#Gazal by Arun Sharma

गजल ___ कृष्ण मिल रहे राधा से जो इस होली में लग रहा रंग गालों पर हंसी ठिठोली में विराग कलुष पाप छोड़ प्रह्लाद हम बनें खुश रहे सब ग्वाल बाल मीठी बोली में अपना धर्म है नेकी करना कर रहे हैं भर रहा ईश्वर खुशियाँ सबकी झोली में लगन लगी गोरी के गाल संग गुलाल की सजें भाल गोपियों के कुमकुम रोली में चलो दुश्मनों अब नई शुरुआत करते हैं गले मिल लिये दिल…

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"#Gazal by Arun Sharma"

#Kavita by Tara Singh

” सखी री कैसे खेलु रंग ” सखी री कैसे खेलूं रंग हृदय में बाजे न मृदंग प्रीति बिन सुनी आंखे यह मौसम है बदरंग सखीरी कैसे खेलूं रंग ! जिया अकुलाय बिना उनके नउठे कोई तरंग सखीरी कैसे खेलूं रंग ! मधुमती एक कली के बौराये मदमाते अनंग सखीरी कैसे खेलो रंग ! ” तारा सिंह अंशुल “

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"#Kavita by Tara Singh"

#Kavita by yasmeen khan

क्षणिकाएँ शब्द बह्म हैं मुखरित होकर भेद बतायें दर्शन सँजोकर। ——————/// सम्वेदना है गहन विचारशैली आंदोलित करे तन , मन सहेली। ———–/// अभिनय ऐसा शर्मा जायें ऑस्कर विजेता भी गश खा जायें। ———–/// हर भली बात दिल को छूती है भाव उकेरना भी साहित्य आहुति है।

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"#Kavita by yasmeen khan"

#Kavita by Dr. Yasmeen Khan

अकेलापन’ अकेलापन भी अकेला कहाँ होता है ख़ुद में समेटे रखता है करोड़ अहसास बीते ज़माने की धमाचौकड़ियां हँसी,मज़ाक़ों की फुलझड़ियां मुस्कानों का अथाह भंडार ज़िंदादिली,जज़्बातों,मोहब्बतों हमदर्दियों का सार भीड़ भी अकेलापन दूर नहीं कर पाती अकेलापन कभी अकेला होने की मोहलत नहीं देता हर घटना मस्तिष्क पटल पर चलती है चलचित्र की भाँति जितनी तेज़ी से विचार पटल पर घटनाएँ फ़्लैशबैक में चलती हैं उतनी ही बढ़ती है चिढ़चिढाहट खिसियाहट, ख़ालीपन की आहट जितना…

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"#Kavita by Dr. Yasmeen Khan"

Kavita by Vinita Rahurikar

मत जलना कभी…. मत जलना कभी चूल्हे की लकड़ियों की तरह दूसरे का पेट भरने के लिए और खुद राख हो जाना। फिर अपनी राख से किसी की झूठन माँजना और उस झूठन का भार लिए नाली में बह जाना। जलना तो दीपक की तरह तम को हरना, जलना तो अपनी आग से बुराई के रावण को राख करना। डॉ. विनीता राहुरीकर

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"Kavita by Vinita Rahurikar"

$Kavita by Vikram Gathania

शब्द की इज्जत शब्द की इज्जत होती है होनी भी चाहिए शब्द की इज्जत कभी दाँव पर भी लग जाती है शब्द की इज्जत ! किसी के कहे या लिखे हुए शब्द भले पत्थर पर की लकीर न होते हों पर कहने से या लिखे जाने से वे उसके हो जाते हैं शब्द इतने सर्व सुलभ होते  हैं ! शब्द की इज्जत महज वादा निभाना भी नहीं होता झूठे न पड़ते हों शब्द स्वार्थ आड़े…

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"$Kavita by Vikram Gathania"

#Kavita by Annang Pal Singh

होली ! सद्भावों के रंग बिखेरो, बचो कलुषता कीचड़ से  ! इस होली में दोष जलादो, दुर्गुण दूर करो जड़ से !! बदबू कीचड़ खेल बनगई, अब सुगंध का नाम नहीं ! फैल रही दुर्गंध चहूँदिशि , लगातार अविराम यहीं   !! किससे कहें सने हैं सबके,हाथ यहाँ पर कीचड़ से  ! इस होली में दोष जलादो,………….. सबके कपड़ों पर ,चेहरों पर,दाग इसीके दिखते हैं  ! बिना मोल के दुर्विचार भी बाजारों में बिकते  हैं  !!…

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"#Kavita by Annang Pal Singh"