#Gazal by Ishq Sharma

ढूंढ़कर ले आओ बहाना किसीका चाहिए ही नही ठिकाना किसीका ••••••••••••••••••••••••••••••••• अक्सर पलकें भीग  जाती  है पर भूलना  नही है 

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#Gazal by Shanti swaroop Mishra

ख़्वाहिश नहीं है मुझ को, मशहूर होने की ! यूं ही चाहतों की चाहत में, मग़रूर होने की !   मैं तो लिखता हूँ सिर्फ अपनी ख़ुशी के लिए, न दिखती कोई वजह, मेरे मज़बूर होने की !   कोई जानता है मुझ को इतना ही काफी है, न पाली है मैंने तमन्ना, चश्मेबददूर होने की !   तड़पते ज़ज़्बात बस उकेर देता हूँ कागज़ पे,  न आती है कभी नौबत, दिल के चूर होने की !   देखता हूँ विषमताएं तो जी तड़पता है “मिश्र“, न रहती फ़िक्र मुझको, किसी से दूर होने की !   शांती स्वरूप मिश्र    

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#Gazal by Shanti swaroop Mishra

उनके अंजुमन में आके, हम बदनाम हो गये ! कभी आश्ना थे जो अपने, वो भी अंजान हो गये !   हमने परस्तिश की जिनकी हरवक़्त बा–वफ़ा, उनकी ही ख़ातिर आज हम, पशेमान हो गये !   शिकवा नहीं है कोई उनकी ज़फाओं का यारो, उनकी फ़ितरतों के चर्चे तो, यूं ही आम हो गये !     ये तो हौसला है अपना कि ज़िंदा हैं अब तलक जाने कितनों के चाक दिल, उनके नाम हो गये !     ये मोहब्बत की चालें हम तो न समझ पाए “मिश्र“, जाने कितनों ने जां गंवाई, कितने नाकाम हो गये !  

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#Gazal by Shanti swaroop Mishra

ज़िन्दगी के तमाशे भी यारो, कितने अजीब होते हैं, देखते है घुस कर वही, जो दिल के करीब होते हैं !   कितना भी निभाओ रिश्ते पर मिलनी है लानतें ही, पर सोच कर क्या मरना, अपने अपने नसीब होते हैं !   कोई तो है जो करता है तय पत्थरों के मुकद्दर भी, तभी तो कुछ मंदिर में, तो कुछ राहों के बीच होते हैं !   न पूंछो कि गिर चुके हैं लोग कितने इस दुनिया के, कि मुखौटा शराफत का, मगर अंदर से नीच होते हैं !   शांती स्वरुप मिश्र 

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#Gazal by Vicky Jane

मिलाना सीख ले….. ——————————————– दुश्मनों के खिलाफ़ आवाज उठाना सीख ले!! हकीकत से तु नजरें मिलाना सीख ले!!   गुजारे़गा

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#Gazal by Ishq Sharma

तुमने बाँहो में कसकर जकड़ा है मुझे स्याह रातों में  ये  ख्याल अच्छा लगा •••••••••••••••••••••••••••••••••••• मगर तलब तुझे भी हो

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#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

जब चाहा तो पत्थरों को, भगवान् बना दिया ! जब चाहा तो घर आँगन की, शान बना दिया !   कितना मतलब परस्त है दुनिया का आदमी,     जब मतलब निकल गया, तो अंजान बना दिया !   मुझको हक़ नहीं अब अपनों को राय देने का,  यारो अपने ही घर में मुझे, मेहमान बना दिया !   बड़ी हसरतों से निभाया था हर रिश्ता मगर, ज़िन्दगी को इस आदत ने, शमशान बना दिया !    कहने को हम क्या कहें उन बेख़बर लोगों से, जिन्हें खुद की फ़ितरतों ने, शैतान बना दिया !   गर मोहब्बत भी करे कोई तो कैसे करे “मिश्र“, उसको भी आज लोगों ने, अहसान बना दिया !   शांती स्वरुप मिश्र

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