसके है हिन्दुस्तान?,अब मत बोलिये


Kavita:

जितना कम सामान रहेगा

उतना सफर आसान रहेगा

अपने घर को लौट भी चल अब

कब तक यूँ मेहमान रहेगा

सुख के सपने भूल जा बन्दे

दिल में अगर अरमान रहेगा

राजनीति ग़र यही रही तो

मुल्क ये बनके मसान रहेगा

झुक सकता है खुदा भी प्यारे

दिल में अगर ईमान रहेगा

चाह चाहतों की छूटी तो

बनकर तू सुल्तान  रहेगा

पत्थर है या है वो इंसां

आंसू ही पहचान रहेगा

सूरज कितने भी रखना पर

जुगनू से भी काम रहेगा


Kavita:

रावी,व्यास,झेलम,चिनाव का और सतलुज के पानी का

ये देश हमेशा ऋणी रहेगा सिक्खों की कुर्बानी का

यवनों के शासन में हिन्दू जब दहशत से डरता था

हिन्दू धर्म की रक्षा में तब पंज पियारा लड़ता था

हिन्दू धर्म की खातिर उठी शमशीरों को भूल गए

सरसठ प्रतिशत फाँसी चढ़े थे उन वीरों को भूल गए

और बता दो कहाँ ये किस्से इतिहासों में सुने गए

धर्म की ख़ातिर बच्चे ज़िंदा दीवारों में चुने गए

बाप क़त्ल और दो दो बच्चे चुनवाये दीवारों में

उनके लहू का गारा होगा संसद की दीवारों में

कटी उँगलियों के एवज़ सत्ता भोगी मरभुक्खों ने

देश बता क्या बलिदानों का एवज़ मांगा सिक्खों ने

आओ आज याद करते हैं सिक्खों के वलिदानों को

देश की ख़ातिर जान लुटाने वाली उन संतानों को

अपने अमर शहीदों को जो याद नहीं रख पाते हैं

वही ग़ुलामी के इतिहासों को फिर फिर दोहराते हैं


Kavita:

हीरे को काँच,काँच  को हीरा बता दिया

फिर ये मलाल है कि अरे हमने क्या किया

इतनी सी बात पे ये जहां ख़फ़ा हुआ है

शीशा था मेरे पास वो मैंने दिखा दिया

उसने मुझे लौटा दीं मेरी बची जो सांसें

और चारागर को वहम कि मैंने शिफ़ा किया

तारीख़ की सफ़ों में जगह पा सका वही

सर देके जिसने पगड़ी को अपनी बचा लिया

एक बात पूछनी थी उस परवर्दिगार से

शैतान पहले से था ,क्यों नेता बना दिया


Kavita :

भूख, भ्रष्टाचार है, बदअमनी है, बेकारी है

उनकी नज़रों में ये कहना द्रोह की तैयारी है

मुनीमों ने मालिकों की ज़र का कर डाला ग़बन

और मालिक पूछ ले तो, देश से गद्दारी है

हमने जब भी आइना उनको दिखाया, उन्होंने

अपनी बद्शक्ली की तोहमत, आईने पे डाली है

हम अँधेरे में रहे, ये देश रोशन हो गया !

बाज़ीगरी है हाक़िमों की, आंकड़ा सरकारी है

हिफ़ाज़त में मुब्तिला, सरकार है, उनके लिए

ज़िन्दगी जिनकी धरा को, बोझ लगती भारी है

सिसकने और रोने के, मौके बहुत हैं देश में

फ़तवा है उनको जो करता, गाने की तैयारी है


Kavita:

यूँ पानी की कमी न होती ,अगर आँख में पानी होता

सबकी आँख में नमीं न होती,अगर आँख में पानी होता

बदले गद्दीनशीन लेकिन हाल हमारे वही रहे

जनता यूँ अनमनी न होती ,अगर आँख में पानी होता

राजनीति का पतन देखिये देशद्रोहियों को भी शह

ज़मीं ख़ून से सनी न होती ,अगर आँख में पानी होता

सही दासता सदियों की पर आत्मालोचन नहीं किया

हालत ऐसी बनी न होती ,अगर आँख में पानी होता

देश पटे लाशों से चाहे गद्दी लेकिन मिल जाए

राम रहीम में ठनी न होती ,अगर आँख में पानी होता

इन्द्रासन जब हिलें युद्ध का दाँव सियासत खेलती है

सीमा पर सनसनी न होती ,अगर आँख में पानी होता

जाने क्या क्या बन जाते इंसान नहीं बन पाते हम

इंसानों की कमी न होती ,अगर आँख में पानी होता


Kavita :

जाने अब क्या क्या करेगा आदमी

और अब कितना गिरेगा आदमी

जेब में पैसे और आंसू आँख  में

करे को अब यूँ भरेगा आदमी

ऎसी आदत पड़ चुकी है क्या करे

ख़ुद से भी धोखे करेगा आदमी

ग्रन्थ सारे पढ़ चुका ये पूछिए

ढाई आखर कब पढ़ेगा आदमी

चाँद पर चलने की चाहत है मग़र

कब ज़मीं पर सीधा चलेगा आदमी

नींद आँखों में न है दिल में सुकूँ

जीते जी अब यूँ मरेगा आदमी


Kavita:

हम फूल ले चलते रहे,फ़ितरत थी हमारी

तुम उनको कुचलते रहे,फ़ितरत थी तुम्हारी

जो हाथ हमने पकड़ा तो छोड़ा नहीं कभी

तुम हाथ बदलते रहे,फ़ितरत थी तुम्हारी

दिलमें वही,जबाँ पे वही और वही व्यवहार

तेरे किर्दार बदलते रहे,फ़ितरत थी तुम्हारी

दुश्मन को हम पे भरोसा,होगी न दग़ा,पर

तुम सदा ही छलते रहे,फ़ितरत थी तुम्हारी

अफ़सोस कि चुप्पी औ शराफत को मेरी तुम

कमजोरी समझते रहे,फ़ितरत थी तुम्हारी

मैं आसमान था मग़र सर झुका के बैठा

तुम खाक़,और तनते रहे,फ़ितरत थी तुम्हारी

**

दोस्त या दुश्मनों को कैसे शुमार करते हैं ?

दोस्त जो होते हैं, आगे से वार करते हैं

अभी तू इश्क़ का मतलब समझ नहीं पाया

तू झूठ बोल, हम फिर ऎतबार करते हैं

कभी भूले से हमने बोला, चाँद सुन्दर है

हरेक शाम वो तबसे, सिंगार करते हैं

तू अपनी अक़्लमंदियाँ भी देख अजमा के

फ़रेब खाने का, हम इंतज़ार करते हैं

वो मेरी पीठ के घावों पे हुआ शर्मिन्दा

जिसे हम कभी से दुश्मन शुमार करते हैं


Kavita :

जी जीवन का हर पल छिन

हर दिन मानके आख़िरी दिन

देव भी होना है आसाँ

इंसां बनना सबसे कठिन

वो जीवन में गिने नहीं

जो दिन बीते तेरे बिन

तीरो तलवार तोप गोले

व्यर्थ हैं तेरे हौसले बिन

तुझे फैसला करना है

बेच ज़मीर और पैसे गिन

उसीको मुश्किल जिसने कहा

रात को रात और दिन को दिन


Kavita:

हर मानव की दुनिया में बस इतनी सी कमजोरी

एक ज़िंदगी ,चाहत इतनीं ,कैसे होंगीं  पूरी

इसी में उलझा हर इंसान

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आशाओं ,इच्छाओं का है एक आकाश अनंत

मन की चाह और लिप्सा का नहीं कभी भी अंत

मन के अश्वों पर लग़ाम ही मुश्किल है श्रीमान

इसी में उलझा हर इंसान

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उज्वल भविष्य की चाहत में वर्तमान को खोते

