#Kavita by Lata Rathore

Tum Suraj ki pehli kiran ki tarah ak umeed ban kar aae ho… Tum is nadi k lie athaah sagar banke aae ho… Barish ki pehli boond ki tarah muje bhigane aae ho… Is banjar jameen par preet k phool khilane aae ho… Is taapish mai nadi ki thandi dhar banke aae ho….. Tum is saanj k sooraj banne aae ho… Adhuri hai Jo baati uske Deepak banne aae ho… Tum is panchi ka khula…

Share This
"#Kavita by Lata Rathore"

#Kahani by Rajender Palampuri

” माँ ~~~~~~~” एक ऐसा अतुलनीय शब्द , जो कानों में पड़ते ही बस मिसरी सा रस घोल देने की क्षमता रखता है !  मां किसी भी भाषा या फ़िर बोली में कहा जाने वाला सबसे मीठा लफ़्ज़ है ! स्वार्थ का तो इसमें दूर-दूर तक का भी रिश्ता नहीं है ! और न ही कोई अन्तर जानता है यह लफ़्ज़ ! बस एक यही बह ऐसा शब्द है जिसमें लिंग , जाति ,धर्म ,…

Share This
"#Kahani by Rajender Palampuri"

#Kavita by Anita Mishra

चक्रव्युह – सारा  जीवन ही ही चक्रव्युह , टूटती संवेदना मरते विचार, खोखली मुस्कान , बोझ सी सांसे , किसे -किसे भेदोगे मन बोलो क्या चक्रव्युह टूटेगा तुमसे ? सब जगह बाजार है कीमत लगाते “रिश्तोकी”” प्यार की, जान की बेमानी सी जीते लोग मानो किसी पेड़ के सुखे ठुंठ हो दे पाओगे उन्हें जीने की हरियाली मन बोलो च्क्र्व्युह टूटेगा तुमसे ? छिनता बचपन – बिगड़ता यौवन बेसहारा बुढापा ,सिसकते सपने सब फंसे है…

Share This
"#Kavita by Anita Mishra"

#Kavita by Sanjay Kumar Avinash

नक्सली कौन हाँ, मैं नक्सली हूँ दर्ज करो मेरे नाम गुनाह सैकडों में हजारों में करोडों में हथौडी संग मांझी कुदाल संग सदा चाकू संग चमार मुमताज जैसी फाल्गुनी। पहाडों को चीर दिया रेलों को उडा दिया थानेदारो से निपट लिया नेताओं को समझ लिया। मेरी लाश नहीं जलती बच्चे स्कूल नहीं पढते मांएं अस्पताल नहीं जाती। दर्ज करो मेरे नाम गुनाह सुगिया बुधिया छविलिया शहरी ने लूटा थानेदारो ने झडपा जेलों में बच्चा जन्मा।…

Share This
"#Kavita by Sanjay Kumar Avinash"

#Kavita by Brij vyas

” है विकास में देर अभी ” !! हरियाली सब और नहीं है , हरा भरा सब छोर नहीं है ! यहाँ प्रकृति जी भर देती , रूठा मौसम ठौर नहीं है ! बैलगाड़ी है ,बैलजोड़ी है – खाते रूखा कोर अभी !! जल संसाधन थोड़े थोड़े , हम तो सदा रहे निगोड़े ! भूमि उर्वर रही नहीं है , खर्च न्यून पाई पाई जोड़े ! अच्छी फसल दाम कम मिलते – बिगड़ी फसल नुकसान…

Share This
"#Kavita by Brij vyas"

#Gazal by Vikas Pal

अपने मित्र दीपक कुमार कुशवाहा को समर्पित—— बहस थी– ऐसा नहीं वैसा नहीं है। जो भी जैसा दिख रहा वैसा नहीं है। तअज्जुब है कि पुतलों के जहाँ में कोई पुतला आदमी जैसा नहीं है। ज़िल्लती है ज़ाबिता से आँख बाँधे मत पूछिए ये मज़हबी कैसा नहीं है। दोस्ती निभती नहीं है दोस्तों को विदा कह दूँ पास में पैसा नहीं है। किरणे कुहासा भेद करके आयँगी धुंध  ही छायी रहे ऐसा  नहीं है। ——विकास…

Share This
"#Gazal by Vikas Pal"

#Kavita by Kewal Krishan Patak

सयमित जीवन बिताना लक्ष्य है इंसान का पर असयंमित जीवन को है बिताता आदमी हो गया स्वाधीन है पर मानता पराधीन है एसे वातावरण में खुश रहना चाहता आदमी आज तो लगता है ऐसा आदमी निस्वार्थ है धोखा दे के राज्य करना चाहता है आदमी लगता जैसे आदमी हर हाल में रहता है खुश पर विवश हो जिंदगी के दिन बिताता आदमी ढेर सारी वस्तुएं हैं ऐश-ओ – इशरत के लिए पैसा पानी की तरह ही…

Share This
"#Kavita by Kewal Krishan Patak"

#Kavita by Ved Pal Singh

ये नज़ारे मुझे रास नही आते……….. जब अपने हुए दूर और वो पास नहीं आते, महफ़िलों के ये नज़ारे मुझे रास नही आते। मैं किसको जा सुनाऊँ अपने दिल का दर्द, धड़कनें सुस्त पड़ गयीं साँसें हो गयीं सर्द। दूर तलक वो चेहरे नज़र खास नही आते, महफ़िलों के ये नज़ारे मुझे रास नही आते। अब अपनी नही खबर अपनों का नही पता, ना मेरी कोई भूल है ना उनकी ही थी खता। क्यूँ अपने…

