Nisha Mathur




nisha mathur's book

जीवन परिचय

nisha pic

पूरा नाम :- निशा माथुर

पति का नाम :- श्री शैलेंद्र माथुर

वर्तमान/स्थायी पता :- बी-12, सेन कॉलोनी, पावर हाउस रोड, रेलवे स्टेशन- फोन नं/वाटस एप नं ई मेल :- 8952874359, mathurnisha1@gmail.com

शिक्षा :- एम. ए. लोक प्रशासन & Business Administration

जनम :- 6 अप्रेल

रूचि – :- गायन, नृत्य, पेंटिंग्स -सभी क्षेत्रो मे अवॉर्ड

कार्य क्षेत्र :- General Manger in Govt. Recognized Export house 302006

from AIIMS

of Natural Stones (Granite, Marble,Sandstone, Limestone ect.)

Director of own company- Bhavya International

साहित्यिक यात्रा :- साझा कविता सग्रह – भारत की प्रतिभाशाली

कवियत्रिया और प्रेम काव्य सागर ( प्रकाशनार्थ) और पुष्पगंधा (प्रकाशनार्थ), देश भर के समाचार पत्रो और पत्रिकाओ मे काव्य

लेख प्रकाशित हिन्दी वेबदुनिया पोर्टल , काव्या सागर पोर्टल, शब्द नगरी पोर्टल पर कविताओ का प्रतिदिन प्रकाशन

आकाशवाणी – जयपुर और अजमेर से कविताओ का निरंतर प्रसारण जयपुर दूरदर्शन (डी डी राजस्थान) से कविताओ का

प्रसारण विभिन्न काव्य मंचो पर काव्य पाठ

आंतररष्ट्रिय हिन्दी पत्रिका- प्रयास– – कनाडा से मेरी कविता के प्रकाशन का चयन वीडियो एलबम :- अध्याय जीवन ग्रंथ का (यू ट्यूब)

सबसे बड़ी उपलब्धि :- सन 2013-14 मे कार्पेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउन्सिल (CEPC) और मिनिस्ट्री ऑफ एक्सटर्नल अफेर्स- NEW DELHI SE आंतररष्ट्रिया व्यापार मेले मे International fair ( DOMOTEX International Fair- 2013-14), मे जाने का अवसर मिला जो Germany-Frankfurt & Hannover मे लगा था! विदेश यात्रा – फ्रॅंकफर्ट जर्मनी, हॅनोवर- जर्मनी और मास्को रशिया

सम्मान का विवरण :-

(1) जयपुर के बिरला ऑडिटोरियम, रवीन्द्र मंच, OTS, पर JDA के तत्कालीन कमिशनर श्रीमान के. एल. मीणा साहब और सेक्रेटरी श्री मान नरहरी शर्मा जी से सांस्क्रातिक गतिविधियो मे अवॉर्ड

(2) JDA प्रेसीडेंट श्री मान भंवर लाल शर्मा जी से सांस्क्रातिक गतिविधियो मे अवॉर्ड,

(3) बिलाड़ा कवि सम्मेलन 19/10/2015 मे साहित्य स्रजन सम्मान !

(4) जे.एम. डी. पब्लिकेशन- न्यू देल्ही से नारी गौरव सम्मान" के लिए चयनित! ये सम्मान भोपाल के हिन्दी भवन में 10th April, 2016 को दिया गया

(5) जे.एम. डी. पब्लिकेशन- न्यू देल्ही से “प्रेम सागर सम्मान “ के लिए चयनित! Delhi के हिन्दी भवन मे – अगस्त 2016 दिया जाएगा!

(6) काव्यसागर पोर्टल की "मा प्रतियोगिता" मे मेरी कविता ने प्रथम स्थान प्राप्त किया..जिसके अवॉर्ड के लिए काव्यसागर द्वारा मेरे काव्य संग्रह सफ़र अभी लंबा है…क्षितिज के पार का….. का जल्दी ही पोर्टल पर प्रकाशन

(7) अखिल भारतीय मुशायरा और कवि सम्मेलन – पीड़ावा- झालावाड़ में “शाने अदब खिताब”

(8) आगमन" साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समूह- न्यू देल्ही द्वारा 15 मई को कार्ल हुबर पब्लिक स्कूल , नॉएडा में आयोजित हुई आगमन काव्य संगोष्ठी के अंतर्गत "श्रृंगार गीत प्रतियोगिता मे देश के जाने माने अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध वरिष्ठ शायर पद्मश्री डॉ० गुलज़ार देहलवी साहब से उत्कृष्ट काव्य पाठ के लिए प्रशस्ति पत्र

(9) अखिल भारतीय काव्य प्रतियोगिता लाइफ टाइम इवेंट्स एंड एंटरटेनमेंट जयपुर तथा कंचनलता (त्रैमासिक ) की एक अनूठी पहल मे "काव्य प्रतिभा" का सम्मान…मेरी कविता- तुम क्यू हो गये विदा " ने सांत्वना पुरूस्कार जीता!

संस्थाओं से सम्बद्धता –

(a) काव्यासागर पोर्टल की HONOURABLE MEMBER,

(b) राजस्थान के मरू मलयज़ काव्य ग्रूप, © जयपुर काव्य साधक ग्रूप,

(d) नवकवी ग्रूप जयपुर

(e) शब्द साधना साहित्य ग्रूप- India

(f) साहित्य गंगा- इंडिया

(g) मित्रा मंडली श्याम ग्रूप राजस्थान

(h) पोएट फॅमिली ग्रूप- India

(i) राष्ट्रिय कवि संगम से जुड़ी हुई हू!!

सादर आभार-

निशा माथुर

08952874359


अच्छा लगता है !!

कभी-कभी यूं ही, बैठे बैठे,मुस्काना अच्छा लगता है,

खुद से खुद को भी, कभी चुराना अच्छा लगता है,

लोग कहते है की मैं ,धनी हूं मधुर स्वर्ण हंसी की,

निस्पृह बच्चे सी निश्चल बन जाना अच्छा लगता है।

वासंती संग मोह जगाना, जूही दलों संग भरमाना,

सतरंगी सुख स्वप्न सजाना, सब अच्छा लगता है

जब बन जाते है यादों के बनते बिगङते झुरमुठ

असीम आकाश में बाहें फैलाना अच्छा लगता है।

मन के आतप से जल, कुनकुनी धूप में फुर्सत से

भाग्य निधि के मुक्तक को रचना अच्छा लगता है,

नन्हें पंछी का तिनका -तिनका नीङ बनाना देख,

अभिलाषाओं पे अपने मर मिट जाना अच्छा लगता है।

धूप धूप रिश्तो के जंगल, नहीं खत्म होते ये मरूथल

जलते सम्बन्धों पे यूं, बादल लिखना अच्छा लगता है।

पूर्णविराम पे शून्य बनकर, शब्दो से फिर खाली होकर,

संवेदनाओं पे रोते रोते हंस जाना,फिर अच्छा लगता है।

दर्पण देख देख इतराना, अलकों से झर मोती का झरना

अन्तर्मन के भोज पत्र पे, गीत सजाना अच्छा लगता है।

कभी-कभी यूं मुस्काना और गालों पे हिलकोरे का पङना

मधुमय वाणी में कुछ अनबोला रह जाना अच्छा लगता है।

निशा माथुर


औरत

कैसे ? औरत का घर के हर,

कोने कोने में बसता है जीव।

ख्वाबों की शालो को जीवन भर,

उधेङता बुनता है जीव।

एक कन्या से यौवना के सफर में,

जब बदलता है जीव।

खुशियो को गिरवी रख रिश्तों की

किश्ते चुकाता है जीव।

बच्चों के छोटे होते कपङों के ढेर में,

यादों का अक्स लिये,

चौखट के पायदान या दरी के पैबंद,

में भी बसता है जीव।

फटी हुई चद्दरों की गद्दियां बनाकर,

सुई से टांके टुमके दिये।

कतरा कतरा तिनकों को जोङने मे ,

जुङता बनता है जीव।

देखो, औरत का घर के

कोने कोने में कैसें बसता है जीव?

