#Kahani by Shabdh Masiha

साहित्य-मानव ========== लेखकों के सम्मान में बहुत बड़ा आयोजन किया गया था . सभी नामचीन लेखकों को आमंत्रित किया गया था . संयोजक की भूमिका निभाते नीलाभ की माँ की बड़ी इच्छा थी कि वह भी इस कार्यक्रम को खुद देखे .किन्तु अस्वस्थता के चलते वह बहुत धीरे-धीरे चलती थीं . उस रोज वह नीलाभ के साथ ही कार्यक्रम स्थल पर गयीं . लेकिन नीलाभ के लिए जरुरी फोन आ गया . वह अपने पुराने…

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"#Kahani by Shabdh Masiha"

#Kahani By Pratik Palor

लघु कथा: साइकिल सात वर्ष की उम्र से ही हेमन्त को अपने दोस्तों को साइकिल चलाते हुए देख कर बड़ा अरमान होता था की उसकी भी एक चमचमाती, सुन्दर, आधुनिक रूप वाली छोटी-सी साइकिल हो । किसी पर रौब पड़े या न पड़े, पर अपनी साइकिल पर घूमने का आनन्द ही शानदार होगा । ऐसे धनाढ्य परिवार से तो था नहीं की इधर आवाज़ की और उधर साइकिल आ गई । तो उसने सोचा पहले…

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"#Kahani By Pratik Palor"

#Kahani by Harprasad Pushpak

लघुकथा—तकनीक अश्विन कई बार बचने के बाद भी आखिर एक दिन अधिकारी के चंगुल में फंस ही गया ।बचने के ऐ प्रयास करने के बाद भी उसे सफलता नही मिली क्योंकि अधिकारी की छवि एक ईमानदार कड़क अधिकारी की थी ।अब उसने एक अन्तिम प्रया्स किया और अधिकारी के घरेलू नौकर को पांच सौ रूपये का प्रलोभन देते हुए पूछा -बुधिया ये बताओ तुम्हारे साहब के घर रोज इतनी बड़ी बड़ी गाड़ियां क्यों आती हैं…

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"#Kahani by Harprasad Pushpak"

#Kahani by Pratik Palor

लघु कथा: दीदी शालिनी चचेरी बहन थी सुबोध की । बस कुछ महीने ही तो बड़ी थी । तीन साल की उम्र से ही सुबोध के लिए बहन कहने को वही थी और सगी है या नहीं, इसकी समझ आने में अभी वक़्त बहुत था । वैसे शालिनी ने कभी एहसास भी नहीं होने दिया की ऐसा नहीं है । सुबोध को जो आत्मविश्वास, सम्बल और ख़ुशी शालिनी से मिलती थी, वो सुबोध के लिए…

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"#Kahani by Pratik Palor"

#Kahani by Harprasad Pushpak

अभिनय (लघु कथा ) ——————————- लम्बी दूरी की रेलगाड़ी जंक्शन पर आकर रूकी।यहां से कुछ डिब्बे और जुड़ने थे ।इस लिये टे्न को कुछ समय रूकना था ।अचानक एक दस बारह साल का एकलड़का रोता हुआ डिब्बे में चढ़ा ।हाथ में कटोरा लिये चीख चीख कर आंसू बहा रहा था वह हाथ से ईशारा कर कहता जा रहा था वह दूर चादर में लिपटा मेरा बाप थोड़ी देर पहले ही मरा है उनके पास मेरी…

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"#Kahani by Harprasad Pushpak"

#Kahani by Pratik Palor

लघु कथा: साइकिल सात वर्ष की उम्र से ही हेमन्त को अपने दोस्तों को साइकिल चलाते हुए देख कर बड़ा अरमान होता था की उसकी भी एक चमचमाती, सुन्दर, आधुनिक रूप वाली छोटी-सी साइकिल हो । किसी पर रौब पड़े या न पड़े, पर अपनी साइकिल पर घूमने का आनन्द ही शानदार होगा । ऐसे धनाढ्य परिवार से तो था नहीं की इधर आवाज़ की और उधर साइकिल आ गई । तो उसने सोचा पहले…