भविष्य की खुशियों  ख़ातिर वर्तमान में रोते

आज को जी तू ,हर भविष्य की नियति है वर्तमान

इसी में उलझा हर इंसान

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धन से दरिद्र होने में क्या दोष किसी मानव का

पर मन से तो राजा होना ,संभव सारे जग का

मन की दरिद्रता तो दूर न कर पाए भगवान्

इसी में उलझा हर इंसान

 

 


Kavita:

आजकल जितने बड़े मिले
धोखे के ढेर पर खड़े मिले
हीरे के भाव काँच है बिका
हीरे कूड़े में पड़े मिले
महँगे लिबास में ढकी विष्ठा
टुच्चे अर्श पर चढ़े मिले
न्याय तो धनवान के गिरवी
कानून जेब में रखे मिले
सत्तानशीन लूट में मिले
और अफसर नकचढ़े मिले
अंधियारों को मिले हैं मानपत्र
सूरज यहां डरे डरे मिले


Kavita:

आदमी तो सोचता, भगवान् होने को
पर कलेजा चाहिए, इंसान होने को
कर्म काले हों भले, चल जायगा
लिबास उजला चाहिए श्रीमान होने को
तुझको केवल चाहिए बस चाहिए
राज पड़ना छोड़ता है, राम होने को
मूढ़ तुझसे चाहतें छुटती नहीं
घर छूटता है कृष्ण सा इंसान होने को
जीभ पर ना चाह पर कोई नियंत्रण है
फ़ाक़े लगेंगे साहिबे ईमान होने को


Kavita:

“ख़्वाहिश”
एक मुक़ाम हासिल होता है तुरत दूसरे की ख़्वाहिश
इंसानों का जीवन मानो केवल ख़्वाहिश ही ख़्वाहिश
क्या है उसके पास तू केवल उसकी ख़्वाहिश रखता है
तुझको पता है जो तुझपर है उसकी दूसरे को ख़्वाहिश
उस मालिक ने शहंशाह सा हर इंसान बनाया है
तुझे भिखारी बना रही है केवल तेरी ही ख़्वाहिश
बनाना चाहे कोई देवता कोई ख़ुदा बनना चाहे
लेकिन नहीं है दिल में किसीके बेहतर इंसां की ख़्वाहिश
जिसमें भी जीवन है उसका नष्ट ही होना है निश्चित
नष्ट नहीं होती है कभी जो नाम उसीका है ख़्वाहिश


Kavita:

सदियों के भूखे ,भाषण से भूख कहाँ मिटने वाली
ओस चाटकर केवल अब ये प्यास नहीं बुझने वाली
जो गुलशन का माली हो वो ही गुलचीं का काम करे
उस गुलशन में जीवन भर फिर क्या बहार खिलने वाली
ख़ुशी जेब में नहीं दिलों में और दिमाग़ में रहती है
खूब समझ लो और कहीं ये ख़ुशी नहीं मिलने वाली
अंधे सारे ताज़दार और बहरी हर सरकार यहां
जोर से चीखो सत्ता ये फ़रियाद नहीं सुनने वाली
अब भी समय है तुम हलचल को पहचानो सत्ताधीशो
नहीं दिलों की आग ये आश्वासन से है बुझने वाली
तुझको पाना ही मक़सद हो जिसका केवल दुनिया में
सारी धरा पाकर भी उसको तृप्ति नहीं मिलने वाली


Kavita:

पैग़ाम अमन का जो देता था तराने में
उसीका हाथ मिला बस्तियां जलाने में
ज़मीर और ग़ैरत को तू किनारे रख
देख तू कैसा सफल होता है ज़माने में
सियासतों की इस जादूगरी का क्या कहिये
गरीब मिट रहा है गरीबी मिटाने में
वही क़ानूनी हिफाज़त का अहद लेते हैं
कल तलक जो दर्ज़ थे हमारे थाने में
ज़माने की किसी शै में कहाँ है वो लज़्ज़त
जो लुत्फ़ मिलता है एक तेरे आस्ताने में
दिलों में कुछ ज़ुबाँ पे कुछ अमल में और ही कुछ
ककहरा राजनीति का है इस ज़माने में
मेरी नज़र में नहीं खाक़ उसकी कीमत है
कि सिर्फ़ धन ही हो पर्याप्त जिसको पाने में


Kavita:

रात लम्बी हो गयी अब भोर होना चाहिए
फ़रियाद बेमानी हुई अब शोर होना चाहिए
जो हमारे देश की खातिर हों दुश्मन की तरह
सर सभी के नेज़ों पे हर ओर होना चाहिए
वोट की ख़ातिर जो बाँटें आज हर इंसान को
उनकी मज़म्मत हर तरफ हर ओर होना चाहिए
कितने हम ज़िंदा रहे हैं इसकी कीमत कुछ नहीं
किस तरह जीवन जिया यह ग़ौर होना चाहिए
दुश्मनों से अदावत या दोस्तों से दोस्ती
कुछ भी करिये सलीके पर जोर होना चाहिए


Kavita:

झूठ को आपने चलते फिरते देखा है ?
देख लो देखो पास कहीं कोई नेता है?
अक़्लमंदियाँ देख लीजिये इंसां की
आंसू बोता बोकर खुद ही रोता है
वक़्त की चाल बदलने की जो चाहत है
कब मानेगी होता है सो होता है
काम क्रोध मद मोह लोभ सब वैसे ही
वस्त्र बदलने से कोई साधू होता है
बस रोटी दो जून अभी भी सपना है
सत्ता वाले कभी तेरा दिल रोता है
वही भुखमरी बीमारी बेकारी है
आज़ादी का क्या ये मतलब होता है ?
युद्ध के उन्मादों की बातें जो करते
पूछिए सीमा पर उनका कोई बेटा है ?


Kavita:

मौत क्या है वो तो बस एक आंकड़ा है
ये कुम्भकर्ण सत्ता का सोया पड़ा है
गर वो देते भी तो देते क्या ज़वाब
आँख का पानी तो सब सूखा पड़ा है
हर पांच सालों में छलावा ही हुआ है
दांव पर विश्वास जनता का चढ़ा है
बना कर सत्ता को सीढ़ी लूटते वो
दो जून की रोटी में पर वोटर पड़ा है
आप तो पढ़ते नहीं तो दोष किसका
संपत्ति अपनी है ये उसने तो पढ़ा है
अब तो संशय में पड़ा भगवान् ख़ुद है
ये सियासतदान क्या मैंने गढ़ा है ?


Kavita:

हम जो देते हैं, वो केवल जवाब होता है
जवाब वक़्त का, पर लाज़वाब होता है
ज़मीन पे तो सभी, भले से ही लगते हैं
अर्श पे पहुंचकर, माथा ख़राब होता है
बिना तक़लीफ़ के तुझको गुलाब होना है
काँटों को सहता है तब वो गुलाब होता है
ये सियासतदां सियासत ही काम है इनका
तू तो इंसान है तू क्यों ख़राब होता है
क्या बता पायेगा तुझे लिबास भला
सुनके देखें ज़रा फ़ौरन हिसाब होता है
किसी इंसान से तू माँगता फिरता क्यों है
वक़्त से मांगे वही क़ामयाब होता है


Kavita:

क्यों है तू परेशान बस कोई जुगाड़ कर
ये देश है महान बस कोई जुगाड़ कर
मंदी के दौर में हरेक धंधा मंदा पर
है सियासत में जान बस कोई जुगाड़ कर
होना है जो मशहूर तो तू कर ले कुछ ऎसा
शैतान हो हैरान बस कोई जुगाड़ कर
गद्दी पे पहुँचने की राह बड़ी है सहल
तू छोड़ ये ईमान बस कोई जुगाड़ कर
इंसान नहीं बन सके जो भी, कमाल है
वो बन गए महान बस कोई जुगाड़ कर


