#Kavita by Rajesh Teli Bhilwara

चेहरा है कि तराशी हुई मुहूर्त है, मेरे ख्यालों से भी बेहद खूबसूरत है – जब भी देखता हूं तो नजर ठहर जाती है, एक उसके सिवा और कोई नजर नहीं आती है, नजर हटाना भी जो चाहूं तो जो बार बार सामने आ जाती है, वह उसकी सीरत है, चेहरा है या तारासी हुई मुहूर्त है मेरे ख्यालों से भी बेहद खूबसूरत है!   चांद भी कभी तुम्हें देखेगा, तो उसका घमंड टूट जाएगा,…

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#Lekh by Amit Khare Sevada

एक सपना जो सच न हो सका-अमित खरे 1999 तक मुझे यह मालूम नहीं था कि साहित्य में कवि सम्मेलन भी होते हैं। हमारे नगर की एक संस्था गाँधी पुस्तकालय 1946 से लगातार कवि सम्मेलन करती है जिसमें वसंत पंचमी पर आयोजित होने बाला अखिल भारतीय कवि सम्मेलन भी शामिल है । 1999 में कुछ मित्रों ने जिद करके दतिया से बुलबाया कि इसबार वसंत पंचमी पर मधुमिता शुक्ला आ रहीं है सो पहली बार…

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#Kavita by M D. Juber:

  एक पंछि और प्रेम (कविता) एक पंछि की हैं कहानी, बस प्रेम को निभाना था, टुटे हुए थे पंख उनके, फिर भी उड़ के जाना था… उसी रात आना था तुफान, तुफान तो चला गया, टुट गई वह डाली, जिनपर उसका आसियाना था… दिल पर था गमों का बोझ, खुशि का तो एक बहाना था, एक पंछि की हैं कहानी, बस प्रेम को निभाना था, टुटे हुए थे पंख उनके, फिर भी उड़ के…

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"#Kavita by M D. Juber:"

#Muktak by Suresh Tiwari

**   एक मुक्तक  **   आगे है परसाद का वितरण, पीछे चलता चीर हरण….!!   सौम्य मुखौटों के भीतर में, अध सोये हैं कुंभकरण….!!   मानव मास का भोग लगाकर, जो हैं बिराजे गद्दी पर……!!   बुद्ध के उपदेशो का  देंगे, लम्बे चौड़े वो उद्धरण……!!   सुरेश सैनिक…….!! 9236717074    

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#Kavita by Gaurav Tripathi

इतना चका चौंध दुनियां का दो आंखो में कैसे आए, मुझसे पूछो इतने अनुभव एक कण्ठ से कैसे गाए,   बड़ा कठिन है इस दुनियां में अपना और पराया पाना, और कठिन है जग में सारे सच्चाई का राह ठिकाना,   ऐसे मिले अमीर जो कहीं निचाई से नीचे थे, ऐसे मिले गरीब जो आसमान से भी ज्यादा ऊंचे थे,   मिले कई ऐसे अपने भी जो गैरों से कहीं दूर थे, कुछ ऐसे भी…

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"#Kavita by Gaurav Tripathi"

#Kavita by Nirdosh Kumar

फर्क… (अमीर और गरीब में….)     य दर्दों को मैंने ऐसे जिया है जैसे तूने खुशियों को जिया है चोटों को मैंने ऐसे सहा है जैसे तूने फूलों को सहा है आंसू को मैंने ऐसे पिया है व जैसे तूने अमृत को पिया है जख्मों को मैंने ऐसे पढा है जैसे तूने गीता को पढा है   कवि निर्दोष कुमार पाठक पेन्ड्रा रोड (छग) 9893453078

