0216 – Sudha Mishra

Kavita :

आइए हिंदी -हिंदी खेलें

कुछ तस्वीरें खिंचाएँ

फिर पुरस्कार ,भाषण

और कुछ बहुरुपियों को

सम्मान बाँटें माला पहनाएँ

लो जी हो गयी

हिंदी -हिंदी

जोर से ठोको ताली

सरकारी बाबू की हो गयी खूब

मौकापरस्ती

हिंदी में गाली

हिंदी  में ताली

हिंदी खुद पर लजाती

कल से सालभर को

छुप जाएगी

कहीं मुँह छिपा के

अगले साल आएगी फिर

चंदन उबटन लगवाकर।

 


Kavita:

रात सपने में एक जुलूस देखा
जुलूस के हाथों में मशालें थीं
और आवाजें जो चीख रही थी–
पूँजीपतियों के हाथ से
नौनिहालों की जान छुड़ाओ
हर हाल में शिक्षा को काॅरपोरेट वार से बचाओ
ये घुन है ये जो फैल रहा है
शिक्षा के मंदिर के नाम पर
कारपोरेट होती मनुष्यता के जंजाल में
मासुम का भविष्य गिरवी पड़ा है
ऐ माता-पिता तुम भी अब
होश में आओ
बच्चों को प्रतिष्ठा की आग में
झोंकने से पहले ये चमक-दमक की
दीवारों के अंदर कि सच पर एक नजर डालो
अकूत संपत्ति खास वर्ग तक का सीमित कर डालो
उनसे कहना धंधा कुछ और करें
शिक्षा को मुक्त कर दे
शिक्षा का व्यापारीकरण बंद करो
नेता और पूँजीपति को
स्कूल से बाहर करो
उच्च और निम्न वर्ग की कमाई की एक सीमा भी तय हो
न नेता न उद्योगपति के पास अथाह संपत्ति हो
कोई महलों में कोई झोपड़ी में का भेद मिटाओ
शानो-शौकत की दादागिरी पर लगाम लगाओ
देश को पूँजीपतियों से मुक्त कराओ
महलों में रहने वालों की एक लिस्ट बनाओ
उनके महलों को अजायबघर बनाओ
एक आदमी एक कमरा बस इतना धन कमाओ
कम से कम शिक्षा और नौनिहालों की जिंदगी
इनके चंगुल से छुड़ाओ
एक व्यक्ति हजारों स्कूल के मालिक
ये धंधा बंद कराओ


Kavita:

प्रदेश वहाँ डूबे
नेता मस्ती में रिसाॅर्ट में खोये
पाठ पढ़ाएँ देश भक्ति की
गायें तड़प के बेहोश पड़ीं
आश्चर्य न करना
अगर कहीं जन्म दाता भी
डूब जाएँ
और औलाद मस्ती में
बारिश की रिमझिम में
कहीं लाँग ड्राईव में
खोया-मशगुल हो
पैसा-पैसा खेल रहे
लोग घर-बार संग डूब रहें
वो जीता वो हारा का
शोर मचाएँ
सैलाब इन के
आँखों में शर्म की मगर
एक बूँद न आए
बनाँसकाठा के राजा
चारदीवारी में रिसार्ट के
घूमें ,नाचें,धूम मचाएँ
चमचे बाहर
चिंता-चिंता देश की
डफली बजाकर ढोंग रचाएँ
मैं बड़ा बाक़ी सब तुच्छ हैं
धरती पर यही गान सुनाएँ!


Kavita:

अजनबी

**

भटक रही है आत्मा
कबसे कुछ खबर तो नहीं
एक अहसास
जो आँखें तर कर गईं
क्या होगा
उनका रूप..

जाने किसने आवाज लगाई
बर्षों से दबी दबी एक लड़की
जो सकुचाती है कुछ भी खुलकर कह देने से
फिर याद आई है
कहीं तुम्हारी खामोशी फिर
सुनाई दी है..

