#Gazal By Shanti Swaroop Mishra

उनकी फ़ितरतों के आगे तो, हम मजबूर हो गए ! उनके जितने क़रीब आये, उतने ही दूर हो गए ! अपना दीया बुझा के, चले थे जलाने उनका हम, मगर लोगों ने समझा ये, कि हम मग़रूर हो गए ! क्या दिखाएं खोल कर, अपने दिल को हम यारो, पहले तो उधर ज़ख्म थे, मगर अब नासूर हो गए ! पहले न समझा किसी ने, हमें माटी के मोल भी,    यारो वक़्त क्या बदला कि, हम तो मशहूर हो गए ! मैं किसको भूल जाऊं, तो किसको याद रखूँ “मिश्र“, इस दुनिया के नाते रिश्ते तो, अब दस्तूर हो गए !    शांती स्वरूप मिश्र [a1]   

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#Gazal By Shanti Swaroop Mishra

वो फिर से चले आये हैं, हमको बरगलाने के लिए ! हमें अपने बनाये जालों में, फिर से फंसाने के लिए !   कैसे बताएं उनको, कि क्या रखा है इन तमाशों में, अब छोड़ा ही क्या है हम पर, सुनने सुनाने के लिए ! न करेंगे असर कुछ भी, अब ये वादों के तीर हम पे,  रख लो इन्हें संभल के, कहीं और पे चलाने के लिए !  भर चुका है अपना ये दामन, ज़फाओं के ख़ारों से,   न बची है जगह कोई अब, दिलों में बसाने के लिए !   घमंड था बुज़ुर्गों को, कि अब अच्छे दिन भी आएंगे, पर कुछ भी न छोड़ा उन पे, ज़िंदगी चलाने के लिए !   इस मतलबी सियासत ने, फंसा रखा सबको“मिश्र“, बस चाहिए उन्हें कुर्सी, फ़क़त धंधा जमाने के लिए ! शांती स्वरूप मिश्र  

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#Gazal By Pradeep Mani Tiwari

बह्र/अर्कान- 1222-1222-1222-1222-मफाईलुन, मफाईलुन, मफाईलुन, मफाईलुन. ★★★★★★★★★★★★ कलाई मुड़ गई ज़ज़्बात की ये तो निशानी है। अमूमन ज़िन्दगी में इस तरह

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