#Kavita by alok trivedi

वापसी खोजने जीवन की चाह, जमा करने पूंजी आशा और विश्वास की आज मैं जा रहा हूँ देखने उन्हें जिनसे मैं और मुझसे जो जीवित हैं मिलने कुछ ख्वाहिशों से अपने अहम् की थाह पाने आज मैं जा रहा हूँ ढूंढने अपनी उन यादों को बचपने को तलाशने यारों की यारी को सांत्वना देने करने वादा अपने फिर लौटने का आज मैं जा रहा हूँ कुछ बूढ़ी आँखों में चमक जगाने गाँव की मिट्टी को…

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#Kavita by Brajmohan Swami ‘ Bairagi’

लोग : जो मार दिए गए… हम सब मर जायेंगे एक दिन, केवल कुछ गुलमोहर ही बचेंगे, न दिखने वाली सुंदरता के लिए। आप उस रात आराम से नही सो सकते, जब कोई अधनंगा लड़का आपके कान में आकर कह दे कि उसकी माँ को मार दिया है – एक घातक उपन्यास ने। आप कैसे करवटें बदल सकते हैं आप भी रहते है उस शहर में जिस शहर में दीवारें आधी रात को और स्याह…

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#Muktak by Kundan kumar Mishra

आसमां के सितारों से मैं होकर के निकला हूँ, मोहब्बत के आगे उसे भी खो-कर के निकला हूँ ! मैं कैसे रहता हूं, ये तुमको क्या खबर होगी? बेवफाई के हर लम्हो पर मैं रो-कर के निकला हूँ !!

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#Lavota by vinay bharat sharma

‘‘कॉलेज का एक लड़का” एक कॉलेज का लड़का वो रोजाना सपने सँजाता है। एक झलक पाने के लिए रोजाना कॉलेज आता है। बालों को वह सॅवारता आईने में वह निहारता। जूते पॉलिश चमकाता सा इत्र से शरीर महकाता है। जीन्‍स शर्ट टी शर्ट कभी कभी सादा वस्‍त्र उठाता है। रोज-रोज सज सँवर वह पढ़ने कॉलेज आ जाता है। कभी कक्षा से बाहर आता कभी पानी पीने जाता है। कभी ताँक झॉककर देखता कभी बहाना कोई…

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#Gazal by Asha Shailli

सहर का ख्वाब टूटा देखने को चले आए तमाशा देखने को उन्हेँ खुद पर गुरूरे जुस्तजू था जमाना भी लगा था देखने को सितारे किसके टूटे आसमां से शहर उमड़ा पड़ा था देखने को हमारे दर्द की हद है कहाँ तक दरीचा खुल गया था देखने को अब आगे हो कोई आहो-फुगां क्यों खड़ा सैय्याद चेहरा देखने को छुपी आँखों में कितनी तिश्नगी थी न पैमाना कोई था देखने को कलम की नोक कैसे कुंद…

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#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan

“मैया मोहि मोदी बहुत सतायो” टीवी सर्वे में हरदम ही, आगे -आगे आयो सदा करत उपहास हमारो ,बालक मोहि बतायो वैसो ही जे निठुर मीडिआ,सर्वे रोज दिखायो यूपी,गोवा, उत्तराखंड को लै-लै नाम चिढ़ायो कछु तो जतन बता तू मैया ,मन मेरो घबरायो “मैया मोहि मोदी बहुत सतायो ” लोकसभा में प्रशांत ने मोदी कों समर जितायो जाई आसरे में मैंने जाए अपने घरै बुलायो जाके कहे ते ही अखिलेश ते मैंने हाथ मिलायो लेकिन जाको…

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"#Kavita by Dinesh Pratap Singh Chauhan"

#Kavita by Surendra Kumar Singh Chance

गीत * तुम आये महक उठा घर सारा ठिठक गया आदिम अँधियारा हो गया जग उजियारा।   अम्बर से तारे छिप छिपकर निरख रहे हैं रूप बर्फीले सन्नाटे में भी चहक रही है धूप सदियो से उलझा भटक था पा गया एक सहारा।   श्वांस श्वांस सुरभित मन हर्षित रोम रोम पुलकित तन उमगित धरती से अम्बर तक बरसा साथ नेह तुम्हारा।   स्वर्ण किरण सन्देश बांटती आयी मेरे पास पतझड़ में भी हुलस रहा…

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"#Kavita by Surendra Kumar Singh Chance"

#Kavita by Anil Uphar

मलयानिल की मन्द समीर जब छूकर गुज़रती है उसके अहसास को तो मन एक अज़ीब सी गंध से महक उठता है । रूप और लावण्य गूँथ देते है उसकी विनम्रता को अभिमंत्रित माल में रिश्तों को सहेजने का हुनर बखूबी आता है उसे तभी तो मन उसके प्रति भर जाता है अटूट श्रद्धा से । सारे गीत और छंद अर्घ बन चढ़ जाते है उसके चरणों में श्रद्धा की ओ पावन प्रतिमा तुम्हे व्याकरणी पैमाने…

