# Kavita By Kapil Jain

दिन प्रतिदिन कुछ न कुछ लिखता हूं शब्दों के विविध रूप मस्तिष्क चाक पर गढ़ता हूं रगं-रूप-गंध कलम से गन्तव्य-पथ

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