#Kahani by Harprasad Pushpak

पुरूस्कार (  लघु कथा) निष्ठा पूर्वक शिक्षण कार्य करते हुए। सीधे सरल और शान्त स्वाभाव पांडे जी ने विगत पांच बर्षों में एक भी अवकाश नही लिया था । स्टाफ रूम में बैठे साथी अध्यापको में मिश्रा जी ने चुटकी लेते हुए कहा- क्यों पांडे जी अवकाश बचाकर कहां ले जाओगे ?तभी तपाक से यादव जी ने कहा-अरे ! भाई भावी जी से वहुत डरते हैं,इसी लिये तो कोई अवकाश नही लेते है ।मिश्रा जी…

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"#Kahani by Harprasad Pushpak"

#Kahani by Surendra Kumar Singh

पूजा ** आज बहुत खुश दिख रही हो दर्शनांशि।लगता है कुछ खास है। हाँ राही आज कुछ खास है माँ का सन्देश है मुझे अपने देश जाना है पूजा में शरीक होने और माँ का कहना है मैं तुम्हे लेकर आऊँ। चलोगे न हाँ चल सकता हूँ देखना है तुम्हारा देश और तुम्हारे देश की पूजा। लेकिन तुम शरीर के साथ मेरे देश नही चल सकते।चलो तुम्हारे यहीं कहीं छिपा देते है और चलते हैं…

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"#Kahani by Surendra Kumar Singh"

#Kahani by ViShal Narayan

–” ख्वाहिश “– बहुत सारे डाक्टरों को दिखाने के बाद संतान हुआ था मैनेजर बाबू को. वो भी सुंदर सा सलोना लड़का. उसे देख देख फूले न समाते. जब वो हंसता रोम रोम खुश हो जाता और जब उदास या रोने लगता परेशान हो उठते मैनेजर बाबू. चाहते थे कि हमेशा हंसता रहे उनका लाल तो लगे हाथ किसी ने सलाह दें दिया फोटो क्यूं नहीं ले लेते. बस क्या था पिता के साथ साथ…

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"#Kahani by ViShal Narayan"

#Kahani by Naman Writer

“मूकबधिर” **** ” चल यहाँ से हट , भाग ” प्रखर के ये उच्चारण अपने से सात साल बडे बाईस वर्षीय “मूकबधिर” भाई अंकुर के लिए थे । जो रोज की तरह आज भी अपने घर की देहली के पास बनी नाली से सटकर बैठना चाहता था । जब तक माँ जीवित थी उन्होने ने अंकुर को पाला-पोसा पर उनके गुजरते ही प्रखर ने अपने “मूकबधिर” भाई को घर से बेघर कर दिया लेकिन घर…

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"#Kahani by Naman Writer"

#Kahani By Lovelesh Dutt

मिट्टी “अब ऐसे मुँह फुलाए बैठने से क्या होगा पिताजी? कुछ तो जवाब दीजिए।” “…” “वैसे भी उस ज़मीन में रखा ही क्या है? हमारे बचपन में थी उपजाऊ लेकिन अब तो बंजर ही है। उसमें सिवाय मिट्टी के और कुछ नहीं है…और मिट्टी की कोई कीमत नहीं होती यह आप अच्छी तरह जानते हैं फिर उसे कलेजे से चिपकाए बैठे रहने में कौन सी समझदारी है?” “पर बेटा…” “बस यही जो ‘पर’ है न…

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"#Kahani By Lovelesh Dutt"

#Kahani by Dr. Sarla Singh

“उलझन” ………….. शाम का समय ,आकाश में बादल छाये  हुए थे, हवा तेज चल रही थी और मौसम भी जाड़े का ।लोग रजाई में दुबके पड़े गर्मचाय का आनन्द ले रहे थे । सरिता चाय के साथ ही साथ बातें भी कर रही थी तभी बगलवालेअजय जी की बातें होने लगीं। अजय जी अपने निजी जीवन से न जाने क्यों त्रस्त थे ।अच्छे खासे पढ़ने वाले बच्चे अच्छी सी पत्नी ,पर अजय काल्पनिक लोक में…

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"#Kahani by Dr. Sarla Singh"

