#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

भंवर से बच गया पर, साहिल पे फंस गया हूँ मैं ! बच गया गैरों से मगर, अपनों में फंस गया हूँ मैं ! कुछ ऐसा ही मुकद्दर लिख डाला है रब ने मेरा, कि आसमां से गिर कर, खजूर में फंस गया हूँ मैं ! मैंने भी चाहा कि उड़ता फिरूं परिंदों कि तरह, मगर अपनों के बिछाए, जाल में फंस गया हूँ मैं ! मैं गुज़ार लेता ज़िन्दगी भी जो कुछ बची है दोस्त, मगर खुद के ही मेरे, जज़्बात में फंस गया हूँ मैं  ! ज़रा से प्यार की खातिर मिटा डाला सुकूं हमने, अब तो बस तन्हाइयों के, दौर में फंस गया हूँ मैं !

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