#Kavita by Roopesh Jain

लोगों का क्या है लोगों का क्या है समझते कम हैं बिना जरुरत समझाते ज्यादा हैं समय पर काम आने से कतराते हैं सलाह मुफ़्त है बिन मांगे दे जाते हैं सुनते रहो ऊल जलूल तो ठीक कुछ कहो तो बुरा मान जाते हैं दूसरे के कष्ट में आता है मजा भला चाहने का ढोंग कर जाते हैं कोशिश करता हैं कोई सुलझाने की बेवजह आकर चीजें उलझाते हैं लोगों का क्या है….. डॉ रूपेश जैन ‘राहत’

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#Gazal by Shanti swaroop Mishra

इस जमाने में अब, नफ़रतों के सिवा बचा क्या है ! अब सफर में आगे, ठोकरों के सिवा बचा क्या है !   यूं ही घुट घुट कर मरना ही नियति है आदमी की, टूटे हुए दिल में उसके, सोचों के सिवा बचा क्या है !   ये शराफत भी न आती है काम कहीं भी अब तो, यारो दुनिया में अब, साजिशों के सिवा बचा क्या है !   गुज़र गए वो लोग जो मरते थे कभी अपनों के लिए, अब तो इस भीड़ में भी, रश्मों के सिवा बचा क्या है !   अफ़सोस कि खून के रिश्ते भी टूट चुके है अब तो,   दिलों में उनके अब, फासलों के सिवा बचा क्या है !   न करो तुम याद उन खुशबुओं उन बहारों को “मिश्र“,

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