#Kavita by Shabnam Sharma

लोग   दूरदर्शन की सुर्खियाँ बनते कुछ लोग, अपनी छोटी-छोटी शिकायतें करते कुछ लोग बाँस-फूंस, मिट्टी, गोबर से बना अपना बसेरा दिखाते कुछ लोग, पीठ-पेट चिपका हुआ, हाथों के छाले, तन को चिथड़ों से छुपाते कुछ लोग बिखरे बाल, मैले कपड़े नंगे बदन, गन्दे नाले में मिट्टी से बच्चे नहलाते कुछ लोग, शायद मालूम नहीं ऐश में रहने वालों को, इनके पसीने, खून, भूख की ईंटो से ही बनते हैं इनके महल जिन्हें तुच्छ कहते…

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#Gazal by Jyoti Mishra

मुहब्बत का सलीका सिखा दिया मैंने दफन करके दर्द दिल में ,मुस्कुरा दिया मैंने   शतरंज की बाजी नहीं, मुहब्बत है मेरी खुद को हरा कर, सिकंदर तुम्हें बना दिया मैंने   कुबुल हैं सारे जुर्म, जो मैंने किये नहीं इक तेरी हंसी की खातिर, खुद को फिर रूला दिया मैंने   रौशन वो रहें, मुबारक़ हो रोशनी उनको चिराग की मानिंद, खुद को ही जला दिया मैंने   देना खुशी उदास चेहरे को, इबादत…

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"#Gazal by Jyoti Mishra"

#Kavita by Kumari Archana

“जाने कितने मौसम आये”   जाने कितने मौसम आये और कितने सावन की फूहार बन आये बाद मुझे पतझड़  बनाकर चल गये !   जो रह गया चट्टान सा अटल बरगद सा अपने शाखायें फैलायें मुझे अपनी आगोश में माघ सा समेटे रहा मेरे मन मंदिर को आज भी अपना फागूनी रंग दे रहा !   अपनी भिन्नी भिन्नी खुखबूँ से मुझे भदों बना रहा !   जिसका नाम ऋतुओं जैसा मझे मुँहजबानी याद रहेगा…

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"#Kavita by Kumari Archana"

#Muktak by Dr. Krishan Kumar Tiwari Neerav

मुक्तक ( एक ) कुछ भी कहते हुए सोचना पड़ रहा, दर्द ही दर्द का सामना पड़ रहा, कितनी बिगड़ी व्यवस्था है जिस देश में भीख बच्चों को हो मांगना पड़ रहा! ( दो ) हमको  तकलीफ है और तुम सो रहे अपने खातिर जहर बीज क्यों बो रहे ठीक है फिर इलेक्शन में आओगे तुम तुमसे पूछूंगा उद्धिग्न क्यों हो रहे? (तीन) टूटकर गर्भ सारा बिखर जाएगा राजनीतिक नशा मित्र झर जाएगा यदि गरीबों…

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#Gazal by Peeyush Gupta Gagan

सुख से मेरा मिलना मुश्किल अब सूरज का निकलना मुश्किल   इस मतलब की दुनिया में यार भरोसा करना मुश्किल   आज के युग में इक लड़की का मीरा जैसा बनना मुश्किल   इक प्तथर को मूरत बनना होता होगा कितना मुश्किल?   नजरों में गिरना आसाँ है पर नजरों में उठना मुश्किल   जग रौशन करने के खातिर दीपक बनकर जलना मुश्किल   वो ऊपरवाला क्या जाने  जग मे जीना कितना मुश्किल पीयूष गुप्ता…

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#Kavita by Sumit Bhardwaj

स्त्री के साथ अभद्र व्यवहार और बलात्कार जैसी घटनाओं पर शोक जताते हुए हमारे द्वारा रचित कुछ पंक्तियाँ     भागी भागी फिरती थी बेटी, खुद की जान बचाने को, उसके पीछे थे चार भेड़िये, उसको नोच के खाने को, मजबूर हुयी चौराहों पर, खुद की इज्जत लुटवा बैठी, तब कोई हाथ नहीं बढ़ा था, उसकी लाज बचाने को।   सब पत्थर को पूज रहे थे, मंदिर के दरवारों पर, बेटी की इज्जत लुटती थी,…

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"#Kavita by Sumit Bhardwaj"

