#Kavita by Shabnam Sharma

पिता कन्धे पर झोला लटकाए, खाना व पानी लिये, देख सकते दौड़ते-भागते पकड़ते लोकल ट्रेन, बसें। लटते-लटकाते, लोगों की दुतकार खाते, कभी घंटे भर का तो कभी घंटों का सफर करते। ढूंढते पैनी नज़रों से, कहीं मिल जायक हाथ भर बैठने की जगह, मिल गई तो वाह-वाह, वरना खड़े-खड़े करते, पूर्ण वर्ष ये सफर। पहुँच दफतर, निबटाते काम, खाते ठंडा खाना, पीते गर्म पानी, बचाते पाई-पाई। लौटते अंधेरे मुँह घर, कल फिर से आने की…

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"#Kavita by Shabnam Sharma"

#Kahani by Vishal Narayan

हुआ यों कि पति ने पत्नी को किसी बात पर तीन थप्पड़ जड़ दिए, पत्नी ने इसके जवाब में अपना सैंडिल पति की तरफ़ फेंका, सैंडिल का एक सिरा पति के सिर को छूता हुआ निकल गया।   मामला रफा-दफा हो भी जाता, लेकिन पति ने इसे अपनी तौहिनी समझी, रिश्तेदारों ने मामला और पेचीदा बना दिया, न सिर्फ़ पेचीदा बल्कि संगीन, सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा, यह भी कहा कि…

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"#Kahani by Vishal Narayan"

#Kavita by Dr. Sarla Singh

एक छोटी सी बच्ची ।   रेल खड़ी होते ही , भागती इधर से उधर । थामे हुए अपने ही कद का, एक बोरा पैबन्द वाला । भर रही उसमें वो भोली, फेंके हुए खाली पड़े बोतल पानी के। रेल की पटरियों पर दौड़ती , पा सके ताकि अधिकतम  । खुद से बड़े बोरे के कारण , बार कई वो गिरती , लड़खड़ाती गिरती उठती । छोड़ती  फिर भी ना , आस अपनी वो  बच्ची…

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"#Kavita by Dr. Sarla Singh"

#Kavita by Aparna Shiv Sharma

खुशियाँ कम और अरमान बहुत हैं । जिसे भी देखो परेशान बहुत है ।।   करीब से देखा तो निकला रेत का घर । मगर दूर से इसकी शान बहुत है ।।   कहते हैं सच का कोई मुकाबला नहीं । मगर आज झूठ की पहचान बहुत है ।।   मुश्किल से मिलता है शहर में आदमी । *यूं तो कहने को इन्सान बहुत है  

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"#Kavita by Aparna Shiv Sharma"

#Kavita by Kumari Archana

“शहादत” ** शहीद हो गई किसी माँ की गोदी, दुश्मनों  से लङते लङते सीमा पर, जिस लाल  को नौ महीन कोख में पाला था, आज उसी लाल को  खून से सना तरंगे में लिपटा देख, माँ की आसुँअन धारा ना रूकती, कभी माँ के आचंल में छुप जाया करता, दुसरोंके साथ शैतानीयाँ करके, आज वही आंचल ना बचा सका दुश्मनों से, गर्व से माथा कर सम्मान पा रही, पर दर माँ का सीना फट रहा,…

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#Kavita by Ram Niwas Kumar

युवाओं को आशीष🌹   कृपा रहे ईश की तुमपर, तुम बढ़ो दिन-रात मैं चाहता हूँ तन-मन से, विहँसे नवल प्रभात ।   बाधा-विघ्न न आवै पथ पर, रहो सदा गतिमान नन्दन-वन सा सुरभित हो, जीवन का उद्यान ।   बढ़े चलो जीवन भर तुम, हर पल नया आयाम विवेकानंद  आदर्श हैं  तेरे, करो संघर्ष सुबह औ शाम ।   दुनिया में युवा बहुत हैं, उनके कितने नाम निकल जाओ तुम सबसे आगे, कृपा करें श्रीराम…

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"#Kavita by Ram Niwas Kumar"

#Kavita by Prerna

-‘बाबुल’   धीरे बोलो गुस्सा मत करो, मुस्कराते रहो ये सब तुम सिखा गये।   विद्या का ज्ञान संस्कारो का पाठ, सिखाकर डोली में विदा कर गये।   बाबुल तुम छोड़कर कहा चले गये।।   त्याग ,ममता,स्वाभिमान से जीना सिखा गये,   आत्म ग्लानि से परे सर उठाकर, जब हम जीना सिख गये,   बाबुल तुम फिर भी छोड़कर चले गये।।   आपकी आत्मा की शांति, पारिवारिक ऊँच नीच को भूल,   हँसकर हर घूंट…

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"#Kavita by Prerna"

