0222 – Asha Shailly

Gazal:

गुज़र जाएगी यह शब हौसला रख
सुबह के वासते दर को खुला रख

सज़ा दे-दे या खुद को माफ़ करदे
अंधेरे में न तू यूँ फैसला रख

वो मुंसिफ़ कुछ नहीं सुनता किसी की
न उसके पास अपना मामला रख

कई मज़लूम होंगे इस जहाँ में
सभी के वासते लब पर दुआ रख

न रो-रो कर कटेगी उम्र सारी
तू मुस्कानों की दामन में ज़िया रख

बहुत हैं चाहने वाले तुम्हारे
तू शैली दामने दिल को तो वा रख


Gazal:

क्या लेना है नाम कमाकर अच्छे हैं गुमनाम मियाँ
नाम कमाने के चक्कर में हुए व्यर्थ बदनाम मियाँ

कहाँ मुरादें मिलती हैं हरइक को दुनिया में आकर
अक्सर जाने वालों को जाते देखा नाकाम मियाँ

ताक पे रक्खो रिश्तों को जजबात झोंक दो चूल्हे में
दिल के मोल पे बिकने वाले मुफ्त़ हुए नीलाम मियाँ

सुबह सवेरे चले सफ़र को दिन पूरा ही बीत गया
अभी न पहुँचे हम मंजिल तक आ पहुँची है शाम मियाँ

मेरे चक्कर में उलझे तो जीवन भर पछताओगे
अपना तो है अंगारों पर चलना ही बस काम मियाँ

कुछ तो रक्खो साथ निशानी उसको देने को आखिर
ऊपर वाले को जाकर देना तो है पैग़ाम मियाँ

इसीलिए कुछ शेर सुनाने शैली यहाँ चले आए
बाद हमारे छपी किताबें आएंगी किस काम मियाँ


Gazal:

मिरे मकान में हर सिम्त खिड़कियाँ रक्खीं
हरेक ताक पे फिर उसने बिजलियाँ रक्खीं

हुनर को उसके बार-बार मरहबा कहिए
चमन की शाख़-शाख़ जिसने आँधियाँ रक्खीं

बनाए जिस्म बशर के धड़कते दिल रक्खे
न जाने उनमें जुबानें कहाँ-कहाँ रक्खीं

आँख को अश्क के नूरानि मोतियों से भरा
मरहबा! दौलतें पलकों तले निहाँ रक्खीं

दयार-ए-दिल को मिरे सब्र की भी बख्शिश दे
जो तूने गर्दिशों में मेरी कश्तियाँ रक्खीं


Gazal:

जब चली ठण्डी हवा मेरे वतन की
कम हुई हैं वुसअतें कितनी गगन की

देवदारों के घनेरे जंगलों में
राज की है गुफ्तगू कोई पवन की

ज़ख़्म तो उसके नहीं देखे हैं तुमने
कर रहे हो बात तुम जिसके चलन की

है अजब सी आज खुशबू इन गुलों में
छू गई शायद हवा उसके बदन की

तुम जिसे मिलने चले हो बक्त-ए-आख़िर
कुछ खबर उसकों नहीं है जान-ो-तन की

आ गए हो तो ज़रा आराम करलो
फिर फ़िज़ा होगी कहाँ ऐसी चमन की

वादियों में चल के नंगे पाँव शैली
लज़्ज़तें लूटेंगे ख़ारों की चुभन की


Gazal:

सहर का ख्वाब टूटा देखने को
चले आए तमाशा देखने को

उन्हें खुद पर गुरूरे जुस्तजू था
जमाना भी लगा था देखने को

सितारे किसके टूटे आसमां से
शहर उमड़ा पड़ा था देखने को

हमारे दर्द की हद है कहाँ तक
दरीचा खुल गया था देखने को

अब आगे हो कोई आहो-फुगां क्यों
खड़ा सैय्याद चेहरा देखने को

छुपी आँखों में कितनी तिश्नगी थी
न पैमाना कोई था देखने को

कलम की नोक कैसे कुंद होती
हमारे पास दम था देखने को

हसीनो की कबा की क्या कहें अब
बदन उघड़ा है सारा देखने को


Gazal:

हमें ललकार सुनकर चाहिए हुशियार हो जाना
नहीं सोने का मौका साथियो बेदार हो जाना

ये हिन्दुस्तान की मिट्टी भले चन्दन सी शीतल है
बहुत मुमकिन है इसका वक्त पर अंगार हो जाना

उठे जब सरहदों से दोस्तो, इक शोर खतरे का
तो लाज़िम है यहाँ हरएक गुल का ख़ार होजाना

खनकती चूड़ियों को रख किनारे थाम लो ख़ंजर
कसम है दुश्मनों के सामने दीवार हो जाना

दिखाता आँख दुश्मन सरहदों के पार से अक्सर
तो हरइक नौजवां का फर्ज़ है तलवार हो जाना


Gazal:

सावनी बौछार हो इक ग़म भुलाने के लिए
आम का भी पेड़ हो झूला झुलाने के लिए

रात भर के जागरण से टूटती इस देह को
इक ज़रा सी है उफक, अब गुनगुनाने के लिए

जम गया सीने पे जो पत्थर ग़मों का दोस्ता
आप का हो इक इशारा ही हिलारने के लिए

उस गली की राह हम हरगिज़ कभी जाते नहीं
आप की खुशबू ही थह हमको लुभाने के लिऐ

चाँद की बस बात ही थी, और भी कुछ था वहाँ
मिल गया उनको बहाना छत पे आने के लिए

जब कभी नग़्मासरा होना तो होना सोचकर
रोज़ तो आते नहीं हम दाद पाने के लिए

लग्ज़िशें अपनी सँभालें, अब बुढ़ापा आ गया
ये नहीं है वक्त शैली लड़खड़ाने के लिए


Gazal :

हमें ललकार सुनकर चाहिए हुशियार हो जाना
नहीं सोने का मौका साथियो बेदार हो जाना

ये हिन्दुस्तान की मिट्टी भले चन्दन सी शीतल है
बहुत मुमकिन है इसका वक्त पर अंगार हो जाना

उठे जब सरहदों से दोस्तो, इक शोर खतरे का
तो लाज़िम है यहाँ हरएक गुल का ख़ार होजाना

खनकती चूड़ियों को रख किनारे थाम लो ख़ंजर
कसम है दुश्मनों के सामने दीवार हो जाना

दिखाता आँख दुश्मन सरहदों के पार से अक्सर
तो हरइक नौजवां का फर्ज़ है तलवार हो जाना


Gazal:

क्या लेना है नाम कमाकर अच्छे हैं गुमनाम मियाँ
नाम कमाने के चक्कर में हुए व्यर्थ बदनाम मियाँ

कहाँ मुरादें मिलती हैं हरइक को दुनिया में आकर
अक्सर जाने वालों को जाते देखा नाकाम मियाँ

ताक पे रक्खो रिश्तों को जजबात झोंक दो चूल्हे में
दिल के मोल पे बिकने वाले मुफ्त़ हुए नीलाम मियाँ

सुबह सवेरे चले सफ़र को दिन पूरा ही बीत गया
अभी न पहुँचे हम मंजिल तक आ पहुँची है शाम मियाँ

मेरे चक्कर में उलझे तो जीवन भर पछताओगे
अपना तो है अंगारों पर चलना ही बस काम मियाँ

कुछ तो रक्खो साथ निशानी उसको देने को आखिर
ऊपर वाले को जाकर देना तो है पैग़ाम मियाँ

इसीलिए कुछ शेर सुनाने शैली यहाँ चले आए
बाद हमारे छपी किताबें आएंगी किस काम मियाँ


Gazal:

