#Muktak by Dr. Krishan Kumar Tiwari Neerav

मुक्तक गिनतियां उल्टी गिनवा रही भुखमरी, दूध  बच्चों का छुड़वा रही  भुखमरी, कच्छियाँ तक भी जिनसे संभलती नहीं नौकरी उनसे  करवा  रही भुखमरी। ** सब रहें प्रेम से राग पैदा करो, पत्थरों में भी अनुराग पैदा करो, अपने तप से जला दो घृणा द्वेष को मंत्र से फूँककर आग पैदा करो! ** तुम जहां तक चलो मैं वहां तक चलूं, साथ हो आपका  मैं जहां तक  चलूं, शर्त  है  बींच में  साथ मत  छोड़ना —…

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#Kavita by Ishq Sharma

एक पैग़ाम ‘माँ’ के नाम “”””””””””””””””””””””””””””””””””””” माजी, अम्मा, आई, माँ, मेरी अपनी पुरवाई, माँ। “”””””””””””””””””””””””””””””””””””” पुचकारती  बे’वक़्त भी, वो कैसे हो हरजाई, माँ। “”””””””””””””””””””””””””””””””””””” हँसाहँसा के पेट फूलादे, खुद  भले  मुरझाई, माँ। “”””””””””””””””””””””””””””””””””””” एकबरस में मौसम चार, खुशियाँ बहार लाई, माँ। “”””””””””””””””””””””””””””””””””””” माथ बिंदी हाथ में कंगन, मांग  सिंदूरी  लगाई, माँ। “”””””””””””””””””””””””””””””””””””” कान झुमके नाक नथनी, नैनन काज़ल लगाई,माँ। “”””””””””””””””””””””””””””””””””””” तीरथ  सारे  पुरे हो  गये, बाबूजी के पैर दबाई,माँ। “”””””””””””””””””””””””””””””””””””” चौखट तक रही ज़िंदगी, लांघ…

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"#Kavita by Ishq Sharma"

#Kavita by Mukesh Madhuram Bareli

सुनी कोअनसुनी करके बहुत पछताना न हो जाये दीये में तेल भी देखो कि बाती का जल जाना न हो जाये जीवन क्या है एक महाअवसर दिव्य अनुभूति एक पावन बेला जीवनखोज रहे स्मरित नहीं तो लक्ष्य से भटक जाना न हो जाये -मुकेश मधुरम्

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"#Kavita by Mukesh Madhuram Bareli"

#Kavita by Prerna

“प्रकृति का कहर ”   प्रकृति के खेल को कौन समझ पाया है, आनन्द तो सभी लेते रक्षा कौन कर पाता है।   उत्तराखंड के प्रहर ने कितनो को रुलाया है, पहाड़ ,जंगल काटकर रास्ता सभी ने बनाया है।   बंद करो प्रकृति की सुंदरता को मिटाना, मिलकर सभी को यही कसम है खाना।   प्रकृति में मनोरंजन कर स्वस्थ, सुरक्षित रहते हो, फिर भी निर्दयी बनकर मुझे काटते रहते हो।   स्वस्थ ,शांति ,उपहास…

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#Gazal by Arun Sharma

इश्क में खुद को फना करना चाहता हूँ खुदा से यही फ़ैसला  करना  चाहता हूँ     तुम रहो पाक  युँ  दुनिया  के  हैहात से दिन – रात यही दुआ  करना  चाहता हूँ     तेरा  अक्स  बनाने  की  कोशिश  में हूँ आज फिर वही  खता करना चाहता हूँ     तुम्हारे  होंठों  को  छूने  की  कशिश है मुहब्बत का सिलसिला करना चाहता हूँ     मेरे   हाथों   की   लकीरें   कह  रही  हैं दर्द  को …

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"#Gazal by Arun Sharma"

