#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

किसी के ज़ख्म सहलाना, कोई हमसे सीख ले ! कैसे निभता है दोस्ताना, कोई हमसे सीख ले !   अपनों की सिफ़त होती है कि बस रूठ जाना,  उन रूठों को मना पाना, कोई हमसे सीख ले !   जुबाँ के तीर जब करने लगें जिगर पे वार सीधे,   खुद को चुभन से बचाना, कोई हमसे सीख ले !   आते जाते हैं जाने कितने दिल की महफ़िल में,   उनकी फितरतों को पचाना, कोई हमसे सीख ले !   वफ़ा का नाम तो है बस किताबों तक महफूज़, मगर ज़फाओं से पार पाना, कोई हमसे सीख ले !   भले ही लेता हो दिल हिलोरें दर्दों के दरिया में,  फिर भी चेहरे पे हंसी लाना, कोई हमसे सीख ले !   ज़िन्दगी के सफर ने ही सिखा दिए नुस्खे तमाम, उन्हें हर सफर में आजमाना, कोई हमसे सीख ले !

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#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

इन हवाओं की तासीर में, इतना वबाल क्यों है यारो ज़िन्दगी का हर कदम, इक सवाल क्यों है   इतनी बड़ी है भीड़ फिर भी आदमी है तन्हा सा ,    यहां हर किसी के चेहरे पे, इतना मलाल क्यों है   अपनी हदों में रह कर भी महफूज़ नहीं हम तो, है हसरत हमें जीने की, पर जीना मुहाल क्यों है   लगा रहता है आदमी बस ज्यादा की तलाश में,  सुकून का इस ज़िन्दगी में, इतना अकाल क्यों है   भर जाता है पेट उसका मगर नीयत नहीं भरती “मिश्र“आदमी की सिफ़त में, इतना कमाल क्यों है   शांती स्वरूप मिश्र

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#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

ये तो सच है कि मैं एक बूढा दरख़्त हूँ यारो तो क्या इन पँछियों का, आशियाना तोड़ दूँ मैं यूं आंधियां तो आती हैं आती रहेगीं आगे भी, तो क्या डर के उनसे, लहलहाना छोड़ दूँ मैं बैठते हैं आज भी कितने पथिक मेरी छांव में, तो क्या वर्षों पुराना उनसे, दोस्ताना तोड़ दूँ मैं बनाया है खुदा ने मुझे सिर्फ औरों की खातिर, क्या उन उसूलों को अपने, निभाना छोड़ दूँ मैं बस कुछ ही तो इंसान हैं जो रखते हैं बदनज़र, तो क्या डर के उनसे, खुशियां लुटाना छोड़ दूँ मैं शांती स्वरूप मिश्र

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# Gazal by Shanti Swaroop Mishra

न रुको दोस्त बस चलते जाओ, मंज़िल दूर नहीं  ; मत करो याद मंझधार को तुम, साहिल दूर नहीं  ! कोई नहीं जो करे मदद, तुम्हें खुद ही लड़ना होगा ;  क्यों करते बेकार मनन, तुम्हें खुद ही बढ़ना होगा ! कट ही चुका है तम का रस्ता, झिलमिल दूर नहीं  ; मत करो याद मंझधार को तुम, साहिल दूर नहीं  !   जीवन के रस्ते सहज नहीं, ये तो टेड़े मेढे पथरीले ;   हर तरफ मिलेंगे लोग तुम्हें, विषधर जैसे ज़हरीले  ! इनसे बच कर निकले जो, वो आगे आगे बढ़ता है  ; हिम्मत जिसमें टकराने की, वो दुनिया से लड़ता है ! गर समझ गए इतना सा नुक़्ता, तो दिल्ली दूर नहीं ; मत करो याद मंझधार को तुम, साहिल दूर नहीं  !   मत ढूंढो कमियां औरों में, अपनी कमियां याद करो ; औरों को बुरा कहने से पहले, अपनी नीयत याद करो ! ईश्वर बनने की उत्कंठा को, अपने दिल से दूर करो ; खुद ही थोड़ा झुक जाओ, मत औरों को मजबूर करो ! गर नहीं है दिल में प्रेम का ज़ज़्बा, अंत तुम्हारा दूर नहीं ; मत करो याद मंझधार को तुम, साहिल दूर नहीं  !

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#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

हमने तो अपनी ज़िन्दगी तमाम कर दी, अपनी तो हर सांस उनके नाम कर दी ! सोचा था कि कभी तो गुज़रेगी रात काली, पर उसने तो सुबह होते ही शाम कर दी ! समझ पाते हम मोहब्बत की सरगम को,   उसने सुरों की महफ़िल सुनसान कर दी ! कर लिया यक़ीन हमने भी उसके वादों पे, मगर उसने तो बेरुखी हमारे नाम कर दी ! हम मनाते रहे ग़म अपनी मात पर चुपचाप, मगर उसने तो मेरी चर्चा सरे आम कर दी ! ये खुदगर्ज़ी ही आदमी की दुश्मन है “मिश्र“, जिसने इंसान की नीयत ही नीलाम कर दी !   शांती स्वरूप मिश्र

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#Gazal by Devesh Dixit

मुफ़ाईलून,मुफ़ाईलून,मुफ़ाईलून,मुफ़ाईलून)   ज़ुबां पर बात आ जाए तो हम रोका नहीं करते बनाकर बोझ सीने में उसे रक्खा नहीं करते

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