#Kavita by Sanjay Ashk Balaghati

पंगे हो गये धर्म को लेकर देश मे दंगे हो गये फैशन के नाम पर लोग नंगे हो गये। करोडो जनता का खून चूस चूसकर अपने यहां के नेता भले-चंगे हो गये। वो लुटे देश तो कोई फर्क नही पडता हमने मांगा हक तो भीखमंगे हो गये। कुछ तो सुधार अपने बरताव मे करो कब तक कहोगे कि लोग बेढंगे हो गये। मंहगाई के दौर मे ईमान बीक जाते है जो थे सत्यवादी अब वो…

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"#Kavita by Sanjay Ashk Balaghati"

#Muktak by Jasveer Singh Haldhar

–जिंदगी ——————- जन्म मृत्यु का सिलसिला अनवरत चलता रहेगा ।। सुबह दिनकर निकलकर शाम को ढलता रहेगा ।। ना बच पाया है कोई माया के जंजाल से । जिंदगी से जिंदगी का दीप ये जलता रहेगा ।। हलधर -9412050969

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"#Muktak by Jasveer Singh Haldhar"

#kavita by Dr. Prabhat ‘Pagal’

“गधा” ————;———– ये भी गधा है ,तो वो भी गधा है , समां देखो चहुँ ओर कैसा बंधा है | पहुँच देखो उसकी,कहॉ से कहॉ तक , चुनावों में भी तो, वो ही खड़ा है || बहकाउ,भड़कीले भाषण में वो है, अखबार,टी.वी. के आखर में वो है | सर उसका ऊँचा,जिसनें किया है, सत्ता के आज,सिंहासन में वो है || किसे हम शह दें, किसे मात दें दें , इधर भी है खाई,उधर भी कुआँ…

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"#kavita by Dr. Prabhat ‘Pagal’"

#Gazal by Adil Sarfarolsh

तीरगी  का मिजाज़ बदला तो करो तुम चिरागों की तरह जला तो करो जीत जाओगे दुनियां की हर जंग दिल से एक बार हौसला तो करो सब  तुम्हारे  दीवाने  यहाँ हो जायेंगे तुम गुलाबों की तरह खिला तो करो काम बनते हैं मिलने से आदिल दोस्तों से अक्सर मिला तो करो जो नशे  में  सब कुछ भूल जाते हैं ऐसे यारों से कुछ फासला तो करो बहुत हो चुकी हैं यहाँ सरगोशियाँ हैं  गुज़ारिश कोई…

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"#Gazal by Adil Sarfarolsh"

#Gazal by Sudesh Dikshit

बताओ इस कदर चुप कब तक रहोगे, बताओ ज़हां के तीर कब तक सहोगे । बहरे,गुंगे बन कर कहां कटेगी ज़िंदगी, जुवां अब न खोली तो फिर कब खोलोगे । इल्ज़ामों,ठोकरों तले नहीं कटेगी ज़िंदगी, खुद पर लगे इल्ज़ामो को कब तक सहोगे । ज़िंदगी को हकीकत में जी कर दिखाओ, ख्वावों की रवानगी मे कब तक बहोगे । तेरी खामोशी होंसला उनका बढा देगी, जो अब न कहा तो फिर कब कहोगे । बदल…

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"#Gazal by Sudesh Dikshit"

#Kavita by Rashmi Badwar Namdev

ऐ गऊ तुम हो मात हमारी। समझो मन की पीढ़ा सारी। देखो न अब फागुन भी आया। और बसंत कुंजों पर छाया। लेकिन राधा अब तक है रूठी। पर हृदय से मेरे कभी ना छूटी। कह दो मां तुम उसको जाकर। कन्हाई पुकारे मिल ले आकर उसको मीठी तान सुनाऊं, राधा को  किस भांति मनाऊं? नैनों में रहती पुतली बनकर, कयूं न समझती रहती तनकर। हे मां तुम उसको समझा दो, व्यथित हृदय की पीर…

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#Kavita by Madhu Mugdha

दरकती उम्मीद अक्सर सोचती हूं ….. मेरे एक पेज जज्बा कि ब्यथा ………… उम्र का ये अन्तराल है रेगिस्तानी  पड़ाव जंहा कई इच्छाये जन्म लेती है अन्दर एक मृगत्तृष्णा सी रहती है कहीं कुछ ना कर पाने की चुभन और भी बहुत कुछ शायद कर पाते या करते , और दरकती है उम्मीदे लेकिन फिर एक उम्मीद चलो कोई बात  नही अभी भी कर सकती हूं एक काश सा दिल मे रहता है शायद अब…