अपने हिस्से के हाशिए को खाली रख,

औरो को रंग दिये,

ताउम्र कई किरदारों में कैद,

भूमिकाऐं निभाता है जीव।

चौखट से अहाते तक दुआओं,

अभिलाषाओं की गठरी लिये

तुलसी के क्यारे में विश्वास का

दीपक जलाता है जीव।

देखो, औरत का घर के

कोने कोने में कैसें बसता है जीव?

सूरज को हथेली पर,

चांद को पानी के थाल में लिये,

नागफनी पर भी संभावनाओं के,

फूल खिलाता है जीव।

जला कर लाल मिर्ची को,

बुरी नजर से बचाने के लिये,

आशंकायो के बवंडर पर

काला टिका लगाता है ये जीव।

देखो, औरत का घर के

कोने कोने में कैसें बसता है जीव?

ख्वाबों की शालो को जीवन भर

उधेङता बुनता है जीव।

निशा माथुर


चाँद टकटकी देख रहा

चाँद टकटकी देख रहा मैं, इंतजार कराया करती हूं!

आंख मिचौली सी करती, हर रात सजाया करती हूं।

तिरछी चितवन से तारों की,तङपन निहारा करती हूं

तन्हाई का इक इक क्षण ,चितचोर सजाया करती हूं

मेरी आरोही सांसो में ,यादों का गीत सजा कर के,

मुखरीत मन से ही अंतर्तम, संगीत सजाया करती हूं।

चाँद टकटकी देख रहा मैं, इंतजार कराया करती हूं!

थाम उजाले का दामन, सुख स्वप्न सजाया करती हूं,

हंसी ठिठोली सुख की हो, कुछ स्वांग रचाया करती हूं,

अमृत के फीके प्याले जब, जीवन में सांसे ना भरे

आशाओ की मदिरा का, रसपान कराया करती हूं।

चाँद टकटकी देख रहा मैं, इंतजार कराया करती हूं!

स्पन्दीत धङकन पे बारिश का ,मोर नचाया करती हूं

बंधी अधूरी परिभाषा ,खिलती भोर सजाया करती हूं

धूप संग मेरी परछाई, यूं चलते चलते कभी ना थके

तुझ संग मेरे मीत, प्रीत की ये, डोर बंधाया करती हूं

चाँद टकटकी देख रहा मैं, इंतजार कराया करती हूं!


चौखट

दरवाजे की चौखट पर राह तकती,

वो दो आंखे ……………………………

मन में आंशकाओं के उठते हुये बवंडर,

दिल मायूसी में डूबा, जैसे कोई खंडहर।

किसी भी अनहोनी को कर अस्वीकार

दिमाग जा पहुंचा संभावनाओं के द्वार।

वो हर एक पल का अब जीना मरना,

कब आयेगा उसका वो अपना???

दरवाजे की चौखट पर राह तकती,

वो दो पुतलियां……………………………

जो भीगी हैं अहसासों की बारिश से,

जो जाग रही हैं ममता की ख्वाहिश से।

अकुलाहट में अपनी पलक पांवङे बिछाये,

प्रतीक्षा की हर आहट पर देवी देवता मनाये।

असमंजस के क्षण-क्षण को गिनता वक्त होगा,

जाने किस हाल में उसका लाडला होगा???

दरवाजे की चौखट पर राह तकती,

वो दो मासूम नजरें……………………………

वो तुतलाती सी बोली, भाव नयन में थमे थमे से,

वो सीने से उठता ज्वार, खङे पांव जमे जमे से।

छाया देता कल्पवृक्ष, गोदी का आश्वासित बचपन,

जीवट था उसका नायक, सवाल पूछता भोला मन।

उसके कन्धों पर चढकर चांद को छूने जाना है,

बता दे मेरी मां, मेरे जीवनदाता को कब आना है???

दरवाजे की चौखट पर राह तकती,

वो दो निगाहें ……………………………

अपनी सिलवटों का दर्द बयां कर रही है,

हर लम्हा पदचाप की सुधियां तलाश रही हैं

कलेजा हथेली पर, सांसे घूमी फिरी सी,

तारीखें मौन पसराये, आशाओं में झुरझुरी सी,

सूखे आंसू और दिल हाहाकार कर रोता है,

जब तिरगें में लिपटा किसी जवान का जनाजा होता है!!!

Nisha mathur


दिल बंजारा गाये

दिल बंजारा गाये सरहद पे, दिल बंजारा गाये,

सीने में एक हूक सी उठती जाने, किस घङी सांस थम जाये।

दिल बंजारा गाये,

पहला प्यार मेरे देश की मिट्टी, जिसका कण-कण प्रियतमा

फुर्सत के लम्हों में दिल रूह से पूछे, तुम कैसी हो मेरी प्रिया

खामोश हवाओं संग लिख लिख भेजे, कैसी प्यार भरी चिट्ठियां

मां के संग बचपन को बांटे, और फिर सरहद की खट्ठी-

मिट्ठियां।

बेताब निगाहें पल पल बूढे बाप को ढूंढे, बच्चें सपनों में पलते

जिगर को बांध फिर मोहपाश, सिपाही, वतन की राह पे चलते।

फिर भी दिल बंजारा गाये……..

सीने में एक हूक सी उठती जाने, किस घङी ये सांस थम जाये।

प्रश्नचिन्ह सी क्यूं बनी खङी है, देश की सरहद और सीमाऐ

सिहांसन ताज के लिये टूट रही, रोजाना कितनी ही प्रतिमायें।

अटल खङा वो द्वार देष के सामने, बैरी चक्रव्यूह सी श्रंखलाऐं

रण का आतप झेल, मस्ती, खेल, हाथ कफन लाखों प्रभंजनायें।

फिर भी दिल बंजारा गाये……..

सीने में एक हूक सी उठती, जाने किस घङी ये सांस थम जाये।

क्षमा मांग तोङे मोह का बंधन, नीङ का करता तृण तृण समर्पित

भाल पर मलता मां चरणों की धूरी,तन क्या मन तक करता अर्पित।

सिंह सी दहाङ, शंखनाद सी पुकार, धूल धूसरित मिट्टी से सुवासित

मार भेदी को बाहुपाश से फिर, कर हस्ताक्षर, नाम शहीदों मे चर्चित।

फिर भी दिल बंजारा गाये

सीने में एक हूक सी उठती जाने किस घङी ये सांस थम जाये।


दिल मांगे ! और ???

बादलों की आहट को सुनकर,सावन में नाच उठता है मोर,

सुंदर पंखों को भूल, पैर देखकर, कैसे हो जाता कमजोर।

कस्तूरी मृग में, यायावर सा सुगंध को, ढूंढ रहा चहुं ओर,

मृगतृष्णा का यह खेल है सारा, क्यूं दिल मांगे कुछ और ?

मरूस्थल की तपती भटकन में कलकल मीठे झरने का शोर

खारे सागर में मुसाफिर, दूर से दिख जाये, जीवन का छोर,

कुम्हलाता अकुलाता जून है व्याकुल, यूं बरसे घटा घनघोर।

फिर भी मरीचिका के दामन को पकङे, क्यूं दिल मांगे और?

दिन भर के भूखे को, भोजन की थाली में, ज्यूं रोटी का कौर,

कङी धूप में व्यथित पथिक को , मिल गयी बरगद की ठौर।

लाख कोहिनूर झोली में मानव के, छूना चांद गगन की ओर,

मानों-अरमानों से भरी गठरीया अब क्यूं दिल मांगे फिर और ?

प्रेम-प्यार का सुधा कलश है, फिर क्यूं, भीगी पलकें भीगे कोर,

अपनी काया की पहचान बना,नाम बना, वक्त भी होगा तेरी ओर।

आगत विगत सब खाली हाथ है, नश्वर जीवन पर किसका जोर,

बंद मुटट्ठी क्या लेकर है जाना, रूक जा!!! दिल मांगे कुछ और!


दो पैसे की पुङिया

एक दो पैसे की पुङिया में कभी मुझ गरीब के नाम,

क्या कोई लेकर आयेगा मेरे लिये जीने का पैगाम?

मुखौटे लगाकर, और खूबसूरत लफजों की जुबान,

क्या मुझे सङक से उठाकर कभी कोई देगा आराम।

कुछ थोङी सी चांदनी, लाकर कुछ थोङी सी धूप

मेरे पेट में जलती हुयी, कब मिटेगी, ये मेरी भूख।

मांगू थोङी सी हंसी, फिर चाहूं थोङी सी खुशी

एक मैली फटी सी चादर, क्या यहीं है मेरी बेबसी!