Kavita:

जो बदलना है कुछ तो सिर्फ सोच बदलिए
कुछ बदलिए न बदलिए बस सोच बदलिए
तवारीख़ उठाइये कि जब तारीख़ बदली है
बदला है सिर्फ सोच तो बस सोच बदलिए
दुश्मन है कौन और कौन दोस्त है यहां
बस सोच बदल देखें तो बस सोच बदलिए
ज़ाहिल है कौन और कौन एक ज़हीन है
ये बता देगी सोच तो बस सोच बदलिए
है धर्म और अधरम में भला फ़र्क़ कौन सा
बस सोच का है फ़र्क़ तो बस सोच बदलिए
इंसान है, इंसान है, इंसान है,इसे
ज़ाहिर करेगी सोच तो बस सोच बदलिए
ये जाति,हिन्दू मुसलमान कौन सिखाता ?
सोचा है कभी यार?तो बस सोच बदलिए


Kavita:

ज़िन्दगी खोने पाने की अज़ब ही एक कहानी है
हमें हर एक हासिल की यहां कीमत चुकानी है
जो जितना जानता उससे अधिक अन्जान रह जाता
ज्ञान की पाठशाला की कहावत ये पुरानी है
जो आँखों से नहीं दिखता वही सब सत्य है जग का
जो सब कुछ देखकर जानी वो दुनिया झूठ जानी है
दिल के अलावा ख़ुदा की भी वो नहीं सुनती
जगत में अक्लमंदी से कभी चलती जवानी है?
उड़ाकर रेत देती है सवालों के ज़वाब अब तो
ये दुनिया आजकल की देखलो कितनी सयानी है


Kavita:

जो जानबूझकर जग में फ़रेब खाता है
हुनर है हाथ कहाँ हर किसीके आता है
ज़मीर जिसका ख़ुद उसपर यक़ीं नहीं करता
सियासतों में तो वो शख़्स भी चल जाता है
मैं जानता हूँ तू मुझसे दग़ा करेगा ज़रूर
करूँ क्या दिल का ये तुझसे ही दिल लगाता है
उसकी महफ़िल में हुआ ज़िक्र बेवफाई का
जाने हर शख्स क्यूँ मुझसे नज़र चुराता है
जो फ़क़त ज़र को ही बस ज़िन्दगी समझता रहा
देख आज उसके पास आँसुओं का खाता है


Kavita:

क्या कभी हक़ की कोई आवाज़ कर सकते हैं आप?
दरबारे हुक़ूमत में बस फ़रियाद कर सकते हैं आप
ताज बचना चाहिए कितनी भी जानें ग़र्क़ हों
हाँ क़त्ल करके शौक से इम्दाद कर सकते हैं आप
वक़्त की जिस बुलंदी पर आप हैं बैठे हुए
पता भी है एक दिन उससे उतर सकते हैं आप
मुद्दई तो थे ही अब मुंसिफ भी ख़ुद ही बन गए
अब मेरे सर कोई भी इल्ज़ाम धर सकते हैं आप
शक़्ल ख़ुद की भूल जाए, यूँ हिजाबों में न रह
एक दिन शीशे में ख़ुद को देख,डर सकते हैं आप
आज भी जब भूख और बदहाली से मरते हैं लोग
अह्लेसियासत शर्म से क्या कभी मर सकते हैं आप?


Kavita:

तुम्हें हमसे हमें तुमसे शिकायत हो भी सकती है
शिकायत हो भले फिर भी मुहब्बत हो भी सकती है
चोर को शह दे के सबको जागने की नसीहत
आजकल इस नज़रिये से सियासत हो भी सकती है
केवल पैरहन से साधू और सन्यासी जो भी हैं
दिलों में उनके बाकी थोड़ी नफ़रत हो भी सकती है
सियासत अब नहीं ख़िदमत भले व्यापार हो फिर भी
सियासत में अभी थोड़ी शराफ़त हो भी सकती है
आजकल फ़ासला कम है मरासिम और अदावत में
दोस्त जो दिखते हैं उनमें अदावत हो भी सकती है
न यूँ तिरछी नज़र से मुस्कराकर देख तू मुझको
तेरी इस अदा पे बागी तबीयत हो भी सकती है
चमकती और दमकती आजकल दिखती है जो भी शै
लगें जो दाम दो कौड़ी की कीमत हो भी सकती है


Kavita:

कोई मंगल पे गया कोई चाँद तक पहुंचा
न मिला कोई जो अपने मुक़ाम तक पहुंचा
वफ़ा का चर्चा था पिछले दिनों ज़माने में
न जाने कैसे ज़िक्र मेरे नाम तक पहुंचा
तख़्ते- ताऊस से अब राज नहीं हो सकता
वही सुल्तान है जो बज़्मे आम तक पहुंचा
बुलंदियों पे पहुँच इस तरह न इठला तू
हरेक सूर्य यहां ढलके शाम तक पहुंचा
ज़रूरी क़ाबलियत भी ज़रूरी कोशिश भी
मगर जो वक़्त को भाया वो बाम तक पहुंचा
मैं पहाड़ों को काट काट ही हल्कान हुआ
वो हटा रेत ही फ़रहाद नाम तक पहुंचा


Kavita:

शत्रु मित्र नजदीकियां या फिर हो पहचान
राजनीति में किसीको स्थायी मत मान
स्थायी मत मान वरन खायेगा गच्चा
मोदी जी को आज नितीश बताते सच्चा
समझ ना आये राजनीति का गोरखधंधा
राजनीति के रंग देख गिरगिट शर्मिन्दा


Kavita:

अहंकार की रार में रहा न रोवनहार
पुत्रमोह लालूप्रसाद का ले डूबा सरकार
ले डूबा सरकार नहीं उम्मीद लगाई
दुश्मन से मिल जाएगा ये मेरा भाई
युग युग की है रीत यही होता आया है
धृतराष्ट्रों के हिस्से में रोना आया है


Kavita:

मरासिम है अदावत अगले पल है
सियासत का अनोखा करैक्टर है
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई हैं यहां पर
इनमें बतलाये कोई इंसां किधर है
मरीजों को शिफ़ा मिलती तो कैसे
दवा के नाम पर देता ज़हर ये चारागर है
जुनूने सफर कब मौकूफ़े मंजिल हो सका
मिल गयी मंजिल मगर जारी सफ़र है
मालिक समझकर वेवकूफी कर रहा है
स्थाई हो पाया यहां पर किसका घर है


Kavita:

नए निज़ाम के मुंसिफ़ बनाये जाएंगे
सच जो बोलेंगे वो बेमौत मारे जायेंगे
ज़िन्दगी जीने में हमने सदैव ध्यान रखा
हम अपने आप से कैसे नज़र मिलाएंगे
ज़म्हूरियत का ये अंदाज़ कुछ अनोखा है
यहां दिमाग़ नहीं सर संभाले जाएंगे
अभी तलक थे रजिस्टर में दर्ज़ थाने के
वही कानून के मंत्री बनाये जाएंगे
नए ज़माने के इस मैक़दे की क्या कहिये
जिन्हें शऊर नहीं वो ही प्याले पाएंगे


Kavita:

(“CAG की रिपोर्ट -सेना पर केवल 10 दिन का गोला बारूद “)
“दलों के दलदल से दूर सम्पूर्ण राजनीति पर तंज करती कविता”
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सेना पर बारूद नहीं है डूब मरें
क्यों रक्षा मज़बूत नहीं है डूब मरें
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सत्ता का इक़बाल नहीं है डूब मरें
किसी प्रश्न का जवाब नहीं है डूब मरें
जन का पुरसा हाल नहीं है डूब मरें
नेताओं को मलाल नहीं है डूब मरें
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आतंकियों पे लग़ाम नहीं है डूब मरें
सुखी कहीं जन आम नहीं है डूब मरें
हाथ में कहीं कमान नहीं है डूब मरें
शर्म का कहीं भी नाम नहीं है डूब मरें
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अनाज के भण्डार सड़ रहे डूब मरें
लाखों भूख से उधर मर रहे डूब मरें
लूटने वाले नहीं डर रहे डूब मरें
रक्षक भक्षक गले मिल रहे डूब मरें
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राजनीति में हैं अपराधी डूब मरें
सरकारी रिपोर्ट बतलाती डूब मरें
शर्म न नेताओं को आती डूब मरें
कोई कहे तो चलती लाठी डूब मरें
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बेचारा बदहाल किसान है डूब मरें
मेहनत का कोई नहीं मान है डूब मरें
अन्न का मिलता नहीं दाम है डूब मरें
आशा उसकी बस भगवान् है डूब मरें
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अफसर और सिपाही मरता डूब मरें
ख़नन माफिया नहीं है डरता डूब मरें
शासन लीपापोती करता डूब मरें
हत्या को दुर्घटना कहता डूब मरें
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हिन्दू मुस्लिम वोट की ख़ातिर डूब मरें
सिक्ख ईसाई वोट की ख़ातिर डूब मरें
मंदिर मस्ज़िद वोट की ख़ातिर डूब मरें
जाति पाँति सब वोट की ख़ातिर डूब मरें
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वोट मिलें तो सब चलता है ,देश तबाह भले हो
गद्दी मिल जाए बदले में देश की इज़्ज़त लेलो
जनता के दिखलाने को तो गतका युद्ध चलाते हैं
मिलकर बांटके खाने की पर हर दिन जुगत लगाते हैं


Kavita :

हम ख़ुशी के बीज बोना भूल बैठे
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छोड़कर फूलों को केक्टस बो रहे हैं
नाते सबसे तोड़ तनहा रो रहे हैं
नाक है लम्बी हमारी सोच छोटी
डिग्रियां इतनीं मगर है अक्ल मोटी
कांच के रंगीन टुकड़े चुन लिए हैं
और हीरे हाथ के हम छोड़ बैठे
हम ख़ुशी के बीज बोना भूल बैठे
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क्या है जीवन इसको जाने ही बिना हम
बोझ जैसा ज़िन्दगी को ढो रहे हैं
श्वान जैसा चूसकर हड्डी को मुंह में
स्वयं अपना खून ही हम पी रहे हैं
दास जिसको बनाना था शास्त्र सम्मत
उसी धन के दास हम ख़ुद होके बैठे
हम ख़ुशी के बीज बोना भूल बैठे


Kavita:

धैर्य विवेक न हो जहां ,निश्चित बिगरें काज
संभव है दोनों मिलें ,जूते भी और प्याज
बड़ीं बड़ीं हैं डिग्रियां ,नहीं सके पर जान
सहज सरल निष्कपटता सबसे बड़ा है ज्ञान
रक्षक ही ज्यों देश के करें देश की लूट
राजनीति में देश की दिखे वही करतूत
सारे धंधे एक तरफ यह राजनीति बहुधंधी
जनहित केवल ढकोसला है सत्ता लूट की मंडी
जिनकी पहरेदारी में सब देश को लूटें खाएं
उनकी ईमानदारी को हम ओढ़ें या कि बिछाएं
अलीबाबा चालीसचोर का जो किस्सा प्रचलन में
उसका ही दोहराव सियासी भवनों के आँगन में
बुरा लगे या भला लगे ऐ सत्ताधारी सुन ले
राजनीति की भ्रष्टता भ्रष्ट प्रशासन जन्मे
मना आप महान हैं विशेष हैं अधिकार
पर विशेष से भी विशेष हैं जनता के अधिकार
कुछ लोगों को थोड़े समय को मूर्ख बनाना संभव
लेकिन सब को सदा सदा को बहलाना है असंभव
कलियुग के परताप सों समय गया वो आय
कांच छत्र में सोहता ,हीरा ठोकर खाय
बिना विचारे जो करे कांग्रेस हुइ जाय
थू थू होवे जगत में जनता क्रोध जताय
वोट डालना मत देना ही जन की ज़िम्मेदारी
वोट को पाकर लूट करें ये उनकी फ़ित्रत ज़ारी
शत्रु मित्र नज़दीकियां या फिर हो पहचान
राजनीति में किसी को स्थाई मत मान
बाहर से सब अलग अलग हैं अंदरखाने एक हैं
सब की मंशा वही लूट है मौसेरे सब एक हैं
हर दल में कुछ कलमाड़ी हैं हर दल में कुछ राजा
राजनीति की लूटपाट में सबका लगता साझा
इस दुनिया में चुनना मुश्किल अपने माँ और बाप
सहयोगी और मित्र बनाना केवल आपके हाथ
जब उरूज पर वक़्त हो तब भी रखिये याद
वक़्त ही लाता फर्श पर वक़्त ही देता ताज
सबक नहीं इतिहास से लेते हैं जो शख्स
दोहराने इतिहास को होते वो अभिशप्त
कांग्रेस की किस्मत में दिग्गी ऎसी हस्ती
दोस्त के ज्यादा दुश्मन की पदवी जिसपर फबती
धर्म जाति समुदायों में तो बाँट चुके हैं आप
वोट की खातिर कितना क्या क्या अब बाँटेंगे आप
राजनीति की कुटिलता ने कर डाला त्रस्त
अन्ना सा योद्धा हुआ शकुनि चाल से पस्त
पिछवाड़े वो ही रहते हैं डंडे बदलते रहते हैं
पिटने वाली जनता ही है गुंडे बदलते रहते हैं
रैट रेस में हो गए हम इतने मशग़ूल
जीवन जीने की कला ही बैठे हैं भूल
हर दल अपना दांव खेलता रहता अपनी जुगाड़ में
हरेक विषय पर सिर्फ सियासत देश की गरिमा भाड़ में
जाति देखकर टिकट बँटेंगे लेकिन धर्मनिरपेक्ष हैं
जाति देखकर क्षेत्र चुनेंगे लेकिन धर्मनिरपेक्ष हैं
दुनिया में सबकुछ हासिल है चाहे जो लो
बदले में क्या दोगे पहले यह तय कर लो
मानपत्र मिलते हैं कभी तो पत्थर भी मिलते हैं
जीवन में अपमान मान सब सहचर ही रहते हैं
कांच जड़ा हो सिंहासन में लेकिन कांच ही रहता
हीरा भले ही ठोकर खाये पर वो हीरा रहता


Kavita :

वक़्त हाथ में नहीं किसी के
इज़्ज़त ज़िल्लत हाथ उसीके
एक पाठशाला है दुनिया
सबक़ बहुत हैं कोई जो सीखे
चाँद पे जाने की ज़ल्दी है
क़ाबिल तो बन पहले ज़मीं के
जीवन यापन ही जीवन है
समझ ये आया मूढ़मति के
पंडित की फिर कौन सुनेगा
बैठा है मंदिर में पी के


Kavita :

मुहब्बत हो अदावत हो तरीका चाहिए
ज़िन्दगी में एक सलीका चाहिए
तू झूठ भी कहे तो वो सच्चाई सा लगे
ये अदा तो तुझसे सीखा चाहिए
हर जगह टेढ़ा नहीं चलता कोई
सांप को भी बिल तो सीधा चाहिए
मुश्किलों की फिर किसे परवाह है
साथ कोई तुझ सरीखा चाहिए
फ़रेबों ने तेरी सूरत बदल दी
लगता है तुझको तो शीशा चाहिए
झूठ,सच या क्या सही और क्या गलत
देखने को दिल का दीदा चाहिए


