#Kavita by Shambhavi Mishra

महाभुजंगप्रयात सवैया 122 122 122 122,122 122 122 122 विषय -सवेरा,भोर नई भोर जागो सिया राम बोलो, गई रात काली नया हैं सवेरा। उठो जाग जाओ निराशा तजो तो, भरो नैन आशा बसाओ बसेरा।। सभी राह देखो खुले सामने हैं, चुनो राह नेकी यही धर्म तेरा। हमारी धरा देश झूमें ख़ुशी से, रहे प्रेम होवे न तेरा न मेरा।। शाम्भवी मिश्रा

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#Kavita by Mahesh Bansal

आज मन में कुछ इस तरह आया। बदल गये कुछ नहीं बदला है बस हाकिम बदल गये, गाड़ियों पर लगे हुये बस परचम बदल गये। कभी गोरे थे अब काले अंग्रेजों का राज है, लुटने वाले तो वही हैं बस लुटेरे बदल गये। २ सी रहे हैं कैसे लोकतंत्र में अब हम जी रहे हैं , अपने ही अब हमारा लहू पी रहे हैं। सियासत दे रही है जख्म रोज नये, बेबस होकर के हम…

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#Kahani by Shuchi

एक लघु कथा… अश्कों की जमा पूंजी— आज बहुत दिनों बाद वो मायके आयी थी।एक ही शहर में विवाह, माँ-पापा ने ये सोच किया था कि बेटी से मिलते रहेंगे। शादी की पहली रात ही पति ने मुँह दिखाई में ये हिदायत दी थी कि मायके को भूल जाओ,ज्यादा नहीं जाना,नये घर को अपनाने में दिक्कत होगी,रोज जाने से सम्मान भी कम होता है।चुपचाप सुनती रही थी वो और पति के सोते ही नम आँखों…

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#Shayari by Amit Omar

बुजुर्गो की दुवाओ का असर ढलता नही देखा दिलो में द्वेष बच्चो के लिए पलता नही देखा यही वो लोग है जो कर रहे है घर तेरा रोशन चरागों से किसी का आशियाँ जलता नही देखा अमित ओमर कानपुर 09935367640

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#Kavita by Kapil Jain

भोर की किरणें और उजाला निशा के चुंगल से जैसे बंद खिड़की के शीशे से होकर मुझ तक आ रही हैं क्या वैसे ही मेरे विचारों की ऊष्मा और गहनता तुम्हारे मन तक पहुँच पाएगी मेरा रोम-रोम जिस तरह जी उठा है किरणों के आगमन से क्या तुम्हारा मन भी अकुरिंत होता है मेरे इन भावुक शब्दों से जैसे ये किरणें मेरे अंतर्मन को सहलाती हैं क्या मेरे विचारों का दिवाकर तुम्हारे कोमल ह्रदय को…

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#Kavita by Tej Veer Singh Tej

हक़ *** हक़ मांगने गए तो बड़े शोर हो गए। इल्ज़ाम ये लगा कि मुंह जोर हो गए। क़ायम रहा ईमान उनका देश बेचकर। हम रोटियाँ चुरा के बड़े चोर हो गए। खा-खा के कसम वोट मांगते जो दिखे थे। जीते तो पांच साल को फिर मोर हो गए। चंदे पे लड़ चुनाव जो पहुंचे असेम्बली। अगले ही साल वन टू का फोर हो गए। सीमा पे इक जवान था छुट्टी को तरसता। नेताजी बीस…

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#Kavita by Sudhanshu Dubey

मेरी प्यारी बुढ़िया दादी अजब है दादी फितरत तेरी गजब है दादी फ़ितूर तेरी अब इससे ज्यादा बोलु मैं क्या? जीवन की तस्दीक भी तुझसे और जीने का सलीका भी तुझसे नन्ही निगाहों से देख तो नहीं पाया लेकिन साँसों की खुश्बू और बड़पन से महसूस जरूर किया है मैंने, अनसुने पलों से कही अधिक , अविनाश स्वरुप अदृश्य यादो से पाला है मुझे, थामाँ है अपने आँचल से, सायद एक माँ से कही ऊपर…

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#Kavita by Hemant Kumar Keern

एक क्षणिका *** आजकल दागी नेताओं पर वार को पत्नियाँ रोक रही हैं, मतलब कुत्ते तो भोकते ही हैं अब बिल्लियाँ भी भोक रही हैं। हेमन्त कुमार ‘कीर्ण’

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#Kavita by Avdhesh Kumar Avadh

नेताओं  की  धमा – चौकड़ी, शुरू   हुई  जब  आया वोट l सभी  गरीबों  के  बन   आये, फेंकें   सूट  बूट  औ   कोट ll अपने  मन  के  सारे कीचड़, प्रतिद्वन्दी  पर   रहे   उड़ेल l लोकतन्त्र  के  शुचि   आँगन, संविधान  सँग  खेलें   खेल ll बरसाती    मेढक  के    जैसे, नेतागण   टर – टर     टर्राय l अब  तो  जागो  मीत   हमारे, अवध सभी को रहा जगाय ll अवध

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"#Kavita by Avdhesh Kumar Avadh"