#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

यारो गुज़रे हुए उन लन्हों को, हम कैसे भुला दें   आखिर अपनों के करतबों को, हम कैसे भुला दें हम चले थे साथ मिल कर एक कारवां बना कर,   पर उन कंकड़ से भरे रस्तों को, हम कैसे भुला दें  वक़्त आता है चला जाता है छोड़ कर निशाँ अपने, भला सर पड़ी उन आफतों को, हम कैसे भुला दें वक़्त के हर दौर मैं जो शामिल थे मेरी इमदाद में,  आखिर मेहरवां जिन्दा दिलों को, हम कैसे भुला दें  ज़िन्दगी के सफर में साथ छोड़ा न जाने कितनों ने, भला उनके सुझाये मशविरों को, हम कैसे भुला दें  “मिश्र” आये थे हम दुनिया में कुछ करने के वास्ते, फिर उसके दिए उन मक़सदों को, हम कैसे भुला दें   शांती स्वरूप मिश्र    

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#Gazal by Ishq Sharma

मेरी नज़र में जब तू नज़र नहीं आता है सच कहता हूँ  कुछ नज़र नहीं आता है ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• रोजमर्रा में 

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#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

यारो दुनिया के अब तो, रिवाज़ बदल गए ! यहां हर किसी के अब तो, अंदाज़ बदल गए ! न मिलती मोहब्बत के बदले मोहब्बत अब, अब तो लोगों के लोगों से, लिहाज़ बदल गए ! न होता कोई शामिल औरों के दुःख में अब, यारो हर किसी के अब तो, मिज़ाज़ बदल गए ! चढ़ गया है रंग सब पर इस ज़माने का दोस्तो, अब तो परिंदों के भी देखो ,परवाज़ बदल गए ! पहले तो लोग लिखते थे सीधी सी सच्ची बातें, पर अफसानों के अब तो, अलफ़ाज़ बदल गए ! चालाकियां पहले भी थीं पर इतनी न थीं “मिश्र”, पर अब तो देखते ही देखते, अरबाज़ बदल गए ! शांती स्वरूप मिश्र

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#Gazal by Pradeep Dhruv Bhopali

ग़ज़ल■■■■■■ वज़्न/अर्कान-212×4, फाउलुन×4,रदीब-हुनरमंद को क़ाफिया-“ओ(स्वर)या..ओ. आइना मत दिखाओ हुनरमंद को। रास्ता मत बताओ हुनरमंद को। बात होगी नहीं यार उसको

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#Gazal by Shanti swaroop Mishra

मत खोइए सिर्फ ख़्वाबों में, कुछ कर के तो देखिये  यारो मुकद्दर की बात छोडो, कुछ हट के तो देखिये किनारे पे खड़े हो कर तो दिखती हैं सिर्फ लहरें ही, पाना है अगर सागर से, तो उसमें उतर के तो देखिये  आखिर जमाने से डर कर तुम जाओगे किधर दोस्त, गर बदला है जमाना, तो खुद को बदल के तो देखिये  फैला है दुनिया में मुफलिसी का आलम हर जगह पे,  किसी मजलूम के दर्दों को, ज़रा समझ के तो देखिये दुनिया इतनी ही नहीं जितनी कि तुम्हें दिखती है “मिश्र“, समझना है अगर इसको, तो आगे बढ़ के तो देखिये शांती स्वरूप मिश्र

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#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

कभी बेमक़सद किसी की ,हम पे नवाज़िश नहीं होती ! कभी खुद के लिए हम से, किसी से गुज़ारिश नहीं होती ! वो ज़रा सा मुस्कुरा दें, तो चाहतों की बाढ़ आ जाती है, हम दिल भी निकाल कर रख दें, तो जुम्बिश नहीं होती ! वो तो हर रोज़ तोड़ते हैं, दिल न जाने कितने दिवानों का, फिर भी किसी की न जाने क्यों, उनसे रंजिश नहीं होती ! अगर दर्द भी बयां करें हम, तो चुप करा देते हैं वो हमको, पर कभी भी उनकी जुबाँ पे यारो, कोई बंदिश नहीं होती ! न ठहरता कभी खुदा भी, किसी के ज़हरीले दिल में “मिश्र” पाक जिगर के बिना खुदा की, कभी परस्तिश नहीं होती ! शांती स्वरूप मिश्र

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#Gazal by Roopesh Jain

सर झुकाना आ जाये नज़ाकत-ए-जानाँ1 देखकर सुकून-ए-बे-कराँ2 आ जाये चाहता हूँ बेबाक इश्क़ मिरे बे-सोज़3 ज़माना आ जाये मुज़्मर4 तेरी अच्छाई हम-नफ़्स मुझमे, क़िस्मत मिरी लिखे जब

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