0202 – Shanti Swaroop Mishra

  Gazal: गिरे को उठाने की, किसी को फुर्सत नहीं होती ! औरों की तरक्की पे, किसी को मसर्रत नहीं होती ! अज़ब सी फ़ितरत है ज़माने के लोगों की दोस्तो, अब किसी की मौत पर भी, उन्हें हैरत नहीं होती ! पड़ती है ख़ुद के सर पर तो झांकते हैं बगलें मगर, किसी औरों की हालत पे, उन्हें ज़हमत नहीं होती ! जुबां के ज़ोर पर बन जाते हैं ख़ैरख़्वाह वो सबके, मगर पड़ती है जब ज़रुरत, उन्हें हिम्मत नहीं होती ! ज़मीर की बात करना भी अब तो बेमानी है “मिश्र”, सिरफिरों की बस्ती में, ईमान की इज़्ज़त नहीं होती ! Gazal: हूँ कमज़ोर मगर, उनके ग़म

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