0216 – Sudha Mishra

Kavita: अजनबी ** भटक रही है आत्मा कबसे कुछ खबर तो नहीं एक अहसास जो आँखें तर कर गईं क्या होगा उनका रूप.. जाने किसने आवाज लगाई बर्षों से दबी दबी एक लड़की जो सकुचाती है कुछ भी खुलकर कह देने से फिर याद आई है कहीं तुम्हारी खामोशी फिर सुनाई दी है.. सफर अधूरा अबतलक वो याद में रहा जाने कहाँ क्या पढ़ लिया सब हूबहु वैसा ही था नाम ,कपड़े और बहुत कुछ…

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"0216 – Sudha Mishra"

0215 – Kirti Vidya Sinha

Kavita : आम का पेड़ ** मेरे आंगन का वह आम का पेड़ मेरे बचपन का वह आम का पेड़ माँ के हाथ की अचार में सनी रोटी झूला झूलते हुये लम्बी सी चोटी वह गुलगुले वह मीठे पराठे आम के पेड़ के नीचे बैठ कर हम खाते मेरे आंगन ——————– जब लगी मैं दहलीज लाघंने माँ की होने लगी हिदायतें पर था वह आम का पेड़ जो देता था कुछ मुस्कराहटें रोती खुश होती…

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"0215 – Kirti Vidya Sinha"

#Kavita by Vinita Rahurikar

आवाज….   नहीं मैनेँ अनसुना नहीं किया उस आवाज को जो मेरे भीतर से उठती थी…   हर बार मैंने बहुत ध्यान से सुना समझा, और अमल किया उसकी बात पर…   क्योंकि वही थी जो मुझे समझती थी जानती थी सबसे बेहतर, सबसे बढ़कर मुझे पूरा विश्वास था उस पर…   तभी मै आज भी सुनती हूँ पूरी ईमानदारी से उसकी आवाज चलती हूँ थामकर उसका हाथ…   पूरा सम्मान देती हूँ मैं उसे,…

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"#Kavita by Vinita Rahurikar"

# Kavita by Ajeet Singh Avdan

नील-छन्द ~~ नैनन से नित दामिनि की छवि आवनि को । देखि मनोहर ओंठ सजी मुस्कावनि को ।। माधव के अध गाल गुलाल रचावनि को । मातु पिता तकि बाल कला दर्शावनि को ।।   कुञ्चित केश कपोलन हाथ हटावन को । धूलि सने कर माधव माथ लगावन को ।। ज्यों अवदान लुभावत केशव हैं मन को । को हिय काठ सरीखन नाहिं जुड़ावन को ।।   …अवदान शिवगढ़ी

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"# Kavita by Ajeet Singh Avdan"

#Gazal by Tej Vir Singh Tej

कितनी बेशर्मियाँ आज़माने लगे इश्क़ में लोग क्या गुल खिलाने लगे।   डर कि मेरी जुबां खुल न जाये कहीं। वो सितम दिन -ब दिन ही बढ़ाने लगे   हम बग़ावत को  शायद निकल ही पड़ें ज़ख़्म दिल के बहुत अब  सताने लगे।   उनको पाने की दीवानगी देखिये हम किताबों से भी दिल चुराने लगे।   रूठने का फकत हमने नाटक किया हमको हँस हँस के वो भी मनाने लगे।   लोग कहते हैं…

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"#Gazal by Tej Vir Singh Tej"

#dohe (Muktak ) by Mukesh Marwari

कुछ राजस्थानी दोहे:-   गणगौर्यां चली सासर,  ईसर जी को साथ | दोन्युँ नाचण लागर्या, पकड़-पकड़ कर हाथ ||     रजपुतानों आज बस्यो, कई बरसां पेली | मरगा राणा मोकळा, कई मरगा माली ||     बिनणी देखी सोवणी, और हाथों कि चुड़ी | साहब फूँकी काया नं, पी कर दारु बीड़ी  ||     प्रेम प्रतीक मीरा ही, और ढ़ोलामारू | प्रित मं मरगा तब ढोला,और अब पिगा दारु |   ✍कवि मुकेश…

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"#dohe (Muktak ) by Mukesh Marwari"

#Gazal by Sanjay Ashk Balaghati

उसे पाकर ग़र लुट भी गया तो क्या सपना दिल का टूट भी गया तो क्या। …. जिंदगी अपना रास्ता खूद डूंड लेती है वो सफर मे ग़र छुट भी गया तो क्या। …. है काम आदमी का आदमी के काम आना उसे गिराकर ग़र मै उठ भी गया तो क्या। …. सच बोलकर दुश्मन ही कमाया है मैने दोस्ती मे बोल एक झुठ भी गया तो क्या। …. हर कदम पर फरेब करता रहा…

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#Kavita by Surendra Kumar Singh

हवा ** इस गन्धिल और शीतल बहती हुयी हवा का अपना सरोकार है। स्पर्श करती है शरीर को तो अंदर से आती है डकार जैसे जी भर के पानी पीने के बाद अक्सर आया करती है। हालाँकि अँधेरा है अभी हवा की इस रौशनी में। लेकिन शब्दों बनो मत कि मैं अँधेरा हूँ तुम अँधेरा नही मोहरा हो। शब्द मेरे भी हैं और सत्ता शब्द की एक मैंने भी बना रखी है चाहो तो देख…