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#Kavita by Praveen Baranwal

आज मुलाकात हुई, जाती हुई उम्र से !   मैने कहा,.. “जरा ठहरो !”   तो वह हंसकर, इठलाते हुए बोली,..   “मैं उम्र हूँ, ठहरती नहीं ! पाना चाहते हो मुझको, तो मेरे हर कदम के संग चलो !!”   मैंने मुस्कराते हुए कहा,..   “कैसे चलूं मैं बनकर तेरा हमकदम ! संग तेरे चलने पर छोड़ना होगा, मुझको मेरा बचपन, मेरी नादानी, मेरा लड़कपन !   तू ही बता दे कैसे समझदारी की…

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"#Kavita by Praveen Baranwal"

#Kavita by Vivek Prajpati, Kashipur

सुकमा नक्सली हमले में शहीद जवानों को समर्पित एक रचना-   एक बार फिर लाल हुई है पुण्य धरा यह भारत की एक बार फिर बातें होंगी रक्षा नीति महारत की।   एक बार फिर व्यक्त किया है दिल्ली ने भी दुःख अपना एक बार फिर निन्दा कर दी दिखा दिया है रुख अपना।   एक बार फिर छब्बीस मौतों पर यह भारत रोया है एक बार फिर भारत माता ने बेटों को खोया है।…

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"#Kavita by Vivek Prajpati, Kashipur"

Kavita by Rajesh Kamaal

घनानंद……. आनंद घन के जीवन में जो बिन बरसे घन डौल रहे थे सुजान की कला और सौंदर्य का जब ठण्डा झौंका आया तो टपक पड़ी बूंदें हृदय के रेगिस्तान में ऐसा लाजवाब सौंदर्य देखा जीवन में पहली बार हृदय की अजंता में अंकित हो गई वह छवि कल्पना के सागर से उपमाओं के नए-नए मोती निकालने में जुट गया वह कवि उसके छंदों में सज गई वह मनोहर मूर्ति नृत्यांगना मुलायम उद्गारों का मक्खन…

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"Kavita by Rajesh Kamaal"

#Kavita by Kavi Krishan Kant Dubey

“हमें भी वरदान दे दो ” *   * हे माँ! हमें भी वरदान दे दो ना झुकूं अन्याय के आगे हमें ऐसी शक्ति दे दो.   हे माँ! तुम वरदायनी हो हमें भी वरदान दे दो, जीवन के अँधेरों को कामयाबियों के प्रकाश से भर दो हे माँ! हमें भी वरदान दे दो.   हे माँ! तुम्हारे ही नाम से हर सुबह होती और तुम्हारे ही नाम से हर शाम आती यही नहीं/बल्कि रात के…

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#Gazal by Abhishek Bharti Chandan

वफ़ा चाहता था….दगा दे गये वो, खता ना थी’ कोई सजा दे गये वो।   चला था उसे मैं सजाने फलक पर, बिछड़ने का’ मुझको मजा दे गये वो।   मिली है ख़ुशी या दिया है मुझे गम, समझ में न आये कि क्या दे गये वो।   मुझे ना शिकायत है उनसे खुदा अब उतरता नही जो……नशा दे गये वो।   कहा जब सुनाओ हुये बेवफा क्यों, कहानी नई हर दफा….दे गये वो।  …

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#Kavita by Jasveer Singh Haldhar

कविता -सरल दलाली मार्ग चुनो । ————————————— भारत के प्रजा तंत्र जनो । नेता या ढोंगी संत बनो ।। मोटा माल कमाना है तो । सरल दलाली मार्ग चुनो ।। में तो गुरवत में  रहता हूँ  । इसलिए भाइयो कहता हूँ ।। तुम अपना काम चला डालो। मंत्राणी बहन बना डालो ।। दीदी दीदी  कह बात करो । यूँ मंत्री जी पर हाथ धरो ।। तुम केवल हाँ कहना सीखो । धारा के संग बहना…

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"#Kavita by Jasveer Singh Haldhar"

#Kavita by Alok Shrivas

  सुकमा में जवानों की शहादत पर मेरा आक्रोश ” ( इस घटना पर सरकार की ‘कड़ी निंदा’ पर मेरी “छोटी निंदा”) ** फिर बस्तर की पावन माटी, रंगी खून के रंगों से। कर गए वो असीम क्रूरता, भारत माँ के अंगों से।।   दीन धरम नहीं है इनका, महज खून के प्यासे हैं। वामपंथ  की  आड़  में , ये  तो  आतंकी  पासे हैं।।   ये शिखण्डी, महिलाओं की, आड़ में घात करे हैं। भारत…