#Kahani by Lovelesh Dutt

मिट्टी “अब ऐसे मुँह फुलाए बैठने से क्या होगा पिताजी? कुछ तो जवाब दीजिए।” “…” “वैसे भी उस ज़मीन में रखा ही क्या है? हमारे बचपन में थी उपजाऊ लेकिन अब तो बंजर ही है। उसमें सिवाय मिट्टी के और कुछ नहीं है…और मिट्टी की कोई कीमत नहीं होती यह आप अच्छी तरह जानते हैं फिर उसे कलेजे से चिपकाए बैठे रहने में कौन सी समझदारी है?” “पर बेटा…” “बस यही जो ‘पर’ है न…

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#Khani by Dr. Sarla Singh

लघुकथा–घुटन मैम मैं भी बहुत लिखती थी । किसी भी घटना को कलमबद्ध कर लिया करती थी ।कुछ कहानियाँ व कविताएँ भी लिखी थीं,पर मेरे घर में कुछ भी अपना व्यक्तिगत नहीं है । मतलब ?मैं कुछ अनजान सी छेड़ते हुए बीच में बोल पड़़ी । मतलब कोई किसी की भी डायरी आदि देख सकता है । तो क्या हुआ ,कौन सा गलत काम है कविता ,कहानी ,संस्मरण लिखना । तुम तो कितना  अच्छा काम…

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"#Khani by Dr. Sarla Singh"

# Kahani by avanindra Bismil

पेन्टिंग का सच कमरें मे प्रवेश करते ही दीपा चौंकी,एक छोटा सा कमरा जिसमें एक पलंग पडा है।चारो तरफ बिखरी किताबें,पेन्टिग्स,डायरियाँ बिखरी पडी है और पलंग पर अस्त वयस्त कपडे पहने एक युवक बैठा है,जो किसी पेन्टिंग को निहार रहा है।उसके चेहरे पर हताशा,निराशा के भाव आ रहें हैं।वह अपने विचारों में इतना खोया हुआ है कि उसे पता ही नही चला बडी देर से कोई दरवाजे पर खडा उसे देख रहा है।’तुम यहाँ रहते…

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"# Kahani by avanindra Bismil"

#Kahani by Lucky Nimesh

शियो की दस्तक “अदा उठ जाओ बेटी देखो दिन निकल आया है” अम्मी ने उसे कधां पकडकर उठाने की नाकाम कोशिश की मगर अदा उठने की बजाय करवट बदलकर फिर से सो गई! अम्मी बडबड करती हुई रसोई में चाय बनाने चली गई! वो ऐसी ही थी दरमि्याना कद ,सावँली सी मगर नयन नक्श अच्छे थे! इण्टर करने के बाद वो आजकल घर में ही अम्मी का हाथ बटा रही थी! * असद खान अपने…

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"#Kahani by Lucky Nimesh"

#Kahani by Naman Writer

पश्चाताप् – “दरकरते रिश्ते से” “माँ जोर से चीखी , बस बहू ,  – बूढी हो चुकी हूँ तेरी माँ समान हूँ , यूँ इस तरह बडो की बेअदबी न कर बेटी ।” पर बहू कहाँ सुनने वाली , वो अपनी जिव्हा के शब्दबाणो का प्रयोग अपनी माँ तुल्य सास के मान मर्दन के लिए करना चाहती थी और कर भी रही थी । बेटा बहू के आगे कुछ बोलने की हिम्मत कर न सका…

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"#Kahani by Naman Writer"

#Kahani by Dr. Shrimati Tara Singh

कफ़न की तलाश बुढ़ापे का एकमात्र सहारा, अपनी लाठी को आँगन के कोने में रखते हुए रामदास, अपनी पत्नी झुनियाँ से कहा—- जानती हो, चमेली की माँ, हमदोनों के अरमानों के मेले में , चाहत की उँगली थामकर चलने वाला सुख, कब कहाँ गुम हो गया , हमें पता भी न चला । हम तो पेट की भूख को मिटाने की धुन में भूखे-प्यासे ,नदी-नाले, पर्वत-खाई , सबों को पार करते , चलते रहे ।…

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"#Kahani by Dr. Shrimati Tara Singh"

