#Kavita by Shabnam Sharma

पिता कन्धे पर झोला लटकाए, खाना व पानी लिये, देख सकते दौड़ते-भागते पकड़ते लोकल ट्रेन, बसें। लटते-लटकाते, लोगों की दुतकार

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#Kavita by Prerna

-‘बाबुल’   धीरे बोलो गुस्सा मत करो, मुस्कराते रहो ये सब तुम सिखा गये।   विद्या का ज्ञान संस्कारो का

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#Kavita by Binod Kumar

चम्पकमाला छंद शिल्प:-(भगण, मगण, सगण,गुरु) आप हमारे पालक पापा, नेह करे हैं बालक पापा। दे अपना आशीष हमेशा, कौन भला

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#Muktak by Sandeep Saras

बेबाक   अनचाहे   अनुबन्ध  मुझे  स्वीकार  नहीं।   प्रियता पर प्रतिबन्ध  मुझे स्वीकार नहीं।।   जो     अपना    लगता   है   अपना

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#Kavita by Shyam Achal

मेरा निर्माता   वह चट्टानों को तोड़ता रहा बनाता रहा हमारे लिए रास्ते   अपने खून को निचोड़कर पसीना बनाकर,

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