0224 – Binod Kumar

Kavita

मासूमों की गई जान,रखा नहीं जरा ध्यान।

दोषी यहाँ कौन कौन, नाम बतलाइये।

काल के बने निवाल, कितने माँओं के लाल।

राजनीति खेल कर, दर्द न बढाइये।

तड़प तड़प मरे,कान न सुनाई पड़े।

दोषी को कभी भी नहीं, सजा से बचाइये।

जिसने किया गुनाह,उसको न हो पनाह।

खोज खोज उसको तो, जेल पहुँचाइये।


Kavita:

मित्रता👬

मित्रता है एक ऐसा रिश्ता,

जिसे आप चुनते हैं।

भले नहीं दुनियाँ की सुनते,

उनकी ही सुनते है।

पर अब सच्चे मित्र न मिलते,

बस देते हैं धोखा,

कर देते हैं घात हृदय पर,

पाये जब भी मौका।

मित्रता की जो मोल को समझे,

वही सही इंसान।

भूल से भी जो सच्चे मित्र हैं

करें नहीं अपमान।

दूर रहे कपटी मित्रों से,

जो मतलब के यार।

बात करे जो मीठी मीठी,

हृदय न जिनके प्यार।

हमे गर्व है सदा आप पर,

मित्रता पर है नाज।

एक दूजे के दिल से निकले,

सदा यही आवाज।


Kavita:

बच्चों को सीखना भूल गये।
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आते जाते तो नित्य रहे,
सबने जाना स्कूल गये।
हाजरी बनी पर मन न बना,
बच्चों को सीखना भूल गये।

अपनी गरिमा न जान सके,
खुद कैसे राष्ट्रनिर्माता हैं।
आजीवन हो जो आभारी,
उनके ही भाग्य विधाता है।
औरों की निष्ठा देख रहे,
खुद भी उनके अनुकूल गये।
हाजरी बनी पर मन न बना,
बच्चों को सीखाना भूल गये।

सब भूल चुके हैं उस पल को,
कितने पापड़ बेले होंगे।
कब मिले नौकरी मुझको भी,
अनगिनित दुःख झेले होंगे।
कितना है कौन निक्कमा अब,
लड़ने में ही अब तूल गये।
हाजरी बनी पर मन न बना,
बच्चों को सीखाना भूल गये।

आपस में जब भी मिले कभी,
होती चर्चा बस वेतन का।
गुरु पद की मर्यादा न रही,
बस ध्यान रखा ऊपरी धन का।
जग भ्रष्टाचार में डूब रहा,
खुद को भी बचाना भूल गये।
हाजरी बनी पर मन न बना,
बच्चों को सीखाना भूल गये।


Kavita :

जैसी करनी, वैसी भरनी

—————————————–

एक सेठजी गये शिवालय,

पहन कर मँहगे जूते।

खूब कमाया दौलत उसने,

मेहनत के बलबूते।

पड़ा सोच में मँहगे जूते,

कैसे अंदर जाऊँ।

कहीं कोई यह ले न भागे,

कैसे ध्यान लगाऊँ।

एक भिखारी हठ्ठा कट्ठा,

सेठ ने उससे बोला।

जरा देखना जूते मेरी,

समझ रहा था भोला।

बोले हे भोले भंडारी,

गजब है तेरी माया।

देते छप्परफाड़ किसी को

कोई सदा सताया।

सोचा सौ रूपये गरीब को,

जाते ही दे दूँगा।

माँगे भीख नहीं वो फिर से,

नौकरी पर रख लूँगा।

बाहर जब निकला तो देखा,

जूते वहाँ नहीं थे।

न तो भिखारी नजर ही आया

इधर उधर कहीं पे।

पैदल ही फिर चले वो घर को,

देख ली दुनियादारी।

करे भरोसा किस पर जग में,

शोक से मन था भारी।

उसने फूटपाथ पर देखा,

एक दुकान सजा था।

कई जूते चप्पल थे उसमे,

उनका वहीं रखा था।

पूछा जब वो दुकानदार से,

आया वह सकते में।

पता चला बेचा जूते को,

केवल सौ रूपये में।

भाग्य में उसके था जितना,

उसने उतना ही पाया।

मिलना था ईनाम उसे,

पर खुद को दाग लगाया।

आखिर पकड़ा गया एक दिन,

गया जेल के अंदर।

जैसी करनी, वैसी भरनी,

बड़ा गजब है मन्तर।


Kavita :

विधा:-वीर/अल्हा छंद  -शिल्प:-१६,१५ चरणान्त गाल/२१

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बार बार मेधा घोटाला,

सही नहीं हो काँपी जाँच।

होता अपना राज्य कलंकित,

सदा साख पर आती आँच।

जिसे कभी मिलता है अवसर,

एक ध्येय पैसे की लूट।

योग्य भले ही फेल हो रहे,

माफिया राज रहे अटूट।

अंग्रेजी की काँपी जाँचे,

सदा पढ़ाते जो विज्ञान।

नहीं ज्ञान पर टॉपर बनते,

मेधा का छीने मुस्कान।

 


Kavita :

बिहार में इंटरमीडिएट परीक्षा परिणाम २०१७ पर प्रतिक्रिया स्वरूप मेरी रचना।
विधा:-वीर/अल्हा छंद  –  शिल्प:-१६,१५ चरणान्त गाल/२१
—————————————
बार बार मेधा घोटाला,
सही नहीं हो काँपी जाँच।
होता अपना राज्य कलंकित,
सदा साख पर आती आँच।
जिसे कभी मिलता है अवसर,
एक ध्येय पैसे की लूट।
योग्य भले ही फेल हो रहे,
माफिया राज रहे अटूट।
अंग्रेजी की काँपी जाँचे,
सदा पढ़ाते जो विज्ञान।
नहीं ज्ञान पर टॉपर बनते,
मेधा का छीने मुस्कान।

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