#Kavita by Binod Kumar

चम्पकमाला छंद शिल्प:-(भगण, मगण, सगण,गुरु) आप हमारे पालक पापा, नेह करे हैं बालक पापा। दे अपना आशीष हमेशा, कौन भला होवे तव जैसा। आज मुझे है संकट भारी, साथ सदा दे आप हमारी। देख रहा हूँ आहट पापा, आप रहे हैं चाहत पापा। बिनोद कुमार”हंसौड़ा  

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#Kavita by Karan Bahadur Sahar

Happy Father’s Day अपने कंधों पर बिठा सारी दुनिया की सैर कराते थे, मेरे पिता मुझे जिंदगी को जीना सिखाते थे।   मैं जब भी साइकिल सीखता हुआ गिर जाता था, ज़िंदगी गिर कर संभलना है, मेरे पिता बताते थे।   अक्सर मेरी गलतियों पे मुझे डांट देते पीट देते थे, मग़र फिर प्यार से मुझे सही रास्ता दिखाते थे।   मैंने ख़ुद नहीं माँगे कोई मिठाई, खिलौने या कुछ भी, क्युँकि मेरे पिता मुझे…

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#Muktak by Sandeep Saras

बेबाक   अनचाहे   अनुबन्ध  मुझे  स्वीकार  नहीं।   प्रियता पर प्रतिबन्ध  मुझे स्वीकार नहीं।।   जो     अपना    लगता   है   अपना लेता  हूँ,   शर्तों  पर  सम्बन्ध  मुझे  स्वीकार  नहीं।।   संदीप सरस,बिसवां 9450382515

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#Kavita by Shyam Achal

मेरा निर्माता   वह चट्टानों को तोड़ता रहा बनाता रहा हमारे लिए रास्ते   अपने खून को निचोड़कर पसीना बनाकर, बुझाता रहा हमारी प्यास   हमेशा मुफलिसी में देता रहा सांत्वना कहता कि महिने में एक दिन ना खाने से स्वथ्य रहता है शरीर फला ,फला ,फला महापुरूष एकबार ही खाते थे दिन में   मेरे लिए लाता हर त्योहार पर नये कपड़े वह फटे – चिथे कपड़े पहनकर खेल लेता होली जला लेता दिवाली…

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#Kavita by Minakshi Manhar

बाबुल मैं तेरे कण की किरण तेरे आँगन में हो गयी रोशन   बचपन बीता तेरी बांहों में झूल कर मन खुशबू  से हो गया चन्दन   अलबेली रही हर कदम पर मैं तेरे दुलार से हो गयी अन्जन   बेखबर  हूँ चाहे जमाने के दस्तूर से तेरे संस्कारों से हो गयी कुन्दन   सपने चाहे रह गये अधूरे मेरे मन फागुन भी खो गया नन्दन   मीनाक्षी मनहर    

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#Kavita by Kishor Chhipeshwar Sagar

पिता बेटे के होंठो पर मुस्कान करते है मुश्किले सारी आसान करते है   पिता होते है भगवान स्वरूप जिसपे हम अभिमान करते है   मौजूदगी से जिनकी महकता है घर आंगन पिता का हम गुणगान करते है   पिता की मेहनत से ही बनते है हम काबिल पिता के दम से हम नाम करते है   पिता होते है सहनशील शक्तिशाली पिता से ही हम अपनी पहचान करते है   पिता का मन होता…

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"#Kavita by Kishor Chhipeshwar Sagar"

#Gazal by Upendra Singh

मेरी तलाश में है ये दुनिया जहान सब। सूरज सितारे चाँद जमीं आसमान सब।   सच बोलने की मैंने तो कोशिश कभी न की, कोशिश बिना ही बोल दे मेरी ज़बान सब।   इसमें बहुत सी ख्वाहिशें जिंदा ही दफ़्न हैं, इंसान का ये जिस्म, है मदफन,मसान सब।   मुश्किल घड़ी में कर दो जो इंसान की मदद, वो मान लेगा इसको ही पूजा अज़ान सब।   बादल बुझा रहे थे समन्दर की प्यास को,…

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"#Gazal by Upendra Singh"

#Kavita by Dr. Manglesh Jaiswal

पापा…   पापा वट वृक्ष है,घनी छाया है, पापा आत्मविश्वास है,मेरा साया है, पापा मेरे ख़ास है,मेरा संबल है, पापा मेरे बॉस हैँ,मेरा मनोबल है, पापा मेरी दुनिया है,वो महान है, पापा मेरी आन है,मेरा सम्मान है, पापा की फटकार में भी प्यार है, पापा मेरे आदर्श है,वो सदाचार है, जब मुझे कुछ होता है,दिल उनका रोता है, मेरी ख़ुशी से वो खुश हो जाते है, पापा आप बहुत याद आते हैं मेरे आंसुओ से…

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"#Kavita by Dr. Manglesh Jaiswal"