बंदरबांट से बंट गये है, धरती मां के दाने दाने,

खाली चूल्हा,गीली लकङी पे कैसे अरमान पकायें।

लोग कहते है कि मजलूम का कोई घर नहीं होता,

फरिश्तो की दुआओं में शिद्दत और रहम नहीं होता।

आज! मैं इस सङक पे एक चुभन लिये पल रहा हूं

पूछो तो सही जन्म से ही,कैसे मर मर के मर रहा हूं।

क्या मेरी गरीबी और भूख की पहचान कभी बदलेगी,

क्या वो दो पैसे की पुङिया मेरा भाग्य भी बदलेगी ?


बरखा की हिलोरें

रिमझिम रिमझिम बरखा की हिलोरें

गिरती बूंदें तन पे भङका रही शोले

छनक छनक छन यूं घुंघरवा बोले

निरखत नैन नैन चितवन हिय डोले

धिनक धिनक धिन धा, हौले हौले

तबले की धाप चंद्रमुख तन डोले

खनन खनन खन पिया कंगना बोले

उन्मुक्त सी स्मित के राज सब खोले

झमझम झमझम घनघोर घटायें डोलें

अंगङाई ले मौसम मनवा ले हिचकोलें

सनन सनन सन पुरवइयां चहुं डोले

मेघदूत संग प्रिय की चिट्ठियां खोले

रूनक रूनक झुन झुन पायलिया बोले

रिदम की ताल थिरकत तनमन हौले

झरझर झरझर मेरा कजरा बहे डोले

बूंद बूंद विरह चक्षुजल नैनों में घोले


इंद्रधनुष

मेरी तिरछी तिरछी चितवन में,

कितने बिखरे है इंद्रधनुष

आज कुछ ऐसी बात करो,

अपने प्यार का रंग मिलाकर,

पिया जी, मेरा हार करो, श्रंगार करो।

आज कुछ ऐसी बात करो ……….

दो नयनों के नीले तरूवर में,

आस- निराश के गहरे सागर में,

नजरों से मुझ को प्यार करो

फिर कुछ भूली, कुछ याद करो

प्रियतम रंगो की बरसात करो।

आज कुछ ऐसी बात करो ……….

लिख दो मेरे गुलाबी अधरों पे,

एक काव्य सृजना इस जीवन की

फिर तुम,तुम ना रहो, मै, मै ना रहूं

ऐसा मिलकर शब्दार्थ करो,

पिया जी नख- शिख तक हरसिगार करो।

आज कुछ ऐसी बात करो……….

माथे की लाल चमकती बिंदिया से,

अपने विश्वासो का सौपान करो,

सूरज सा दमकता तेज लिये,

गहरी पीङाओं का दान करो,

प्रियतम, मेरे सिन्दूर का मान करो।

आज कुछ ऐसी बात करो ……….

चाँदी सी चमकती रूनछुन पायल में,

उम्मीदों के स्वेद सुखद सवेरे हैं,

देखो, कान्हा की मुरली में जैसे

मन भरमाती मीठी रागों के फेरे हैं,

पिया जी मेरी धङकन का आभास करो।

आज कुछ ऐसी बात करो……….

जुल्फ घनेरी श्याम सलोनी अलको में,

सावन के बहकता आवारा बादल हैं,

अल्हङपन, चंचल मन से उङता

भीनी खुश्बू से लिपटा आंचल है

अपनी तन्हाई मे अब दो पल तो विश्राम करो।

आज कुछ ऐसी बात करो ……….

इक बंधन है रंग बिंरगी चूङी में

जलतंरग सा जादू बिखरी रंगत है

कुछ नाजुक सी, पर अनमोल, भोली सी,

अल्फाजों में तुझे बंया करती मेरी हसरत हैं

सजन जी, इसकी खनखन का अहसास करों

आज कुछ ऐसी बात करो……….

अपने प्यार का रंग मिलाकर,

पिया जी, मेरा हार करो, श्रंगार करो।


एक कमरे की जिन्दगी!!!

एक कमरे में बसर करती ये जिन्दगी

जाने कहां कब क्यूं खत्म होती जिन्दगी!!

खिलखिलाते से बचपन लिये खिलती

कभी बहकती जवानी लिये जिन्दगी

लङखङाता बुढापा लिये लङखङाती

आती जन्म मरण परण लिये जिन्दगी!

जाने कहां कब क्यूं खत्म होती जिन्दगी!!

चादर से बङे होते पाँव की सी फैलती

या रिश्तो संग बहती नाव सी जिन्दगी

अनजाने से अनचाहे घाव सी दे जाती

बबूल कभी बरगद के छाँव सी जिन्दगी!

जाने कहां कब क्यूं खत्म होती जिन्दगी!!

दोनों हाथों को फैला चांद को छू आती

भाई भाई के मन को ना छूती जिन्दगी

कहने को तो हमें समृद्दि आज छू आती

माँ बाप को घर में ना छू पाती जिन्दगी!

जाने कहां कब क्यूं खत्म होती जिन्दगी!!

अनकही यादों की गलबहियाँ सी हंसती

समय शून्य में अठखेलियों सी जिन्दगी

मुट्ठी में बंद कुछ निशानियों को कसती

दीवार टंगी अपनो की स्मृत्तियाँ जिन्दगी!

जाने कहां कब क्यूं खत्म होती जिन्दगी!!

खाली कोना बंद दरवाजे चुप सी सन्नाती,

खुली खिङकी से झाँकती आती जिन्दगी!

दरारों की वजह से दीवारों को यूं दरकती

कभी बङी खाइयों को भी पाटती जिन्दगी!

जाने कहां कब क्यूं खत्म होती जिन्दगी!!


एक दुआ हमारे बुजुर्ग।

एक ख्याल की तरह होते हैं, जब पल पल में बिखर जाते हैं,

अपने दिल की दुआओं से संभाला करते है हमें, हमारे बुजुर्ग।

जब अंतर्मन से होते हम खाली, फिर कोई हमारी राह नहीं,

हमारा जूनून, हमारी ख्वाहिश, ताकत बन जाते हैं, हमारे बुजुर्ग।

हम कौन हैं, क्या है, जब कोई खुद की खबर नहीं होती हमें?