Kavita :

भटके बहुत,पर ज़िन्दगी को घर नहीं मिला
हारे ही सदा, जीत का अवसर नहीं मिला
दिल को मिले सुकून, इसके वास्ते हमें
चौखट मिलीं तमाम, मग़र दर नहीं मिला
ढूँढा बहुत गुरु को, जो जीवन को दे दिशा
बुत तो मिले,मग़र वो पयम्बर नहीं मिला
मिल पायें जिनसे ज़िन्दगी के प्रश्नों के जवाब
विद्वान् मिले,मग़र उनसे हल नहीं मिला
जम्हूरियत की कोशिशें,यूँ बहुत हमने कीं
सर मिले,तो उनके कुछ अंदर नहीं मिला
मंदिर,मस्जिद,चर्च और गुरद्वारे सब देखे
अवतार कोई, माँ के बराबर नहीं मिला
माँ ख़ुदा सही, पिता भी कुछ कम नहीं होता
पर दर्ज़ा उसे, माँ के बराबर नहीं मिला
इस दौर के इंसान की ख़ुसूसियत यही
बाहर जो दिखा,वो कभी अंदर नहीं मिला
दरिया भले छोटा था, मग़र प्यास तो बुझी
पर बुझा सके प्यास, वो सागर नहीं मिला
हम उम्र भर लगे रहे जिस चैन के लिए
सब कुछ मिला,ये चैन रत्ती भर नहीं मिला


Kavita :

विरोधियों को धता बता कर,मोदी अब इसराइल में
बाधाएं सब हटा-वटाकर,मोदी अब इसराइल में
दुनिया में इज़्ज़त पानी हो,तो फिर सीधी रीढ़ रखें
अपनी सीधी रीढ़ दिखाकर,मोदी अब इसराइल में
वक़्त की सारी बातें हैं और वक़्त के सारे जलवे हैं
वक़्त के परचम को लहराकर,मोदी अब इसराइल में
अगर सफलता पानी है तो हवा के रुख़ का ध्यान रखें
हवा के रुख़ का पता लगाकर, मोदी अब इसराइल में
अमन चाहते हैं हम चाहे लेकिन हैं कमजोर नहीं
दुनिया भर को यही बताकर,मोदी अब इसराइल में
आगे का ईश्वर है मालिक,लेकिन आज तो चारों ओर
दिलों पे अपना राज जमाकर,मोदी अब इसराइल में


Kavita :

“अंतिम कविता”
शाम कुछ ढलने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
रात भी उगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए

काम जितने भी थे पूरे हो चले
नींद भी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
मौत से उम्मीद बाकी रह गयी
ज़िन्दगी छलने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
अब सुकूँ की जगह शबनम से हमें
तपिश सी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
जितने भी देखे जमाने के ख़ुदा
उनसे घिन लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
दोस्त दुश्मन पराये अपनों में अब
दूरी कम लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
आग का बिस्तर मिले कुछ गर्म हों
ठण्ड सी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
एक नई कक्षा नये कुछ सबक़ हों
कापियां भरने लगीं हैं ,अब तो चलना चाहिए
कहना छोडो सच को सुनने से भी अब
ज़िन्दगी डरने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
पेट भरते ज़िन्दगी अपनी हमें
ढोर सी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
ओढ़ने को जो थी चादर दी गयी
मैली सी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए
कुछ दिनों से एक पुराने दोस्त की
याद सी लगने लगी है ,अब तो चलना चाहिए


Kavita :

साँप नाथ हार गए,नागनाथ जीत गए
जम्हूरी प्रहसन के पांच वर्ष बीत गए
सत्ता के शिखरों पर निर्लज्जता का नाच
आँखों में पानी के पनघट सब रीत गए
सेवक बनाके जिन्हें सौंपा था लोकतंत्र
मालिक बने वो हमें बना दास क्रीत गए
सम्मोहक चितवन थी मदमाता आमंत्रण
मादक दशा में फूट अधरों से गीत गए
माया के मोहपाश में ही रहे उम्र भर
ज़र की खनक में भूल जीवन संगीत गए
सत्ता की बंदरबाँट का छिड़ा है घमासान
हार तय है जनता की चाहे जो जीत गए


Kavita :

भलमनसाहत और सियासत,क्या कहते हो मियाँ ?
इस ज़मीं के नहीं हो , कहाँ रहते हो मियाँ ?
यूँ मौत से भी जंग की बातें करो हो तुम
पत्नी की एक डाँट से लरज़ते हो मियाँ
यूँ गीत मुहब्बत के बहुत गा चुके हो तुम
इस इश्क़ के मतलब को भी समझते हो मियाँ ?
जब विष उतारने का मन्त्र नहीं जानते
तो साँप आस्तीन में क्यों रखते हो मियाँ ?
इस झूठ पर भी यक़ीं ही करने का मन करे
तुम झूठ को भी इस अदा से कहते हो मियाँ


Kavita :

“कालातीत कविता”

सब हमीं पर न टालिए साहब
नज़र ख़ुद पर भी डालिये साहब
हमसे ईमानदारी की उम्मीद
अपना भी दिल खँगालिये साहब
सारे कर्तव्य हमारे ही लिए ?
और अधिकार क्या हुए?साहब
सबको उपदेश देने से पहले
अपना ईमाँ सम्भालिये साहब
कुछ तो इंसान भी रह जाने दें
सब न वोटों में ढालिए साहब
सिर्फ बातों से ना बनेगी बात
तीर भी कुछ निकालिये साहब
बाहरी दुश्मनों से पहले तो
घर के दुश्मन को मारिये साहब
सिर्फ सपने सिर्फ सपने सिर्फ सपने
कुछ हक़ीक़त में ढालिए साहब
अफ़ज़लों ने जकड़ लिया है देश
अब तो खंज़र निकालिये साहब


Kavita :

सब कुछ है पर कम लगता है
जाने क्यूँ हर दम लगता है
कभी तो लगता वहम है माया
कभी ये सोच वहम लगता है
देखा नहीं भरोसा उस पर
साथ है पर दुश्मन लगता है
हर दम आपाधापी है पर
प्यारा ये जीवन लगता है
कभी तो तपती धूप लगे और
कभी वही सावन लगता है
कभी किताबों में जो पढ़ा था
दुनिया में कंडम लगता है
बही में जिसकी कीमत ज़ीरो
उसी में अपना मन लगता है
बेशकीमती वही वस्तुयें
नहीं कि जिनमें धन लगता है


Kavita :

“राजनीति की कविता”
धंधे और व्यापार हो रहे ,राजनीति में अब तो
सौ के कई हजार हो रहे,राजनीति में अब तो
जनता के ही बीच के प्रतिनिधि होते थे पहले तो
पेश कई अवतार हो रहे,राजनीति में अब तो
राज बदल लो चेहरे बदलो बदले मगर न किस्मत
अलीबाबा के यार हो रहे,राजनीति में अब तो
पर उपदेश कुशल बहुतेरे ब्रह्म सूत्र सत्ता का
उपदेशक भरमार हो रहे,राजनीति में अब तो
पढ़ लिखकर क्या होना,रोना और उदर भर लेना
मंत्री कई गंवार हो रहे,राजनीति में अब तो
राजनीति के रा का भी कुछ पता नहीं है जिनको
सब वो भी स्वीकार हो रहे,राजनीति में अब तो
सेहत और हालत से जनता भोगे चाहे दुर्दिन
ऐश वहां भरमार हो रहे,राजनीति में अब तो
पुश्तों के भविष्य आरक्षित दस परसेंट कमीशन
सब अवसर भरमार हो रहे,राजनीति में अब तो
लुच्चे, गुंडे, चोर, मवाली, छुटभैये, व्यापारी
हम तुम सब बेकार हो रहे,राजनीति में अब तो
वही परीक्षा देने वाला वही परीक्षक बनता
प्रश्न सभी बेकार हो रहे,राजनीति में अब तो
देश पटे लाशों से चाहे, पर सत्ता मिल जाए
लाशों के व्यापार हो रहे,राजनीति में अब तो
सत्ता की खातिर माँ को भी गाली से ना हिचकें
गद्दी को गद्दार हो रहे,राजनीति में अब तो


