Kavita by Brajmohan Swami ‘Bairagi’

लोग : जो मार दिए गए… हम सब मर जायेंगे एक दिन, केवल कुछ गुलमोहर ही बचेंगे, न दिखने वाली सुंदरता के लिए। आप उस रात आराम से नही सो सकते, जब कोई अधनंगा लड़का आपके कान में आकर कह दे कि उसकी माँ को मार दिया है – एक घातक उपन्यास ने। आप कैसे करवटें बदल सकते हैं आप भी रहते है उस शहर में जिस शहर में दीवारें आधी रात को और स्याह…

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"Kavita by Brajmohan Swami ‘Bairagi’"

#Kahani by Reeta Jaihind Arora

पुजारी एक मंदिर में एक पुजारी बहुत समय से भगवा वस्त्र धारण कर भक्त व भगवान की सेवा करता था । और हर आने जाने वाले भक्तों से रामराम बेटा राधे राधे कर सभी का चित्त प्रसन्न कर देता था ।उस पुजारी के स्नेह से भक्त भी बहुत आने लगे और मंदिर में प्रसाद भी पंडित जी सबको खुश होकर बांटते थे।चढावा भी अच्छा होने लगा।जितना भी चढ़ावा  आता सब मंदिर के बनाने में लग…

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"#Kahani by Reeta Jaihind Arora"

#Kavita by Lal Bihari Lal ‘ Lal Kala Manch’

काम करी चाहे नाकरी,तबहुँ बनी सरकार आइल राजनीति मेंदेखीं अजब बहार काम के सपना देखा- देखाके भष्टाचार के निमनघुट्टी पिला के कोसी विरोधी के हमरोज बार-बार आइल राजनीति मेंदेखीं अजब बहार अच्छा दिन आई, तनीकरी इंतजार करब परोसी के, सिरहम कलम हजार उल्ट-पुल्ट के देहब,नेता हम बार-बार आइल राजनीति मेंदेखीं अजब बहार सीमा पर देख करब नाकुछूओं खास कतनों विरोधी करिहेरोज-रोज बकवास परे ना देहब हमकुरसी में कवनों दरार आइल राजनीति मेंदेखीं अजब बहार लाल…

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"#Kavita by Lal Bihari Lal ‘ Lal Kala Manch’"

#Kavita by vinay bharat sharma

म और माँ “म” ऐसा शब्द हटाने पर जिसे बिखऱ जाती है भाषा हिन्दी, संस्कृत भी कहाँ टिक पाती है “म” के पुत्र अनुस्वार के बिना इसी “म” की एक महिमा है “माँ” जिसके बिना कहाँ चल सकता है कोई संसार, वह माँ जिसका आँचल सिंहासन से बढकर है उसी “म” शब्द से बना हूँ “मैं” जो करता हूँ शरारत विविध अठखेलियाँ, हाँ, “म” शब्द से बनी है प्रकृति की अनुपम छटाकृति “माँ” उसी माँ…

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"#Kavita by vinay bharat sharma"

#Kavita by Meghvrat Arya

क्यों न अब अपनी आँखें बंद कर लें क्या पता ख़्वाबों में गुज़रा हुआ कल मिल जाए, इक अरसा पहले बिछुड़ गये थे जो क्या पता उसी मोड़ पर वो फिर मिल जायें, क्यों न कुछ पल के लिए हम बीते कल में लौट जायें ख्वाबों में ही सही क्यों न कुछ पल उस जिंदगी को फिर जी आयें, वो जो बातें थीं कुछ उनकी – कुछ मेरी अनकही – अनसुनी सी, क्यों न कुछ…

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#Gazal by Asha Shaili

वो क्यूँ साया नहीं देता, पुराना इक शजर होकर जहाँ का दर्द सहना था उसे तो बस बशर होकर हमारे वास्ते इक घर तलाशें कौन कहता है चमकना था मुकद्दर में, तो चमके दरबदर होकर चले हैं उम्रभर तन्हा, जहाँ से रोज़ो-शब लोगो वही बस बात करती हमसे है सूनी डगर होकर हमारी ज़िन्दगी तारीकियों की हो गई आदी चरा़े दिल जलाया हमने हरदम बेख़बर होकर वो हमसे दूर था पर दूर दिल से हो…

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"#Gazal by Asha Shaili"

#Kavita by Amit Kaushik

– शब्द – शब्दों का खेल भी बड़ा अजीब होता है, इन्सान पैसो से नहीं शब्दों से भी गरीब होता है। शब्दों में चेतना होती है, शब्दों में जान होती है हमारें शब्द ही हमारी पहचान होती है। शब्दों में दहाड़ होती है, शब्दों में वजन होता है। शब्दों को हल्के में लेना हमारी सबसे बड़ी भूल है। शब्द स्वंय गुणवान है, साथ-साथ हमारी गुणवत्ता, बुद्धिमत्ता की परख शब्दों का प्रतिमान है। शब्द मध्यस्थ है,…

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"#Kavita by Amit Kaushik"

#Shayari by Umesh Lakhpati , krishna

मेरी धड़कन का तेरे दिल से रिश्ता। मेरी आँखों का तेरी नजर से रिश्ता। रिश्ता मेरी रूह का तेरे बदन से है, टूट ना पाये ये किसी कसम से रिश्ता।

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"#Shayari by Umesh Lakhpati , krishna"

#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

ग़र मानव हो तो कैसा हो ,हमको समझाया ईसा ने ग़र जीवन हो तो कैसा हो ,हमको समझाया ईसा ने ईश्वर को खोजने कहीं न जा,कर्मों के दम पर ही केवल ख़ुद ही तू ईश्वर जैसा हो ,हमको समझाया ईसा ने “दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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"#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan"

#Kavita by Sumati Sharma

मौन प्रलय है अन्तर्मन में नभ से इस विराट जीवन में फिर कोई आंधी आई है , फिर कोई तारा टूटा है ढलती हुई शाम ने आकर चुपके से कुछ कहा रात से परछाई भी रूठी है क्यों छोड़ गयी है बिना बात के भोर लिए मुस्कान मिलेगी अब तो ये लगता झूठा है फिर कोई आंधी आई है , फिर कोई तारा टूटा है हर दिन नियति के हाथों में, एक पहेली अनसुलझी सी…

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"#Kavita by Sumati Sharma"

#Kavita by Vinay Shukla

कायर शासन सत्ता का गुणगान नहीं मेरी कविता राजनीति दरबारों का सम्मान नहीं मेरी कविता अख़बारों सा वैभव गौरव गान नहीं मेरी कविता संविधान का झूठा  दलितोत्थान नहीं मेरी कविता। संसदीय सदनों में कोई शोर नहीं मेरी कविता  पुरस्कार की अभिलाषा में जोर नहीं मेरी कविता मौसम की मदमस्त हवा में मोर नहीं मेरी कविता यहाँ सियासत के झण्डों का छोर नहीं मेरी कविता । कुरुक्षेत्र में आहिंसा का जाप नहीं मेरी कविता जात पात…

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"#Kavita by Vinay Shukla"

#Kavita by rakesh yadav

कुसुमसुमुदिता छन्द शिल्प :~ भगण नगण नगण गुरु। 10वर्ण प्रतिचरण, 4चरण, 2-2 चरण समतुकान्त। ** निर्मल बह अनिल सदा। वृक्ष हरत अब विपदा।। सर्व सुलभ सब तन करें । सिंचित मन पवन भरे।।                   राम सिय सँग वन चले। मात विचलित कर मले।। हर्षित अब सुर कहते। रिषि मुनि सब दुख कटे।।

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"#Kavita by rakesh yadav"