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#Kavita by Mukesh Marwadri Navalpuri

वीर शहीदों कि गृह वेदना:-   कितनी ही गोद सुनी हो गयी, उतनी ही राखी रोयी है | लाखों का सहारा छुट गया, कितनों कि रोली खोयी है | कलेजे पर पत्थर रख लिया, पूरे गाँव ने उस वक्त | आँगन में खेलने वाले कि लाश, आँगन में आकर सोयी है |   कवि मुकेश मारवाडी़ नवलपुरी |

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#Kavita by Sanjay Ashk Balaghati

  डिजीटल इंडिया की क्या पहचान भीख मांगते बच्चे,फंदे पर किसान।   हिन्दु-मुस्लिम एकता खूब है देश मे मंदीर -मस्जिद को लेकर घमाशान।   दिन के उजाले मे है जो समाजसेवी भेडिये बन जाते है देख राह सूनसान। आरक्छण का लाभ अमीर ऊठा रहे शासकीय नौकरी पर है पुरा खानदान।   मजदुर आज भी मजदुर ही है समाज मे गरीब को मिलता नही है मान-सम्मान।   झुठे सर आंखो पर बैठे हुये है लोग के…

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Kavita by Brajmohan Swami ‘Bairagi’

लोग : जो मार दिए गए… हम सब मर जायेंगे एक दिन, केवल कुछ गुलमोहर ही बचेंगे, न दिखने वाली सुंदरता के लिए। आप उस रात आराम से नही सो सकते, जब कोई अधनंगा लड़का आपके कान में आकर कह दे कि उसकी माँ को मार दिया है – एक घातक उपन्यास ने। आप कैसे करवटें बदल सकते हैं आप भी रहते है उस शहर में जिस शहर में दीवारें आधी रात को और स्याह…

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"Kavita by Brajmohan Swami ‘Bairagi’"

#Kahani by Reeta Jaihind Arora

पुजारी एक मंदिर में एक पुजारी बहुत समय से भगवा वस्त्र धारण कर भक्त व भगवान की सेवा करता था । और हर आने जाने वाले भक्तों से रामराम बेटा राधे राधे कर सभी का चित्त प्रसन्न कर देता था ।उस पुजारी के स्नेह से भक्त भी बहुत आने लगे और मंदिर में प्रसाद भी पंडित जी सबको खुश होकर बांटते थे।चढावा भी अच्छा होने लगा।जितना भी चढ़ावा  आता सब मंदिर के बनाने में लग…

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#Kavita by Lal Bihari Lal ‘ Lal Kala Manch’

काम करी चाहे नाकरी,तबहुँ बनी सरकार आइल राजनीति मेंदेखीं अजब बहार काम के सपना देखा- देखाके भष्टाचार के निमनघुट्टी पिला के कोसी विरोधी के हमरोज बार-बार आइल राजनीति मेंदेखीं अजब बहार अच्छा दिन आई, तनीकरी इंतजार करब परोसी के, सिरहम कलम हजार उल्ट-पुल्ट के देहब,नेता हम बार-बार आइल राजनीति मेंदेखीं अजब बहार सीमा पर देख करब नाकुछूओं खास कतनों विरोधी करिहेरोज-रोज बकवास परे ना देहब हमकुरसी में कवनों दरार आइल राजनीति मेंदेखीं अजब बहार लाल…

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#Kavita by vinay bharat sharma

म और माँ “म” ऐसा शब्द हटाने पर जिसे बिखऱ जाती है भाषा हिन्दी, संस्कृत भी कहाँ टिक पाती है “म” के पुत्र अनुस्वार के बिना इसी “म” की एक महिमा है “माँ” जिसके बिना कहाँ चल सकता है कोई संसार, वह माँ जिसका आँचल सिंहासन से बढकर है उसी “म” शब्द से बना हूँ “मैं” जो करता हूँ शरारत विविध अठखेलियाँ, हाँ, “म” शब्द से बनी है प्रकृति की अनुपम छटाकृति “माँ” उसी माँ…

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#Kavita by Meghvrat Arya

क्यों न अब अपनी आँखें बंद कर लें क्या पता ख़्वाबों में गुज़रा हुआ कल मिल जाए, इक अरसा पहले बिछुड़ गये थे जो क्या पता उसी मोड़ पर वो फिर मिल जायें, क्यों न कुछ पल के लिए हम बीते कल में लौट जायें ख्वाबों में ही सही क्यों न कुछ पल उस जिंदगी को फिर जी आयें, वो जो बातें थीं कुछ उनकी – कुछ मेरी अनकही – अनसुनी सी, क्यों न कुछ…

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"#Kavita by Meghvrat Arya"