सफर अधूरा अबतलक वो याद में रहा
जाने कहाँ क्या पढ़ लिया
सब हूबहु वैसा ही था
नाम ,कपड़े और बहुत कुछ
एक अजनबी से
टकरा गया..

तुम्हारा दूर तक
बल्कि मंजिल के
आखिरी पड़ाव तलक का खामोश सफर
और उस खामोशी में भी दूर होकर
पास होना..

कभी पाँवों के
छाले पर मरहम
कभी दर्द से छटपटाते
पाँवोंमे
अचानक से
गरम पानी उड़लेना..

यानी हर पड़ाव पर
मुझसे पहले पहुँचना..

तुम्हारा हाथ थामे
कुछ कदम चलना
बिन कहे हर कदम
मेरे पीछे चलना और
मंजिल के आखिरी पड़ाव
पर पहुँच कर भी
खामोश रह जाना..

तुम्हारी आँखें
बहुत कुछ कह गईं
जाते-जाते अनकहे रह गए
जज्बात तुम्हारे-हमारे
मगर सफर का वो पल
अब भी सब कुछ
याद है हमें…

बस ये याद नहीं कब
कहाँ से चल रहे थे तुम पीछे पीछे
साथ तुम्हारी माँ और
तुम बस इतना याद है
सफर के एक मंजिल पर
जब पिता संग खड़े
रो रहे थे हम पाँव के छाले से
तुम अपना बोझ कंधे से उतार
तुरंत दौड़ गए थे एक ढ़ाबे में
और इशारे से हमें वहीं रोक
जब कुछ पल बाद आए…

मैंने महसुस किया
तुम्हारे हाथों से
छूते पाँव और गरम पानी की धार
शायद तुमने हाथ
इसलिए लगा रखा था कि
जल न जाएँ गर्म पानी से पाँव
और तुम्हारे हाथों के
चमत्कारिक स्पर्श
जिसने भूला दिया था दर्द सारा..
अजनबी न जाने तुम
कौन कहाँ से कब आ गए थे यूँ ही
बीच सफर में
और फिर बिछड़ जाना
अनकहे जज्बातों के साथ
चुभते रहते हैंअक्सर
शुक्रिया भी अदा करने को
तरसते रह गए हम…


Kavita :

सुनो हुक्मरानों सुनो…

 

सुनो हुक्मरानों सुनो  आँख से परदा

उठाओ

अपनी-अपनी गद्दी से उतरकर बताओ

क्या खूब बेटी बचा रहे हो क्या खूब बेटी पढा रहे हो

कहाँ रहते हो ,कहाँ सोते हो,कहाँ जगते हो?

जो महीने तक भी नींद नहीं खुलती

और जो बेटियाँ झेल रही हैं

जान से हाथ धो रही हैं…

बस तुमसब को नहीं दिखतीं

नहीं देख पाते दर्द किसी का तो

गद्दी से उतारकर रहेंगे

होश में आओ प्रशासन

चैन की तुमको नींद न आए

एक बात और बताओ

गर ये तुम्हारी बेटी होती तो

क्या तब भी तुम अबतक चुप बैठ जाते????

अब और नहीं कोई जुल्म सहेगी

बेटी की जान का हर हिसाब अब

जनता लेकर रहेगी….


Kavita :

दर्द

 

रात  के बाद

सुबह हुई

तम फिर भी छटा नहीं

एक और दिन

या हर दिन का

मेहमाँ तु हो गया दर्द

कुछ कहना चाहे भी तो

जुबाँ साथ नहीं देती

पर्वत समझ कर

पूजा जिसे

एक ठोकर से

अस्तित्व ही बिखर पड़ी

मिट्टी के ढ़ेर सा

लड़खड़ा गिरा

वो जो पर्वत

पूजा किए….

 

ऐसे ही सारे बंधन

जिंदगी से  हाथ छुड़ाकर

मौका परस्ती निभाते रहे…

हम हमेशा उसी

मोड़पर खड़े

सजदे में झूके रहे

जो आया

एक ठोकर लगाकर

आगे निकलता रहा….

