#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

गुलशन को उजाड़, बनाने में लगे हैं लोग ! बस ख़ारों से प्यार, निभाने में लगे हैं लोग ! अब न चिंता है अमनो चमन की किसी को, बस खुशियों में आग, लगाने में लगे हैं लोग ! मोहब्बतों की भाषा तो भुला डाली है सबने, बस ज़िन्दगी को भाड़, बनाने में लगे हैं लोग ! न रहा कोई मतलब हक़ ओ ईमान का इधर, अब तो औरों का माल, पचाने में लगे हैं लोग ! हर तरफ छाया है अब नफरतों का आलम, बस साजिशों के जाल, बिछाने में लगे हैं लोग ! कहाँ गयीं वो मुलाक़ातें वो मोहब्बतें “मिश्र”, अब तो दिलों के तार, तुड़ाने में लगे हैं लोग ! शांती स्वरूप मिश्र

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#Kavita by Roopesh Jain

 कैसी हो गयी हैं जिन्दगी ना कुछ सोचो ना कुछ करो, क्योंकि चाय के प्यालों से होंठों का फासला हो गयी है जिंदगी। भूख से बिलखती रूहों को मत देखो शान-औ-शौकत के भोजों१  में खो गयी है जिंदगी। बस सहारा ढूढ़ते, सड़क पे फट गए जूतों से क्या सुबह शाम बदलती गाड़ियों का कारवाँ हो गयी है जिंदगी। तन पे फटे हुए कपडे मत देखो नए तंग मिनी स्कर्ट सी छोटी हो गयी है जिंदगी। पानी की तड़प भूल कर महगीं शराब की बोतलों में खो गयी है जिंदगी। फुटपाथ पे सोती हजारों निगाहों की कसक छोड़ के इक तन्हा बदन लिए, हजारों कमरों में सो गयी है जिंदगी। हजारों सवाल खामोश खड़े; बस सुलगती सिगरेट के धुएं सी हो गयी है जिंदगी। डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

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#Tewari by Ramesh Raj

तेवरी— कहीं दिखायी दे नहीं शिव जैसा व्यक्तित्व डाले हुए गले में मिलते बस हरहार बहुत से हैं। अमरबेल-सी बढ़

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