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"#Kavita by Madhu Mugdha"

#Kavita by Md Juber

जब से आईलो छे फ़ोन (एक दिहाती कविता) जब से आईलो छे फोन मन करे छे ओन-बोन हैं गे माई आबे की करबे मनो न लागे छे मन करे छे ओन-बोन….. दिल मे बेचैनी होवे छे मनो मे खलबली मचे छे रातो मे नींद न आवे छे रात भर करवटे बदले छिये है गे माई आबे की करबे मनो न लागे छे मन करे छे ओन-बोन जब से आईलो छे फोन मन करे छे ओन-बोन….…

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"#Kavita by Md Juber"

#Lekh by Dr.Arvind Jain

सहिष्णुता और अनेकान्तवाद वर्तमान में भारत में शब्दों के बाणों का इतना अधिक  उपयोग हो रहा जिससे आपसी कलह बढ़ रहा हैं कारण कोई किसी की बात को आदर नहीं देता और सब अपनी अपनी बात पर अड़े हैं और सब सही हैं .जैसे आधा गिलास भरा हैं और आधा खाली हैं .पांच अंधे हाथी को छूकर बताते हैं की यह खम्बा जैसा हैं ,कोई कहता पंख जैसा हैं ,कोई कहता रस्सा जैसा हैं .…

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"#Lekh by Dr.Arvind Jain"

#Kavita by Kishor Chhipeshwar Sagar

कही जाँच कही पड़ताल हो गई हद हो गई शहर में हड़ताल हो गई सोचा था अब तो अच्छे दिन आएंगे आम जनता ही बेहाल हो गई व्यापार पड़ गया ठंडा सरकार शायद मालामाल हो गई छिड़ गई है जंग राजनीती में वाह ये राजनीती भी कमाल हो गई किसान कर रहा है आत्महत्या गरीबी भी सवाल हो गई वो लगे है भाषणबाजी में आम जनता किस तरह बेहाल हो गई -किशोर छिपेश्वर”सागर”

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"#Kavita by Kishor Chhipeshwar Sagar"

#Kavita by Chandrakanta Siwal ‘chandresh’

नव  परिवर्तन  का दौर है नयी आशाओं की भौर है बच्चा  ये कुछ बोल रहा है बातों को कुछ तोल रहा है अपने मत का मान बढ़ाना बापू  तुम ये भूल न जाना नयी  आशाओं की भौर है नव  परिवर्तन  का  दौर है प्रयास प्रखर  हो गगन चूमे सोच में अपनी नभ विस्तार दे उम्मीदों को नयी दिशा मिले जननी जन्मभूमि को मान दे नयी  आशाओं की भौर है नव  परिवर्तन  का दौर है शापित…

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"#Kavita by Chandrakanta Siwal ‘chandresh’"

#Muktak by Devendra Kumar Dubey

माँ भारती के मान का,अभिमान हैं ये बेटियाँ, इस धरा के गान का,स्वाभिमान हैं ये बेटियाँ, दो कुलो में साथ रह,दीपक जलाती प्यार का माता-पिता के प्यार का, सम्मान हैं ये बेटियाँ, #_____देवेन्द्र

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"#Muktak by Devendra Kumar Dubey"

Kavita by Harprasad Pushpak

मेरी मातृ भूमि … जिसके हृदय में राष्ट् का अभिमान नही हो। उस देश द्रोही का कहीं सम्मान नही हो ।। ये मातृ भूमि है मेरी भूभाग नही है । सदियों से मेरे देश की पहचान  यही है ।। देवों की भूमि सुरसरि की धार यहीं है। गो माता की आराधना का सार यहीं है ।। मर्यादा जिसे राष्ट् की स्वीकार नही हो । उस देश द्रोही का कहीं सम्मान नही हो ।। युग युग…

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"Kavita by Harprasad Pushpak"

#Kavita by Dr. Pratibha Prakash

उम्र बीत गई झुर्रियां आ गई काश ये तब समझ लिया होता! समय का वहाव ही है सब अपनों के दिए घाव ही हैं सब सत्य तो बस सनातन है मानव हृदय माटी का बर्तन है भागमभाग तेजी से तेज हे मानव क्यों हुआ तू निस्तेज? जीवन के उद्देश्य खो चुके है यथार्थ भाव के अर्थ खो चुके है सत्य पर आरूढ़ है असत्य का सिंहासन कहाँ डोलता अब कोई इंद्रासन? कौन सा ज्ञान कैसा…

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"#Kavita by Dr. Pratibha Prakash"