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#Kahani by Vishal Narayan

–” बेमतलब किरदार “– कहानी में कुछ किरदार बेमतलब, बिला वजह ही आ जाते हैं. ना तो उनकी जरुरत होती है और ना ही कोई महत्वपूर्ण कार्य कि जिसको अंजाम न दो तो कहानी रुक जाएगी. फिर भी ये आते हैं. मुस्कुराते हैं. अपना सबकुछ लगा देते हैं और आपको हंसाते भी हैं. और फिर…. फिर क्या, कुछ भी नहीं. समाज की यही रीति रही है, वक्त की यही नीति रही है. जिस पात्र का…

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"#Kahani by Vishal Narayan"

#Kahani by Vikas Pal

(लघुकथा) भीतर का हाल स्कूल में एक दिन पहले ठहरे बारातियों के खाकर फेंके दोने-पत्तलों को कुचलते और धूल के हवाई हमलों को सहते हुए शर्मा जी, शुभम का पाँचवीं में एडमिशन कराने को कार्यालय कक्ष की तरफ एक-एक कदम बढ़ा रहे थे किन्तु उनका निश्चय मन से पाँव पीछे खींच रहा था। पत्नी नही चाहती थी। आंतरिक इच्छा तो उनकी भी सरकारी स्कूल में पढ़ाने की नहीं थी किन्तु नवोदय विद्यालय में सरकारी स्कूल…

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"#Kahani by Vikas Pal"

#Kahani by Vishal Narayan

-” मुहब्बत तो नहीं “– ओए हीरो, क्या बात है. सुबह से साफ सफाई चल रही है. धोए हुए कपड़े भी धो डाले. पूरा घर चमकाए जा रहे हो. दीवाली आने वाली है क्या. और मुझे तो नहीं लगता कभी गलती से भी जनवरी में दिवाली आई हो. और ये ऊंची आवाज में भजन कौन सून रहा है. कल तक तो मेरे रस्के कमर … मजा आ गया फुल वोल्युम में बज रहा था. और…

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"#Kahani by Vishal Narayan"

#Kahani by Harprasad Pushpak

पुरूस्कार (  लघु कथा) निष्ठा पूर्वक शिक्षण कार्य करते हुए। सीधे सरल और शान्त स्वाभाव पांडे जी ने विगत पांच बर्षों में एक भी अवकाश नही लिया था । स्टाफ रूम में बैठे साथी अध्यापको में मिश्रा जी ने चुटकी लेते हुए कहा- क्यों पांडे जी अवकाश बचाकर कहां ले जाओगे ?तभी तपाक से यादव जी ने कहा-अरे ! भाई भावी जी से वहुत डरते हैं,इसी लिये तो कोई अवकाश नही लेते है ।मिश्रा जी…

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"#Kahani by Harprasad Pushpak"

#Kahani by Surendra Kumar Singh

पूजा ** आज बहुत खुश दिख रही हो दर्शनांशि।लगता है कुछ खास है। हाँ राही आज कुछ खास है माँ का सन्देश है मुझे अपने देश जाना है पूजा में शरीक होने और माँ का कहना है मैं तुम्हे लेकर आऊँ। चलोगे न हाँ चल सकता हूँ देखना है तुम्हारा देश और तुम्हारे देश की पूजा। लेकिन तुम शरीर के साथ मेरे देश नही चल सकते।चलो तुम्हारे यहीं कहीं छिपा देते है और चलते हैं…

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"#Kahani by Surendra Kumar Singh"

#Kahani by ViShal Narayan

–” ख्वाहिश “– बहुत सारे डाक्टरों को दिखाने के बाद संतान हुआ था मैनेजर बाबू को. वो भी सुंदर सा सलोना लड़का. उसे देख देख फूले न समाते. जब वो हंसता रोम रोम खुश हो जाता और जब उदास या रोने लगता परेशान हो उठते मैनेजर बाबू. चाहते थे कि हमेशा हंसता रहे उनका लाल तो लगे हाथ किसी ने सलाह दें दिया फोटो क्यूं नहीं ले लेते. बस क्या था पिता के साथ साथ…

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"#Kahani by ViShal Narayan"

