#Kavita by Kirti Vidya Sinha

आम का पेड़ मेरे आंगन का वह आम का पेड़ मेरे बचपन का वह आम का पेड़ माँ के हाथ की अचार में सनी रोटी झूला झूलते हुये लम्बी सी चोटी वह गुलगुले वह मीठे पराठे आम के पेड़ के नीचे बैठ कर हम खाते मेरे आंगन ——————– जब लगी मैं दहलीज लाघंने माँ की होने लगी हिदायतें पर था वह आम का पेड़ जो देता था कुछ मुस्कराहटें रोती खुश होती लिपट जाती थी…

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"#Kavita by Kirti Vidya Sinha"

#Kavita by Anand Shinghanpuri

कुछ शब्द बाकी हैं तुझको क्या दूँ, हिसाब दूँ। या किताब दूँ आवाज दूँ या ख़िताब दूँ। सुन तो लो, अभी भी कुछ शब्द बाकी हैं। तेरे मेरे बुनियाद के कुछ फरियाद के कुछ अफ़साने है उन हंसी जज्बात के कुछ शब्द बाकी हैं।। उन लम्हों की दरमियाँ गूंजती चहुँ छोर मन मे फुदकते उचकते ख़्वाब भरे आशाएं कुछ शब्द बाकी हैं।

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"#Kavita by Anand Shinghanpuri"

#Muktak by Annang Pal Singh

समय अवधि वा कार्यमें , व्यवहारिकता लाव ! वरना पैदा करेगी , यह मन माहिं तनाव. !! यह मन माहिं तनाव , देय अवसाद. घनेरा ! अतः समय के बंधन. पर मत खींचो घेरा !! कह ंअनंग ंकरजोरि,रिक्त कुछ करो वक्त तय ! फिर तनाव ना देगा तुमको, कभी ये समय. !!     पने को पहचानना अाध्यात्म आधार ! अपने में उस रूप को देखो भली प्रकार !! देखो भली प्रकार,साथ है वह नित…

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"#Muktak by Annang Pal Singh"

#Kavita by Vikram Gathania

कविता यह सच है यह जो मंजर है आँखों के सामने का बेमानी है इस पर एक  कविता लिखी भी नहीं जा सकती एकदम सोचकर या सोचकर बहुत लंबा चौड़ा अक्सर देखा हुआ मंजर है यह और यह भी कि तुम्हें फुर्सत नहीं है दैनिक व्यस्तताओं के अतिरिक्त की हो सकता है इस मंजर पर तुम लिख चुके होओ कविता पहले भी कभी और ऐसा भी नहीं है कि दुबारा न लिखी जा सकती हो…

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"#Kavita by Vikram Gathania"

#Haiku by Dr. Sulaxna Ahlawat

सारे हैं मौन मर रहा किसान  दोषी हैं कौन   मजे की बात हो रही सियासत देखो हालात   चिंता वोट की  खिसक रही कुर्सी ऐसी चोट की   ना है आयोग जो सुने किसान की बढ़ा है रोग   राज बदले  हालात ना सुधरे ताज बदले    क्या करे कोई सुलक्षणा सोच में  जनता सोई   ©® डॉ सुलक्षणा

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#Gazal by dharmender arora

*पत्थरों के दिल* शानो शौकत से भरे जो घर मिले ! पत्थरों के दिल वहीं अकसर मिले !! :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: फूल जिनके हाथ में दे आये हम ! आज उनके पास में खंज़र मिले !! :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: ज़िंदगी से क्यूँ शिकायत हो हमें ! जब जहाँ में दिलनशीं मंज़र मिले !! :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: देश भर के जो दिलों को जोड़ दे ! काश ऐसा भी कोई रहबर मिले !! :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: जो तरसता ही रहा इक बूँद को !…

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#Kavita by Brij Vyas

हरी भरी धरती है , और घनेरी छाँव है ! यह हमारे गाँव हैं !! गहरे कुँए , बहती नदिया , है पोखर में पानी ! यहाँ नहीं स्वीमिंग पूल होते , बच्चों की मनमानी ! दूजे , तीजे , चौथे , अंतिम , कूद रहा है बचपन ! अल्हड़पन ऐसे ही पलता , निडर यहाँ लड़कपन ! सूरज ने छाया कर दी है – धूप के उखड़े पाँव हैं !! पकड़म पाटी और कबड्डी…

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#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

खुश है ज़िंदगी से जो, उसे आबाद रहने दो ! दिल की धड़कनें यूं ही, बे आवाज़ रहने दो ! न उखाड़ो गढ़े मुर्दों को यूं ही बेसबब यारो, यूं गुज़रे हुए लम्हों को, मत आज़ाद रहने दो ! नहीं है फरिश्ता कोई इस जमाने में अब तो, संभालो खुद को ही, औरों की बात रहने दो ! न सिखाइये अपनी सरगम किसी को “मिश्र”, जो खुश है जिस अंदाज़ में, वो अंदाज़ रहने दो…

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#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

मन का दुःख किससे कहें,सब दुःख के आधीन हम बतलइहें एक दुःख ,सब बतलइहें तीन। धर्मध्वजा सौंपी जिन्हें ,धर्म का करते नाश चाँद बादलों ने ढका ,जुगुनू करत प्रकाश। संचारों ने कर लिया ,पृथ्वी को आधीन घटे फासले तो मगर ,दूर हुए गुन तीन। डिग्री लिए प्रदेश में ,मूरख फिरते आज वेद लादकर पीठ पर,गधे चरें ज्यों घास। धर्म जाति सब अलग थे ,पर मन से थे एक राजनीति ने हर लिए ,सबके ज्ञान ,विवेक।…

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"#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan"

#Muktak by Mithilesh Rai Mahadev

दर्द तेरा कायम है याद भी आ जाती है! #शाम_ए_तन्हाई में बेइन्तहाँ सताती है! हंसने की जब भी तमन्ना होती है दिल में, ख्वाबों की चुभन से मेरी आँख भर आती है!

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"#Muktak by Mithilesh Rai Mahadev"