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#Kavita by Gayaprasad Rajat

सजल 🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄🎄 गोलियां संभालकर  रखना ,मौसम ठीक नहीं . बोलियाँ संभालकर  रखना ,मौसम ठीक नहीं . हवाओं से भी खतरा है तुम्हें हर कदम है बचना , रोटियां संभालकर रखना ,मौसम ठीक नहीं . नज़र नश्तर से पैनी है ज़माने में शरीफों की, बेटियां संभालकर रखना ,मौसम ठीक नहीं . छीन लेते हैं हाथों से बक्त जब इनको मिलता है , झोलियाँ संभालकर रखना ,मौसम ठीक नहीं . काट देते हैं बो खुद ही कि…

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#Kahani by Vishal Narayan

–“लड़का हूँ न”–   My Dear Mother, आज कुछ पुरानी तस्वीरें पलटते हुए ये तस्वीर हाथ लगी और साथ में एक पुरानी चिट्ठी भी, जो कभी पाँचवीं में पढ़ते वक्त आपको लिखी थी मैंने. इन दस पन्द्रह सालों में कागज फाख्ता हो गया है और स्याही बदरंग. पर उस पर लिखा सवाल अभी भी जस का तस है. कहाँ हो अम्माँ.   मुझे मालूम है मेरी ये चिट्ठी न पहले आपतक पहूँची थी न अब…

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#KLavita by S B S Yadvesh

विश्व पर्यावरण दिवस पर मेरी एक नई कविता   मैं सृजनता  !   तू संहरता   ? क्यों मैं घटता !     क्यों तू बढ़ता ?   मेरी जड़ता में फले हुए , तू खाले फल सूँघ ले फूल क्यों मैं घटता !       क्यों तू बढ़ता ?   मैं कोयल बनकर कूकू कर , देती हूँ तुमको मधुर गीत  । तुम बाज पालतू से  मेरा , खा जाते हो कटवा के  घींच  ॥ क्या मानवता ये ही कहता…

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#Gazal by Rajesh Kamaal

ज़रा देखो घिर गया है बादलों से आसमान बरसेंगे लहक के तो जी जाएगा ये किसान खाद-बीज-बुवाई का बड़ा कर्ज है पहले से लील जाएगी उसको मोटे बनिये की दुकान हाथ पीले करने हैं इस कार्तिक में कन्या के बेटे की पढ़ाई है और बनाना है इक मकान बीवी बेवा-सी लगती है बेरंग चीथड़ों में बाप के दमे की दवा का करना है इंतजाम जमीन गिरवी पड़ी है बैंक में परसाल से ही कहा नहीं…

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#Kavita by Madhumita Nayyar

क्या महसूस कर पाते हो तुम?     क्या महसूस कर पाते हो तुम? मेरे सीने मे छिपे हर दर्द को? क्या तुम देख पाते हो मेरे दिल के हर दरार को? छू पाते हो क्या तुम हर रिसते हुये ज़ख़्म को? क्या बता पाओगे कि मेरी रूह कहाँ बसी है और कहाँ कहाँ उसे चीरा गया है? पैनी कटारों से उसे कहाँ गोदा गया है? नोची गई हूँ, उजड़ी हुई हूँ, नुकीली, धारदार चीज़ों…

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"#Kavita by Madhumita Nayyar"

#Kavita by Amit Kaushik

“व्यथा” एक पहाड़ की मे पहाड़ हूँ, मे घोर तपस्या मे लीन हूँ, अडिग हूँ, बिना किसी हलचल के, तुम मेरी तपस्या को भंग करते हो, मुझ पर अनगिनत प्रहार करते हो, दर्द होता है मुझे, जब प्रहार होता है, पर मे विनम्र हूँ, सहनशील हूँ, तुम्हारी तरह, क्रोध नही करता, क्या बिगाड़ा है, मेने तुम्हारा, मे टूटता हूँ, कटता हूँ, तूम्हे आसरा देने को, तुम्हारा घरोंदा बनाने को, तुम्हारी तरह, उजाड्ता नही हूँ, आशियाना…

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#Kavita by Mahakal Bhakt Kuldeep

