kavita by Vinita rahurikar

तुम प्रतिरूप हो मेरे पर, मैं तो साक्षात् जीवन हूँ सीखा नहीं है मैंने कभी भी, किसी भी परिस्थिति में हारना पाताल के अंधेरों से जलते सूरज तक मैं हर एक कण में विद्यमान हूँ तुम चाहे कितना भी कुचलते रहो मुझे उग आउंगी हर बार चट्टानों का भी सीना चीरकर बरगद और पीपल की तरह। तुम कितनी बार भी बाहर उगल दो मुझे फिर भी बलात् तुम्हारे फेफड़ों में घुस ही जाउंगी बहुत जरुरी…

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kavita by ashok jaiswal

–         -: “पात्रों के नाम व जगह भर बदलते हैं” सुबह आज का ताजा अख़बार देखा, वही मार-काट-हत्या और बलात्कार, रोज ही तो पढ़ता हूँ इन घटनाओं को, पात्रों के नाम व जगह भर बदलते हैं….!! सब्जी~मंडी में भूखों की भीड़ देखी, भूख की भी अपनी-अपनी किस्में हैं, पेट की भूख और शरीर की भूख भी, आंतकी रक्त की भूख पे मचलते हैं….!! दंतविहीन को दंतमंजन बेचते देखा, अंधों ने लगा…

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kavita by bunty singh

शंकर पुत्र गणपति है नाम गौरी के लाल हे वक्रतुंड प्रथम पूजयते बुद्धि ज्ञान दो मोदक प्रिय मूषक की सवारी मंगल मूर्ति जय गणेश पधारे भक्त हिय करें आरती शुभकामना अतिथि आगमन सजे पंडाल ऋण मोचन हे महा गणपति देव देवेश मंगल कार्य गणपति पूजन अथर्वशीर्ष परशुराम कैलाश में प्रवेश स्तंभित युद्ध सूंड लपेट गौलोक से भूतल दिया पटक परशु वार कटा एक ही दांत हे एकदन्त मातृ आदेश द्वार पर रक्षक क्रोधित शिव आज्ञा…

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"kavita by bunty singh"

kavita by ashok snehi

लौट चुके हैं थके पखेरू मुंदे कमल ठहरे पानी में पेडों के धुंधलाते साये. सिमट रहे हैं धीरे  धीरे रजनी की पसरी चादर में थकी देह कर्मों के अक्षर संकल्पों की द्वंद्व श्रृंखला. ठहर गई हैं लटें तुम्हारी अर्धोन्मीलित पलकों की यह बढी खुमारी. सो जाओ अब दिया बुझाकर कुछ ही देर में सपनों का संसार खुलेगा.

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kavita by BRAHMA DEV SHARMA

जिन्होंने कहा अवनमन कर रहा हूँ | वही कह रहे उन्नयन कर रहा हूँ || सभी कुछ लुटाया कि पाया कहीं कुछ | इसी बात का आँकलन कर रहा हूँ || धुनें जो दिलों से दिलों को मिला दें | उन्हीं का यहाँ संकलन कर रहा हूँ || कभी धूप से तो कभी चाँदनी से | अमावस से” भी संतुलन कर रहा हूँ || में’री जिन्दगी तू, मुहब्बत की’ देवी | ते’रे प्यार का आचमन…

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kavita by Gulzar Singh Yadav

“विश्व योग-दिवस” “””””””——“”””””””” न कोई जाति न अब धर्म से. संबंध है योग का तन मन से.. इससे ही है जीवन का संचार. मस्तिष्क -आत्मा तन- मन से.. अष्टांग योग – साधना जीवन का है आधार. पूरक -रेचक से निरोग हैं आज सारा संसार.. प्राणायाम आसन से निरोग हो रहा जहान. श्वास प्रश्वास नियंत्रण योग का है आधार.. अब चहू ओर योग की है पूकार. विश्व पटल में हो रही आज जयकार.. योग से निरोग…

