Muktak by Annang pal Singh

क्त इकाई से बनी , है जीवन की डोर ! व्यर्थ. नष्ट मत कीजिये, देखो इसकी ओर !! देखो इसकी ओर , व्यर्थ मत इसे गँवाओ ! श्रेष्ठ मनुज तन मिला,इसे सदराह चलाओ !! कह ंअनंग ंकरजोरि,बड़ी इसकी पृभु ताई ! श्रेष्ठ कार्य हित करो नियोजित वक्त इकाई !! अनंग पाल सिंह भदौरिया ग्वालियर म. पृ.⁠⁠⁠⁠

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"Muktak by Annang pal Singh"

# Gazal By Nirav Joshi

दर्द कागज़ पर मेरा बिकता रहा मैं बैचैन था रातभर लिखता रहा !   छू रहे थे सब बुलंदियाँ आसमान की मैं सितारों के बीच, चाँद की तरह छिपता रहा !   दरख़्त होता तो, कब का टूट गया होता मैं था नाज़ुक डाली, जो सबके आगे झुकता रहा !   बदले यहाँ लोगों ने, रंग अपने-अपने ढंग से रंग मेरा भी निखरा पर, मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा !   जिनको जल्दी थी,…

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#Kavita by Jaya Singh

शायद मैं अच्छी नहीं , क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलती । दूसरों की इच्छाओं के अनुरूप , सच को कभी नहीं तोलती । शायद मैं अच्छी नहीं , क्योंकि पीठ पर वार नहीं करती । जो है सब कुछ सामने ही है , यह सोच कर पीछे से प्रहार नहीं करती । शायद मैं अच्छी नहीं , क्योंकि सभी को ही भला समझती । आस्तीन मे रहकर सापँ बन जाते हैं, लोगों की ये कला…

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#Gazal by Asha Shailly

आँख उसकी आज देखी नम उसे क्या हो गया है कौन सा सँभला न उससे ग़म उसे क्या हो गया है जिस दिए की आब से जंगल सुनहरा लग रहा था है उसी की रौशनी म(म उसे क्या हो गया है चार सू घर में उसी के डोलते साए तो हैं पर पायलों की खो गई छम-छम उसे क्या हो गया है बाद पतझड़ के बहार आती तो है गुलशन में लेकिन फिर यहाँ पतझड़…

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#Shyari by Rishabh Tomar Radhe

जमाने मे मोहबत का फ़साना न होता, तो वीराना सा बेरंग ये जमाना  होता तेरे दीदार को मेरा ये दिल बेकरार न होता तो आज ‘ऋषभ’ मोहबत का मारा न होता अगर नदिया का कोई किनारा न होता तो सागर से भी मिलने से जाना न होता अगर भगवान ने तुमको बनाया न होता तो दुनिया मे कोई दिलकश हसीं नजारा न होता फ़िजा में फूलों का यूँ ही खिलना न होता अगर ‘महक’तुझमे ये…

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#Kavita by Amit kaithwar Mitauli

हम पर है अधिकार तुम्हारा मेरे सपनो पर भी अधिकार तुम्हारा. देना अगर मुझे तुम फिर तो लौटा देना वो प्यार हमारा . मैं सांसे भी लेता हूँ तो तुम्हारी इजाजत लेकर के . द्वार तुम्हारे आऊंगा बस एक शिकायत लेकर के. प्यार मोहब्बत का रिश्ता न निभाना तुमको आया. तुम्हारी इस गलती से सपना न हुआ साकार हमारा. हम पर है अधिकार तुम्हारा………. बिना सहारे कठिन राह पर चलता रहा अकेला. मैने जो राह…

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#Kavita by Sudhir Gupta ‘ Chakr’

वसीयत (कविता) जिंदगी भर पिता ने कवच बनकर बेटे को सहेजा लेकिन पुत्र कोसता रहा जन्मदाता पिता को और सोचता रहा जाने कब लिखी जाएगी वसीयत मेरे नाम पुत्र ने युवावस्था में जिद की और बालहठ को दोहरा कर फैल गया धुँए सा पिता ने गौतम बुद्ध की तरह शांत रहकर अस्वीकृति व्यक्त की कुछ देर शांत रहने के बाद हाथ से रेत की तरह फिसलते बेटे को देखकर पिता बोला मेरी वसीयत के लिए…

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#Muktak by Mithilesh Rai ‘ Mahadev ‘

तेरे लिए मैं तन्हा होता जा रहा हूँ! तेरे लिए मैं खुद को खोता जा रहा हूँ! अश्कों में मिल गयी हैं यादों की लहरें, तेरे लिए मैं तन्हा रोता जा रहा हूँ!

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#Kavita by Vikram Gathania

मेरा समय मेरे सापेक्ष की पुरानी पड़ती चीज़ों की दुनिया मेरा समय है मेरी दुनिया छोटी सी है जो मेरे लिए नहीं है अदृश्य ! यह संसार समस्त लोगों की छोटी छोटी दुनियाओं से निर्मित है जिसमें पृथ्वी है और सूर्य है और समस्त लोगों के समय के लिए पृथ्वी चक्कर लगाती है सूर्य के जो अदृश्य है सबके लिए मेरे लिए भी ! विक्रम गथानिया

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#Lekh by Pankaj Sharma

स्त्री और नदी का स्वच्छन्द विचरण घातक और विनाशकारी लेखक:- पंकज प्रखर कोटा (राज.)   स्त्री और नदी दोनों ही समाज में वन्दनीय है तब तक जब तक कि वो अपनी सीमा रेखाओं का उल्लंघन नही करती | स्त्री का व्यक्तित्व स्वच्छ निर्मल नदी की तरह है जिस प्रकार नदी का प्रवाह पवित्र और आनन्दकारक होता है उसी प्रकार सीमा रेखा में बंधी नारी आदरणीय और वन्दनीय शक्ति के रूप में परिवार और समाज में …

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#Kavita by Braj Mohan Swami

ओम पुरी जिन्दा हैं / कविता ————————————- मेरे बाथरूम में एक अनोखा प्रयोग चल रहा है/ दरवाज़ा बन्द कर के/ घण्टों बैठा रहता हूँ.. घुटन की साँस लिए/हर रोज़ सोचता हूँ “आज क्या मैं ईमानदार नहीं रहा ?” (जो कि सरेआम क़त्ल करने वाली कविता लिखता हूँ) एक नौसिखिया जादूगर, जो सरेआम क़त्ल जैसा कुछ कर जाता है, उसकी जिम्मेदारी एक संगठन ले लेता है वह जादूगर लोगों की जीवन-शैली में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहा…

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"#Kavita by Braj Mohan Swami"