मरते हुऐ के लिये उस पल आशीर्वाद बन जातें हैं, हमारे बुजुर्ग।

तूफान में जब कभी एक दिये की तरह टिमटिमाते के जलते हैं,

हर कदम पे हमें दे हिम्मत, हमारा हौसला बढाते हैं, हमारे बुजुर्ग।

जब ये एहतराम होता है कि कोई हमारा साथी, रहनुमां भी नहीं

खुशियो की जिन्दगी में तब, फलसफे बन जाते हैं, हमारे बुजुर्ग।

चढता दरिया बनके और उफान के गर पाना चाहे मंजिल कोई

देकर मशविरा तहजीब का, एक तजुर्बा बन जाते हैं, हमारे बुजुर्ग।

जब कभी फितरत में रंगीन मिजाजी, पुरजोर हो जाती है हमारे,

फैला के आंचल हमारे मुकद्दर पे इक साया बन जाते हैं,हमारे बुजुर्ग।

कैसे ताउम्र बच्चों की परवरिश और उनकी बेहतरी के जज्बे में,

मौत के हर कदम पर अपनी, सांसों को जीतते जातें हैं, हमारे बुजुर्ग।

जिनकी दुआओं से ही हमें हासिल होते है ये शोहरत और ये मुकाम,

कांपता हाथ सर पर रखते ही, राह के पत्थर हटा देते है,हमारे बुजुर्ग।

बनके सरपरस्त जब हमें लपेट लेते हैं अपने बाहुपाश में प्यार से,

घर-आंगन में चांदनी लेकर, चांद बनकर उतर आतें है,हमारे बुजुर्ग।


एक शौर्य

मैं खुद मिटटी राजस्थान की मेरा कण-कण है महामाया,

पूर्वजन्म का कोई पुण्य है मेरा, जो इस धरा पे जन्म पाया।

सिन्दूर सजाती सुबह यहां देखी रूप लुटाती फिर संध्या,

एक एक दुर्ग का शिल्प सलोना, और मरूभूमि की सभ्या।

भोर सुहानी घर-घर मीरा गाती, पौरूष प्रताप सा यूं गरजे,

मेरी धरती के वो नौनिहाल, कैसे रेतीली सीमाओं पर बरसे।

दोहे-सोरठे, दादू और रैदास सरीखे, कहीं अजमल अवतारी,

दुर्गादास और पन्ना की स्वामी भक्ति से, मेरी धरती महतारी।

पीथल, भामाशाह, मन्ना से फिर हम सब कैसे पानीदार हुये,

इन सब वतनपरस्तों के तो हम पल पल के कर्जदार हुये।

इकतारे, अलगोजे, बंसी, ढोलक और कंही पर चंग की थाप,

तीज, गणगौर पे रंगीली गौरी, और ईसर की फाग पे अलाप।

खङी खेत में फसलें धानी, चातक, मोर, पपीहा पीहू पीहू बोले,

बातें हो गयी बरस पुरानी, आज भी ढोला-मारू का दिल डोले।

मैं मिटटी राजस्थान की मुझमें भी ऐसा हो त्याग, प्रेम, सौन्दर्य

मेरी काया की मिटटी धोरों में संवरे, मै भी कहाऊं एक शौर्य


कागज की नाव

कल रात दर दो कदम बबूलों से गुजर के आयी,

देह पर अपने खरोचों के कुछ सिलसिले ले आयी।

बहुत से टूटते सपने सालते दुखते हुये रो रहे थे

मरूस्थल से जलते मन पर जैसे छाले पङ गये थे।

अरमानों का टपकता लहू मेरी आंखे धो रही थी,

सिसकती चांदनी भी दिल के घाव सहला रही थी।

वक्त कुछ यूं किस्से सुना रहा था मुझे खंडहरों के,

कैसे जिन्दगी के पल बीत रहे है संग पतझरों के।

मैं, बेचैन सी सिरहाने नींद धर धर के जागती रही,

आखों मे यादों के कितने, बीहङ जमा करती रही।

छांव का कोई छींटा नहीं, मौसम टीसों सा ठहरा है

काटे नहीं कटते सन्नाटे, होंठो पे चुप का पहरा है।

कोई छत नही कैसे देखो, सिर पर खङी बरसात है?

जिन्दगी की क्या बात करूं, हाथ कागज की नाव है।

निशा माथुर


काहे को ब्याहे महतारी ?

सौंधी माटी की खुश्बू को यूं चाक चाक ढल जाने दो,

छोटी सी कच्ची है गगरिया, तन को तो पक जाने दो।

मधु स्मृतियों के बीच पनपते बचपन को खिल जाने दो,

काहे को ब्याहे महतारी ? मुझे, थोङा तो पढलिख जाने दो….

नादानी के खेल चढी है, बल बुद्दि की बेल नही बढी है,

मां के आंचल की ऋणी है, ममता की मूरत नही गढी है,

तिनका तिनका दाता के अंगने को, हाथों से सजाने दो।

महलों की छोटी सी चिङिया, फुदक फुदक उङ जाने दो।

काहे को ब्याहे महतारी ? मुझे, थोङा तो पढलिख जाने दो….

कच्ची पगडंडी के सपनों में, वो बरगद की छांव भली है,

इच्छाओं के पंख लगाकर अब, आसमान में उङान भरी है

मेरे दम से दम भरती प्रतिभा को, सूली पे मत चढ जाने दो

अभी अभी तो हुआ सवेरा खिलती धूप तनिक खिल जाने दो।

काहे को ब्याहे महतारी ? मुझे, थोङा तो पढलिख जाने दो…..

कन्यादान की क्या गजब विधि है,कन्या की तो जान चली है,

एक कली की दुखद कहानी, दुल्हन का आंचल ओढ चली है,

पीपल की पाती पे कुमकुम स्हायी को, क्यूं करके बह जाने दो।

चंद्रकला की मधुर चांदनी,धरा पे, थोङी थोङी तो इठलाने दो,

काहे को ब्याहे महतारी ? मुझे, थोङा तो पढलिख जाने दो……

निशा माथुर


कैसे तुम बिन

कैसे तुम बिन चैन धरूँ पिया, कैसे धङकते मन को समझाऊँ,

छलक रही नैनों की गगरीया, कैसे ये गीत विरह का गाऊँ।

आंगन बुहारू, मांडणा मांडू, अंग-अंग खिलती रंगोली सजाऊँ,

भोर अटरीया बोले कागा, पल पल द्वारे दौङती क्यूं आऊँ।

कुमकुम भरे कदमों से नाचती शुभकामनाऐं लिख लिख जाऊँ,

पी रो संदेसो ले आ रे सुवटिया, तेरी चौंच सुनहरी मढवाऊँ।

कैसे तुम बिन चैन धरूँ पिया,कैसे धङकते मन को समझाऊँ!!!

उमङ घुमङ घन गरजे काले, मैं पात सरीखी कंप कंप जाऊँ,

कुहूकू कोयलिया बोले मीठी बोली, मैं हूक कलेजे में पाऊँ,

सावन सुरंगा क्यूं करे अठखेली, मैं, कजरा नीर छलकाऊँ।

पिया परदेस,भीगा मोरा तन-मन, का से हिय की पीर बताऊँ।

कैसे तुम बिन चैन धरूँ पिया, कैसे धङकते मन को समझाऊँ!!!

चंचल हिरणी सी घर भर में डोलूँ लक्ष्मी केरा हाथ सजाऊँ,

मन-भावन मांडण को निरखती, पिय मिलन की आस बंधाऊँ।

सखी-सहेलियां करें अठखेली, कनखियाँ नजर भर मुस्काऊँ,

चंदन लेप, कुन्तल केश,चंचल चितवन, सौलह सिणगार सजाऊँ।

कैसे तुम बिन चैन धरूँ पिया, कैसे धङकते मन को समझाऊँ!!!

छलक जाय नैनों की गगरीया, कैसे यूं गीत विरह का गाऊँ।

निशा माथुर


खिङकी का चांद

मेरी खिङकी के चांद, सुनो,

पल दो पल, दिल की बात करो।

खामोशी से एकटक तकते हो,

किस्मत पर मेरी हंसते हो।

तुम बात करो मेरे सपनों की,

सांझ सवेरे जो देख रही हूं,

घर की देहरी पर बैठी,

अभिलाषाओं की चादर ओढ रही हूं।

तुम बात करो आशाओ की,

नयनों के दो मोती लुटा रही हूं

अपनी तुलसी के क्यारे में,

उम्मीदों का दीपक जला रही हूं।

तुम बात करो मेरे दिल की,

हर एक धङकन जोङ रही हूं,

अपनो की चिंता मे क्यूं,

धूं धूं सी जलती दम तोङ रही हूं।

तुम बात करो ना खुशियो की,

राहें तकती थकने लगी हूं,

पल हर पल कम होते लम्हों से,

कुछ लम्हों को लपक रही हूं।

तुम बात करों मेरे अश्को की,

पलकों के कोरों पे सजा रही हूं,

बारिष की बूंदो मे भीग भीग,

चुपके से इनको छुपा रही हूं।

तुम बात करो ना मेरे चांद की,

तुम्हैं हमराज बना रही हूं,

अपने जीवन की उलझन को,

देखो ! कैसे तुम संग बांट रहीं हूं??


मन के पलाश

एक सुरमुई भीगी भीगी शाम

ओढ कर चुनर चांदनी के नाम

सुनो………….

तुम जरा मेरे साथ तो आओ,

कुछ मौसमों को भी बुला लाओं,

मै…… मैं बादल ले आऊं,

और इस भीगी भीगी शाम में,

गुलमोहरी मधुमास चुराऊं।

सुनो………….

तुम आज कुछ बिगङो, कुछ बनो

और आंधियां भी संग ले आओ,

मैं……..मैं चिराग बन जाऊं,

और इस आंधी संग जल जल के,

अपना विश्वास आजमाऊं।

सुनो………….

तुम कुछ पल पहाङ बन जाओ

और सन्नाटे से लहरा जाओ,

मैं……..मैं धंुधलके साये सी मचलूं

सन्नाटे में तुम्हारा नाम पुकारूं।

सुनो………….