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kavita by omprakash chandel

………खो ग ई है मिट्टी की लाली खो गई है मिट्टी की लाली। मुरझा गई है धान की बाली॥ सुख गई है बरगद की डाली उजड़ी बगिया रोता माली॥ खो गई है गिद्धों की टोली। गुमसुम है कोयल की बोली।। उठ गई गॊरिया की डोली । राजहंसनी को लगी है गोली॥ उठी गर्जना भूकंप वाली। बादल फूटा बरसा पानी।। बह गई बस्ती भुमि खाली। कंजूस हो गया पर्वत दानी।। लुट रही जंगल की झोली ।…

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kavita by kiran singh

–                               – सीख लिया मर मर कर जीते जीते , मरकर जीना सीख लिया जब जिन्दगी ठोकर खाई , खुद सम्हलना सीख लिया मॄगतृष्णा में भटक रहे हैं , भाग रहे सभी यहाँ वहाँ आस लगाए चातक पंक्षी , स्वाति बूंद मिले कहाँ छलकर विजयी झूठ हो रही , टूट रहा सच दर्पण लोग मुखौटा लिए लगाए , बदल रहे…

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kavita by shambhu nath

गम कभी आने न देंगे. अग्नि को साक्षी मान कर ॥ सात फेरे हम लिए है॥ हम तुझे जाने न देंगे॥ गम कभी आने न देंगे॥ लड़ जाए गे उस बला से॥ जो तेरा अपमान करे॥ मांगना है मांग मांग लो जो॥ आसमा के तारे देंगे॥ गम कभी आने न देंगे॥ हम तुझे जाने न देंगे॥ जब तक जिन्दा रहे जम पर॥ हम तुम्हे हंसना सिखाये॥ गर कभी आये मुशीबत ॥ साथ मिल कर उसे भगाए॥ कल तेरा कोई मीत आये॥ हम उसे आने न देंगे॥ हम तुझे जाने न देंगे॥ हंसी खुसी से रहे यहाँ सब॥ यही दुआ तुम कीजिये॥ कोई भूँखा न जाए द्वार से॥ खाना उसको दीजिये॥ गर कोई आँख तुमको दिखाए॥ आँख उसकी फोड़ देंगे॥ हम तुझे जाने न देंगे॥

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"kavita by shambhu nath"

kavita by mithlesh rai ‘ mahadev ‘

        -: गुनाहगार हूँ मैं! तेरी चाहत का गुनाहगार हूँ मैं! हर लम्हा मगर तेरा तलबगार हूँ मैं! तड़प रही है आरजू तेरी ख्वाहिश में, अपनी तमन्नाओं का दर्द-ए-इजहार हूँ मैं!

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kavita by atul mishra

टूट जाते है अक्सर वो रिश्ते जो स्वार्थ पे टिके होते है । छूट जाते है अक्सर वो अवसर जो प्यार पे टिके होते है न होना अपनों से दूर मेरे दोस्त। क्यों कि दोस्ती के रिश्ते सिर्फ विश्वास पे टिके होते है

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haiku by sanjay verma”drushti”

काले बादल गगावे घणा जसा बयरा हो मोर दाँत काडिया नवी लड़ी ने जदि सासू रिसाणी वाट देखी के थाकिगी आखियाँ नींद नी  आवे चाँद -चकोर बिना बोल्या करे घणो प्यार धूली  जावे आंखियाँ को काजल फोन नी आवे

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kavita by bhushan lamba bhushan

मेरी कश्ती भी आखिर, बेवफाई पे उतर आयी, लाकर किनारे से मुझे बीच मझदार डबो डाला। हर नेता आया अपनेे किय झूठे वादों को छुपाने, दिखा कर चाँद के ख्वाब, समुंदर में डुबो डाला । करना भरोसा किसी पे, आज जोखिम का काम, बताकर रस गुल्ला जालिम ने चूना खिला डाला। अपनी टाँगें जो दोड दोड के कभी न थकती थी। आज दो कदम चलने से, , मोहताज बना डाला।

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kavita by surendr kumar singh chance

