#Muktak by Annang Pal Singh Bhadoriya ‘ Annang’

कर्मशीलता, उदासी , का ना कोई योग. ! वह उदास रहते नहीं , कर्मशील जोलोग !! कर्मशील जो लोग, सदा उत्साह सँजोते ! लोग आलसी और पृमादी रहते रोते !! कह ंअनंग ंकरजोरि,उचित ना दीन हीनता ! साथ साथ ना रहे, उदासी, कर्मशीलता !! अनंग पाल सिंह भदौरिया ग्वालियर

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#Gazal by Asha Shailly

वो आज राहगुज़र का नज़ारा देखते हैं तसव्वुरों के सफर का नज़ारा देखते हैं नदी में डूबती कश्ती का ज़िक्र होगा तो उधर के लोग इधर का नज़ारा देखते हैं बुझा सकेगा वो खुद अपनी प्यास को क्योंकर हम आज उसके हुनर का नज़ारा देखते हैं उछालते हैं ख़ला में बयान रोज नए जो रहनुमां हैं खबर का नज़ारा देखते हैं हरइक गली में है इक शोर खून-ए-आदम का जो कत्ल करते हैं डर का…

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"#Gazal by Asha Shailly"

#Kavita by Sumati sharma

किसी भी बात पर जो रूठ जाना ज़िन्दगी मुझसे तो वो उपहार बचपन का मुझे बस लौटा देना तुम वो मिट्टी के खिलौने और धुली मुस्कान चेहरे की वो फुलझड़ियाँ , मेरी आज़ादियाँ बस लौटा देना तुम वो दीवाली की मस्ती और नए कपड़ों की फरमाइश मेरे मन का वो भोलापन मुझे बस लौटा देना तुम वो माँ की उंगलियाँ थामे निडर चलते चले जाना वो भाई बहनो का फिर संग रहना लौटा देना तुम…

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"#Kavita by Sumati sharma"

#Kavita by TejVir Singh Tej

बचपन ** अल्हड़ मस्त हुआ यह जीवन पुलकित हो आया है तन-मन। हुई व्योम सी उच्च उमंगें स्वस्फूर्त उठ रहीं तरंगें। निखर गया कुंदन सा जीवन। बड़ा निराला होता बचपन। चिंता-फिकर नहीं कोई घेरे मार गुलाटी लेता फेरे। खेल-खिलौने हैं सब न्यारे सुंदर सरस सजीले सारे। महक उठा फूलों सा उपवन। बड़ा निराला होता बचपन। जो मन कहता वो ही करते परी लोक में रहें विचरते। धरा-गगन कदमों में रहते नित्य स्वप्न-सागर में बहते। सुरभित…

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"#Kavita by TejVir Singh Tej"

#Kavita by Vikram Gathania

अमलतास सेहरे निकल आये हैं अमलतास   के पेड़ों में एक पेड़ अमलतास खास के पीले फूलों से ढके मुँह अमलतास के कितने चेहरे देखना ही पड़ेगा पास से दूल्हे को सजाने के पहले अहसास से धन्य हुए हैं पीले फूल अमलतास के दूल्हे न ऋणी  गुलाब के न पलाश के वे ऋणी हैं सदियों से अमलतास के ! विक्रम गथानिया

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#Muktak by Amit kaithwar mitauli

शरीर बेजान है फिर भी चलने का हुनर जानता है. खुद गुमशुदा है फिर भी हर एक शहर जानता है. आज हम लोग पैसों की कदर नहीं करते लेकिन . हर घर में एक बूढा है जो पैसों की कदर जानता है. – अमित कैथवार मितौली – – 9161642312 –

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Lekh – BOOK REVIEW OF “कुछ व्यंग्य की कुछ व्यंग्यकारों की ” by M M handra

आत्ममंथन से व्यंग्यमंथन तक समीक्षक : एम. एम. चन्द्रा वरिष्ठ व्यंग्यकार हरीश नवल की पुस्तक “कुछ व्यंग्य की कुछ व्यंग्यकारों की ” जब मेरे हाथों में उन्होंने सौंपी, तो कुछ समय के लिए तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. बसदो पल का आत्मीय मिलन सदियों पुराना बन गया. यह पुस्तक आत्म मंथन से व्यंग्य मंथन तक का सफ़र तय करती हुई आगे बढ़ती हैं. जिसका अध्ययन करते ही मेरे मन में सिर्फ एक विचार उत्पन्न…

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#Kavita by Neeloo Neelpari

फ़ीनिक्स सी ज़िन्दगी ~~~~~~~~~~~ अज़ाब सी ज़िन्दगी परेशां हो, खा ली अपनी उम्र बराबर प्रोज़ाक की छोटी गोलियां 20 मिलीग्राम की नींद के आगोश में शून्य के चरम तक पहुँचने की फिर एक नाकाम कोशिश समय को विराम देने की भरसक जद्दोजहद में टूटी-बिखरी बिखर के उलझी उलझ के सुलझी कितनी ही बार राख हुई फिर अपनी ही राख से जी उठी फ़ीनिक्स सी ज़िन्दगी क्योंकि वो एक जिस्म नहीं ‘नीलपरी’ एक माँ थी.. ©…

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"#Kavita by Neeloo Neelpari"

#Kavita by Brij Vyas

” अब तक ना आये ” !! इंतज़ार अब और नहीं ! होगा कोई शोर नहीं ! पल-पल होगें चुप्पी साधे , चले किसी का ज़ोर नहीं ! रंग बिरंगी इस दुनिया में – होगें रंगी साये !! रंग सजे हैं गहरे गहरे ! खुशियों ने बैठाये पहरे ! हाथ सफलता के पैमाने , अँखियों में हैं भाव रूपहरे ! पुलकित हुई समय की धारा – ऐसे मन भाये !! बैचेनी का दौर नहीं है…

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"#Kavita by Brij Vyas"

#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

गर चाहिए मोहब्बत, तो काबिल बनिए ! तपती धूप नहीं, खुशनुमा बादल बनिए ! बन के बारूद क्या मिलेगा तुम्हें दोस्त, बन सको तो, आँखों का काजल बनिए ! न मुस्कराओ किसी को डूबता देख कर, गर बन सको तो, उसका साहिल बनिए ! ज़िन्दगी में ज़रा संभल कर चलो “मिश्र”, न ज्यादा सुर्ख़रू, न ज्यादा जाहिल बनिए !

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"#Gazal by Shanti Swaroop Mishra"