#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

दिल के शोलों की जलन, हमसे पूंछो! कैसी है कांटो की चुभन, हमसे पूंछो! हो चुका है ख़त्म दौर-ए-शराफत अब, दोरंगी दुनिया का चलन, हमसे पूंछो! न समझो माली को बगीचे का मालिक, अब कैसे उजड़ते हैं चमन, हमसे पूंछो ! आज़ाद ज़िंदगी जीना तो सपना है अब, कैसे होता है उसका दमन, हमसे पूंछो! न उठाये फिरिये ग़मों का पहाड़ “मिश्र”, इसमें होता है कितना वजन, हमसे पूंछो !

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