#Kahani by Naman Writer

“मूकबधिर” **** ” चल यहाँ से हट , भाग ” प्रखर के ये उच्चारण अपने से सात साल बडे बाईस वर्षीय “मूकबधिर” भाई अंकुर के लिए थे । जो रोज की तरह आज भी अपने घर की देहली के पास बनी नाली से सटकर बैठना चाहता था । जब तक माँ जीवित थी उन्होने ने अंकुर को पाला-पोसा पर उनके गुजरते ही प्रखर ने अपने “मूकबधिर” भाई को घर से बेघर कर दिया लेकिन घर…

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"#Kahani by Naman Writer"

#Kahani By Lovelesh Dutt

मिट्टी “अब ऐसे मुँह फुलाए बैठने से क्या होगा पिताजी? कुछ तो जवाब दीजिए।” “…” “वैसे भी उस ज़मीन में रखा ही क्या है? हमारे बचपन में थी उपजाऊ लेकिन अब तो बंजर ही है। उसमें सिवाय मिट्टी के और कुछ नहीं है…और मिट्टी की कोई कीमत नहीं होती यह आप अच्छी तरह जानते हैं फिर उसे कलेजे से चिपकाए बैठे रहने में कौन सी समझदारी है?” “पर बेटा…” “बस यही जो ‘पर’ है न…

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"#Kahani By Lovelesh Dutt"

#Kahani by Dr. Sarla Singh

“उलझन” ………….. शाम का समय ,आकाश में बादल छाये  हुए थे, हवा तेज चल रही थी और मौसम भी जाड़े का ।लोग रजाई में दुबके पड़े गर्मचाय का आनन्द ले रहे थे । सरिता चाय के साथ ही साथ बातें भी कर रही थी तभी बगलवालेअजय जी की बातें होने लगीं। अजय जी अपने निजी जीवन से न जाने क्यों त्रस्त थे ।अच्छे खासे पढ़ने वाले बच्चे अच्छी सी पत्नी ,पर अजय काल्पनिक लोक में…

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"#Kahani by Dr. Sarla Singh"

#Kahani by Lovelesh Dutt

मिट्टी “अब ऐसे मुँह फुलाए बैठने से क्या होगा पिताजी? कुछ तो जवाब दीजिए।” “…” “वैसे भी उस ज़मीन में रखा ही क्या है? हमारे बचपन में थी उपजाऊ लेकिन अब तो बंजर ही है। उसमें सिवाय मिट्टी के और कुछ नहीं है…और मिट्टी की कोई कीमत नहीं होती यह आप अच्छी तरह जानते हैं फिर उसे कलेजे से चिपकाए बैठे रहने में कौन सी समझदारी है?” “पर बेटा…” “बस यही जो ‘पर’ है न…

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"#Kahani by Lovelesh Dutt"

#Khani by Dr. Sarla Singh

लघुकथा–घुटन मैम मैं भी बहुत लिखती थी । किसी भी घटना को कलमबद्ध कर लिया करती थी ।कुछ कहानियाँ व कविताएँ भी लिखी थीं,पर मेरे घर में कुछ भी अपना व्यक्तिगत नहीं है । मतलब ?मैं कुछ अनजान सी छेड़ते हुए बीच में बोल पड़़ी । मतलब कोई किसी की भी डायरी आदि देख सकता है । तो क्या हुआ ,कौन सा गलत काम है कविता ,कहानी ,संस्मरण लिखना । तुम तो कितना  अच्छा काम…

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"#Khani by Dr. Sarla Singh"

# Kahani by avanindra Bismil

पेन्टिंग का सच कमरें मे प्रवेश करते ही दीपा चौंकी,एक छोटा सा कमरा जिसमें एक पलंग पडा है।चारो तरफ बिखरी किताबें,पेन्टिग्स,डायरियाँ बिखरी पडी है और पलंग पर अस्त वयस्त कपडे पहने एक युवक बैठा है,जो किसी पेन्टिंग को निहार रहा है।उसके चेहरे पर हताशा,निराशा के भाव आ रहें हैं।वह अपने विचारों में इतना खोया हुआ है कि उसे पता ही नही चला बडी देर से कोई दरवाजे पर खडा उसे देख रहा है।’तुम यहाँ रहते…

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#Kahani by Lucky Nimesh

शियो की दस्तक “अदा उठ जाओ बेटी देखो दिन निकल आया है” अम्मी ने उसे कधां पकडकर उठाने की नाकाम कोशिश की मगर अदा उठने की बजाय करवट बदलकर फिर से सो गई! अम्मी बडबड करती हुई रसोई में चाय बनाने चली गई! वो ऐसी ही थी दरमि्याना कद ,सावँली सी मगर नयन नक्श अच्छे थे! इण्टर करने के बाद वो आजकल घर में ही अम्मी का हाथ बटा रही थी! * असद खान अपने…