#Kavita by Ishq Sharma

• रैप •   जिसे पीना खराब उसे कहते है शराब.. बिना पिये चढ़े बेबी तेरा शबाब….. जितनी पियूँ शराब मुझको चढ़ती नही…. मेरी नज़र से बेबी तू उतरती नही…. रोज सोचता हूँ आज थोड़ी कम पियूँगा… महंगे है गम मेरे रम पियूँगा…. फिर चखने में तेरी तीखी नज़र को खाऊंगा… रखे तेरे होठ पे हर ज़हर चूस जाऊंगा… मेरे लफ्ज़ में उस रब से दुआ में करूँ… कोई रोके न मुझे जब तुझे छुआ…

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"#Kavita by Ishq Sharma"

#Shayari by Amit Kaithwar Mithouli

फूल कागज के कभी महकते नही हैं कृत्रिम पक्षी जो कभी चहकते नही हैं. शराब शबाब देखकर लोग बहक जाते हैं . एक हम ही हैं जो कभी बहकते नहीं हैं . ** छप्पर न उड़ जाए आंधी में इस डर से वो सोता नहीं है. आंधी ,तूफ़ान, सब सह लेता है मगर वो रोता नहीं है. किसान हर साल उम्मीद की इमारतें खड़ी करता है . वो सोंचता भी बहुत कुछ है मगर कुछ…

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"#Shayari by Amit Kaithwar Mithouli"

#Kavita by Kavi Nirdosh Kumar

(क्यों……?)   नीरवता में जाने ये कैसा शोर  है व बिखरा जो आज चारों चारों ओर है पसरा है सन्नाटा क्यों ?इस कोलाहल में उबाल आ रहा क्यों?रिश्तों के हलाहल में बिखर रहे हैं क्यों?नीड के तिनके तिनके गुंथे थे कभी हम सहारे जिनके जिनके हमवृक्ष की सभी शाखाएं टूट रहे हैं क्यों?खग मन की आशाएं भी टूट रहे हैं कवि निर्दोष कुमार पाठक बिलासपुर (छग) 9893453078

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"#Kavita by Kavi Nirdosh Kumar"

#Kavita by Mukesh Marwari

“वीर राणा प्रताप”   एक तरफ खमनौर कि पहाड़ी, एक ओर थी गोगुन्दा कि घाटी | रक्त पीने को आतुर थी वो, प्यारी सी हल्दीघाटी |   प्यास बुझेगी उसकी भी अब, शायद वो यह भान गयी | मिलेगा रक्त अब मुगलों का, शायद वो यह मान गयी |   उस ओर खड़ी थी मुगली सेना, ओर इधर थे राजपूती लाल | अस्सी हजार के सामने, बीस हजार थे राणा के लाल |   महाराणा…

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"#Kavita by Mukesh Marwari"

#Kavita by Kavi Krishan Kant Dubey

सुबह निकले पंक्षी शाम को लौट आये बसेरों में और करने लगे हिसाब क्या खोया क्या पाया.   कुछ बहुत खुश हैं तो कुछ बहुत उदास हैं क्योंकि जिनको आशाओं से अधिक नहीं मिल पाया वह मुहूँ लटकाये बैठे हैं, पर,जिनको अप्रत्याशित मिल गया वह इठाला रहे हैं नसीब पर.   पता नहीं क्यों कुछ पंक्षी यह नहीं समझ पाते कि हर रात के बाद सबेरा होता है और निराशाओं के बाद आशाओं की रौशनी…

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"#Kavita by Kavi Krishan Kant Dubey"

#Gazal by Arun Sharma

नक्श-ए-कदम पर हूँ गुल के खार नहीं जानूँ होश में हूँ जो मगर कभी होशियार नहीं जानूँ   गाँव में आज कल जो ख़िज़ाँओं का मौसम है मैं तो शहर में रहता हूँ फ़क़्त बहार नहीं जानूँ   शाइर हूँ इबारत लिखता हूँ अब मौशिकी पर तलब है मुझे जीस्त का मगर प्यार नहीं जानूँ   सौदेबाज़ी के लिए उल्फत की दुकानें खुलीं हैं बाजार में घूमता हूँ पर मैं खरीदार नहीं जानूँ   मेरे…

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#Kahani by Soni Pandey -( Through ) Vishal Shukla

