#Gazal by Shanti Swaroop Miahra

न हो जिसका जवाब, तो ऐसा सवाल क्या करना ! नहीं है जो मुकद्दर में, उसका मलाल क्या करना ! जब वक़्त था तो करते रहे हम नफरतों की खेती, जब सरका वक़्त हाथों से, तब कमाल क्या करना ! बस जीते रहे अपने लिए न समझा दर्द औरों का, फूल ही मुरझा गए, तो डालों से सवाल क्या करना ! न दिखता अगर महफ़िल में अपने वजूद का असर, तो ठहर के उस जगह पे, इज़्ज़त हलाल क्या करना ! ज़िन्दगी तो उलझ गयी इस दुनियां के ताने वाने में, जब टूटे पड़े हों रिश्ते, तो अपना ख़याल क्या करना ! “मिश्र” शराफ़त का दुनिया में ग्राहक नहीं कोई भी, जब अँधेरे रास आते हों, तो रोशनी बहाल क्या करना ! शांती स्वरूप मिश्र  

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#Gazal by Shanti Swaroop Mishra

उनका दिल तोड़ कर जाना, अच्छा नहीं लगता, हो जाना मोहब्बत में रूसबा, अच्छा नहीं लगता ! वो हमसे मुख़ातिब हों न हों कोई बात नहीं यारो, मगर किसी और से बतियाना,अच्छा नहीं लगता ! उनके मुस्कराने से भले ही चमकती हैं बिजलियाँ, मगर मुस्कराएं कहीं और वो, अच्छा नहीं लगता ! ज़िन्दगी भर इंतज़ार करूं ये भी कुबूल है मुझको, मगर बिछड़ जाना भी उनका, अच्छा नहीं लगता ! कसते हैं हम भी ताने अपना इख्तियार समझ कर, पर कोई और बुरा बोले उनको, अच्छा नहीं लगता ! अगर भूल जाएं हमको तो न कोई शिकायत हमें, मगर दिल लुटाएं किसी गैर पर, अच्छा नहीं लगता !  ** उनके नख़रे उठा पाना, गर मेरे बस में होता, मैं तो उन्हीं का हो जाता, गर मेरे बस में होता ! उनकी आँखों में छप जाता मूरत बन कर मैं, ख्वाबों में यूं ही घुस जाना, गर मेरे बस में होता ! मुस्कान सजाकर रख लेता चेहरे पर अपने मैं

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#Gazal By Ramesh Raj

रुक्न के अनुसार हू-ब-हू, बिना मात्रा गिराए एक ग़ज़ल- बहर-फायलातुन फायलातुन फायलुन ** आप तो अहले-शरारत हैं बहुत आपसे हमको

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