तुम आज वक्त बन जाओ,

और मेरे लिये थोङे ठहर जाओं,

मै…………मैं फिर स्मृतियां छू लूं,

दर्पण में अनुरागी छवियां निहार लूं।

सुनो………….

तुम आज मेरा आंगन बन जाओं,

और मेरा सपना बन कर बिखर जाओं,

मै………..मैं मन के पलाश सी खिल जाऊं

अनुरक्त पंखुरी सी झर झर जाऊं।

सुनो………….

फिर एक सुरमुई भीगी भीगी शाम

ओढ कर चुनर चांदनी के नाम

मै……..तुम्हारी आखों के दो मोती चुराऊं

और उसमें अपना चेहरा दर्ज कराऊं।

निशा माथुर


मन

औरत का मन, देखो क्या क्या लिखता है,

रूह को छूकर निकल जाये,

वो पन्ना लिखता है………..

आंधियों के जोर पर, अपना हौसला लिखता है,

या,ममता का भीगा दुबका कोई कोना लिखता है।

दिल में हिलोरती लाखों, तमन्नाऐं लिखता है,

या,सपनों की यहां वहां बिखरी किरचें लिखता है।

अपने हिस्से का आंसमा तकती दो आंखे लिखता है,

या, इंतजारी के डूबते पलों का कांरवां लिखता है।

अपनी जांबाजी से टकराती, वो कोमलता लिखता है,

या, पत्थरों पर अपने आंसुओ का इतिहास लिखता है।

रिश्तो पर अपने स्नेह का मखमली पैबंद लिखता है।

या, यायावर सी जिन्दगी का मौन आहवान लिखता है।

औरत का मन, देखो क्या क्या लिखता है,

रूह को छूकर निकल जाये,

वो पन्ना लिखता है………..


मन्नत का धागा

लो चलो, आज मैं, बांध ही दूं अपनी सांसो पे

तेरे लिये, एक छोटा सा, मन्नत का धागा।

नाम तेरा ले कर कह दूं अब, इस धङकन को,

देख ! तुझसे ही जा उलझा, मेरे मोह का ये धागा।

तुझसे छुपकर बांधू उसमे, लाखों मजबूती की गाँठें,

चाहे भी तो खोल ना पाए, बिन मेरी सांसे काटे।

चारो ओर लपेटूं अपने इसको, यूं नाम तेरा ले लेकर,

ये गिरह कभी ना सुलझे, चाहे धङकन गिरवी देकर।

चांद मलिन सा हो जाये क्यूं फिर सूरज आखं चुराये,

मेरी मन्नत की ताकत से कभी, तुझपे आंच ना आये।

रूह छुपा के डोले तुझको जब काली नजरें जो भरमाये।

हाथों पे बरबस खिंच आते है आभासी रेखाओं के साये।

पांव जहां भी पङ जाये तेरे, मेरे रोम रोम के तारे गुजरे,

कही अनकही को समझ सकते है नयनों के मेरे कतरे।

अनहोनी की चिठिठयों को लेकर, मै, ऐसी गांठ लगादूं,

नाजुक प्यार के धागे को पक्की मन्नत की जंजीर बनादूं।

निशा माथुर


मिट्टी सी औकात

मिट्टी के धोरे, मिट्टी के खेल, मिट्टी से शुरू कहानी हैं,

मिट्टी सी औकात है मेरी, फिर मिट्टी में मिल जानी है।

समय की पुस्तक रही अधूरी, मिटटी सा बचपन का अहसास,

जहां खोटे सिक्के सी ये जिन्दगी, भी चल पङती थी बिंदास।

अब स्वप्न से रूठे, स्वप्न से सोते, स्वप्न ही जीते आसपास,

गम की थिरकन से तांडव शरमाता, हंसी खिलकी तो मधुमास।

सोचूं की इस एकाकी जीवन में अब क्या खोना क्या पाना हैं?

मिट्टी सी औकात है मेरी फिर मिट्टी में मिल जाना है…………

जीवन- शाम ये प्यास तमाम, सूना मन मेरा, सूनी सी आंखें,

खुद की कर खुशियो को अगवा, क्यूं दूसरों की थाली झांके।

दर्द के आगे शब्द छूट गये, देखा तन हाङ-मांस की फाकें,

जब्ज हो गया ढलती रेत में, चली रूह आसमान की पाखें।

बोलो चराचर नश्वर जीवन में अब क्या तेरा और क्या मेरा हैं?

मिट्टी सी औकात है मेरी फिर मिट्टी में मिल जाना है…………

धुंधली सोच, मंजिल भी धुंधली, धुंधले क्यूं कमजोर ये रिश्तेनाते

मरघट तक फिर याराना है, दोस्तो, बारह दिन भी मंहगे लगते।

जिस घर आंगन रूह बसती थी आज खुद वहीं तस्वीर पे सजते,

शानोशौकत,धन सम्पत्ति सब तज, रज गये अब मिटटी के रस्ते।

देखो, सांझ का पंछी क्या घर लौटेगा ये दो पल का रैन बसेरा हैं

मिट्टी सी औकात है मेरी फिर मिट्टी में मिल जाना है…………


मुफलिसी

कितनी खामोश होती है मुफलिसी अपनी टेढी जुबान में!!!

क्यूं कर कोई नजर देख नहीं पाती, इसे इस जहान में

कितनी आह, कितना दर्द, कितनी भूख दिखाई देती है,

सब मसरूफ है खुद में, बदली सी निगाहें दिखाई देती है।

कहीं तो रोती है जवानी, कहीं बिखरता आंख का काजल,

उतने ही पैबंद लिये तन को छुपाता किसी मां का आंचल।

कितनी खामोश है मुफलिसी क्यूं लफजों में बंया नहीं होती है!!!

मासूम सी अबोधें कन्यायें फिर कौड़ी-कौड़ी के लिये बिकती हैं

कितनी ही बहनों की डोली, फिर सपने में भी नही सजती है।

असहाय कमजोर बदन को लेकर जब कोई बाप यूं सुलगता है

मजबूर ख्हाहिशॉ का धुआं छोङते कोने कोने में चिलम पीता है।

कितनी खामोश है मुफलिसी अश्को से छलकती दिखती नहीं!!!

कोई धङकन कोई सांस कोई आत्मा रोजाना फिर मरती वहीं

जिन्दगी का आलम ये है कि तब वो घुट घुट के सिसकती है

बरसात आंधी तूफान में जब किसी गरीब की छत टपकती है।

बिकती है भूख, बिकता ईमान, बिकता है फिर बदन नशीला

यही है खामोश मुफलिसी जहां गरीबी में भी होता, आटा गीला।

Nisha Mathur


मेरा अनोखा बलमा

मेरा बलमा मेरा अनोखा बलमा!!!

चुप चुप गूंगी चितवन से बात करे,

मुझे नजर लग जाये ना किसी की

यूं कह,मेरी तारीफों से बचकर चले।

मेरा बलमा मेरा अनोखा बलमा!!!

पूरी शिव नाथ कृपा बरसाता रहें,

जरूरी बातों से अनजाना बनकर,

आखं मूंद, भोला राम का रूप धरे।।

मेरा बलमा मेरा अनोखा बलमा!!!

दिल का तो राजा, दिलदार रहे,

अपनी आखिरी कोङी सबपे लुटा

फिर खुद चाहे फटेहाल रहे।।

मेरा बलमा मेरा अनोखा बलमा!!!

जाना पूरब पर पष्चिम में चले,

अपनी जिद्दी और तीखी नाक तले

फिर चाहे बङा नुकसान सहे।

मेरा बलमा मेरा अनोखा बलमा!!!

इतना भी क्यूं भूलभलैया में रहे,

मेजबानी का न्यौता लोगो को दे,

फिर कहीं ओर का मेहमान बने।

मेरा बलमा मेरा अनोखा बलमा!!!

यूं कृष्ण कन्हैया सा रास रचे,

चाहे कैसी भी हो स्त्री जाती,

उसकी बंसी धुन पे नृत्य करें।

मेरा बलमा मेरा अनोखा बलमा!!!

