#Gazal by Shanti swaroop Mishra

न बसाते दिल में किसी को, तो अच्छा होता ! न बताते राज़े दिल किसी को, तो अच्छा होता ! जब वक़्त बदला तो फेर लीं निगाहें यारों ने , न समझते अपना किसी को, तो अच्छा होता ! तल्खियों की बाढ़ में बह गए सब नाते रिश्ते, न थमाते उँगलियाँ किसी को ,तो अच्छा होता !  करते हैं वार पीछे से वो हमारे यार बन कर , हम न लगाते गले किसी को, तो अच्छा होता ! बेहूदियों की हद तक बिगाड़ा महफ़िल को , यारो न बुलाते हम किसी को ,तो अच्छा होता ! लोग तो लिए फिरते हैं नमक अपने हाथों में , न दिखाते ये ज़ख्म किसी को, तो अच्छा होता ! औरों पे यक़ीन कर हम तो फंसते रहे “मिश्र“, यारा न परखते हम किसी को, तो अच्छा होता !   शांती स्वरूप मिश्र

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#Pustak Samiksha by Sanjay Verma ‘drishti’

व्यंग्य  विशेषांक ‘यशधारा ‘ शब्दों  से श्रृंगारित भावों की धारा “यशधारा ‘का व्यंग्य विशेषांक के संपादक डा. दीपेंद्र शर्मा ने अंक अप्रैल

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#Kavita by RAmesh Raj

नवगीत —————————————- अन्जानी पीड़ा में अब तो मन का पोर-पोर जलता है, गहरी होती ही जाती है धीरे-धीरे संशय-खाई। चिंगारी

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