मिरे मकान में हर सिम्त खिड़कियाँ रक्खीं
हरेक ताक पे फिर उसने बिजलियाँ रक्खीं

हुनर को उसके बार-बार मरहबा कहिए
चमन की शाख़-शाख़ जिसने आँधियाँ रक्खीं

बनाए जिस्म बशर के धड़कते दिल रक्खे
न जाने उनमें जुबानें कहाँ-कहाँ रक्खीं

आँख को अश्क के नूरानि मोतियों से भरा
मरहबा! दौलतें पलकों तले निहाँ रक्खीं

दयार-ए-दिल को मिरे सब्र की भी बख्शिश दे
जो तूने गर्दिशों में मेरी कश्तियाँ रक्खीं


Gazal:

गुज़र जाएगी यह शब हौसला रख
सुबह के वासते दर को खुला रख

सज़ा दे-दे या खुद को माफ़ करदे
अंधेरे में न तू यूँ फैसला रख

वो मुंसिफ़ कुछ नहीं सुनता किसी की
न उसके पास अपना मामला रख

कई मज़लूम होंगे इस जहाँ में
सभी के वासते लब पर दुआ रख

न रो-रो कर कटेगी उम्र सारी
तू मुस्कानों की दामन में ज़िया रख

बहुत हैं चाहने वाले तुम्हारे
तू शैली दामने दिल को तो वा रख


Gazal :

जब भी चमकी रौशनी तो राज़ जंगल का खुला
इस बियाबां में भी है कोई दिया जलता हुआ

मुन्हसर यह तुम पे था तुम रोक सकते थे उसे
कारवां को रह गए बस देखते जाता हुआ

रोकना दरिया को तो मुशकिल नहीं लेकिन जनाब
बाँध जब टूटा तो पाओगे नगर डुबा हुआ

आप को सहना पड़ेगा उसका गुस्सा भी हुज़ूर
आप के हाथों ही सीना चाक पर्वत का हुआ

तेज़ तूफ़ानी नदी में एक तिनके का वुजूद
वो किसी शायर का शयद ख्वाब था देखा हुआ

किस ने ठण्डा कर दिया है इन का सब जोश-ो-खरोश
ऊँघती नस्लों पे शैली है नशा छाया हुआ


Gazal :

खुदा का शुक्र जो दिल से अदा नहीं करते
सुकून से वो कहीं भी रहा नहीं करते

ग़म-ए-हयात का हम तो ग़िला नहीं करते
उदास हो के किसी से मिला नहीं करते

जो मुल्क-ो-कौम पे जानें निसार करते हैं
उन्हीं के नाम जहाँ से मिटा नहीं करते

नदी चढ़ेगी तो अपनी बिसात खो देगी
घरोंदे लहर से हरगिज़ बचा नहीं करते

ख़िज़ां के दौर में यह घर भी छोड़ जाएंगे
कभी किसी के परिन्दे हुआ नहीं करते

हमारे वासते काग़ज़ कलम ही काफ़ी है
ये माल-ो-ज़र तो किसी से वफ़ा नहीं करते

अमीर-ए-शहर की आँखों में क्यों खटकते हैं
फ़कीर-ए-शहर किसी का बुरा नहीं करते

शब-ए-विसाल मुक्कद्दर में अपने हो कि न हो
हम इतनी जल्द कोई फैसला नहीं करते

कोई तो सरफिरा शैली नगर में हैं शायद
बिला सबब यूंही पत्थर चला नहीं करते


Gazal :

बात दिल की जहाँ-जहाँ रखिए
एक परदा भी दरम्याँ रखिए

घोंसले जब बुने हैं काँटों से
क्यों बचाकर हथेलियाँ रखिए

हौसले अपने आज़माने को
हर कदम साथ आँधियाँ रखिए

मौसमों से नज़र मिलाने को
सर पे कोई न आसमाँ रखिए

हर जगह नाम उनका लिक्खा है
फिक्र है दासतां कहाँ रखिए

माया-ए-ग़म छुपाएँ किस-किस से
कीमती शै को अब कहाँ रखिए

बात दिल की किसी से तो कहिए
पास बेहतर है राज़दाँ रखिए

तब जनम लेगी नग़मगी शैली
दिल के जख्मों पे जब ज़ुबां रखिए


Gazal :

ऐसे भी कोई छोड़ता है गाँव को घर को,
जैसे खिज़ां में छोड़ते हैं बर्ग शजर को?