सभी रिश्ते नातों पे राज करे,

मां-बहनों की सांस सांस और

धङकन धङकन अरदास करे।


मेरी माँ —

वो कतरा -कतरा चुनती रही,

अपने अन्तर्मन के आंसू,

और पिरोती रही,

हमारी अभिलाषाओं की माला,

वो नित, प्रतिपल थकती रही,

भागती रही,

इसी कोशिश में ताकी,

हमारे भूखे पेट को मिले,

सुख का निवाला।

वो थपकाकर हमें सुलाती,

खुद जागती ताकी,

हमारे सपनों को,

आकर बहलाये कोई सुरबाला।

वो सहलाकर हमारे बालों को,

इतना दुलारती,

अपने सीने से लगा,

हमें ओढाती ,

नेह वात्सल्य की दुशाला ।

वो हर गम को पी कर मुस्काती,

हमें हंसाती, और खुद पी जाती,

अपनों के भी अपमानों की हाला।

वो क्षण-भंगुर से,

हर पल को खुल कर जीती,

मुस्काती, कर्मफल की सीख सिखाती,

हमसे कहती ये,

जीवन है इक रंगशाला ।

वो अविरल पथ पर चलती जाती,

अंगुली थामे हम बच्चों की,

कहती नेह- विश्वास की,

आपस में पीते जाओ मधुशाला ।

वो मोह माया को छोङ,

हमसे मुख को मोङ,

चीरनिन्द्रा में ऐसी सोयी,

एक आंधी ले गयी उसको,

और लील गयी ये बेरहम ज्वाला।

उसके गम से पिघल गया सूरज,

सहमां ये आसमां,

जब ये खुश्क धरती ही पी गयी,

उसके रक्त का प्याला।

वो हमें सींच कर पाल पोस कर,

खुद के हिस्से का, कर्त्वय निभाकर,

हमें सिखा गयी,

आज मां के शब्दो का जाला।


मै क्या हूं ?

मैं, खुद को क्या परिभाषित करूं, शब्दो का सम्मिलित रूप हूं,

चांदनी में नहायी हुई या बरखा के बाद की खिली खिली धूप हूं

मुझमें है निशा सी शांत नीरवता और बहती नदी सी निश्चलता

चंद बूंदो में सागर तलाशती, और सामंजस्य बैठाती सी एकरसता,

मुझको चलते रहने की आदत है, मेरे पांवों में थकन नहीं होती

नहीं सोचती पलायन, मैं शमशीर सी जंग से परेशा नहीं होती।

मेरे हौसलों में इतनी जान है की, उङानें मेरी आसमां से भी उपर

इरादे इतने फौलादी मेरे, नारीरूप में भी नहीं किसी से कमतर।

किस्मत की घायल रूह हंसकर जीने की आस कभी नहीं छोङती,

कितनी रहूं बिंदास मगर अपनी देहरी के संस्कार कभी नहीं भूलती।

कुछ है भोली सी संवेदनाऐं और कोकिल कंठी सी मेरी स्वरंजनाऐ

राह से भूलूं ,भटकूं ना भरमाऊं, मेरे अपने लक्ष्य, अपनी हैं वर्जनाऐं।

जीवन की आपाधापी है फिर भी रिश्तो में पलक पांवङे सजा देती,

पानी सी घुल मिलती सबमें, लहरों से आगे तक नजर बिछा देती।

किंचित नहीं भयभीत,गीत है मेरा, नही है हार है और सामने जीत?

अभी तो नापी एक कदम की जमीन,अभी शेष है आंसमां संग प्रीत।

पत्थरों से गम को बांटती, हदय को आल्हादित करती रस का सागर

मेरी नींव है आधार और जमीं है चांद, विप्लव मूल्यों की हैं मेरी गागर।

मै क्या हूं ? मैं.. मेरी कल्पनाऐं कोरे कागज पे कविता मेरी बोल जाती हैं

उन्मुक्त,उच्चश्रंखल सी सासों में महुऐ की गंध सी निशा महक जाती है।


मैं उङ सकती हूं,

क्यूं लोग मुझे कहते हैं कि मैं क्या हूं ?

क्यूं लोग मुझे कहते हैं कि मैं क्या कर सकती हूं ?

मैं उङ सकती हूं, देखो…. और नाप भी सकती हूं,

सात परतों के भी पार उस क्षितिज के फलक को,

अंजुरी में ला सकती हूं ,उस चांद की ललक को।

अनदेखी सलाखें मुझे क्यों जकङती हैं !!

बैसाखियां सिर्फ मुझे ही क्यों पकङती हैं !!

मैं उङ सकती हूं, देखो और बदल भी सकती हूं

अपने आत्मविष्वास से हवाओं के रूख को,

मुझ पर हंसने वाले, जुमले बोलते मुखो को।

मैं उङ सकती हूं, देखो…. और तोङ सकती हूं

मुझको जीने से रोकने वाली हर हदों को,

रिवाजो, परम्पराओं या फिर सरहदों को।

मैं उङ सकती हूं, देखो…. और संभाल सकती हूं,

अपनों के प्यार, विश्वास और मर्यादाओं को,

घर और घर के बाहर की सारी विपदाओं को।

मैं उङ सकती हूं, देखो…. और मार सकती हूं

मुझको नारी शब्द से छलने वाले उस डर को,

भेदती निगाहों से जिस्म को छूते हर शर को,

मैं उङ सकती हूं, देखो…. और उङ सकती हूं

उन्मुक्त पतंग की तरह, हर बाधा को कर पार,

अपनी खुद की पहचान बनाती, खुद को कर तैयार।


नेह के सौ बिंब

कुछ शिकवे शिकायतो में बोलती हम दो जिन्दगीयां,

मेरे दर्द भरे सिर में जब खौलती है तेरी अंगुलियां।

तुम कितनी शिद्दत से तलाशते हो मेरी रग रग को,

नीरव मन से छिन फतह कर ले जाते हो बैचेनियां।

क्यूं जलते मन पर बन जाते हो बादल सी परछाईयां

ढक देते हो अपनी मुखरीत भाषा से मेरी तन्हाइयां।

जब आरोह अवरोह के स्वर में, मैं, ढूबती उतराती हूं,

इन्दªधनुषों के पत्र पढकर कर लेते कुछ बचकानियां

अनहद नाद सी गूजती है हम दोनो की अठखेलियां,

धूप संग गाती सप्तपदियां भी घोल देती है रागनियां।

सात फेरों के मधुमास को, उम्र के इस दौर में जीती,

नेह के सौ बिंब गढती सी, बज उठती हैं शहनाईयां।

निशा माथुर


पलकन की डोर

वो हसंता गाता सा चेहरा था,

दो प्यारी दिलकश सी आँखें थी,

क्यूं पलकन की डोर से बंधकर,

अब तेरे दो मोती उलझ ही गये।

वो नूर बहारों का छलका था

और गहरी गहरी सी चितवन थी,

इस निर्मल झील के पानी में फिर

क्यूं तेरे दिल के कंकर उछल गये।

वो शोखियो में यूं महक रहीं थी,

अल्हङ अलबेली इक साहिल थी

ज्वार ज्वार से उमङ उमङ कर

तुम क्यूं सागर गहरे छलक गये।

वो प्यासा प्यासा सा पनघट थी,

और निपट अकेली इक घट थी।

उसकी मदहोशी में डूब डूब कर

तुम क्यूं घूंट घूंट पे बहक गये।

वो मधुर मुस्कान चहक रहीं थी,

निगाहें उफ क्या खंजर सी थी।

कत्ल होने को उसकी नजरों से,

तुम क्यूं बहके दीवाने मचल गये।

उन नैनो के संग इक बिंदिया थी,

अब झीनी जिसने तेरी निंदिया थी,

अंगङाई लेते उस जलते सूरज से,

तुम क्यूं रोम रोम से झुलस गये।

वो ऐसी बोलती सी दो आंखे थी,

जो सांस सांस को ये कहती थी,

पलकन की डोर से बंधकर आखिर

अब तेरे दो मोती उलझ ही गये।

निशा माथुर


पिता

कन्या के जन्म लेते ही पिता, ऐसा पिता बन जाता है।

पल पल बङते उसके रूपों संग, उसका रूप ढल जाता है।

अपनी तनया को गोदी लेते ही वो मां जैसा बन जाता है,

अपने सीने से लगा प्यार से, थपकाकर उसे सुलाता है।

उसके रोने, उसकी सिसकी पर, जब वो लोरी बन जाता है,

पलको की कोरो पर अश्को के मोती, बीन बीन कर लाता है।

नन्हें नन्हे उसके कदमों संग, हरपल वो बच्चा बन जाता हैं,

अपनी बेटी की तुतलाती बोली में अपना बचपन जी जाता है।

तितली सी खिलती तनूजा का, फिर ऐसा साथी बन जाता है,

उसकी मुस्कान, हंसी खुशी के लिये, कैसे यारीयां निभाता है।

स्वप्न सजाती वैदेही के लिये जब वो जनक बन जाता है,

अपने अनुभव और सामथ्र्य से बेहतर का, राम ढूंढकर लाता है।

ससुराल विदा होती आत्मजा का, जब वो बाबुल बन जाता है,

अपने अंश वंश को भीगे नयनों संग,कैसे डोली में बैठाता है ?