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"#Kavita by Surendra Kumar Singh"

#Gazal by Aasee Yusufpuri

मुझको मालूम है इक रोज़ ज़ुबां खोलेगी ज़िन्दगी मांग ले मुझसे तू अभी जो लेगी   कौन देता है यहां जान किसी की ख़ातिर ये जो दुनिया है बहुत होगा ज़रा रो लेगी   मैंने रग-रग का लहू देके संवारा है इसे मैं अगर चुप भी रहूँगा तो ग़ज़ल बोलेगी   तेरे हमराह तो दुनिया भी है आसी भी है हमसफ़र अब ये बता दिलरुबा किसको लेगी

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"#Gazal by Aasee Yusufpuri"

#Kavita by Kshitij Bawane

अभी के अभी…! ०•••[   कदमों तले होंगे वो बादल सभी ज़िद पकड़ ले तू ऐसी अभी के अभी!   नाम चमकेगा तेरा देखेंगे सभी भिड़ जा तू खुद से ही अभी के अभी!   होगा भरोसा खुद पे मंजिल मिलेगी तभी बढ़ा कदम तू आगे अभी के अभी!   आँसू खुशी के होंगे जब जीत होगी तेरी जगा ले विश्वास तू ऐसा अभी के अभी!   ना रुकेगा कहीं ना झुकेगा कभी खा कसम…

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"#Kavita by Kshitij Bawane"

#Kavita by Uday Shankar Chaudhari

गई शीत पतझड़ गुजरी आया बसंत हर्षित जग वन है कोयल गाती गीत मधुर पुलकित धरती और गगन है —– सजी प्रकृति है दुल्हन सी मादकता मधुमाई है मनमोहक मुस्कान लिए वन उपवन ली अंगराई है —- तरुवर में कोपल लगते बासंती रंग मचलता है बैठ पतंगे मंजर पे डाली-डाली  खिल उठता है —– जैसे सोलह श्रृंगार किए वनदेवी वन में उतरी हो बैकुंठ सी आभा को लेकर अन्नपुर्णा जग में उतरी हो —– देख…

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"#Kavita by Uday Shankar Chaudhari"

#Geet by Dipti Gour ‘Deep’

प्रकृति का रूप है नारी, शक्ति का अवतार है l सृजन का सोपान मनोहर, सृष्टि का उपहार है l    वात्सल्य,उत्कृष्ट प्रेम की ये मूरत अनमोल है l कर्तव्यों की प्रेरणा , संघर्षों का भूगोल है l कलमधरों की काव्य प्रेयसी धरती का श्रंगार है रणचंडी,महाकाली,दुर्गा अनगिन रूप है नारी के l वीर लक्ष्मीबाई बन के, खेले खेल कटारी के l अबला मत जानो नारी को, नारी पैनी धार है    अभियंता, अभिभाषक बन के, अद्भुत कला…

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#Muktak by Mahendra Mishra

भले दो लाख आँसू तुम सदा हंस के पियूँगा मैं, करोगी बेवफाई तुम प्यार फिर भी करूँगा मैं, सदा है जो कहा तुमसे वही फिर आज कहता हूँ, तुम्हारा था, तुम्हारा हूँ, तुम्हारा ही रहूँगा मैं। मिले जो घाव ठोकर पे वो सीना चाहता हूँ मैं, तेरे नयनों के हर आँसू को पीना चाहता हूँ मैं, तुम्हारे दिल की नगरी पे प्रिये अधिकार करके अब, तुम्हारा रहनुमा होकर के जीना चाहता हूँ मैं।

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"#Muktak by Mahendra Mishra"

B 0214 – Dr. Prashant Dev Mishra

Kavita : “कश की कश्मकश ” *** सिगरेट, पीना बुरी बात है- सेहत ,रिवायत,मुहब्बत सब के लिये। मग़र, तेरी बेपनाह यादों के जालों से घिरा हुआ इंसान, आखिर, करे भी तो क्या? शायद सिगरेट प्रतीक है- “टूटे आशिकों के ज़ज़्बात को बहलाने का” मैं, सिगरेट इसलिये पीता हूं। क्योंकि मुझे लगता है, तुझे , मेरे करीब सिगरेट ही लायी थी।!! उन दिनों , मैं बेफ़िक्र था। जवां हसरतों का एहसास हुआ था। जब पहली बार…

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"B 0214 – Dr. Prashant Dev Mishra"

0213 – S K Gupta

Gazal : वो तमाम घर मेंं खुशी बिखेर देती थी नए से लहजे की हंसी बिखेर देती थी सुबह जब मेरी आंख नहींं खुलती थी हंस के मुझ पर पानी बिखेर देती थी भीगे रेशमी बालों को लहराकर अपने नथुनों में महक सोंधी बिखेर देती थी अपने कंधे से सरका के पल्लू हौले से मेरे वजूद में भी मस्ती बिखेर देती थी दिल मेंं रूमानियत का ख्याल आते ही नज़र में अपनी मर्ज़ी बिखेर देती…

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"0213 – S K Gupta"