0216 – Sudha Mishra

Kavita :

दर्द

 

रात  के बाद

सुबह हुई

तम फिर भी छटा नहीं

एक और दिन

या हर दिन का

मेहमाँ तु हो गया दर्द

कुछ कहना चाहे भी तो

जुबाँ साथ नहीं देती

पर्वत समझ कर

पूजा जिसे

एक ठोकर से

अस्तित्व ही बिखर पड़ी

मिट्टी के ढ़ेर सा

लड़खड़ा गिरा

वो जो पर्वत

पूजा किए….

 

ऐसे ही सारे बंधन

जिंदगी से  हाथ छुड़ाकर

मौका परस्ती निभाते रहे…

हम हमेशा उसी

मोड़पर खड़े

सजदे में झूके रहे

जो आया

एक ठोकर लगाकर

आगे निकलता रहा….

 

वक्त बार-बार

रिश्तों के नाम पर

छलता रहा

वादे बेइरादे

बाइन सानेहा

दिल में पलते रहे

आकिल  बनकर

बे खता हम

खुद ही के लिए

सजा -ए-मौत

की दुआ करते रहे …..


Kavita :

ख्वाइशें
ख्वाइशों को चल
मोड़कर गठरी में
कहीं तहखाने में रख आएँ
रह-रह के यह
चुभती बहुत हैं ।।


Kavita :

किसकी बातों में जिक्र किसका है क्या पता

मेरी हर बात में तुम और सिर्फ तुम होते हो

 

रात आएगी सुबह हो न हो ,जिंदगी छलती है

यही छलने और संभलने में उम्र तमाम गुजरी

 

हम भी बैठे रहे अबतक उस सजर की छाँव में

जो दिया करते हैं हर पथिकों को अपनी छाँव

 

क्या फर्क सजर किसका है इनसे ही सीखा सब

जो दे सके दे दिया ,सजर कहाँ रखता कुछ पास

 

काट कर सजर अपने आँगन नहीं लगाया  करते

ये वहीं खड़ा रहेगा जहाँ जड़ें इसकी ,काटना तो अंत है

 

बस फकत यही बात है तुम गर समझ सको

बस हर बात पर इल्जाम ;कड़वे बोल न कहो ।

 

हवाएँ ये कहकर नहीं बहतीं कि हिन्दू या मुस्लिम  के  लिए

सरहदें बाँटना और दिलों में नफरतें पालना इंसा का है काम

 

आसमाँ ने भी अपनी कभी सरहदें नहीं बाँटी

तुम जमीनें बाँटो इंसा ,मुस्लिम की या हिन्दू की

 

पीढ़ियाँ भी गुजर जाए तो तुम (इंसान)न समझोगे शायद

दुनिया के खत्म होने तक जारी रहेगा सरहदें बाँटना ।।।


Kavita :

और तो कुछ पता नहीं…

***

और  तो  कुछ पता नहीं

बस इतना जानते हैं हम

एक फूल तेरे कदमों में

रखकर खुश हो लेते हैं हम

मेरे हर शब्द को

अपने कदमों के

फूल ही समझना तुम

और कोई आलौकिक

प्रकाश सा तुम्हारे

चेहरे के तेज से

खिंचता है मेरा मन

तुम्हारी ओर

और गहन पीड़ा के

क्षण बन जाते हैं

दूर से एक सरगम

और उस सरगम में

डूब हंस लेती हूँ मैं

कदापि मुझे ये भी

खबर नहीं तुम

सुनते हो कि नहीं

मेरे दिल की पुकार

पर शब्द -शब्द

न जाने क्यूँ

लगते हैं परिचित

ऐसा क्यूँ लगता है

एक डोर है जो

तुम्हें हमें बाँधे रखा है

झूठ या सच

मुझको खबर नहीं

जी लेने को

काफी है इतना

अहसास ‘प्रिय’

और बस आँखें मूँद

महसूस किया है तुम्हें

वैसे जैसे

तन में साँसें

और तो

कुछ पता नहीं…,


Kavita :

तेरे चंद शब्द मेरे

***

जानते हैं हम

मिलकर खो जाने का गम

बस इसी बात से

कभी हाथ आयी

खुशियों से

बेपरवाह रहते हैं हम …

चंद खुशियाँ

चंद शब्द

बस इतना ही

अपना बना लेते हैं हम

और कुछ शब्द

तुम्हें अर्पित करते हैं हम

जो बहुत कम होते हैं

तुम्हारे दिए के सामने जानते हैं हम

मगर तुम्हारे शब्दों के बाहर

अब मेरा कोई

आकाश नहीं

बस इतना ही

कहना चाहते हैं हम….

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