गीत **** सुरेन्द्र कुमार सिंह चांस सुबह लिखा है ********* सुबह लिखा है शाम लिखा है सागर की उठती लहरों पर हमने तम्हारा नाम लिखा है यार लिखा है प्यार लिखा है हमने तुम्हारा नाम लिखा है। पढ़ लो सुबह की पहली किरण में तारो भरे इस नील गगन में आँख में पढ़ लो प्यास में पढ़ लो प्यार में पढ़ लो चाह में पढ़ लो बहती हुयी इस शोख हवा पर हमने तुम्हारा नाम…

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kavita by ramesh raj

+स्मृतिशेष पिताश्री ‘लोककवि रामचरन गुप्त’ का एक चर्चित ‘लोकगीत’…   ऐरे चवन्नी भी जब नाय अपने पास, पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूं? किससे किस्से कहूं कहौ मैं अपनी किस्मत फूटी के गाजर खाय-खाय दिन काटे भये न दर्शन रोटी के एरे बिना किताबन के कैसे हो छटवीं पास, पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूं? पढि़-लिखि कें बेटा बन जावै बाबू बहुरें दिन काले लोहौ कबहू पीटवौ छूटै, मिटैं हथेली के छाले एरे काऊ तरियां ते बुझे जिय मन…

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"kavita by ramesh raj"

kavita by puneeta bhardwaj

               – बेचारा बागवानएक माली ने घर आंगन में पौधे तीन लगाये धीरे- धीरे बड़े वो तीनों मन ही मन हर्षाये कभी खाद की कमी रही तो कभी न पानी पाये माली ने  फिर सींच प्रेम से वृक्ष बड़े उपजाये देख -देख खुश होता माली ,कल मीठे फल खायेंगे किन्तु पता नहीं था उसको क्या ये आँधी सह पायेंगे चली जोर की आँधी इक दिन पेड़ गिरा एक धरती…

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kavita by shyam snehi shastri

चलो कहें कुछ खरी-खरी बात भी है भली-बुरी बेरोजगारी-घटाने को गरीबी -मिटाने को विकसित-कहलाने को प्रयास जारी है आजादी के बाद से देश ने बागडोर सम्हाली है तब से अब तक कर्ज भी लेंगे और, आपको भी लूटेंगे…. तरीके बदल-बदलकर विकास के खेत में हम जियेंगे लोग मरेंगे तभी तो गरीब-मजदूर-किसान पुत्र-बेरोजगार घटेंगे खाली पेट….भरेंगे विकास के नाम देशी खाओ- विदेशी खाओ देश बना है चारागाह तन्त्र हुआ जब लापरवाह निरीह… मेमना जैसे लोग और,…

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kavita by shashwat upadhayay

बेटा जज । अफसर का बेटा अफसर तो मेरा बेटा  भी देश की सेवा करेगा  ,, इस लिये विधायक बनेगा । ठीक उसी वक्त मैं भैतिक विज्ञान के विधुत परिपथ मे उलझा था और  सही धारा प्रवाहित करा ,सवाल की पसलियां तोड़ चूका था । मैं सोचने लगा , उनके  ही मुताबिक कि.. उनके “तेजस्वी” “चिराग” तो रौशन हो गए पर मेरे पिता कहाँ के भौतिक शास्त्री हैं। और तभी , मुझे जाना पड़ा ,…

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kavita by AMARESH GAUTAM ‘AYUJ’

उठि भिन्सारे कहबा करी के,दादू थोड़ क पढ़िले, बोर्ड कलास हइ कर न आलसि,लाला पढ़िल-पढ़िले। जुलाई से स्कूलि खुली त,पोथी नहीं उठाय, नहीं बना जब उत्तर त,मुँह लटकाये आय। साल भर तइर गड़ही,बहरा,सगले कूद फाँद, कुंजी दइके चचा क अपने,चुटका के टेंशन लाद। नहीं मिला जब उत्तर ओनका,ओनहीन का खिसियान, बइठी परीक्षा रूम म काहे,जोर-जोर चिल्लान। साँझि सकारे उठिके पढ़त,तब न उत्तर आबत, पासउ होत निकहा से,मेरिटउ म नंबर आबत।