Kavita :

“भारतीय किसान की कविता”
जो भी पैदा हुआ है उसको एक दिन मरना पड़ता है
देहकां की मज़बूरी जिसको हर दिन मरना पड़ता है
सरे देश की भूख मिटाने को जो मेहनत करता है
देश बता क्यूँ उसको अक़्सर फ़ाक़ा रखना पड़ता है
राजनीति में हर दल ने बस भरमाया है और छला
अधिकारों की मांग पे उसको मौत से लड़ना पड़ता है
गोरे अंग्रेजों को देखा, अब देखे काले अंग्रेज
तब भी रोना पड़ता था और अब भी रोना पड़ता है
उसकी फसल का मूल्य लगाते नेता,लाला और दलाल
किस व्यापारी को बाजार में, ऎसा सहना पड़ता है
एक अंगौछे की ख़ातिर भी वो तो जीता मर मर कर
बिचौलियों के गले हमेशा स्वर्ण का गहना पड़ता है


Kavita :

मन का दुःख किससे कहें,सब दुःख के आधीन
हम बतलइहें एक दुःख ,सब बतलइहें तीन।
धर्मध्वजा सौंपी जिन्हें ,धर्म का करते नाश
चाँद बादलों ने ढका ,जुगुनू करत प्रकाश।
संचारों ने कर लिया ,पृथ्वी को आधीन
घटे फासले तो मगर ,दूर हुए गुन तीन।
डिग्री लिए प्रदेश में ,मूरख फिरते आज
वेद लादकर पीठ पर,गधे चरें ज्यों घास।
धर्म जाति सब अलग थे ,पर मन से थे एक
राजनीति ने हर लिए ,सबके ज्ञान ,विवेक।
मानवीय संवेदना, सबसे बड़ा है धर्म
बढ़ती जाती भागवत,घटता जाता मर्म।
करते थे भंडारे जो ,एक वर्ष में तीन
आज उन्होंने छीन ली ,भाई की ही ज़मीन।
नागनाथ को हराकर ,ले न पाये थे सांस
सत्ता सौंपी अब जिसे ,वो भी निकला सांप।
काम थे पैसे जेब में ,लेकिन था उल्लास
धन से जेब भरी मगर ,मन हो गया उदास।
मित्र जानकर दर्द का ,जिसको किया बयान
इठला इठला जगत में वही करे अपमान।
नीर पिएं और त्रण भखैं ,हंसों का अपमान
क्षीर पात्र के साथ अब वक पाएं सम्मान।
जो मंदिर में कर रहे ,पूजा सौ सौ बार
मूर्ति बेच भगवान् की ,वही करें व्यापार।
बहुत लगाई अक्ल पर ,नहीं पा सके पार ,
सत्ता के दरबार में ,ठगे गए हर बार।
धन को कमाना सिखाते ,सब शिक्षा संस्थान
पर सुख कैसे कमाना ,उससे सब अंजान।
इतने भरोसे हट गए,इस दुनिया में आज
अपने हाथ से सकुच कर ,मिलता दूजा हाथ।
जो खम्भा था तीर और तोप को करता मात
धन -सत्ता के चक्र ने ,उसे किया बर्बाद।
कोई मुकदमा जनम भर ,अगर न निर्णय पाय
अगला जनम तो है अभी ,मन काहे घबराए।


Kavita :

इस ओर भी नेता हैं और उस ओर भी नेता
इंसान भी मिलेगा? या बस नेता ही नेता
जब राजनीति लाशों पर ही करनी है तुझे
शम्शान को ही घर तू बना क्यों नहीं लेता?
जन्मों का इंतिज़ार भला क्यों करेंगे हम
इस जन्म में ही उनको सज़ा क्यों नहीं देता?
जो देश भर का पेट भरते रहते हैं हरदम
भरपेट देश उनको ग़िज़ा क्यों नहीं देता?
सुखसुविधा का सामान सभी जोड़ लिया पर
जीवन हमें ये उतना मज़ा क्यों नहीं देता?
जो रोज लड़ाती हों हमें,तुम्हें और सबको
इंसां उन किताबों को जला क्यों नहीं देता?


Kavita :

तंत्र सभी बेहाल देखिये
राजनीति बदहाल देखिये
कोई उत्तर नहीं मिल रहे
कितने करें सवाल देखिये
आश्वासन हर बार मिले हैं
छले गए हर बार देखिये
अस्पताल खुलते जाते हैं
देश रहा बीमार देखिये
शर्म छुपाती फिरती चेहरा
बेशर्मी की चाल देखिये
राज बदलते रहते है पर
हाल वही हर बार देखिये
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई
सभी वोट का माल देखिये
गाय भैंस से किसको मतलब
वोट की सारी चाल देखिये
धर्मनिरपेक्ष वही हैं जो भी
माँ पर करें सवाल देखिये
मज़हब किसान और गरीबी
सब सत्ता की ढाल देखिये
धन के बिना न चलता जीवन
धन ही बना जंजाल देखिये
जीवन सदैव ख़्वाब रहेगा
सत्य रहेगा काल देखिये
बुद्धिमान सब लोग हुए तो
घर में हुई दीवाल देखिये
जेब भरी है धन से सबकी
मन लेकिन कंगाल देखिये
स्कूलों की नहीं है गिनती
और शिक्षा के हाल देखिये
ईद पे है इफ्तार यहां पर
होली पर न जुहार देखिये


Kavita :

“जय जवान जय किसान”

हमेशा सर झुकायें उन जवानों के लिए
जो अपना परिवार
देश के सभी परिवारों की रक्षा के लिए छोड़ देते हैं
जिनकी वज़ह से
हम निश्चिंतता से परिवार के लोगों का
जन्म दिन मनाते हैं
जिनकी वज़ह से
हम निश्चिन्त होकर परिवार के साथ
छुट्टियों का आनंद उठा सकते हैं
इसी के साथ साथ सबसे बड़ी बात
जिनकी वज़ह से
दुनियाँ में हमारे देश का और हमारा सर गर्व से ऊँचा है
————————————————————————————————————-
हमेशा सर झुकायें उस बाप के सामने
जिसने अपने बुढ़ापे के एकमात्र सहारे को
देश की रक्षा के लिए दांव पर लगा दिया
————————————————————————————————————-
हमेशा सर झुकायें उस माँ के लिए
जिसने बेटे के माथे पर टीका लगाकर
विदा कर दिया यह कहकर
कि अपनी जान की कीमत पर भी
अपनी भारत माँ की
अस्मत का सौदा मत मंजूर करना
मुझे वापस
तेरा मुंह देखने को चाहे न भी मिले
कोई दुःख नहीं
पर दुश्मन को
किसी भी कीमत पर
तेरी पीठ देखने को न मिले
————————————————————————————————————-
हमेशा सर झुकायें उस पत्नी के लिए
जो देश के सारे सुहागों की
सलामती के लिए
अपना सुहाग
देश की सीमा के हवाले कर देती है
इस सोच के साथ
कि मेरा पति केवल मेरा पति ही नहीं है
अपनी जन्म भूमि
और देश के करोङों माँ बापों का बेटा भी है
देश की करोड़ों बहनों का भाई भी है
,देश और इस देश के नागरिकों का
मुहाफ़िज़ भी है
और न जाने कितने मौकों पर
अपने आंसू इसलिए पी जाती है
कि बच्चों
और माँ बाप के आंसू न छलक जाएँ