आंगन में उङती फिरती चिङिया का, जब सूनापन छा जाता है,

अपनी उम्र उसे लगा,जीवन को हार, मन्नतें मांगता रह जाता है।


प्राण निमंत्रण

चाँद तू कुछ और निखर, अपनी चंद्रिका पे इनायत कर,

उर बीच पनार के छालों को, हाथों पे सजाकर रक्खा है।

प्राण का फागुन खिल रहा मेरी सांसों में धुंआ धुंआ सा,

प्रीत की बासंती हवाओं को मेरे द्दार बुला कर रक्खा है।

गुनकी महकी यादें संजोयी है किताबों में अब मुरछाने को

गुलाब तू भी हंस के देख ले, पत्ता पत्ता बिखरा रक्खा है।

अरे पावस के पहले बादल ,उमङ घुमङ घिर के बरस जरा

अंतस की तृष्णा को, बारिश की बेखुदी ने तरसा रक्खा है।

बर्फ के धुऐं पे बना रही हूं हौले से आशियाँ कुछ ख्वाबों का

मेरी ही शे के सदके जाऊं मैने एक शहर भी बसा रक्खा है।

तेरे कदमों में हो तो जाऊं निछावर इन गुलाबी फूलों सी ,

खाक में मिलके भी तेरे लिये खुशबू को बचा कर रक्खा है।

घटाओं पे हया की बंदिश है,झट से चाक कलेजा कर देंगी,

इन जुल्फों की शोखी को हौले से भी तो संभाले रक्खा है।

झौंका हवाओं का उन्मन नाच रहा,लेकर सुधियां साजन की,

घूंघट में अपने चुपके से वो आधा चांद छुपा के रक्खा है।

मैं, लतर सलोनी क्यूं नी भीगूं, मधुबन के तरूवर से मिलकर

चांद चांदनी की मदिरा में इस निशा को भरमा के रक्खा है।

अब चंचल मंदाकिनी उतर रही है चुरा के मेरी चितवन को,

प्रियवर! मिलन यामिनी का तुम्हैं प्राण निमंत्रण दे रक्खा है।

निशा माथुर


सफेद साङी

अवसान के समय स्वरमय

पहना दिया सफेद कफन

सभला दी गयी बंदिशो और

प्रथाओं की ढेरों चाबियां

जिस सिन्दूरी रिश्ते को वो

मनुहार से जीती आयी थी

वही निर्जीव नसीब में लिख गया

जमाने की रूसवाईयां।

उसके माथे की लाली फिर

धो दी समाज के ठेकेदारों ने

आंगन में लाल चूङियां भी तोङ दी

वज्रकठोर रिश्तेनातों ने।

कानून बनाकर मौलिक अधिकारों पे

संविधान लागू हो गये

वैधव्य का वास्ता देकर

समाजी रंगो की

वसीयत लूट ले गये।

सरहदें तय कर दी गयी अब

घर की देहरी, चौखट तक की

उसकी जागीर से छीन ली गयी

मुस्कराहट उसके होठों की।

स्पन्दित आखें नमक उतर आया

गंगाजल से उसे शूद्ध कराया

बटवारें में ऐलान

सांसों को गिन गिन कर

लेने का आया।

निरामयता समपर्ण से जुङे रिश्ते

तो उसे निभाने ही होंगे

शून्य सृष्टि सी प्रकृति संग

विरक्ति के नियम अपनाने होंगे

बिछोह का दंश रोज छलेगा

तपस्या ही अब जीवन होगा।

तन पे सफेद साङी

सूनी कलाई और

खामोश मातम होगा।


समय शून्य सा!!!

समय शून्य सा कभी करवट बदलता सा,

टूटती सी सांसे और बिखरे फूल सा!!!

दिल की गर्द झाङने को जरा जो ठहरी,

तो ये रूक गया, कायनात सा थम गया।

और देता हुआ सा दस्तक दहलीज पर,

कठहरे में मुझ स्वयम को खङा कर गया।

समय शून्य सा कभी करवट बदलता सा,

झूमती इठलाती लहरो की मौज सा।!!

बादल निचोङ कर कुछ छीटे देता रहा,

तो तपते से जीवन को राहत भी दे गया।

और घङी घङी मेरे कदमों का सहारे पर,

मेरी बाहों में अतीत के अवशेष छोङ गया।

समय शून्य सा कभी करवट बदलता सा,

ठूंठ की तरह जङ होता और नगण्य सा!!!

अधरों पे गुलमोहरों सी गुलाबी रंगत ले रहा,

तो भावविभोर हो प्यार में खिलखिला गया।

और सुख के सूरज सा छांव धूप के खेल पर,

कलैण्डर के पन्नों सा बदल, शून्य कर गया।

समय शून्य सा कभी करवट बदलता सा,

चुप बिना पदचाप के वक्त की चाल सा!!!

एक हाथ से लेकर के दोनो हाथों से लेता रहा,

अपने पदचिन्ह छोङता अनवरत भागता गया।

और सांस के साथ देह, देह के साथ आस पर,

कालचक्र सा कभी जीता और पल पल मार गया।


साँस साँस चंदन हो गयी

मैं! नीर भरी कुंज लतिका सी

साँस साँस महकी चंदन हो गयी

छुई अनछुई नवेली कृतिका सी

पिय से लिपटन भुजंग हो गयी!

अंगनाई पुरवाई महके मल्हार सी

रूप रूप दर्पण मधुबन हो गयी

प्रियतम प्रेम में अथाह अम्बर सी

मन राधा सी वृंदावन हो गयी!

गात वल्लरी हिल हिल हर्षित सी

तरूवर तन मन पुलकन हो गयी

मैं माधवी मधुर राग कल्पित सी

मोहनी मूरत सी मगन हो गयी!

अनहद नाद उर की यमुना सी

मन तृष्णा विरहनी अगन हो गयी

भीगी अलकों की संध्या यौवना सी

दृग नीर भरे नैनन खंजन हो गयी!

मैं! विस्मित मौन विभा के फूल सी

बूंद बूंद घन पाहुन सारंग हो गयी

बिंदिया खो गयी मेरी सूने कपोल

साँसों से महकी अँग अंँग हो गयी!