#Kavita by Ajeet Singh Avdan

स्वाभिमान ~~~~ मन इक आशा जगी,नेक अभिलाषा जगी । कविताई का प्रभाव,घर में जमाते हैं ।। घरवाली से विकट,होती आई खटपट । के निदान हेतु इक,छंद आजमाते हैं ।।   चाटुकारी छाँव तले,दिल व दिमाग चले । अति प्रिय लेखनी की,धार को भुनाते हैं ।। तज निज आन-मान,रूठी हुई भाग्यवान । के निकट बैठ थोड़ी,ऐंठ सुलझाते हैं ।।   भिण्डियों को काटती वो,मेरी ओर ताकती वो । भृकुटि की भाव-भंगिमा पे थर्राया मैं ।। कण्ट…

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#Gazal by Kishor Chhipeshwar Sagar

  रिश्ता दिलों का मै निभाता गया ——————————————- तुम्हे देखकर मै मुस्कुराता गया धीरे से तेरे करीब आता गया   आरजू थी तुमसे दिल लगाने की बेवजह ही मै शरमाता गया   हाल ए दिल कह ना सका आँखों से प्यार जताता गया   चूम लेता था तेरी तस्वीर को भी और जमाने से छुपाता गया   वो लबो की मुस्कान जुल्फे झटकना तेरा हर अंदाज मुझे भाता गया   तेरे जिश्म की आरजू नहीं…

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#Shayari by Sanjay Ashk Balaghati

तमाम उम्र पलको पर शबनम जमी रहेगी पर जब भी तुम मिलोगी मुस्कान बनी रहेगी क्या हुवा जो अधुरा ही रह गया अपना प्यार तुम खूश रहोगी तो इसी मे मुझे खूशी रहेगी. … तुम्हारी मांग मे किसी का सिंदूर अच्छा है मुनासिब अब मेरा तुमसे रहना दूर अच्छा है प्यार तो तमाम उम्र रहेगा हम दोनो के दरमयां पर होकर जूदा निभाना जग का दस्तूर अच्छा है …  संजय अश्क बालाघाटी

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"#Shayari by Sanjay Ashk Balaghati"

#Kavita by Nitish Kumar Rajput

बैठे बैठे कुछ यूँ ही…   घर मेरा जन्ऩत है,और माँ,बहनें मेरी परियां हैं.. पत्नी मेरी राधा जैसी,हम उसके सावरियां है..   तुम देखो नारी के तन को,मै मन की व्याकुलता देखूँ.. अलग है सबकी सोच यहाँ,सबका अलग नज़रिया है..   इन तूफ़ानों से कह दो, हमको ताक़त ना दिखलाये यूँ… दीपक की लौ समझे ना, हम आग का पूरा दरिया हैं…   पूरा का पूरा भारत ही,बसता है मुझमें यूँ की… दिल में मेरे…

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#Kavita by Kavi G S Joshi

एक सैनिक का दर्द । ** में सैनिक हूँ भारत माँ का, शांति शौर्य की भाषा मेरी या तो दिल्ली वाले कश्मीर का वादा भूल गए या जनता को झूठा आश्वासन देना वो भी सिख गए ! # अब सिन्दूर नही मिटने दूगा ,मै चातो का प्रतिघातक हूँ ,दिल्ली वाले केवल मोहलत दे दे ,लाशों की गिनती करना मुश्किल कर दू में ! #  विधवा होती बहन हमारी ,माँ की गोदी खाली खाली हो ,दर्द…

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"#Kavita by Kavi G S Joshi"

#Kavita by Sonika Mishra

मुझे भी कभी, निहारा करो, सांसो में तुम्हारी, बस जाऊँगी। दिल में मेरे कभी, आया करो पलकों में तुम्हारी, ठहर जाऊँगी।।   बहुत दिन से तुमने जताया नहीं है इश्क लवो पे आया नहीं है मेरी गली से कभी गुजरा करो बनके घटा मैं बरस जाऊँगी मुझे भी कभी, निहारा करो, सांसो में तुम्हारी, बस जाऊँगी।   रूठा हुआ है अँधेरे से दीपक रौशन किया है सारा जहां कही भी रहे तू जलता हुआ कदमो…