 

वक्त बार-बार

रिश्तों के नाम पर

छलता रहा

वादे बेइरादे

बाइन सानेहा

दिल में पलते रहे

आकिल  बनकर

बे खता हम

खुद ही के लिए

सजा -ए-मौत

की दुआ करते रहे …..


Kavita :

ख्वाइशें
ख्वाइशों को चल
मोड़कर गठरी में
कहीं तहखाने में रख आएँ
रह-रह के यह
चुभती बहुत हैं ।।


Kavita :

किसकी बातों में जिक्र किसका है क्या पता

मेरी हर बात में तुम और सिर्फ तुम होते हो

 

रात आएगी सुबह हो न हो ,जिंदगी छलती है

यही छलने और संभलने में उम्र तमाम गुजरी

 

हम भी बैठे रहे अबतक उस सजर की छाँव में

जो दिया करते हैं हर पथिकों को अपनी छाँव

 

क्या फर्क सजर किसका है इनसे ही सीखा सब

जो दे सके दे दिया ,सजर कहाँ रखता कुछ पास

 

काट कर सजर अपने आँगन नहीं लगाया  करते

ये वहीं खड़ा रहेगा जहाँ जड़ें इसकी ,काटना तो अंत है

 

बस फकत यही बात है तुम गर समझ सको

बस हर बात पर इल्जाम ;कड़वे बोल न कहो ।

 

हवाएँ ये कहकर नहीं बहतीं कि हिन्दू या मुस्लिम  के  लिए

सरहदें बाँटना और दिलों में नफरतें पालना इंसा का है काम

 

आसमाँ ने भी अपनी कभी सरहदें नहीं बाँटी

तुम जमीनें बाँटो इंसा ,मुस्लिम की या हिन्दू की

 

पीढ़ियाँ भी गुजर जाए तो तुम (इंसान)न समझोगे शायद

दुनिया के खत्म होने तक जारी रहेगा सरहदें बाँटना ।।।


Kavita :

और तो कुछ पता नहीं…

***

और  तो  कुछ पता नहीं

बस इतना जानते हैं हम

एक फूल तेरे कदमों में

रखकर खुश हो लेते हैं हम

मेरे हर शब्द को

अपने कदमों के

फूल ही समझना तुम

और कोई आलौकिक

प्रकाश सा तुम्हारे

चेहरे के तेज से

खिंचता है मेरा मन

तुम्हारी ओर

और गहन पीड़ा के

क्षण बन जाते हैं

दूर से एक सरगम

और उस सरगम में

डूब हंस लेती हूँ मैं

कदापि मुझे ये भी

खबर नहीं तुम

सुनते हो कि नहीं

मेरे दिल की पुकार

पर शब्द -शब्द

न जाने क्यूँ

लगते हैं परिचित

ऐसा क्यूँ लगता है

एक डोर है जो

तुम्हें हमें बाँधे रखा है

झूठ या सच

मुझको खबर नहीं

जी लेने को

काफी है इतना

अहसास ‘प्रिय’

और बस आँखें मूँद

महसूस किया है तुम्हें

वैसे जैसे

तन में साँसें

और तो

कुछ पता नहीं…,


Kavita :

तेरे चंद शब्द मेरे

***

जानते हैं हम

मिलकर खो जाने का गम

बस इसी बात से

कभी हाथ आयी

खुशियों से

बेपरवाह रहते हैं हम …

चंद खुशियाँ

चंद शब्द

बस इतना ही

अपना बना लेते हैं हम

और कुछ शब्द

तुम्हें अर्पित करते हैं हम

जो बहुत कम होते हैं

तुम्हारे दिए के सामने जानते हैं हम

मगर तुम्हारे शब्दों के बाहर

अब मेरा कोई

आकाश नहीं

बस इतना ही

कहना चाहते हैं हम….

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