Share This
"#Kavita by Ved Pal Singh"

#Kavita by Neeraj Dwivedi

राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति अभी अभी राष्ट्र वाद मिला था मैंने परिचय पूंछा तो बोला मै नेताओं का भाषण हूँ मैं पी एम का अभिभाषण हूँ मैं संसद का सिर्फ विचार हूँ मैं देश का बेरोजगार हूँ मैं नेताओं का वादा हूँ मैं भृष्टों का इरादा हूँ मैं पहले भी एक जुमला था मै आज भी एक जुमला हूँ पहचाना नही , मैं राष्ट्र वाद हूँ मैने जवाब दिया : तुम हिंदुस्तान की ताकत हो देश…

Share This
"#Kavita by Neeraj Dwivedi"

#Kavita by sanjay verma ‘drushti’

मनोकामना ठंडी हवा मचलकर न चल वसंत की आबो हवा कही चुरा न ले जिया बैचेन तकती  निगाहे मौसम में देखती दरख्तों को सोचता मन कह उठता बहारे  भी जवान होती वे सजती संवरती दुल्हन की तरह झड़ते पत्ते गिर कर आ जाते मेरे पास प्रेम पत्र की तरह प्रेम  गीत गुनगुनाने चले कोयल की मिठास संग नादान  भँवरे धड़कने बढ़ जाती प्रेमियों की जाने क्यों जब जब बहारे आती /जाती बांधी थी कभी  मनोकामना…

Share This
"#Kavita by sanjay verma ‘drushti’"

#Gazal by SHANTI SWAROOP MISHRA

ये अजीब सा ही, मौसम हो चला है आज कल ! आदमी का धीरज, ख़त्म हो चला है आज कल ! दिल में तो ख्वाहिशें सजी हैं सब कुछ पाने की, मगर आदमी क्यों, बेदम हो चला है आज कल ! जिधर भी देखते हैं उधर सियासत का खेल है, फिरकापरस्ती का, मौसम हो चला है आज कल ! सियासत के आँगन में तो हो सकता है कुछ भी, जाने क्यों आदमी, बेशरम हो चला…

Share This
"#Gazal by SHANTI SWAROOP MISHRA"

#Kavita by Alok Trivedi

मानव है कस्तूरी मृग, फिरे है ढूंढे ज्ञान अपने मन की आत्मशक्ति का इसे नहीं है भान लगा है दुनिया की खींचतान में खोकर सब सम्मान चाहे तो पत्थर को हीरा कर दे या मिटा दे नाम-ओ-निशान लगा है दुनियादारी में रोजी में बेकारी में बच्चों में और नारी में, रातों की तैयारी में जेब भरी या खाली है, पल पल यही सवाली है क्या पायेगा ये सब पाकर, ये है थोथा मान मानव है…

Share This
"#Kavita by Alok Trivedi"

#Lekh Samiksha by Ramesh Raj

डॉ. गोपाल बाबू शर्मा की कविता-यात्रा +रमेशराज ———————————————————————– प्रसिद्ध व्यंग्यकार और जाने-माने कवि डॉ. गोपाल बाबू शर्मा विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं। कविता उनके लिए मनोरंजन का एक साधनमात्र नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों, शोषित-लाचारों की दुर्दशा, दयनीयता और घृणित व्यवस्था से उत्पन्न अराजकता, विसंगति और असमानता को भी प्रमुखता के साथ अपना विषय बनाकर चलती है। जहां भी जो चीज खलती है, कवि उसके विरुद्ध खड़ा होता है और वसंत या खुशहाली के सपने बोता…

Share This
"#Lekh Samiksha by Ramesh Raj"

#Kavita by Ram Chandra Azad

आज के नेता ये चुनावी गीत है जी आप भी तो गाइए | वोट हमें दीजिए और हमीं को जिताइए ||  हम तुम्हारे हमदर्द व हम तुम्हारे सिरदर्द | दर्द की दवा तो तुम  हमीं से ले जाइए ||  रूपये ले लीजिये या कम्बल वसन लीजिये | वोट देकर ये हिसाब जल्दी  से चुकाइए  ||  घर तो हम बनायेंगे ही सड़क भी बनायेंगे | टोल टेक्स देकर मोटर खूब तुम चलाइये ||…

Share This
"#Kavita by Ram Chandra Azad"

#Kavi9ta by Shambhu Nath

भवरे मंडराते अब फूलो पर ॥ हवा बहे स्वछन्द ॥ कलियां महक विखेर रही है ॥ मौसम आया बसंत ॥ चिड़िया कलरव शुरू किया है कोयल गीत सुनाती ॥ मोर मतवाला होके नाचे ॥ ऋतू बसंती भाती ॥ रंग विरंगे रंगे है उपवन ॥ छाया है  आनंद ॥ कलियां महक विखेर रही है ॥ मौसम आया बसंत ॥ लौकिक छटा निहारे अम्बर ॥ धरती माँ मुस्काती ॥ मधुर मिलन होने वाला ॥ खड़ी शोभा सकुचाती…

Share This
"#Kavi9ta by Shambhu Nath"

#Muktak by Mithilesh Rai Mahadev

आज भी मैं तेरी राहों को देखता हूँ! बेकरार वक्त की बाँहों को देखता हूँ! जुल्मों सितम की दास्ताँ है मेरी जिन्दगी, आरजू की दिल में आहों को देखता हूँ!

Share This
"#Muktak by Mithilesh Rai Mahadev"