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#Kavita by Md Juber Husain

उड़ान (हवा का झोका)   फैला हुआ हैं पंख, हवा का झोका तो आने दो, हमें भी भरना हैं उड़ान, तेज हवा का झोका तो आने दो…. न मिलेगी चेहरे पे शिकन, सिर्फ मिलेगी खुशियाँ बस, हमारा मौका तो आने दो, तेज हवा का झोका तो आने दो…. दुनिया हो जाएगी छोटी, एक उड़ान तो भरने दो, सर उठाकर देखोंगे हमें बस, हमारी पहचान तो आने दो, तेज हवा का झोका तो आने दो…. आँखो…

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#Kavita by Nirdosh Kumar

(यह……चांद…)     सर्द निशा की निस्तब्धता में भी य चांद कुछ आहट सुनने लगा चांदनी बिखेरने के बहाने धरा से य चांद कुछ चुनने लगा प्रकृति के स्तब्धता पर भी झींगुर कुछ गाने लगा पवन गुनगुनाने लगा व दिवस के श्वेत उजाले में हमने उडेला था जो जहर य चांद उसे समेटने लगा स्तब्धता के साथ पहर दर पहर         कवि निर्दोष कुमार पाठक पेन्ड्रा रोड(छग) 9893453078

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#Kavita by Madhumita Nayyar

दिल-दुनिया       एक कोने में माँ के हाथ की बुरकियाँ, तो कहीं हँस रही बाबा की मीठी झिड़कियाँ, दिखाई दे रही कुछ वाहवाही की थपकियाँ, देखो पीछे मचल रही जीजी की झूठी थमकियाँ।   वो छुपे घर-घर के खेल के बरतन, अनगिनत कागज़ के कतरन जिनसे बनाकर कितने ही प्लेन, उड़ा रहे देखो कैसे तन तन।   कुछ खट्टे मीठे झूठ, देखो कैसे मै जाती थी रूठ! पतंगों की लूट, कितने गीत, जो…

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#Kahani by Mahakal Bhakt Kuldeep

में तब 11 साल का था मुझे याद है बहुत बीमार था और उस वक़्त दवाई कराने के लिये भी पैसे नहीं थे क्योंकि कोई था ही नहीं घर में कमाने वाला और पिताजी पुरे दिन नशे में चूर रहते थे । जितना कमाते थे उससे ज्यादा की वो शराब पी जाते थे । और माँ भी छोटा-मोटा काम कर लेती थी बस इसी से घर चलता था । जब डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने…

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"#Kahani by Mahakal Bhakt Kuldeep"

#Gazal by Karan Bahadur Sahar

  वो कोई और नहीं तेरा ही अपना है, इक अधूरा अधमरा सा सपना है।   कुछ खटकता सा है दिल में मेरे, शायद फिर किसी दर्द ने पनपना है।   ज़मीं के ऊपर ही है दुख-दर्द के खेल, ज़मीं के नीचे ना रोना ना तड़पना है।   कल किसी फूल का ख़त आया था मुझे, उसको मेरी खुशबू, मेरा रंग हड़पना है।   अब कोई और कारोबार नहीं “सहर” का, उस की हर याद,…

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"#Gazal by Karan Bahadur Sahar"

#Kavita by Dilip Singh Charan

दमण रतन पिचहतरी दीप चारण कृत   शब्द दिजै मां सारदा, गणपति दीजो ग्यान। रीत लिखतां पदमण री, धरू आपरो ध्यान।। 1   रतनसिं रंगमहेल, निहारन लगो नागमति । रूपल दीठी पैल? पुछत नागमति कंत नै।। 2   उड़ हीरामन आय, कैय तुं उण समि कैंइ नी। जोय रतनेश जाय, सिंहल द्वीप री सुंदरी।। 3   सटपट सूवे संग, सिंहल द्वीप दिस रतनसीं। टूरिया अश्व टंग, पथ झट झाल पदमण रो ।। 4   बड़बड़…