जाज़िम   अन्धेरा घिरने लगा तो कनिया ताड़ का झांडू लिए छत की ओर चलीं….कमर झुक गयी थी ….एक आँख का मोतियाबिन्द पक गया था ,किसी को सुध नहीं । झुकी कमर पर दाहिना हाथ धरे ,एक हाथ में झांडू उठाए कनिया  को जाते देख कलक्ते वाली ने ताली पीटा …इ लो  मुल्ला चला मस्ज़ीद की ओर ।हा ..हा…हा…ए  इया !सुनिये तो ,यहाँ बैठिए, हल्दी वाली जगत बो ने हाथ पकड़ कर खटिया की ओर…

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#Lekh by Sushil M Vyas

टालस्टाय ने एक छोटी सी कहानी लिखी है। मृत्यु के देवता ने अपने एक दूत को भेजा पृथ्वी पर। एक स्त्री मर गयी थी, उसकी आत्मा को लाना था। देवदूत आया, लेकिन चिंता में पड़ गया। क्योंकि तीन छोटी-छोटी लड़कियां जुड़वां–एक अभी भी उस मृत स्त्री से लगी है। एक चीख रही है, पुकार रही है। एक रोते-रोते सो गयी है, उसके आंसू उसकी आंखों के पास सूख गए हैं–तीन छोटी जुड़वां बच्चियां और स्त्री…

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#Kavita by Reeta JaiHind Arora

चश्मा 👓 जब नजर कमजोर हुई हमारी डाॅ ने चश्मे की सलाह  दे डाली चश्मे हमें कभी  नही सुहाता था ख्याल मात्र  से रूह कांपी हमारी बुढ़ापे ने हमें  दस्तक दे डाली सारी रात अब नींद नहीं आती थी ख्वाब भी अब  चश्मे से डराते थे डाॅ के पास फिर गई मैं एक बारी चश्मे से  जान बचाइये हमारी डाॅ ने हमे लैंस की सलाह दे डाली खर्चा  सुन  लैंस चक्कर पड़े भारी चुपचाप चश्मे…

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"#Kavita by Reeta JaiHind Arora"

#Kavita by Kavi Santosh Kumar Preet

जीवन के सफर में तो कई मोड़ आते है, हर मोड़ मगर आखिरी मंजिल नही होता।   बस मुश्किले हालात समझने की देर है, आसान वरना कौन सी मुश्किल नही होता।।   इंसान हारता है तो बस अपने आप से, वरना ओ कौन है कि जो काबिल नही होता।   अपना जो हक है बढ़ के जमाने से छीन लो, उम्मीद बस रखने से कुछ हासिल नही होता।   दरिया में भी  होती नही फिर…

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"#Kavita by Kavi Santosh Kumar Preet"

#Kavita by Vivek Bhaskar

कोई टोपी बेच देता है । तो कोई अपनी पगडी बेच देता है ।। मिले गर भाव अच्छा तो जज भी अपनी कुर्सी बेच देता है । तवायत तो फिर भी अच्छी है । कि वो सीमित है कोठे तक ।। पुलिसवाला तो खुले चौराह पर अपनी वर्दी बेच देता है । जला दी जाती है ससुराल मे अक्सर वही बेटी ।। जिस बेटी के खातिर पिता अपनी किटनी बेच देता है । कोई मासूम…

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"#Kavita by Vivek Bhaskar"

#Kavita by M D Juber

आजादी ** जब हम थे सोए तब कोई ख़्वाब था आया किसी अपने ने ही खून था बहाया,,,,,,   लेकर निशानी हम भूल गए उनकी कुर्बानी किसी अपनो ने ही आज़ाद हिन्द का मसाल था जलाया,,,,,   यहाँ कभी था शोर शराबा खुब चली थी गोली हमें तो दे दी आजादी ख़ुद तो खेला खून की होली,,,,,,   गुजरती हवाओं ने भी कहा यही हैं सुरवीरों की नगरी उन्होंने भी ऐसा फरमान किया जाते-जाते तिरंगे…

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"#Kavita by M D Juber"

#Kavita by Sanjay Ashk Balaghati

चीर देंगे -फाड देंगे जिंदा ही गाड देंगे   बहुत हो गया अब पाक तुझे उजाड देंगे   हर पत्थर का जवाब हम अब पहाड देंगे।   गोली सिधे भेजे मे अब ना तिहाड देंगे।   बड रहे कदम सेना के अंदर तक खदाड देंगे।   संजय अश्क बालाघाटी

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"#Kavita by Sanjay Ashk Balaghati"