सूखे गुलाब

सूखे हुए गुलाबों पर आ तेरी यादों के छंद लिखूं

गुलदान में जो महक रहे है उन पे कोई बंध लिखूं।

दिलजोई मुलाकात पे महकी आखों का अनुबन्ध लिखूं

गहरे हुये गुलाबों से वो बिखरी प्यार की सुगन्ध लिखूं।

चेहरा चांद गुलाब हो गया बातें अब क्या चंद लिखूं

क्या जीती हूं मैं,क्या हारी हूं जीवन का निबन्ध लिखूं।

तेरे जिस्म से छूकर गुजरे इन गुलाबों की गंध लिखूं

हौठों की जुम्बिश से महकायी छलकायी मकरन्द लिखूं।

थमें पांव है सांस सांस के ,धङकन भी है मंद लिखूं,

अल्फाज करूं बयां तो आती हिचकी कैसे बंद लिखूं।

मेरा इश्क़ किताबों सा सूखे फूलों की भीनी गंध लिखूं,

हसरतों ने की मौहब्बत रूह से रूह का संबंध लिखूं।


तारीखों में झांकती जिन्दगी

जिन्दगी दीवार के कलैण्डर सी

बदरंग ब्यौरेवार सी

तारीखों में झांकती

कहीं पर रोते, कहीं पर हंसते

मिल जाते है हादसे।

बहाने ढूंढते है फलसफे

और फिर एक पन्ना पलट जाता है।

अगला अध्याय शुरू होता है तिथिवार

सुख दुख की लहरों से बेखबर

किश्तिया बांधे उम्मीद के साहिल पे

ख्वाहिशो और कोशिशो की गठरी संग

चढनी है नयी चढान

कल का क्या निचोढ

बीत गया पल छिन पल छिन

बनकर भूतकाल का अंश

कितनी ही पीङाओं का दे गया दंश

वो तमाम खामियां जो हमने कमायी

कितना खुद को खरच किया

इस कलैण्डर के पन्ने तो बदले

पर परिस्थितियां नहीं

बिना दस्तक दिये आती हैं

उदासी और पीङाऐं

कुछ बन जाती समाचार मौहल्ले का

कुछ बन जाती हैं दुखदायी

यादें उम्र भर की

बन जाती है नासूर

इस गिरमिटिये से जीवन की

और कुछ ढल जाती है

उम्र के त्यौहार सी

बस गुजर रही है

दीवार के कलैण्डर सी

बदरंग ब्यौरेवार सी

हां! ये जिन्दगी।

निशा माथुर


तुम इतना जो मुस्कराती हो,

तुम हरदम इतना जो बिंदास मुस्कराती हो,

लगता है खुद से कहीं खुद को चुराती हो।

शेफालिका के फूल सी निर्झर झरती हो,

पाषाण को भी पारस बन पिघलाती हो,

दर्द मिटाने के कुछ लम्हे उधार देकर…

जमाने को मसखरा बन यूं हंसाती हो।

सजी संवरी सी धूप को धूल चटाती हो,

बेफ्रिक, गर्वीली, निश्चल सी लजाती हो,

वक्त को अपने अंदाजो की हंसी देकर….

नदिया के यूं बहते पानी सी बहती हो।

चंचल चपल नैनों में काजल समाती हो,

शीतल सी प्रणय समीर बन बहती हो,

मन व्याकुल को नैनों की थिरकन देकर…

भावो की चुगली को चेहरे से छिपाती हो।

इतर इतर के कनखी मार शरमाती हो,

खोखली हंसी में हर विषाद छिपाती हो,

चित्रलिखित मिजाज को जीवन रंग देकर…

अपने जज्बे से हार में जीत हर्षाती हो।

तुम हरदम इतना जो बिंदास मुस्कराती हो,

लगता है खुद से कहीं खुद को चुराती हो।


तुम क्यूं हो गये विदा

काश! तेरे नयनों से मेरे, नयनों की बात कर पाती

झुकी हुई बोझिल पलकों पे कुछ ख्वाब सुला पाती,

क्यूं हंसों के जोङे को देख, मेरे प्राण अकुला जाते

आज मेरे देह द्वार तुम दो पल अतीत सजा जाते।

निष्ठुर! तुम क्यूं हो गये विदा, ये तो बतला जाते?

दिल की धङकन देख, तुम्हैं, यूं उन्मादित होती

ये सूनापन ना होता सोचो, कितनी मादकता होती।

पिया विरह ये तङप विरहनी, होंठ कभी मुस्काते,

कैसे शूल चुभे चितवन में, व्याकुल नयना बतलाते।

निष्ठुर! तुम क्यूं हो गये विदा, ये तो बतला जाते?

सांसों में गुम होती सांसे, भीगी भीगी प्रीत निभाती

सौभाग्य की पहचान बताती, माथे सिन्दूर सजाती,

शतदल सी गोरी कलाई, तुम हरी चूङीयां लाते,

कान्त, अभिमंत्रित फेरो के, कितने ही वचन निभाते।

निष्ठुर! तुम क्यूं हो गये विदा, ये तो बतला जाते?

उर में छिङती नयी रागिनी, अलसायी संध्या गाती,

खिलती काले गेसू के जादू, महुवा मनवा भटकाती।

मैं अमावस सी घिर घिर जाती, तो तुम मेघ बरसाते,

अंध गर्त से जीवन को भी, रतरानी सा महका जाते

निष्ठुर! तुम क्यूं हो गये विदा, ये तो बतला जाते?

ले जाते निज याद तुम्हारी, हदय मेरा मुझको दे जाते

मेरी पीर भरी व्यथा लेकर तुम, मेरे त्यौहार दे जाते।

मौन बन गया प्रश्नचिन्ह सा, क्यूं मेरी पूजा ठुकराते

इसी जनम में छोङ गये, क्या सातों जनम निभाते।

निष्ठुर! तुम क्यूं हो गये विदा, ये तो बतला जाते?

निशा माथुर


वो इठलाता सा चला आया ।

कल जब लौटी थी तुझसे बिछुङ के,

भरे भरे मन से सुबह ने इंतजार कराया

आंगन की खिली खिली धूप हंसके बोली

लो देख! वो इठलाता सा चला आया।

वो यादो की पुरवाई जिगर से उतर गयी

मेरी आखों की नमी ने अहसास कराया

और पलकों के कोरे ढुलक कर यूं बोले

लो देख! वो इठलाता सा चला आया।

दबी दबी हंसी मे कुछ ख्याल खनके,

मेरी बेखुदी को लबों ने खामोश कराया

फिर हौठो की चुप नजरों से यूं बोली

लो देख! वो इठलाता सा चला आया।

एक भीनी भीनी खूश्ब लिपट सी गयी

तेरे आसपास होने का आभास कराया

और हवा का झौका कानों मे यूं बोला

लो देख! वो इठलाता सा चला आया।

तेरे ख्वाब मेरी नींदो से दोस्ती करके

चाँद बनकर मेरे आंगन मे उतर आया

फिर बंद खुली आंखो का सपना बोला

लो देख! वो इठलाता सा चला आया।

तेरा जिस्म ओढ के मै क्यूं इतरा गयी

फकत मेरे वजूद पे तूने एतबार कराया

और तुझ पे मेरा यकीन मुस्कराकर

बोला लो देख! वो इठलाता सा चला आया।

पागल सी ढूंढ रही हूं तुझको याद करके,

जहां जा रही हूं तू रास्ता बन चला आया

फिर हर मोङ पे मेरे दिल की सदा बोली

लो देख! वो इठलाता सा चला आया ।


वो लिपटी हुयी दुआ

बनके दुआ वो लिपट-लिपट जाती है, जब-जब मेरे आंचल से,

मैं जब उर्दू में गजल कहती हूं, वो हिन्दी सी फिर मुस्कराती हैं।

वो मगृनयनी सी जब तकती है, बङे भोलेपन और मासूमियत से,

क्या कहूं की उसकी आंखे मुझे, सारे काशी गंगा-तीरथ कराती हैं।

मेरी ये बुनियाद ना हिल जाये, कभी यूं ही किसी नमी के आने से,

कोशिशे मेरी सारी उसके लिये, मेरे अश्को को भी छिपा जाती हैं।

दुआ है, वो मेरी तरह ही पाकदिल, नेकसीरत, गोया चंचल सी हो,

उसके दिल की खूबसूरती मेरे गुलशन पे जां निसार कर जाती हैं।

छूकर गुजरे उसकी अटखेलियां मेरे आंगन पे फिर दुआ बन बनके,

क्या बताऊं उसकी धङकन, हमें हमारी मौत से भी हरा देती हैं।

बरसों बरस जो मांगी थी दिल से, मासूम सी मन्नत और दुआ है वो,

वो हमारी जमीन, हमारी छत, आसमां तक का अहसास करा जाती है।

चूमती हूं जब भी उसका माथा, हजार बलैया ले कर कभी लाङ से,

मन से और मेरी ख्वाहिशो से लिपट, मुझे वो फरिश्ता बना जाती हैं।

थाम उसकी अंगुली कहां तक ले चलूं, मैं उसे जिन्दगी के सफर में?

दुनिया की बेदर्द सरगोश हवायें मुझे, रूह तक से फिर डरा जाती हैं।

दुआ है मेरी मिल जाये उसे जीवन की वो हर चीज दुआ करने से ही,

फिर खुद दुआ को, दुआ के लिये, उसके हाथों की जरूरत पङ जाये!!!!


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