#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

दिल की भी अब, चौकसी हो रही है ! मेरे चेहरे पे देखो, बे बसी रो रही है ! न सुना पाता हूँ दर्दे दिल किसी को, ऐसी अंदर से क्यों, बेकली हो रही है ! पतझड़ के बिना ही झड़ रहे है पत्ते, गुलशन में क्यों, खलबली हो रही है ! आते जाते भी लोग कस्ते हैं फब्तियां, राहों की धूल भी, मनचली हो रही है ! दिल के कारनामे न समझ पाए हम, ज़िंदगी बस यूं ही, अनमनी हो रही है ! लगा दो लगाम अब जुबां पे भी “मिश्र”, इसकी भी तासीर, कटकनी हो रही है !

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Sangeeta Nag Suman

संवेदनाओ के मापदण्डों पर चलता है जीवन का चक्र कभी सीधा कभी वक्र किन्तु तिमिर को हटाने के लिए सहज

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# Lekh By Ramesh Raj

हिन्दी ग़ज़लः सवाल सार्थकता का? +रमेशराज ग़ज़ल अपनी सारी शर्तों, ;कथ्य अर्थात् आत्मरूप-प्रणयात्मकता तथा शिल्परूप- बह्र, मतला, मक्ता, अन्त्यानुप्रासिक व्यवस्था

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