#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

भंवर से बच गया पर, साहिल पे फंस गया हूँ मैं ! बच गया गैरों से मगर, अपनों में फंस गया हूँ मैं ! कुछ ऐसा ही मुकद्दर लिख डाला है रब ने मेरा, कि आसमां से गिर कर, खजूर में फंस गया हूँ मैं ! मैंने भी चाहा कि उड़ता फिरूं परिंदों कि तरह, मगर अपनों के बिछाए, जाल में फंस गया हूँ मैं ! मैं गुज़ार लेता ज़िन्दगी भी जो कुछ बची है दोस्त, मगर खुद के ही मेरे, जज़्बात में फंस गया हूँ मैं  ! ज़रा से प्यार की खातिर मिटा डाला सुकूं हमने, अब तो बस तन्हाइयों के, दौर में फंस गया हूँ मैं !

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#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

न बचा है कोई ग़म, मुझे अब रुलाने के लिए ! मान गया है दिल भी, सब कुछ भुलाने के लिए !  नफरतों की आग ने जला दिया मेरा सब कुछ,   न बची हैं उल्फतें, किसी का दिल चुराने के लिए ! न ढूंढो अब कोई भी नया चाँद मेरे लिए दोस्तो, न बची है जगह कोई, अब चाँदनी छुपाने के लिए !  न रहा कोई अपनापन न रिश्तों का कोई बंधन,   दिखते हैं तैयार सब, बस कश्तियाँ डुबाने के लिए ! मैं तो एक जाहिल ही नहीं काहिल भी हूँ “मिश्र“, न आतीं हैं मुझे तरकीबें, आसमां झुकाने के लिए !

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