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#Kahani by Naman Writer

पश्चाताप् – “दरकरते रिश्ते से” “माँ जोर से चीखी , बस बहू ,  – बूढी हो चुकी हूँ तेरी माँ समान हूँ , यूँ इस तरह बडो की बेअदबी न कर बेटी ।” पर बहू कहाँ सुनने वाली , वो अपनी जिव्हा के शब्दबाणो का प्रयोग अपनी माँ तुल्य सास के मान मर्दन के लिए करना चाहती थी और कर भी रही थी । बेटा बहू के आगे कुछ बोलने की हिम्मत कर न सका…

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#Kahani by Dr. Shrimati Tara Singh

कफ़न की तलाश बुढ़ापे का एकमात्र सहारा, अपनी लाठी को आँगन के कोने में रखते हुए रामदास, अपनी पत्नी झुनियाँ से कहा—- जानती हो, चमेली की माँ, हमदोनों के अरमानों के मेले में , चाहत की उँगली थामकर चलने वाला सुख, कब कहाँ गुम हो गया , हमें पता भी न चला । हम तो पेट की भूख को मिटाने की धुन में भूखे-प्यासे ,नदी-नाले, पर्वत-खाई , सबों को पार करते , चलते रहे ।…

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"#Kahani by Dr. Shrimati Tara Singh"

#Kahani By Dr/ Tara Singh

हवन कुंड 20 साल गुजर गये, सावित्री के पति को मरे हुए, तब उसके दोनों बेटे छोटे-छोटे थे; एक दश के और एक आठ के रहे होंगे । पूंजी के नाम पर पति का दिया एक घर था, और एक गाय , जिसका दूध बेचकर सावित्री ने अपने बच्चों को पाला, पढ़ाया-लिखाया । जब दूध के पैसे, बच्चों के खर्च के लिए कम पड़ जाते थे, सावित्री ,रात का अपना भोजन छोड़ दिया करती थी…

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"#Kahani By Dr/ Tara Singh"

#Kahani by Shabnam Sharma

प्यास बात उन दिनों की है जब मंडल कमीशन का काफी शोर था। जगह-जगह बंद चल रहे थे। इस बीच मुझे लखनऊ जाना पड़ गया। ज़रूरी काम था। मैं सामान समेट कर चल पड़ी। मेरे साथ मेरा 4 बरस का बेटा भी था। हम देहरादून से रवाना हुए। ट्रेन रात को साढ़े आठ बजे के करीब चली। मन में एक अजीब सा डर बैठा था। 2-3 जगह ट्रेन रुकी। गंतव्य तक पहुँचने में काफ़ी लेट…

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"#Kahani by Shabnam Sharma"

#Kahani by Shabnam Sharma

रोटी हम बहुत छोटे थे। खेलने के लिये अकसर घर से बाहर निकल जाते। उन दिनों कोई टी.वी., विडियो गेम या फिर दूसरा साधन न था। इतवार का दिन था। सामने वाले के झार में काम लगा हुआ था। मिट्टी, रेत के बड़े-बड़े ढेर थे। हम बच्चे वहीं खेलने लगे। काफी देर खेलने के बाद हम आम के पेड़ के नीचे बैठने को आये। वहाँ पर एक मज़दूर हाथ में रोटी का डिब्बा लिये आ…

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"#Kahani by Shabnam Sharma"

#Khani by Shabnam Sharma

दिन हौसला सुबह का वक्त था। जनवरी का महिना। लखनऊ की ठंड। मैं छत पर जाकर बैठ गई। मन बहुत उदास था। मेरी बेटी मात्र 8 महिने की थी और बेटा 12 साल का। मेरे पति को फौज से रिटायरमेंट मिल गई थी। रोटी के लाले पड़ गये थे। कभी अपनी गोद में आई बेटी को देखती तो कभी मझधार में खड़े बेटे को। पति की मायूसी भी मुझसे देखी न जा रही थी। आगे…

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"#Khani by Shabnam Sharma"