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kavita by balram ballu

अंनंत दुरिया सफ़र की लो मुझे डरा रही जिंदगी भी जंग है आभास ये करा रही कदम कदम पे पीछे पांव हम ढकेले जाते है अजीब से वे खेल भी तो हमसे खेले जाते है ै राह रोककर कर मेरी वे अपने ही पड़े मिले दिल में झांक के जो देखा सपने ही खड़े मिले हूँ धरा पे में अभी ये आसमान दूर है। चलना ही तो जिंदगी है अपना ये गुरुर है अंनंत है…

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"kavita by balram ballu"

kavita by akhilesh mishra

“अब कोई “डाकिया” नहीं आता दूर ग्राम पगडण्डी से चल, सुख-दुःख,आस-निरास उम्मीदों  के काग़ज़ बाँटने। अब क़ैद हो गयीं सारी संवेदनाएँ मोबाइल  इंटरनेट में।। भोर होते ही ऊँघता हुआ कोई बालक हाथ में गिलास ले, नहीं दिखाई दिया,बैठा दुही जाती गाय के पास । अब निकल पड़ते हैं फ्रिज से, “शीतल पेय”  सर्वतोमुखी विकास हेतु। घर के आँगन में सुखाये गए दानों को, नहीं चुगती कोई ‘गौरैया’ नहीं सुनाई देती तालियाँ  पीट कर निकाली गयी…

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kavita by ankit kumar

24/5/2015 को योगदा सत्संग महाविद्यालय राॅची केपरिसर मे 3 घंटे बिताया तो प्रकृति की कुछ सुन्दरता नजर आई जिसे कविता के माध्यम से आपके सामने रख रहा हूॅ। बैठा था हरे मैदान मेअंजाने वृक्ष के छाॅव मे इक अजीब सा सन्नाटा था बीच बीच मे कू- कू की आवाज का आना था जानवर चिड़ियो का ठिकाना था बड़ी दूर मे मकानों का नजराना था यूॅ शान्त से खड़े थे वृक्ष सभीजैसे इक दूजे से अंजाना…

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"kavita by ankit kumar"

kavita by manmohan barakoti ‘ tamacha lakhnavi ‘

–               -: “त्रासदी” आदमी ही आदमी के, खून का पियासा है। हादसों की त्रासदी है, सब तरफ निराशा है।। नफरतों की दीवारें है, आपसी दरारें है। सच यही हकीकत है, सच का ये खुलासा है।। बदनसीब माँ को देखिये, उबालती रही पत्थर। अपने दिल के टुकड़े को, दे रही दिलासा है।। अमीरों व गरीबों में, गहरी हो रहीं हैं खाईयाँ। मुफलिसों की जिंदगी से, हो रहा तमाशा है।।…

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"kavita by manmohan barakoti ‘ tamacha lakhnavi ‘"

kavita by Nishant sandilya

हमारा मिलन कभी शाम तन्हा थी कभी रात थी खामोश कभी दिन में था अंधेरा ख्वाबों की थी आगोश बाहों में  समेटेे विरह  पलों के गीतों की रचना कभी न सोचा  ,मिलने की करनी होगी कल्पना न भाव भरा न मन भरा ,फिर ये कैसा मिलन तडप रहा बंजर सा दिल,वर्षा जैसे करो मिलन नदियों के प्रवाह से हो तेज तेरे प्यार की धारा सदियो तकसब याद रखें हो ऐसा मिलन हमारा तू ख्वाब परि…

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"kavita by Nishant sandilya"

kavita by vishnu sharma (sharhade Intazar)

          – फासलों की दास्ताँहमारे  बीच फासलों का होना जरुरी रहा होगा, काफी दिनों से जी भर जो तुझे याद ना किया होगा, कहते हैं करीब रहकर मोहब्बत कम होती है, जाने दूरियों ने ही मोहब्बत को मुकम्मल किया होगा, सुबह और रात भी फासले बना कर चलते ही हैं, जाने क्या हर रात ने सुबह से क्या कहा होगा, तड़प देखि है सभी ने सुबह के आने की रात के…

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"kavita by vishnu sharma (sharhade Intazar)"