#Lekh by Nitish Kumar Rajput

लेख- हल्के होते मंच   मुझे आज भी याद आते हैं वे दिन जब हमारे शहर में कवि सम्मेलन और मुशायरा होता था । कवियों को सुनने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती थी क्योंकि उस समय मंचों की एक गरीमा होती थी । कविगण भी साहित्य तथा देश को समर्पित होते थे । उनकी रचनाओं में सच्चाई तथा सादगी झलकती थी । जब वे मंच पर आते थे तो तालियों की गड़गड़ाहट से…

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#Shayari by Akash Khangar

मुझे मेरी हक़ की तन्हाई मिली तुम्हे तुम्हारे हक़ की खुशियां जो सच्चा था उसने सबने ठगा वाह रे ऊपर वाले क्या है तू और क्या है तेरी दुनियां… ** वक़्त सफाई पेश करने का मौका नही देता इंसान खुद ही खुद का दुश्मन है कोई और धोखा नही देता तेरा दिल टूटता क्यों और तोड़ता कौन जो तू इश्क़ को न्यौता नही देता…    

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"#Shayari by Akash Khangar"

#Kavita by Gayaprasad Mourya , Rajat

दो घनाक्षरी भारतीय खून कुलभूषण हमारा वीर, कर षणयंत्र तूने जाल में फंसा दिया। भारतीय शौर्य का न भान तुझे कुछ रहा, जासूसी का ठप्पा मेरे वीर पै लगा दिया। बार बार करता है थोथी थोथी बातें पाक, कई बार ताला तेरे मुँह पै लगा दिया। ढूंढता फिरेगा तुझे ठौर ना मिलेगा कहीं, एक बार सेना को जो पाक में पठा दिया। 2-🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲 एक भी खरोंच यदि उसके वदन आई, चीर देंगे सीना तेरा तुझको…

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#Kavita by Nirdosh Kumar

[मरदूद……]       ऐ मरदूद !यूं आंखें ना दिखा गोटी खेलना हमें आता है ऊंह !धुंध को और धुंआ ना दिखा राख बनाना हमको आता है फीके रंग को और गाढा ना दिखा लहु से होली खेलना हमें आता है        निर्दोष कुमार        

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#Kavita by Uma Mehata Trivedi

    ‘एक पूर्ण विराम…।‘ तुम्हारें अक्षरों के हर अक्षर में,  अनेक स्वर-व्यंजन गुम हें..  तुम्हारें शब्द तुम से हीं खामोश,  वहीं तो…,  पता नहीं तुम्हें…?  अब हमझ जाती हूँ..  अनकही,अनबुझी ओर अनजानी-सी..  अक्सर लिख जाती…  असंख्य कोरे-कोरे कागजों को,  नीले रंगों से रंगती रहती हूँ…  पता है तुम्हें…?  कुछ-कुछ रह जाता,  वो रंग बिखरा-सा..  सोच जिसे मुस्कुराती हूँ..  चुन-चुनकर समेटना चाहती हूँ..  हजारों रंगीन धागों में  अपार स्नेह रूप में पिरोकर  शब्द-साधना में जोड़कर…  तारों…

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"#Kavita by Uma Mehata Trivedi"

#Kavita by Sanjay Ashk Balaghati

देखकर हमको दुश्मन हमारे सून्न है चारो दिशाओ मे हमारे दहाड की गुंज है। दुश्मन रचकर साजिश मना रहा खैर है, हमे डर कैसा साथियो हम तो भीम के शेर है। … जब जब दुश्मन इंसानियत के बिगडेंगे हम और हौसला लिये मंजिल पर बडेंगे। चलते चलेंगे आगे आम्बेडकर के हम पैर है, हमे डर कैसा साथियो……!!! …. उठेगी जो राह मे तोड देंगे हम हर वो दीवारे तुफानो मे लगाते है हम कश्तियो को…

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#Gazal by Jyoti Mishra

  वो खयालों में इस कदर  आते हैं भरी बरसात की तरह  ऑखों से बरस जाते हैं   जर्रे -जर्रे पे होती है निशानी  उनकी दूर जाकर भी हर बार, ठहर जाते हैं   बेबसी इस दिल की क्या कहिये दिल में जो काबिज़ हैं, उन्हीं से राज़ छुपाते हैं   कैसे कह दें के रह नहीं सकते तुम बिन नजरें झुक जाती हैं और लफ्ज़ शर्माते हैं   जान सके वो न पर जाने…

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#Shayari by Ishq Sharma

••••••••••••••••• इश्क़ु •••••••••••••••••• ख़ामोश चेहरा माँ का, तकलीफ बता देता है। बेटे चार है,  देखते  है,  दवा कौन ला देता है। नज़र  उतार कर  भूत भगा  देती हैं  जो माँ। उसके माथे की वो शिकन कौन भगा देता है। सब कुछ उसका बीत गया, आस बाकी नही। खींच कर दामन में खुशियां कौन ला देता है। निवाला  अगर  थोड़ा  ही  रहता है रसोई में। कौन सा ख़ुदा है उसमें जो भूख मिटा देता है। ••••••••…

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#Kahani by Shabdh Masiha

मैं पागल नहीं होना चाहता =================  ‘डाक्टर साहब ! जरा इनको देखिये आप . जाने क्या हो गया है इन्हें ….सपने में भी भारत माता की जय …इन्कलाब जिंदाबाद चिल्लाते रहते हैं .‘ पत्नी ने कहा .  डाक्टर ने उसकी आँखों को देखा और दूसरे अंगों का मुआयना किया और फिर बोला-  ‘क्या आप के घर में पहले कोई स्वतंत्रता सेनानी था या किसी के साथ कोई और घटना घटी थी जिसका इनके मन पर…

