0222 – Asha Shailly

Gazal :

ऐसे भी कोई छोड़ता है गाँव को घर को,
जैसे खिज़ां में छोड़ते हैं बर्ग शजर को?

ग़म साथ बाँध कर सफ़र के वासते चले
हैरत से देखते हो क्यों सामान-ए-सफर को

खुद पर भी नज़र रख न सकी उम्र कट गई
पहचान लू मैं किस तरह दुश्मन की नज़र को

वो चार दिन के वासते आया था शहर में
इक उम्र पालती रही मैं उसके असर को

बस आज में जो जी लिया तो जी लिया बहुत
दिल से निकाल फेंकिए कल के किसी डर को

बस दोपहर से दोपहर तलक है दासतां
ख्वाबों में भी देखा नहीं है हमने सहर को

शे‘रो सुख़न बग़ैर तो जीना मुहाल है
शैली मै कैसे छोड़ दूँ इस फन की डगर को


Gazal :

वो आज राहगुज़र का नज़ारा देखते हैं
तसव्वुरों के सफर का नज़ारा देखते हैं

नदी में डूबती कश्ती का ज़िक्र होगा तो
उधर के लोग इधर का नज़ारा देखते हैं

बुझा सकेगा वो खुद अपनी प्यास को क्योंकर
हम आज उसके हुनर का नज़ारा देखते हैं

उछालते हैं ख़ला में बयान रोज नए
जो रहनुमां हैं खबर का नज़ारा देखते हैं

हरइक गली में है इक शोर खून-ए-आदम का
जो कत्ल करते हैं डर का नज़ारा देखते हैं

उठेगा एक दिन सच से भी तो परदा शैली
शिकस्त-ए-कुफ्र का दमभर नज़ारा देखते हैं


Gazal :

आँख उसकी आज देखी नम उसे क्या हो गया है
कौन सा सँभला न उससे ग़म उसे क्या हो गया है

जिस दिए की आब से जंगल सुनहरा लग रहा था
है उसी की रौशनी म(म उसे क्या हो गया है

चार सू घर में उसी के डोलते साए तो हैं पर
पायलों की खो गई छम-छम उसे क्या हो गया है

बाद पतझड़ के बहार आती तो है गुलशन में लेकिन
फिर यहाँ पतझड़ का है मौसम उसे क्या हो गया है

कल तलक घुटनों के बल चलना जिसे आता नहीं था
है उसी के हाथ में परचम उसे क्या हो गया है


Gazal :

सहर का ख्वाब टूटा देखने को
चले आए तमाशा देखने को
उन्हेँ खुद पर गुरूरे जुस्तजू था
जमाना भी लगा था देखने को
सितारे किसके टूटे आसमां से
शहर उमड़ा पड़ा था देखने को
हमारे दर्द की हद है कहाँ तक
दरीचा खुल गया था देखने को
अब आगे हो कोई आहो-फुगां क्यों
खड़ा सैय्याद चेहरा देखने को
छुपी आँखों में कितनी तिश्नगी थी
न पैमाना कोई था देखने को
कलम की नोक कैसे कुंद होती
हमारे पास दम था देखने को
हसीनो की कबा की क्या कहें अब
बदन उघड़ा है सारा देखने को


Gazal :

ज़रा रुक सको तो सहर देख लेना
सितारों से बरसा हुनर देख लेना

थकोगे यकीनन वो लम्बा सफर है
घना राह में इक शजर देख लेना

कहाँ तक उड़ोगे, तुम्हें कुछ पता है
कभी अपने भी बालो-पर देख लेना

नसीबों में हर इक के होता नहीं है
रश्तिे-सा कोई बशर देख लेना

कहीं पर समन्दर, कहीं ऊचे परबत
मुकद्दर में है ये मगर देख लेना

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