#Kavita By Reetu Devi

गुलाल कैसे उड़ाऊँ गुलाल? पैसे-पैसे के तरसे हम हमारा है हाल बेहाल। कहने को राष्ट्रनिर्माता हैं हम वेतन न मिले

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#Kavita By Sunil Gupta

“यथार्थ” “आज और कल में, अन्तर फिर- बढ़ता गया। सम्पन्नता के साथ-साथ, विचारो में- सन्नाटा छाता गया। अपन्त्व का बंधन

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