#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

हमको बेसबब, सर खपाना बुरा लगता है ! ज़रा सी बात पे, आंसू बहाना बुरा लगता है !   जो दिल और चेहरे को रखते हैं दूर ही दूर ,  उन शातिरों को, मुंह लगाना बुरा लगता है !   मदद के नाम पे किसी को ठगो मत यारो ,  किसी की बेबसी को, भुनाना बुरा लगता है !   आज जो हम पे है कल किसी और पे होगी , हमें दौलत का दम, दिखाना बुरा लगता है !   ये अजब सा दौर है मक्कारियों का “मिश्र“, पर किसी मासूम को, सताना बुरा लगता है !   शांती स्वरूप मिश्र

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#Kavita by Rajendra Bahuguna

सत्ता के राष्ट्र-भक्त हे,राजनाथ जी महबूबा  मुफ्ती का ना गुणगान करो अलगाववाद के नेताओं को  ढूंढो  और  पहचान करो काशमीर

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#Lekh by Ramesh Raj

डॉ. नामवर सिंह की आलोचना के अन्तर्विरोध +रमेशराज ‘‘एक नये सृजनशील कवि के नाते मुक्तिबोध ‘काव्य और जीवन, दोनों ही

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