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#Kavita by Vishal Narayan

-” बोलो विधाता …”–   माना कि बहुत विधाता हो सम्पूर्ण ब्रहाण्ड के निर्माता हो पर क्या मिला तुमको एक बालक को बेघर कर के बोलो विधाता मैं रोउं किसके कंधे सर कर के….   जैसे सारे धरती पर आते हैं मैं भी धरती पर आया था पर तुम्हीं बताओ मुझको संग में पाप कौन से लाया था कहने को मैं जिंदा हूं पर जीता हूं रोज मर मर के बोलो विधाता मैं रोउं किसके…

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#Kavita by Kishor Chhipeshwar Sagar

आदत सी हो जाती है…… ——————————– इस भरी दुनिया में किसी से चाहत तो किसी से अदावत सी हो जाती है किसी से बेइंतेहा मोहब्बत तो किसी से बगावत सी हो जाती है रहना है इस दुनिया में तो ये सब तो फिर आदत सी हो जाती है” –किशोर छिपेश्वर”सागर” भटेरा चौकी बालाघाट जिला बालाघाट(म.प्र.) 9584317447

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#Kavita by Vivek Prajapati ,Kashipur

लगा माँ भारती के भाल पर उस दाग वाला दिन रुलाने आ गया फिर आज जलियाँ बाग वाला दिन।   ग़ुलामी की तड़प से लोग दो दो हाथ करने को इकट्ठे हो रहे थे देशहित की बात करने को। निभाने चल पड़े थे जो किया बेख़ौफ़ वादा था नहीं लेकिन किसी की जान लेने का इरादा था। वहाँ पर औरतें थी और थे बच्चे व बूढ़े भी वहाँ परिवार भी थे साथ पर कुछ थे…

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#Kavita by Alok Shirivas

” कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान द्वारा फांसी की सजा दिए जाने पर मेरा आक्रोश ” ******************   पाकिस्तानी चेहरे पर एक, नया मुख़ौटा आया है। एक हिंदुस्तानी को उसने, फिर जासूस बताया है ।।     कर के कपट उसने फिर एक, नया  शगूफा छोड़ा है। अपनी समझ में उसने अपने, एटम बम को फोड़ा है।।     छल, छद्म और धोखे से, उसने मासूम फंसाया है। सजा – ए – मौत झूठ की, बुनियाद…

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#Kavita by Pankaj Sharma Jhalawar

मैं तुमसा नजर आऊँ…   रंगों की परम्परा औऱ खुशियों में झूमें आओ फिर पुरानी गलियों में घूमें.. जहां मैं तुमसा ही नजर आऊँ…   बरसो बाद निभा ले फिर रस्में तोड़ दें अहम की दीवारें होने दें आसमां को गुलाल जहां तुम गुलाब नजर आओ औऱ… मैं तुम जैसा नजर आऊं   आज फिर चुरा लाऊं, तेरे चित्रों की डायरी कुछ अधूरे चित्रों को पूरा कर दूं आज के दिन इन रंगों के सहारे…

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#Shayari by Saurabh Dubey Sahil

हर एक पन्ना पूरी किताब नहीं होता , मुँह से निकले शब्दों का हिसाब नहीं होता, यूँ तो ना जाने कितने लोग मिलते जिन्दगी में, पर हर कोई आपसा आफताब  नही होता ।   ~ सौरभ दुबे   ” साहिल ” किशनी मैनपुरी  (यूपी )

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"#Shayari by Saurabh Dubey Sahil"

#Kavita by Ajeet Singh Avdan

श्रीगणेश-नामोस्तुति ~~~~ गौरीसुत गजानन नाम जप वंदन, बुद्धि-चित शुद्ध-भाव लाय नित कीजिए । श्रीगणेश एकदंत दयावंत की अनंत, महती कृपा का फल, तत्काल लीजिए ।।   बुद्धिनाथ धूम्रवर्ण भालचन्द्र गजकर्ण, सूपकर्ण शशिवर्ण लम्बकर्ण रीझिए । गणपति गणाध्यक्ष गजवक्र एकाक्षर, बुद्धिप्रिय बुद्धि की अशुद्धि शुद्ध कीजिए ।।   अमित अखूरथ अनन्तचिदरूपम : , ओमकार अवनीश शुभाशीष दीजिए । विश्वमुख वरप्रद विघ्नराज हे विकट, विनायक विघ्नेश्वर विघ्न हर लीजिए ।।   मुक्तिदायी मनोमय मूढ़ाकर मृत्युञ्जय, हेरम्ब हरिद्र…

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"#Kavita by Ajeet Singh Avdan"

#Kavita by Vinita Badmera

स्वार्थ की दुनिया   बहुत दिनों बाद बूढ़ी काकी  को, भर-पेट भोजन  करवाया है। दाल-भात के साथ हलवा परोस, बेटा आज समीप भी आया है।   वत्स को आशीष देती काकी का   मन फूला नहीं समाया है। अश्रुओं से भीगी पलकों को, पौछ  मन   को  हर्षाया है।   हर दिन महीने का पहला दिन क्यों नहीं ईश्वर ने बनाया है? यह सोच उसनेे पेंशन पर खुशी सेअंगुठा भी लगाया है   वाह रे!स्वार्थ की   दुनिया…

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"#Kavita by Vinita Badmera"