#Kahani By Dr/ Tara Singh

हवन कुंड 20 साल गुजर गये, सावित्री के पति को मरे हुए, तब उसके दोनों बेटे छोटे-छोटे थे; एक दश के और एक आठ के रहे होंगे । पूंजी के नाम पर पति का दिया एक घर था, और एक गाय , जिसका दूध बेचकर सावित्री ने अपने बच्चों को पाला, पढ़ाया-लिखाया । जब दूध के पैसे, बच्चों के खर्च के लिए कम पड़ जाते थे, सावित्री ,रात का अपना भोजन छोड़ दिया करती थी…

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"#Kahani By Dr/ Tara Singh"

#Kahani by Shabnam Sharma

प्यास बात उन दिनों की है जब मंडल कमीशन का काफी शोर था। जगह-जगह बंद चल रहे थे। इस बीच मुझे लखनऊ जाना पड़ गया। ज़रूरी काम था। मैं सामान समेट कर चल पड़ी। मेरे साथ मेरा 4 बरस का बेटा भी था। हम देहरादून से रवाना हुए। ट्रेन रात को साढ़े आठ बजे के करीब चली। मन में एक अजीब सा डर बैठा था। 2-3 जगह ट्रेन रुकी। गंतव्य तक पहुँचने में काफ़ी लेट…

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"#Kahani by Shabnam Sharma"

#Kahani by Shabnam Sharma

रोटी हम बहुत छोटे थे। खेलने के लिये अकसर घर से बाहर निकल जाते। उन दिनों कोई टी.वी., विडियो गेम या फिर दूसरा साधन न था। इतवार का दिन था। सामने वाले के झार में काम लगा हुआ था। मिट्टी, रेत के बड़े-बड़े ढेर थे। हम बच्चे वहीं खेलने लगे। काफी देर खेलने के बाद हम आम के पेड़ के नीचे बैठने को आये। वहाँ पर एक मज़दूर हाथ में रोटी का डिब्बा लिये आ…

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"#Kahani by Shabnam Sharma"

#Khani by Shabnam Sharma

दिन हौसला सुबह का वक्त था। जनवरी का महिना। लखनऊ की ठंड। मैं छत पर जाकर बैठ गई। मन बहुत उदास था। मेरी बेटी मात्र 8 महिने की थी और बेटा 12 साल का। मेरे पति को फौज से रिटायरमेंट मिल गई थी। रोटी के लाले पड़ गये थे। कभी अपनी गोद में आई बेटी को देखती तो कभी मझधार में खड़े बेटे को। पति की मायूसी भी मुझसे देखी न जा रही थी। आगे…

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"#Khani by Shabnam Sharma"

#Khani by Shabnam Sharma

वो पागल गली-गली में घूमती रहती, फिर कभी मन्दिर के सामने या फिर सड़क के किनारे बैठ जाती। उसके बच्चे उसी शहर में रहते थे। उसे ढूंढकर कहीं भी वो उसे खाना देकर आते, उसके कपड़े बदलवा कर आते। फिर भी पूरा दिन घर से बाहर रहकर वो बीमार हो गई। उसे बहुत ज़ोर का बुखार था। उनकी बड़ी बेटी उन्हें अस्पताल लेकर गई, उनका चैकअप कराया। डा. ने उन्हें टी.बी. बताई। जैसे-तैसे उन्हें अस्पताल…

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"#Khani by Shabnam Sharma"

#Kahani by DR.Arvind Jain

एक बीड़ी का सवाल बस रुकते ही उतरने वालों को उतावली और चढ्न वाली सांवरिया की आतुरता सीट पाने की . बस की खिड़की से अपना झोला , गमछाफेंककर सीट सुरक्षित रखना अमूमन ग्राममें सभ्यता की निशानी हैं . अन्य सवारियों के साथ उतारने में बुजुर्ग व्यक्तियों को मैडम की व सांवरिया बैठी , दोनों बुजुर्गों ने आपस में एक दूसरे को देखा और अरे ! पायलागू महाराज . शांडिल्य जी — कहा से पधार…

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"#Kahani by DR.Arvind Jain"

#Kahani by Shabnam Sharma

वो 1 नं. ईमानदारी (पेपर) परीक्षा चल रही थी। बच्चों ने अपनी यथाशक्ति के अनुसार मेहनत की थी। कुछ बच्चे प्रश्नपत्र को देखकर परेशान नज़र आ रहे थे व दूसरे बच्चे खुश थे। कुछ सिर्फ थोड़े से नम्बरों के लिये परेशान थे तो कुछ सिर्फ मात्र पास होने का जुगाड़ जोड़ रहे थे। पर संजीव को सिर्फ उन 2 नम्बरों की फिक्र थी जो उसे आता न था। उसके मुकाबले का दोस्त हरीश भी बगल…