———————————————————————————————————
हमेशा सर झुकायें उन बहनों के लिए
जो रक्षा का सूत्र बांधकर
अपने भाई को देश की सारी
बहनों की रक्षा का भार सौंपकर
भीगी आँख की कोरों में भी
मुस्कराहट को खोने नहीं देतीं
———————————————————————————————————-
हमेशा सर झुकायें उन बेटों के लिए
जो मम्मी पापा बोलने से पहले
जयहिन्द और भारत माता की जय
बोलना सीख जाते हैं
जिनके नन्हे हाथ
पूजा के लिए अर्घ्य देने से पहले
सेल्यूट देना सीख लेते हैं
जो कच्ची उम्र में ही यह जान लेते हैं
कि वो उस बहादुर पिता की संतान हैं
जिसके कारण
दुश्मन उनके देश से भय खाता है
वह उस गौरवशाली पिता की संतान हैं
जिन्हें देश के प्रधानमंत्री
और राष्ट्रपति भी सलामी देते हैं
———————————————————————————————————-
हमेशा सर झुकायें
उन लाखों किसानों के लिए
जिनके पसीने की बूँदें
देश की भूख की दुश्मन बन जातीं हैं
जो दुनिया का सबसे बड़ा जुआरी बनकर
अपनी सारी पूँजी खुले आस्मां के नीचे
केवल ईश्वर के नाम पर
दांव पर लगा देता है
केवल इसलिए
कि दुनिया उसके देश को
भूखों का देश कहकर
अपमानित न कर सके
जो नेताओं ,अफसरों ,व्यापारियों
और दलालों से
बेशर्मी से बार बार
छले जाने के बावजूद
देश और समाज को
छलने का पाप नहीं करना चाहता
भले देश ,राजनीति ,समाज उसकी भूख
उसकी मौत की भी परवाह न करे
पर वह हमेशा परवाह करता है
कि उसके जीवित रहते
देश में किसी की भी मौत भूख से न हो


Kavita :

रीढ़ रखना, ज़ुर्म की धारा बना है
कोर्निश करिये यहाँ तनना मना है
चारणों की भीड़ है फिर राजपथ पर
नौरत्न चुनने की हुई उद्घोषणा है
तीरगी की हुक़ूमत चलने लगी है
रोशनी से महल का रिश्ता बना है
आज फिर पेशी हुई गैलीलियो की
लग रहा है सूर्य को फिर घूमना है
जख़्म ही बस हमारी किस्मत में आये
फूल या पत्थर कोई जब भी चुना है


Kavita :

“देश में दिन प्रतिदिन हो रहे नारी अपमान और रेप की घटनाओं पर”
नारी पूजन में ,देवों का वास, जो देश बताता था
धरती नदियों तक को अपनी मां के तुल्य जताता था
उस देश के कुछ निर्लज़्ज़ों ने है किया काम शैतानों का
धूल में देश का मान मिला सिर झुका सभी इंसानों का
जो देश था वीर जवानों का
वहां अब डेरा हैवानों का।
जहां पर नारी की रक्षा में एक गीध प्राण दे देता है
वीर शिवा स्वराज की शिक्षा जीजा मां से लेता है
हिन्दू को बना बहन रक्षा का भार हुमायूँ लेता है
उस देश की कोख लजाने वाला कार्य है इन संतानों का
धूल में देश का मान मिला सिर झुका सभी इंसानों का
जो देश था वीर जवानों का
वहां अब डेरा हैवानों का।
लेकिन सत्ता के शिखरों की लापरवाही भी दोषी है
दलों में अपराधी ,गुंडों की वाहवाही भी दोषी है
और प्रशासन की ढुलमुल ये कार्यवाही भी दोषी है
कुम्भकर्ण कब जागेगा इन सत्ता के ऐवानों का
धूल में देश का मान मिला सिर झुका सभी इंसानों का
जो देश था वीर जवानों का
वहां अब डेरा हैवानों का।


Kavita :

बहुत दिनों से नहीं हो रहा मौसम बेईमान
अब मौसम की जगह हो गया बेईमान इंसान
करें रक्षा अब कृपानिधान
——————————————————–
मुल्ला और पंडितों के चक्कर में नहीं रह पाते
जो साथ साथ रहना भी चाहें, राम और रहमान
करें रक्षा अब कृपानिधान
——————————————————–
यूनिवर्सिटी और डिग्रियों, ने पकड़ी ऊंचाई
किन्तु धरातल पर आ पहुंचा देखो मानव ज्ञान
करें रक्षा अब कृपानिधान
———————————————————
कई ग्रेजुएट,पोस्टग्रेजुएट शहर के हैं वाशिंदे
पर,लाइब्रेरी की जगह खुल गए पार्लर और दुकान
करें रक्षा अब कृपानिधान
———————————————————-
मंदिर और महात्मा कम थे,धर्म था लेकिन ज्यादा
किन्तु छलावे और ढोंग ने धर्म किया बदनाम
करें रक्षा अब कृपानिधान
———————————————————–
दूर दूर चाहे रहते थे ,नज़दीकी थी मन में
दूरी सात समंदर की अब,एक हो चाहे मकान
करें रक्षा अब कृपानिधान
————————————————————
गैरत और शर्म ने कर ली ,बेशर्मी से शादी
शर्मदार से ज्यादा है ,बेशर्मों का सम्मान
करें रक्षा अब कृपानिधान
————————————————————
भाग्यविधाता भारत के मुस्तक़्बिल का क्या होगा
राजनीति वैश्या है,हाक़िम करें दलाल का काम
करें रक्षा अब कृपानिधान


Kavita :

“समय के स्वर”
करोड़ों के नोटों की माला पहनने के बाद
उन नोटों से बाजार में ख़रीदारी के
उनके प्रयास विफल
विक्रेताओं का कथन
उनके पहने नोटों के अवमूल्यन के बाद
इनका मौद्रिक मूल्य शून्य हो चुका है
————————————————————————————————-
विरोधियों ने उनपर जूते फेंके
पर आश्चर्यजनक रूप से
जूतों ने उन्हें स्पर्श से परहेज़ किया
—————————————————————————————————–
हिंसक जानवरों ने जब अपने इलाके में
उनके दौरे
और सम्बोधन सभा का समाचार पाया
तो मीटिंग करके
सभी जानवरों को वहां न जाने की ताक़ीद की
जिससे वो इंसानों की भाँति
हिंसक होना न सीख जाएँ
————————————————————————————————————-
सर्पों ने एक जनहित याचिका में
निवेदित किया
कि जितने ज़हर के लिए
हजारों हजार सर्पों को
प्रताड़ित किया जाता है
उससे कई गुना ज़हर तो
केवल एक नेता से ही
प्राप्त किया जा सकता है
————————————————————————————————————-
अपने को सिक्कों से तुलवाने के बाद
वे उन्हें गरीबों में दान करने गए
तो उन्हें उत्तर मिला
कि अभी हम इतने भी गरीब नहीं


Kavita :

“महाराणा प्रताप जयंती पर”
राज्य की ख़ातिर नहीं, बस मान की ख़ातिर लड़े
देश और इस देश के, अभिमान की ख़ातिर लड़े
ग़ुलामी से, देश की रक्षा का प्रण, पूरा किया
राष्ट्र, और इस राष्ट्र की, पहचान की ख़ातिर लड़े


Kavita :

“एक समाचार -अमेरिका पकिस्तान को मदद देता रहेगा पर भारत की मदद बंद ”

