#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

कभी मेरी भी ज़िन्दगी तुम, बिता कर तो देखो ! कभी खुद को मेरी आग में, जला कर तो देखो !   कैसे गुज़रते हैं ज़िन्दगी के लम्हें तुम क्या जानो,  ज़रा अपनी आँखों पे पड़े पर्दे, हटा कर तो देखो !   बहुत ज़ख्म खाये हैं इस बेक़रार दिल ने दोस्त,    कैसे बहता है समंदर आँखों से, आ कर तो देखो !    हम तो खोये हैं आज भी उन गुज़रे हुए लम्हों में, आकर के कभी हम को, गले लगा कर तो देखो !    दिखता है मेरे चेहरे पे नहीं है वो हक़ीक़त“मिश्र“, गर जानना है सच तो दिल में, समा कर तो देखो !   शांती स्वरूप मिश्र

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#Kavita by Dr Prakhar Dixit

पनघट सूना सूना   आत्मश्लाघा से परिपूरित दम्भ द्वेष के सौदागर प्लावन मानिद संज्ञाओं की होती कोई आन नहीं।।  

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