#Kahani by Vikas Pal

शिक्षा (लघुकथा) “चोप्प…” सरजी कक्षा में घुसते ही दहाड़े। आगे की सीटों में बैठे छात्र सन्न हो गए। पीछे अभी भी खुसुर-फुसुर हो रही थी। “ऐय…पीछेवालो, ज्यादा चर्बी चढ़ी है क्या, दो डंडे में सुद्ध हो जाओगे। सीधे अपने मुँह में ऊँगली रख लो, आवाज न निकले, वरना मार-मार के गुड़िया कर देंगे।” सरजी ने अँगूठे और बीच की ऊँगली से चुटकी बजाकर तर्जनी को ऊपर-नीचे हिलाते हुए खड़े होने का इशारा किया– “ऐ चश्मेवाली,…

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"#Kahani by Vikas Pal"

#Kavita by Gopal Kaushal

रंग पंचमी प्रेम रंगों की बौछार रंग पंचमी महकाती सद्भाव की फुलवारी । कोई बना बजरबट्टू ,बनवारी तो कोई टेपा,गोपाल,गिरधारी ।। गेर संग निकले जब फाग यात्रा हर शहर-गांव लगता इंद्रधनुषी । बच्चों की टोली भी लगे निराली भेदभाव से कोसों दूर किलकारी ।। भाईचारे का अबीर-गुलाल उड़ाओं भारत माता की जय बोले नर-नारी । छोड़ो दुश्मनी की बातें है जो पुरानी बेमिसाल बने हम भारतीयों की यारी ।।

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"#Kavita by Gopal Kaushal"

B 0206 – Vinod Sagar

Kavita : ~- इंतज़ार -~~~ एक तेरे आने की ख़ुशी एक तेरे जाने का ग़म, आँख़ों में अश्क़ों के मेले दर्द ही अब मेरा मरहम। चन्द पलों का साथ तेरा और उम्रभर की जुदाई, मैं तेरी याद में मर रहा तुम्हें याद ना मेरी आई। जब प्यार हमारा बच्चा था दिल भी हमारा सच्चा था, आज जो यहाँ रुसवाई है कल तलक सब अच्छा था। तेरे जाने के बाद तो सनम जीवन जैसे शमशान है,…

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"B 0206 – Vinod Sagar"

0205 – Ishaan Sharma , Anand

गज़ल : तेज़ लहरों पर सफीना आ गया। मुश्किलों के साथ जीना आ गया।। . तीर तेरे सब जिगर के पार हैं। आज मेरे काम सीना आ गया।। . कुछ परिन्दे इस कद़र ऊँचे उड़े। आसमानों को पसीना आ गया।। . ऐक तेरे इश्क में जलता रहा। दूसरा सावन महीना आ गया।। . आग सीने की बुझाने क्या गये? दिलजलों को जाम पीना आ गया।। . फरवरी की सर्द रातों में हमें। आतिशे-ग़म से पसीना…

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"0205 – Ishaan Sharma , Anand"

#Kavita by Vinay shukla

कभी रूठना कभी मनाना चलता है ये चलने दो सुख दुख का है ताना बाना चलता है ये चलने दो जीवन भी तो चलता है आकंठ न डूबो तुम इसमें यहाँ लगा है आना जाना चलता है ये चलने दो । (2) लोग कहते यहाँ मीत हो जाऊंगा जग से हारा हूं मैं जीत हो जाऊंगा कंठ से जो अपने लगाओगी तुम स्वर हूं टूटा हुआ गीत हो जाऊंगा । ( 3) स्वयं से दूर …

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"#Kavita by Vinay shukla"

#Kavita by Lata Rathore

कागज़ की नाव ** कागज़ की नाव सी हो गई है ज़िन्दगी , कभी चलती , ठहरती , कभी बहाव में बहती l कभी हल्की सी हवाओ से डगमगा जाती , कभी हौले सी फूंक इसे आगे बड़ाती l कभी हरे गुलाबी रंगो से सजती , कभी बेरंग व्यर्थ कागज़ से बनती l मैं इसके पीछे बचपन सी दौड़ू , बनी अंजान इसे गलने से रोकूँ l कागज़ की नाव सी हमारी ज़िंदगानी , चन्द…

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"#Kavita by Lata Rathore"