आरती अमरीका सर की ,जगत के स्वयंभू अफसर की
हैं क़ाज़ी सारी दुनिया के ,हैड दुनिया के बनिया के
जिन्हें ये आतंकी कहते ,उन्हीं को भर झोली देते
अजब है मति इनके सर की
आरती,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
तेल है इन्हें बहुत प्यारा ,न जाने कितनों को मारा
बहाना कोई बना लेंगे ,धवल को स्याह बता देंगे
यू एन ओ है इनके घर की
आरती,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
जगत पर जो तोहमत धरते ,काम ख़ुद वही रोज करते
कभी ख़ुद बाज न आएंगे ,फटे में टांग अड़ायेंगे
ख़ामखाँ बड़ी बुआ घर की
आरती,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इन्हीं के ख़ून का मानी है ,और का ख़ून तो पानी है
चोट पर ख़ुद की हंगामा ,और की चोट सिर्फ ड्रामा
ग़ज़ब हैं बन्दा परवर भी
आरती,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


Kavita :

हर बार देश की आँखों में ये पानी, आखिर कब तक?
लापरवाही की, हर बार कहानी, आखिर कब तक?
माना, जंग आखिरी विकल्प होना चाहिए,लेकिन
अमन की आशा में हर दिन क़ुरबानी,आख़िर कब तक?
रोज हमारे बेटे शहीद ,कब तक,कब तक,कब तक?
यहाँ मुहर्रम ,वहां ईद, ये कब तक,कब तक,कब तक?
दुश्मन तो दुश्मन है उससे हमको क्या आशा रखनी
घर में दुश्मन की ताईद, ये कब तक,कब तक,कब तक?
जान चुकी है जनता सब कुछ, मांगेगी अब लेखा
जाग चुकी है जनता सारी, अब न सहेगी धोखा
शांति चाहते हैं हम भी,पर ये भी मत है हमारा
अगर जंग है अमन की कीमत ,होने दो जो होता
और भी बेटे हम दे सकते ,लेकिन शांति हो अब तो
तन,मन,धन सारा दे देंगे ,लेकिन शांति हो अब तो
माना युद्ध से ध्वंस बहुत हो सकता है, पर भाई
शांति हो केवल शांति हो केवल शांति हो केवल अब तो
वीर जवानों की जां पर भी राजनीति ,बेशर्मो
केवल वोटों की ख़ातिर ही राजनीति ,बेशर्मो
हर नेता से, हर दल से ये कहता हूँ मैं सुन लो
देश की कीमत पर न करो ये राजनीति बेशर्मो


Kavita :

नेता का है, अफसर का है, ईमान माल्या
इस देश में हर दिल का है अरमान माल्या।
जादू का पिटारा है ,हर रोज नया खेल
दुनिया में, मेरे देश का, गुमान माल्या।
भ्रष्टनारयन की कथा, का है एक प्रसंग
भ्रष्टों का मेरे देश में, यजमान माल्या।
हर बदन है उघडा हुआ, हर व्यवस्था नंगी
सत्ता की नंगई का, है हम्माम माल्या।
तेरा है न मेरा है पूरे, देश का गौरव
भारत महान की है ,एक ढलान माल्या।
हम माल्या ,तुम माल्या ,सब देश माल्या
अब होगा मेरे देश की ,पहचान माल्या।
आईना है, जो देख सको, गौर से देखो
इस व्यवस्था पे काला एक निशान माल्या।


Kavita :

जब तक हम यूँ मौन रहेंगे ,जब तक हम चुप बैठेंगे ,
तब तक यूँ ही, माली, अपने बाग़ की खुशबू बेचेंगे।
नहीं कृष्ण, अब हमको ही, ये सूर्य छुपाना होगा रे ,
वरना अर्जुन की आहुति, ये कौरव छल से ले,लेंगे।
कल जिन सज्जन को हमने ,मधुशाला से आते देखा ,
वही, सुना है, दारूबंदी का आंदोलन छेड़ेंगे।
खुली पाठशालाएं ऐसी ,गाँव गाँव और नगर नगर ,
धोखे और फरेब की शिक्षा ,जिसमें सारे लेवेंगे।
एक तुग़लक़ के नाम का चर्चा ,करते हैं हम आजतलक ,
जाने अब इस देश के अंदर ,कितने तुगलक होवेंगे।
गंदा पानी भी हमको तो ,नहीं मिल रहा हफ़्तों से ,
उनका कहना है हम नल में ,डिस्टिल वाटर भेजेंगे।
सब्र कीजिये,माल गया है ,इज़्ज़त फिर भी बाकी है ,
रपट करेंगे तो भैयाजी ,वो इज़्ज़त भी खो देंगे।
अग्नि परीक्षा बहुत हो चुकी ,इस समाज में सीता की ,
एक बार क्या यही परीक्षा ,राम भी देकर देखेंगे ?
बहुत हो चुकी हानि धर्म की ,लेलो अब अवतार प्रभो ,
वरना आश्वासन हम तेरा धोखा साबित कर देंगे।


Kavita :

कुछ हालिया घटनाओं पर छंद मुक्त टिप्पणियां ”

बाप ने खाया चारा ,और बेटा मिटटी खाय
तेजस्वी अब ख़ानदान की ऎसे रीत निभाय
ऎसे रीत निभाय ,फँस गए बुरे सुपुत्तर
ख़ून ने आखिर दिखा दिया है अपना चरित्तर
घाघ कवी ने ये कह कर, कर दिया बखेड़ा
बाप पे पूत सवार पे घोडा ज़रूर होगा थोड़ा थोड़ा

बड़ी बड़ी सैद्धांतिक बातें बड़े बड़े थे बोल
मानहानि के केस ने खोल दी लेकिन पोल
खोल दी लेकिन पोल घिरे हैं चतुर केजरी
जनता के पैसे से फीस वकील को दे दी
मुंह से बड़े बोलवालों पर करो न तुम विश्वास
जे आचरहिं ते नर न घनेरे कहि गए तुलसीदास

क्या अजीब बातें हैं आजकल राजनीति में भाई
धर्म को अलग तरह की दिशा इस राजनीति ने दिखाई
राजनीति ने दिखाई ,गद्दी क्या न करा ले
सुबह, दोपहर, शाम के बाप ही अलग बना ले
सब कहते हैं राजनीति में धर्म का ना हो मेल
तो फिर क्या अधर्म का होगा राजनीति में मेल ?

राजनीति का पहलवान बेटे के हाथ से ढेर
सारी चालें विफल हो गयीं चकरी दांव भी फेल
चाकरी दांव भी फेल लुट गयी सभी विरासत
भाई और बेटे में बंटी नेता की चाहत
युग युग की है रीत यही होता आया है
धृतराष्ट्रों के हिस्से बस रोना आया है

नब्ज़ नहीं पकड़ी जनता की और मशीन को रोते
बची खुची जो साख रह गयी उसको भी वो खोते
उसको भी वो खोते हास्यास्पद बन बैठे
रेत में नाव चलाकर रोना भाग्य का रोते
ख़ुद जीते तो ये मशीन लगाती थी प्यारी
हार गए तो वही लगे तुमको हत्यारी


Kavita :


“कांग्रेस के नए अध्यक्ष का चुनाव 15 ओक्टोबर को -समाचार”
बदहवास सेना के पति का ,भार धरें अब राहुल जी
कोंग्रेसियों की चाहत ,उद्धार करें अब राहुल जी
तार -तार गरिमा कॉंग्रेसी ,हर मोर्चे पर मात मिले
डगमग कांग्रेस की नैया ,पार करें अब राहुल जी
शस्त्र नहीं लड़ती है जवानी ,शायद वो ये भूल रहे
घायल सेना साथ में ले ,क्या ख़ाक करें अब राहुल जी

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