#Kavita by Anupama Srivastava Anushri

“ रंग ” बाहर रंगों के मेले हों ना हों, दिलों में रंग खिले-खिले हों नीला रंग ओढ़ लेती हूं, लगता आसमां साथ चल रहा है सफेद पैरहन पंछियों की टोलियों में उड़ा देता है धानी धरा के हरीतिमा समों, उसी की तरह औघड़ दानी बना देता है गुलाबी, मासूम परियों की, लज़ीली मुस्कुराहट से सज़ा देता है तो गेरुआ मन पर दस्तक दे रूह छू जाता है लाल रंग जीवंत कर जाता है ,…

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"#Kavita by Anupama Srivastava Anushri"

#Kavita by Vinita Rahurikar

तुम जन्म दो अब…. *** छोड़ा, बहुत हो गया क्या सोचना, कितना रोना पुरुष के अहम् से अपने जीवन में उपजे दर्द पर। तुम जन्म दो अब अपने स्वाभिमान को जरा मन की धरती पर, पालो-पोसो अपने अंतर में इतना ऊँचा उठाओ उसे कि तुम्हारी विश्वास भरी एक दृढ़ मुस्कुराहट से, और आत्मविश्वास भरी एक दृष्टि के सामने खण्ड-खण्ड बिखर जाये उसका झूठा दम्भ।।

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"#Kavita by Vinita Rahurikar"

#Kavita by Vikram Gathaniya

घूरे तुमने देखें ही होंगे कितने ही घूरे अबाँछित होते ही कहीं तुम बदलते हो जगहें जब तुम्हें कतई चिंता भी नहीं होती कि तुम ढूँढो कोई घूरा रोटी की चिंता तुम करते हो कहीं भी होते हुए इसलिए एक दिन तुम्हें दिख ही जाता है एक घूरा संयोगवश कि तुम  रख सको तुम्हारा टिफिन धूप में और तुम प्रासंगिक  होने लगते हो उस नयी जगह !

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"#Kavita by Vikram Gathaniya"

#Kavita by Sudesh Kumar Dikshit

साजिश किसकी थी छेद कर कश्ती डूवोने की साजिश किस की थी, तुम नहीं शामिल नहीं तो साजिश किस की थी । सब अपने ही सबार थे कोई गैर न था, फिर माझी को डराने की साजिश किस की थी । जान कर भी न जाने क्यों चुप हो तुम, बता घर ढाहने की साजिश किस की थी । दिल अगवा कर छुपा लिया चुपके से, वता दिल चुराने की साजिश किस की थी ।…

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"#Kavita by Sudesh Kumar Dikshit"

#Kavita by Uday Shankar Chaudhari

बार-बार यह देश हमारा अपनों से हीं हारा है भारत तेरे टुकड़ें होंगे ये ( जे एन यू ) का नारा है ~~ मत पालों गद्दारों को अब दुध पिलाना बंद करो देश की मेहनत के पैसे अब उन्हें खिलाना बंद करो ~~ आत्मशक्ति आह्वान करो इतिहास बदल तुम सकता है गर ठान लिया तो काश्मीर लाहौर छीन तुम सकता है ~~ उससे पहले घर के अंदर साफ करो गद्दारों को काश्मीर से भेड़िए (जे…

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"#Kavita by Uday Shankar Chaudhari"

#Kavita by Mukesh Marwari

एक व्यंग्य “कोयले की करतुत” एक नेता जी सुबह ही सुबह आग में लकड़ी झोक रहे थे | शायद हाथ शेक रहे थे | सफेद लिबास में काले चरित्र को ढ़के हुए | मुँह में गुलकन्द का पान चबा रहे थे | जो उनके चरित्र को नगां करे उसे ही दबा रहे थे | उनकी चाल में जबरदस्त रौब था | तभी तो जनता में उनका खौफ था | चेहरे पर घोटालों कि रेखा साफ…

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#Kavita by Shailesh Kumar Singh

माँ का आँचल। स्नेह से भरा , प्यार से सराबोर । माँ तुम सबसे निर्मल पावन चरण जरा दे धो दू माँ । अमृत उस जल को माथे पर तिलक सजा कर बोलू माँ। बहन दिया  पत्नी भी अब बेटी की बारी है , कैसे मैं गुणगान करू जिस छवि से दुनिया सारी है। एहसान नहीं चूकता कर सकता मैं इस जनम में माँ। बस एक एहसान और कर देना। तुम मेरी माँ बनना हर…

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"#Kavita by Shailesh Kumar Singh"

#Kavita by Sulaxna Ahlawat

सीता के रूप में मेरी अग्नि परीक्षा लेते हो, द्रौपदी रूप में जुए के दांव पर लगा देते हो, फिर भी तुम महिला दिवस मनाते हो। कभी सती के नाम पर चिता में जला देते हो, कभी जौहर के नाम पर अग्नि में कूदा देते हो, फिर भी तुम महिला दिवस मनाते हो। खरीद लेते हो लगा कर कुछ दाम मजबूरी का, बना कर रखते दासी, लेते हो काम मजदूरी का, फिर भी तुम महिला…

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"#Kavita by Sulaxna Ahlawat"

#Gazal by Adil Sarfarosh

किस ने निभाया है साथ वफादारी से सबने लूटा है मुल्क को बारी-बारी से सबकी फितरत में है बस दर्द देना कौन पेश आया है यहाँ खुद्दारी से हम क्या ये जहाँ तेरे साथ हो जाए अमा एक बात तो करो दमदारी से न जाने कब बिगड़ जायें मुल्क के हालात- सब लिए बैठे हैं खंजर देखो बड़ी तैयारी से मैं कैसे मान लूं वो बदल गया है आदिल गद्दार कभी बाज़ भी आया है…

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"#Gazal by Adil Sarfarosh"

Lekh by Dr. Arvind Jain

पुनः मूषको भव- एक किवदन्ति सुनी थी की एक गरीब आदमी की इच्छा थी रईस बनने की ,उसने बहुत प्रयास किया पर सफलता नहीं .एक दिन वह निराश होकर आत्म हत्या करने  का सोचा ,उसके शहर में एक आत्म हत्या या ख़ुदकुशी करने का स्थान था .वहाँ बहुत आत्महत्याएं होने के कारण सरकार ने वहां पर एक चार की गार्ड लगा दी थी. वह बेचारा गरीब आत्म हत्या का साहस लेकर चोरी छिपे जा रहा…

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"Lekh by Dr. Arvind Jain"

#Kavita by Jasveer Singh Haldhar

युद्ध के बाद मेवाड़ महल देखा ,मांथे पै चिंता की रेखा । मात भूमि आजादी का प्रण दोहराय था ।। देश पराधीन हुआ ,मुग़ल अधीन हुआ ।। सोच सोच राणा जी का मन भर आया था ।। दृग में अंगार लिए ,युद्ध का संघार लिए । क्रोध ने ही क्रोध को ही ढाढस बंधाया था ।। मेवाड़ का जन गण ,हल्दी घाटी कण कण । मात पराधीनता के शोक में समाया था ।।

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"#Kavita by Jasveer Singh Haldhar"