अब न जाऊ तोहे छोड़ के में प्रेम में पागल हु तेरे मोह-माया छोड़ी नहीं मेने सारा छोड़ दिया संसार ओ गिरधर प्रेम में पागल हु तेरे   प्रेम व्रज की रज से किया मेने प्रेम तेरी मुरली से किया मेने न किया प्रेम तेरे प्रेम से में प्रेम में पागल हु तेरे   बार-बार चेरी करू तेरी में लाख बार तुजको मनाऊ न मना पाया तुजे कान्हा में में प्रेम में पागल हु तेरे…

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#Gazal by Karan Bahadur Sahar

सभी इल्ज़ाम वो मुझ पर करते हैं, इतने निडर हैं कि मौत से डरते हैं।।   अजी पत्थर तो पत्थर ही होगा ना, फिर क्यूँ वो इस दिल पर मरते हैं।।   अजब दोस्ताना है अपना भी, वो जीते हैं हम मरते हैं।।   कुछ लोग ही कर गुज़रते हैं, हम तो बस अर्ज़िया भरते हैं।।   वो क्या समझें वो क्या जाने, हम कितना उन पे मरते हैं।।   अपना ये इश्क अमर हो…

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"#Gazal by Karan Bahadur Sahar"

#Kavita by Dr.Mangesh Jaiswal

पर्यावरण बचाओ   मेरे मन में एक ख्वाब पल रहा है, धूप तेज है मगर बदन जल रहा है, बेपरवाह-सा मदमस्त हूँ  धुन में, कुछ दर्द ज़रूर है,पर घर चल रहा है।   इस धरती माँ पर कुछ तो रहम करो, पर्यावरण बचावो कुछ तो शरम करो, धरा नही तो कुछ नही रहेगा मंगलेश, याद रखे नई पीढ़ी कुछ तो करम करो।   ओजोन पर्त में छेद हो रहा है, मनुज आधुनिकता में खो रहा…

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"#Kavita by Dr.Mangesh Jaiswal"

#Muktak by Kavi Nilesh

सारी कि सारी सभ्यता पानी में आ गई साड़ी से चली नारी अब जवानी में आ गई ये वक्त का प्रहर कैसा रुप ले लिया छुप के नहाने वाली अब सड़कों पे आ गई ** ये जवानी मैं तुमको,  उपहार दे दूं जिंदगी  है मेरी,  मैं तुमको सार दे दूं सफर हैं मेरे पर मैं थकती नहीं हूं । थककर भी  मैं, तुमको बहार दे दूं ये जवानी मैं तुमको,  उपहार दे दूं

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"#Muktak by Kavi Nilesh"

#Kavita by Vivek Bhaskar

किसान आंदोलन को अचानक समाप्त करने पर आक्रोश व्यक्त करती एक कविता 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 किसानो का संघर्ष एक नया पृष्ठ लिख रहा था, तभी सत्ता हितैषी संघ बंद कमरे में बिक रहा था,   सरकार के दुमछल्ले संघ,अब तक क्यो मौन थे..? हमारे भाग्यविधाता बनने वाले आप कौन थे..?   तुम्हे क्या अधिकार,कि सरकारो से सवाल करो, बंद कमरे मे कैसे कहा,कि खत्म हड़ताल करो,   आने वाली पीढ़ी भुगते,एसा समझौता मत करो, अन्नदाता के पसीने…

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"#Kavita by Vivek Bhaskar"

#Kavita by Reeta JaiHind Arora

कन्यादान   दुल्हन की बारात सजी है दूल्हा राजा पहने सेहरा दुल्हन के श्रंगार से माना धरती स्वर्ग सी लग रही है     बारात आयी दरवाजे पर स्वागत में सब जुटे हुए है दुल्हन के पापा पर माना चिंता साफ झलक रही है     स्वागत के पश्चात देहरी पर दूल्हा राजा अड़े  खड़े है दुल्हन के भाई और चाचा दूल्हे जी को बुला रहे हैं     समधी जी दूल्हे को बोलो पंडित…

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"#Kavita by Reeta JaiHind Arora"