ग़म साथ बाँध कर सफ़र के वासते चले
हैरत से देखते हो क्यों सामान-ए-सफर को

खुद पर भी नज़र रख न सकी उम्र कट गई
पहचान लू मैं किस तरह दुश्मन की नज़र को

वो चार दिन के वासते आया था शहर में
इक उम्र पालती रही मैं उसके असर को

बस आज में जो जी लिया तो जी लिया बहुत
दिल से निकाल फेंकिए कल के किसी डर को

बस दोपहर से दोपहर तलक है दासतां
ख्वाबों में भी देखा नहीं है हमने सहर को

शे‘रो सुख़न बग़ैर तो जीना मुहाल है
शैली मै कैसे छोड़ दूँ इस फन की डगर को


Gazal :

वो आज राहगुज़र का नज़ारा देखते हैं
तसव्वुरों के सफर का नज़ारा देखते हैं

नदी में डूबती कश्ती का ज़िक्र होगा तो
उधर के लोग इधर का नज़ारा देखते हैं

बुझा सकेगा वो खुद अपनी प्यास को क्योंकर
हम आज उसके हुनर का नज़ारा देखते हैं

उछालते हैं ख़ला में बयान रोज नए
जो रहनुमां हैं खबर का नज़ारा देखते हैं

हरइक गली में है इक शोर खून-ए-आदम का
जो कत्ल करते हैं डर का नज़ारा देखते हैं

उठेगा एक दिन सच से भी तो परदा शैली
शिकस्त-ए-कुफ्र का दमभर नज़ारा देखते हैं


Gazal :

आँख उसकी आज देखी नम उसे क्या हो गया है
कौन सा सँभला न उससे ग़म उसे क्या हो गया है

जिस दिए की आब से जंगल सुनहरा लग रहा था
है उसी की रौशनी म(म उसे क्या हो गया है

चार सू घर में उसी के डोलते साए तो हैं पर
पायलों की खो गई छम-छम उसे क्या हो गया है

बाद पतझड़ के बहार आती तो है गुलशन में लेकिन
फिर यहाँ पतझड़ का है मौसम उसे क्या हो गया है

कल तलक घुटनों के बल चलना जिसे आता नहीं था
है उसी के हाथ में परचम उसे क्या हो गया है


Gazal :

सहर का ख्वाब टूटा देखने को
चले आए तमाशा देखने को
उन्हेँ खुद पर गुरूरे जुस्तजू था
जमाना भी लगा था देखने को
सितारे किसके टूटे आसमां से
शहर उमड़ा पड़ा था देखने को
हमारे दर्द की हद है कहाँ तक
दरीचा खुल गया था देखने को
अब आगे हो कोई आहो-फुगां क्यों
खड़ा सैय्याद चेहरा देखने को
छुपी आँखों में कितनी तिश्नगी थी
न पैमाना कोई था देखने को
कलम की नोक कैसे कुंद होती
हमारे पास दम था देखने को
हसीनो की कबा की क्या कहें अब
बदन उघड़ा है सारा देखने को


Gazal :

ज़रा रुक सको तो सहर देख लेना
सितारों से बरसा हुनर देख लेना

थकोगे यकीनन वो लम्बा सफर है
घना राह में इक शजर देख लेना

कहाँ तक उड़ोगे, तुम्हें कुछ पता है
कभी अपने भी बालो-पर देख लेना

नसीबों में हर इक के होता नहीं है
रश्तिे-सा कोई बशर देख लेना

कहीं पर समन्दर, कहीं ऊचे परबत
मुकद्दर में है ये मगर देख लेना

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