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"#Kavita by Dilip Singh Charan"

#Kavita by Kapil Jain

•••क्षणिकाएं•••••   1) बातो से तेरी.. रचना रच जाती है कविता लिखता मैं.. बाते कविता जैसी तुमको आती है…   2)   मैं  तलाश करूँ तुम्हे .. मिल जाओ तुम मुझे . इतनी तो आसान नही ये जिन्दगी…   3)     ख़त तुम्हारे लिये.. मैंने इस साल लिखे…. उलझे हुए जवाबों मे… अधूरे सवाल लिखे… कई ख़त तुम्हारे लिये.. इस साल लिखे… कुछ शिकायतो के कुछ महीनो के प्यार लिखे… कुछ तुम्हारी शरारते कुछ…

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"#Kavita by Kapil Jain"

#Gazal by Sawan Ajmer (Shukla Missing)

  रोज के रोज कुछ नया करना ।। सख़्त मुश्क़िल है तज़र्बा करना ।।   हिज्र हम दिन ही दिन का रक्खेंगे ।। तुम ‘न‘ रातों को सो लिया करना ।।   बस यही काम है हमारा अब ।। अपने होने पे तब्सिरा करना ।।   पहले दुनिया को कोसना जी भर ।। और फिर ख़ुद पे हँस लिया करना ।।   धीरे धीरे तुम्हें समेटें हम ।। धीरे धीरे ही तुम खुला करना ।।…

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"#Gazal by Sawan Ajmer (Shukla Missing)"

#Gazal by Vijay Kumar Rahi

बडों ने ये बडा अच्छा कहा है। फकीरी का अलग अपना मजा है। अकेले ही सफर करना करना है सबको, तू किसका रास्ता फिर ताकता है। कभी क्या चांद उतरा है जमीं पर, मेरा दिल फिर भी जिद पे क्यों अडा है। तुझे जब साथ चलना ही नही है, तुम्हारे सामने ये रास्ता है। खटकता है वो गुलची की नजर में, चमन में फूल जो ताजा खिला है। वही समझेगा धन-दौलत की कीमत, गरीबी में…

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"#Gazal by Vijay Kumar Rahi"

#Kavita by Dharmendra Kushwaha

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई धर्म के नाम पर मत करो लड़ाई एक तो मैंने तुम्हारे लिए ये दुनियां बनाई फिर भी करते हो व्यर्थ में जग हंसाई ऊपर से सभी धर्मों में दी है लुगाई जिसमें बहुत है मस्ती और खूब है अंगड़ाई फिर भी सालों को अभी तक शर्म नहीं आई मेरी बात मानों इसे नहीं कहते खुदाई ये तो झगड़ने का रास्ता है जिसमें सबकी हो सकती है पिटाई सब जी भरके मेहनत…

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"#Kavita by Dharmendra Kushwaha"

#Gazal by Uday Shankar Chaudhary

दरख्तों में मेरे देखो लगाए जाल बैठे हैं संभलकर हीं जरा चलना बिछाए जाल बैठे हैं —– परिंदों तक को भी छोड़े नहीं ये जहां वाले फंसाने के लिए हर ओर दाना डाल बैठे हैं —— हंसी में भी जहर है कुटील मुस्कान है इनकी जहर से भड़े घट में शहद ये डाल बैठे हैं —– कौवे उल्लुओं में है गजब की दोस्ती गहरी हंश का क्या कहें छुपकर बुरे बेहाल बैठे हैं —— भड़ोसा…

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"#Gazal by Uday Shankar Chaudhary"