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"#Kahani by Shabnam Sharma"

#Kahani by Shabnam Shaqrma

समझौता बन्तो ताई रिश्ता लेकर आई थी। घर बहुत बड़ा था, घर में 2-2 गाड़ियाँ, बड़े-बड़े खेत हैं। लड़का इकलौता है। हरिदास की तीन लड़कियाँ हैं एक से एक सुन्दर, गुणी व होनहार। वह घर देखने अपने छोटे भाई के साथ गये। सब कुछ पसंद आ गया। लड़का भी ठीक लगा। बात-बात में लड़के वालों ने कहा कि उनकी कोई भी माँग नहीं है, अच्छी लड़की के सिवा। ये सुनकर हरिदास की साँस में साँस…

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#Kahani ty dr arvind Jain

अनाथालय शीला ने किरण से डांटते हुआ पूछा आज कल कॉलेज से बहुत देर से घर वापिस आती हो ,कहाँ जाती हो ?सोच रही थी की कोई कोचिंग जानाशुरू कर दिया . पापा की जो शह रहती हैं . किरण -मम्मी में अनाथालय से लौट रही हु ? क्यों क्या कोई वह भर्ती हैं . ? दादी की तबियत ज्यादा ख़राब हैं .वार्डन का फ़ोन पापा के पासआया था . अच्छा ये सब बाते मुझसे…

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"#Kahani ty dr arvind Jain"

#Kahani by Dr Arvind Jain

गले मिलकर गला काटा . महेश 11 वी कक्षा का छात्र  अपने दोस्तों के साथ प्रदेश के मुख्य दर्शनीय स्थलों का भ्रमण करने निकला . उसने मालवा   अंचल  से     यात्रा शुरू कर अंतिम छोर पूर्व की ओर जबलपुर आये .जबलपुर में बहुत दर्शनीय स्थानों को देखा. यात्रा अनिश्चित थी सो लौटने का आरक्षण नहीं हो पाया . सब लोगो  के  पास इतने पैसे बचे थे की वे टिकेट लेकर अपने घर वापिस आ सके. और…

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"#Kahani by Dr Arvind Jain"

#Kahani by Laxmi Khanna Suman

लघु कथा सब सामान्य और आँख मूँदकर गुटक जाता हूँ वह कड़वा घूँट ! फाँकी जरा सी चीनी सब सामान्य -सहज , वैसा का वैसा । क्या गया मेरा ? आख़िर आलाकमान का आदेश था दूरभाष पर ! कडुआ घूँट भरना ही था मुझे । उनके किसी चहेते को कोई राज रोग था , शायद नाकाबलियत का , और उनके आदेशानुसार मुझे ही भरना था कड़वा घूँट , उस बदबूदार द्रव्य का जिसे वे उसकी…

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"#Kahani by Laxmi Khanna Suman"

#Kahani by Laxmi Khanna Suman

लघु कथा पुराना खिलाड़ी अकेली जवान औरत जाने कहाँ से भटककर आई और ‘ फ़ार्म ‘ के बाहर गेट पर खड़ी हो गई । ननकू ने उससे बात की और मुंशी जी से कहकर उसे काम पर लगवा दिया । पर अकेली जवान औरत पर कई लोगों की नजर थी । एक दिन मुंशी जी ने मुझसे कहा, ‘ साहब, वे  साथ वाले कुंदन बाबू कह रहे थे कि उस औरत को उनके यहाँ भेज…

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"#Kahani by Laxmi Khanna Suman"

#Kahani by Asif al atas

Kahani अरमान पिछले २२ मिनट से उसको ये समझाने की कोशिश कर रहा था कि तुम किसी टेंशन में हो तुम आज मुझे बहुत परेशान लग रही हो.और इस बार भी उसने उससे यही कहा प्लीज़ मुझे बताओ आख़िर हुया क्या है? इस बार भी शीरीं ने अपनी गर्दन हिलाकर इशारा किया कि कुछ नही.लेकिन अरमान ये बात मानने को तैयार नही था क्यूंकि उसका दिल बहुत बेचैन था जिसका मतलब है कि शीरीं किसी…

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"#Kahani by Asif al atas"